Thursday, March 21, 2013

'बिगेट' का अर्थ

Bigotry (बिगेट ) का अर्थ हिंदी भाषा के शब्दकोशों में कट्टर, अड़ियल इत्यादि दिया गया है । मगर भाषा-अनुवाद की असल दुविधा यह रहती है की न सिर्फ शब्द, वरन उसके सही भाव को भी अनुवाद करी गयी भाषा में परिवर्तित करना चाहिए । उदहारण के लिया अब Bigot को ही ले लीजिये । बाज़ार में उपलब्ध शब्दकोष के माध्यम से तो कोई भी छात्र यह समझ लेगा की जो व्यक्ति किसी वस्तु को पाने के लिए हट करे जब वह वस्तु उसे प्राप्त नहीं हो सकती तब वह Bigot हुआ ।
     है, की नहीं? अब खुद ही सोचिये , “अड़ियल” से तो कुछ भाव ऐसा ही आता है । या फिर की ....वह व्यक्ति जो सिर्फ अपनी ही चलता है वह Bigot है । अब यह अर्थ सुनने के बाद कौन पसंद करेगा एक समालोचनात्मक चिंतन के भाव में अपने मस्तिष्क को डाल कर यह प्रशन करना की अगर “बिगेट” का अर्थ होता है 'वह जो सिर्फ हर समय अपनी ही चलता है ', तब फिर यह कैसे तय होगा की किस विषय में या किसी परिस्थिति में किसकी चलनी चाहिए ।
    साधारणतः , हम लोग बिगेट से अर्थ निकलते है , "जिद्दी", या फिर "हट्टी "। और फिर जिद्दी का अर्थ समझने के लिए अपने बाल्य काल का उदाहरण ले लेते है की जब हम एक खिलौना चाहिए था जो हमने पिता हमे नहीं दिल सकते थे , मगर फिर भी हम उनसे उस खिलौने के मांग बार बार करते है तब हम "हट्टी " हुए । और जब थोडा बड़े हो गए और फिर किसी दिन कहीं जाने की या कुछ पाने की मांग बार बार करी तब हम "जिद्दी " हो गए ।
    यानी 'जिद्दी' और 'हट्टी' में मुख्य अंतर मांग करने वाले की आयु का है ।
    धीरे-धीरे हमारा मस्तिष्क ऐसा ही समझने लगता है । मगर ऐसा नहीं है । 'बिगेट' का अर्थ है वह जो किसी एक ख़ास पंक्ति पर ही न्याय की स्थिति को देखता है । जैसे की, हमे बचपन से यह सिखाया जाता है की "माता-पिता का आदर करना चाहिए"। या की "संसार में माता-पिता से अधिक मूल्यवान और सत्य प्रेम करने वाला कोई नहीं होता "। ऐसे में जब हम वास्तविक जीवन में यदि किसी परिथिति में माता-पिता को कोई अन्याय करते देखें मगर उसका विरोध न करे क्योंकि वह उनका अनादर होगा तब हम स्वयं न्याय को तलाशना बंद चुके होंगे और एक अड़ियल व्यक्ति हो जायेंगे जो यह मानता है की 'उसके माता-पिता तो कभी कोई गलत या अन्याय कर ही नहीं सकते '।
                यह ‘बिगेट’ यानि अड़ियल का सही भाव है ।
   गौर करने की बात यह है की अड़ियलता का भाव अक्सर कर के धार्मिक संस्कारों में 'गुण' और 'दुर्गुण' के ज्ञान से विकसित होता है जब हम किसी ख़ास मनो भाव में,तर्क को मात देते हुए , किसी क्रिया के होने या न होने से 'गुण ' और 'दुर्गुण ' की पहचान करने लगते है । जैसे की जो बड़ों के या की माता-पिता के पैर नहीं छूता , वह दुर्गुण है , इत्यादि । धार्मिक भाव में गुण और दुर्गुण को चिन्हित करना , तर्क और न्याय की बदलती परिस्थिति को समझे बिना, अड़ियलता है।