कच्चे तेल के गिरते हुए दाम और इसका रूस से सम्बन्ध

धीरे धीरे ऐसा लगने लगा है की कच्चे तेल के दामों में गिरावट एक व्यापक राजनैतिक साज़िश के तहत लायी गयी हैं।
मगर शायद वह राजनैतिक कारक भारत से नहीं जुड़ा है। बल्कि रूस से सम्बंधित है - जो की युक्रेन के कुछ पूर्वी हिस्सों पर कब्ज़ा करे हुए है। पश्चिमी देशों को इन राजनैतिक संकट का बड़ा सदमा मलेशिया के विमान mh17 के मिसाइल द्वारा गिराए जाने से लगा था। अमेरिका और पश्चिमी देशों का कहना है की यह विमान रूस-समर्थित युक्रेन अलगाववादियों ने मिसाइल मार कर गिराया था जबकि उनके यह मिसाइल रूस की फोजों ने मुहैया करवाई थी। विमान दुर्घटना में मारे गए यात्री अधिकाँश नीदरलैंड (एक पश्चिमी यूरोपीय देश) के थे।
  उड़ान संख्या mh17 की दुर्घटना एक बेहद त्रासदीपूर्ण और व्यक्तिगत हानि थी।
हाल में ऑस्ट्रेलिया में हुए G20 सम्मलेन में भी पश्चिमी देशों ने रूस के राष्ट्रपति व्लाद्मिर पुटिन से बेरूखी का व्यवहार रखा था जो की मीडिया रिपोर्ट में बराबर दर्ज हुआ है। पश्चिम देशों ने रूस के पेट्रो-डॉलर को सुखा देने की चेतावनी भी दी थी।
  रूस की आर्थिक हालत एक बिगड़े हुए, भ्रष्ट , मंत्री-परस्त व्यक्तिगत पूँजीवाद (state sponsored crony capitalism) वाली हो गई है। देश की ज्यादातर जनता गरीबी में है हालाँकि कुछ एक उद्योगपति जो की राष्ट्रपति पुटिन से नजदीकी रखते है वह देश के तेल स्रोतों को सरकार से खरीद चुके है और अब उन कुओं से तेल बेच बेच कर एकदम मालामाल हो गए हैं।
  फिर वह यही तेल बेच कर मिला पेट्रो-डॉलर से पुटिन को राष्ट्रपति पद कर काबिज़ रहने में मदद करते हैं। यह कुछ ऐसा ही है जैसे हमारे देश में नरेन्द्र मोदी और अम्बानी , अडानी की दोस्ती। यहाँ भी कुछ इसी रस्ते पर हमारा देश चल चूका है। विश्व व्यापक भ्रष्टाचार निवारक संस्था, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल, के मुताबिक रूस आज दुनिया के अधिक भ्रष्टाचार वाले देशों में शामिल हो चुका है। एक अन्य संस्था ने दावा किया है कि विश्व अर्थव्यवस्था में मौजूद अन-लेख्य मुद्रा (un-accounted money) ,यानी "ब्लैक मनी",  में रूस का प्रतिशत सबसे बड़ा है।
   रूस को एक अनियंत्रित, उन्मादी देश माना जाने लगा है। वहां पर सरकार ने प्रतिबन्ध बहोत किस्म के लागू कर दिए हैं। सबसे प्रथम तो स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर प्रतिबन्ध। इसमें सरकार को इस बात का भी लाभ मिलता है की वहां की जनसँख्या वैसे ही अंग्रेजी भाषा नहीं जानती है, ठीक विपरीत जैसा की भारत ,पकिस्तान ,श्रीलंका जैसे देशों में हैं।
फिर सरकारी न्यूज़ चेनल तथा प्राइवेट चेनल जो की उद्योगपतियों और सरकारी दबाव से नियंत्रित होते है, ने सही सूचना को दबा कर ,या अर्थों को पलट कर प्रस्तुतीकरण के द्वारा जनता के आक्रोश को ढीला कर रखा है और सरकारी पदों पर बैठे मंत्रियों को बचा रखा है।
    पश्चिमी देशों को तेल के कारण हो रही राजनीति का आभास पहले ही लगा हुआ है। कच्चा तेल आज विश्व कूटनीति का सबसे बड़ा प्रेरक है। मध्य पूर्वी "खाड़ी" देश ,उत्तरी अफ्रीका (तुनिशिया ,लीबिया, और अब रूस। उधर दक्षिणी अमेरिका में  वेनेज़ुएला । कुछ एक अंतर्राष्ट्रीय समाचार चेनलों के मुताबिक एक अन्य तकनिकी विकास ,शेल गैस (shale gas) ,की प्रयोग तकनीक में हुए विकास के कारण भी तेल के दामों में गिरावट हुई है। शेल गैस के प्राकृतिक भण्डार तो कई दूसरे देशो में उपलब्ध थे मगर इसके परिष्करण की तकनीक अज्ञान थी। आज वही तकनीक विक्सित कर ली गयी है। नतीजे में अमेरिका ने अपनी ज़रूरतों के लिए शेल गैस पर बदलाव कर लिया और तेल आयात कम कर दिया है। इससे बाज़ार में कच्चा तेल अधिक हो गया है और खरीदार कम। अब तेल के दाम गिर रहे हैं। हालाँकि तेल निर्यातक देशों के संघठन, ओपेक , जब चाहे तेल उत्पाद को घटा कर तेल के उच्चें दाम वापस बहाल कर सकता है,मगर वर्तमान में उसने हस्तक्षेप से मना कर दिया है।
    याद करे की अभी कुछ दिनों पहले रूसी राष्ट्रपति पुटिन ने कुछ घंटों के लिए भारत यात्रा करी थी और प्रधानमंत्री मोदी के साथ कुछ एक मसौदों पर हस्ताक्षर कर के तुरंत वापस चले गए थे। भारत से रूस के रक्षा सम्बन्ध बहोत पुराने और गहरे हैं। मगर आश्चर्यजनक तौर पर दो तीन घटनाएं आज भी भारत-रूस संबंधों को बार बार परखने के लिए प्रेरित करती रहती है।
एक, यह की गाँधी परिवार को व्यक्तिगत तौर पर डॉलर-धन देने की बात ,जो शायद एक प्रकार की रिश्वत हुई,को रूस की गुप्तचर संस्था ने पहले भी स्वीकारा है। सुब्रमनियम स्वामी न जाने क्यों सोनिया गांधी को भी एक रूसी-इतालियन घर-का-भेदी होने का इशारा करते रहे है। भारत ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जहाँ रूसी हित पर अनकुश लगने की सम्भावना थी, भारत ने कुछ अटपटा व्यवहार करके रूसी हितों की रक्षा करी है। आश्चर्यजनक तौर पर रूस सम्बंधित विदेश नीति ,कोंग्रेस पार्टी और भाजपा, दोनों ने ही पालन करी है।
   दूसरा  ,कि  पाकिस्तान से ताशकेंट में रूस द्वारा प्रायोजित समझौते के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु वास्तव में कैसे हुई थी।
  भारत बहोत बड़ी मात्रा में अपने रक्षा उपकरण आज भी रूस से ही खरीदता है। इधर हाल के वर्षों में रूस ने पकिस्तान से अपने रक्षा उपकरण के व्यवसायिक सम्बन्ध स्थापित किये हैं।
   क्या कहें की किस देश से किसके कैसे सम्बन्ध हैं। कभी कभी अन्तराष्ट्रीय मंच की कूटनीति वाकई बहोत पेंचीदा और सर घुमा देने वाली होती है।
 
  बरहाल, वर्तमान में बहोत गौर से नज़र रखने वाली घटना होगी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के भाव और इसका अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर प्रभाव। यह भी देखना होगा की हम भारतीय कब तक इस सस्ते होते पेट्रोल-डीजल के दामों से ख़ुशी मनाते रहेंगे। क्या हम इस क्षणिक हालात को सिर्फ व्यक्तिगत ख़ुशी मना कर के जाने देंगे या की कोई सामाजिक लाभ भी उठा पाएंगे ,अपने देश में महंगाई को अचानक कम करके।
  

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