इशरत जहाँ और अर्क की जोआन

इशरत जहान तो मर चुकी है। अब तो बस यह राजनैतिक सुविधा का सवाल रह गया है की उसे साबित क्या करवाया जाये -- बेगुन्हा, या फिर गुन्हेगार ? वह तो पहले ही मर चुकी है अपना बचाव कर सकने में असमर्थ।
    अंग्रेजी नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के साहित्य सेंट जोएन की स्मृति दिलाता रहेगा आज़ाद भारत में घटा यह इशरत वाला हादसा। बर्नार्ड शॉ का साहित्य इंसान का नजरिया इसी समझ पर खोलता है की एक उचित और निष्पक्ष न्यायायिक प्रक्रिय में क्या क्या चारित्रिक विशेषतायें होनी चाहिए। बर्नार्ड शॉ फ्रांस अर्क शहर की रहने वाली की युवती जोआन की जीवन त्रासदी के माध्यम से यही बताना चाहते थे की किस किस्म की मूर्खतापूर्ण न्यायिक प्रक्रिय होती थी उस युग में जिसमे पहले इंसान को जिन्दा जला दिया जाता था और फिर राजनैतिक सुविधाओं के हिसाब से यह तय होता रहता था की वह एक चुड़ैल थी या की एक संत थी । न्याय का एक प्रथम सूत्र दुनिया भर में माना गया है की एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए भले ही हज़ारो गुन्हेगार आज़ाद और बिना सजा के बच निकले। मगर कैसी मूर्खो वाली न्यायायिक प्रक्रिय का पालन हुआ था वहां, कि पहले इंसान को सजा दी गयी, वह भी मौत की और उसके बाद साबित और फिर पुनः साबित हुआ की वह चुड़ैल थी और फिर बाद में संत।
   बर्नार्ड शॉ के उपन्यास से शायद छात्रों को यानि समझने की कोशिश थी की गलत न्यायिक प्रक्रिया में क्या क्या चरित्र दोष होते है। गोपनीयता और अप्रत्यक्ष, गैर सार्वजनिकता किसी भी गलत न्यायिक प्रक्रिया के लिए खुल्ला न्यौता होता है। आज वही देखने को मिल रहा है आज़ाद भारत में इशरत प्रकरण में, बर्नार्ड शॉ के इंसानियत की आँख खोल देने वाले इतिहास के रचे जाने के सौ सालों बाद फिर से। राष्ट्रिय सुरक्षा के नाम पर कई सारे गुप्त संस्थाओं के ऑफिस लोगों का cross examination स्वीकृत नहीं होगा। वह बस एक लिखित हलफनामे से अपनी बात कह कर सस्ते में कोर्ट से फुर्सत ले लेते है। और बाद में उनमे से कुछ रिटायरमेंट के बाद, इस घटना के दसियों साल बीत जाने के बाद खुलासा करते फिरेंगे की कुछ गलत हलफनामे जमा कर दिए थे जी, राजनैतिक दबाव के चलते।

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