Saturday, December 29, 2012

बलात्कार, स्वतंत्र-मन,व्यवसायिक अनुबंध और भारतीय समाज

सिद्धान्तिक दृष्टिकोण से बलात्कार मात्र एक अपराध नहीं, वरन, समाज में एक स्वतंत्र-मन (free-will) के दमन का प्रतीक होता है । विज्ञानं में स्वतंत्र-मन एक बहोत ही कोतुहलता का विषय रहा है । आरंभ में कर्म-कांडी धार्मिक मान्यताओं ने हमे येही बतलाया था को "वही होता है जो किस्मत में लिखा होता है " । दर्शन और समाजशास्त्र में इस प्रकार के विचार रखने वालो को 'भाग्यवादी' कह कर बुलाया जाता है । मगर एक कर्म-योगी धार्मिक मान्यता ने इस विचार के विपरीत यह एक विचार दिया की "किस्मत खुद्द आप के किये गए कर्मो का फल होती है "। दूसरे शब्दों में , यह भागवत गीता जैसे ग्रन्थ से मिला वही विचार है की "जो बोयेगा, वही पायेगा ", या फिर की "जैसे कर्म करेगा तू , वैसा फल देगा भगवान् "। दर्शन में इस विचार धरा को कर्म योगी कहा जाता है । सिद्धांत में यह दोनों विचार एक दूसरे के विपरीत होते है । या कहे तो मन में यह प्रश्न होता है की "क्या किस्मत या भाग्य कोई निश्चित वस्तु है , या फिर कोई खुद अपनी किस्मत या भाग्य को किसी तरह से नियंत्रित कर सकता है ?"।
    सदियों से इस दोनों विचार पर कही कोई और रास्ता उज्जवल नहीं हुआ था । भौतिकी (Physics) में विज्ञानियों ने किस्मत को कर्म का फल मन था । न्यूटन के सिद्धांतो में तो यही समझा जाता है की "हर क्रिया का फल उसके समान अनुपात का , उसकी दिशा के विपरीत प्रतिक्रिया होती है " (Every action has an equal and opposite reaction.) 
मगर बाद में जब विज्ञानियों (या यह कहे प्रकृति दार्शनिक ) में अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने क्वांटम फिजिक्स (Quantum Physics ) के विचारो को दिया और प्रयोगशालाओं में इन नियमो की भी पुष्टि पाई गयी,
तब फिर से किस्मत-वादिता के विचारों को एक बल मिला। आरंभ में महान वैज्ञानिक और प्राकृतिक दार्शनिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन भी अपने से पहले न्यूटन के दिए गए विचारो के अनुसार यही भाव रखते थे की "इश्वार (इस दुनिया के निर्माण और दैनिक कार्यकर्मो में )कोई पासे वाला खेल नहीं खेल रहे हैं ", (God doesn't play dice.). मगर ज्यों-ज्यों आइन्स्टाइन ने प्रकाश से सम्बंधित अपने शोध में समय और शून्य (space and time) की परस्परता के सिद्धांतो को दुनिया के सामने दिया ,- प्रकाश और ऊर्जा के सूक्ष्म धारक, यानी Quantum, और उनके व्यवहार , पदार्थ के सूक्ष्म कर्ण , और फिर तरंग और पदार्थ के बीच होने वाले कोई स्वतंत्र -मन से घटित बदलाव (wave - particle duality )-- दुनिया में एक नए दर्शन ने फिर से जन्म लिया ।
  आधुनिक विज्ञानियों , और प्राकृतिक दार्शानियों ने न्यूटन और आइन्स्टाइन द्वारा दिए गए दो अलग अलग विचारों से दुनिया के हर पक्ष को दो विचारों के नज़रिए से समझने का प्रयास किया । दर्शन में दो अलग किसम के विश्व का सृजन हुआ , Deterministic world , aur Probabilistic World ।
  इतिहास, विज्ञानं में घट रही इन घटनाओं का वास्तविक दुनिए  के समाज शास्त्र , और विधि-विधान पर भी असर पड़ा । safety और Security से सम्बंधित कानूनों में 'probabilistic' विचारधारा ने घर बनाया और ऐसे प्रशनो को उत्तरित किया की "क्या सुरक्षा नौका को पास में रखने से किसी नाविक की जान बच सकती है ?" । इससे पहेले के विचारों में इस प्रश्न का उत्तर यही समझा जाता था की "भई , कोई कितना भी कुछ क्यों न कर ले, जब जिस दिन ऊपर वाले ने मौत लिखी है , उस दिन हो कर ही रहेगी ।".
 जीवन और मृत्यु पर तो इंसान ने आज तक नियंत्रण नहीं प्राप्त किया , मगर मृत्यु के सत्य के आगे कर्म-हीन हो कर जीवन रक्षा के इंतज़ाम करना नहीं छोड़ता । 
  किस्मत के प्रश्न पर एक नया उत्तर तैयार हो गया है -- सम्भावना (probability ) का । गणितज्ञों ने भी संभावना को नापने के लिए गणित का विकास किया । भविष्य अभी भी अनजान है , मगर उस अँधेरे और शून्य में क्या है पर अब ज्यादा सटीकता से क्यास लगाया जा सकता है । पदार्थ-और-तरंग  के परस्पर बदलाव के विचार से स्वतंत्र-मन के अस्तित्व को कुछ बल मिलता है । यदि ऊर्जा के कर्ण , Quantum , स्वयं अपनी मर्जी से कभी भी तरंग के समान व्यवहार दिखलाते है , और कभी अपनी मर्जी से पदार्थ के कर्ण जैसा व्यवहार दिखलाते है तो यह कहा जा सकता है की कही कुछ है जो स्वतंत्र मन के समान है जो ऊर्जा को कभी तरंग और कभी पदार्थ जैसा व्यवहार रखने का इशारा देता है ।
   यही से स्वतंत्र-मन के अस्तित्व पर कुछ छोटा से प्रमाण दिखता है । कानून और निति-निर्माण में यह विचार स्वतंत्रता की परिभाषा में व्यक्ति को प्रधान बनता है कि सरकारें किसी व्यतिगत मनुष्य या पूरे समाज की भाग्य विधाता नहीं बन सकती। प्रत्येक मनुष्य में एक स्वतंत्र इच्छा होती है और सरकारों की निति निर्माण का एक उद्देश्य इस स्वतंत्र-इच्छा को सुरक्षा देने का है । इसको दमन से बचाने का है । कहीं भी, कोई भी सामाजिक न न्यायायिक अनुबंध स्वतंत्र-मन को किसी के पराधीन नहीं कर सकता । यानि , हर अनुबंध में उस अनुबंध को टूट जाने की स्थिति में नुक्सान की भरपाई का न्याय होना चाहिए । अनुबंध हमेशा के लिए लगो को आपस में नहीं बांधे रह सकते , और उनके टूटने का नुक्सान मृत्यु (स्वतंत्र-मन का सम्पूर्ण दमन)  द्वारा नहीं भरवाया जा सकता।
  अनुबंध के अस्तित्व में आने के लिए स्वतंत्र-मन को प्रथम कसौटी मन गया है , और स्वतंत्र-मन को अनुबंध के दौरान और पूरण तक बचाए रखने का प्रावधान होता है । कोई भी अनुबंध जो मनुष्य को उसकी प्राकृतिक भावनाओं से वंचित करने का प्रयास करता है वह अ-संवेधानिक अनुबंध माना जाता है ।
 तब प्रशन उठता है की यौन को किस तरह का अनुबंध माना जायेगा?  स्वतंत्र-मन था की नहीं यह कैसे प्रमाणित किया जायेगा। और शादी के बाद पति-पत्नी के रिश्ते में स्वतंत्र-मन का क्या स्थान होगा ? ज्यादातर पश्चिमी देशो में स्वतंत्र-मन के अस्तित्व को शादी के बाद भी ऐसा है स्वतंत्र मन गया है । इसी लिए वहां तलाक को कोई असामाजिक वाकया नहीं मानते । या यो कहें को क्योंकि तलाक को असामाजिक वाक्य नहीं मानते इसलिए स्वतंत्र-मन के अस्तित्व को बनाये रखा जाता है । 
भारत में सामाजिक मान्यताओं में स्वतंत्र-मन को इतना ऊचा स्थान नहीं मिला है । बल्कि सभी पिछड़े देशो में स्वतंत्र-मन को ले कर यही हालत है । स्वतंत्र-मन को बनाये रखते हुए व्यापार कर सकना इन देशो में आज भी न ही संभव है, न ही संभव माना जाता है । कर्मचारियों में किसी को किसी के पराधीन मानना , नारी के साथ शोषण या बलात्कार , अनुबंधों के विरुद्ध काम करना -- यह इन देशो में आम घटना है । असल में स्वतंत्र-मन के अस्तित्व को स्वीकार कर लेने से हर अनुबंध में कुछ अन कही शर्ते अस्तित्व में आ जाती है । इन शर्तो को अनुबंध में संयुक्त दोनों पक्ष स्वयं में दो स्वतंत्र-विचार वादी होने के कारन समझ लेते है । मगर जब दोनों हो पक्ष स्वतंत्र-विचार वादी न हो, या एक हो , एक न हो तब इन अनकही शर्तो पर अनुबंध के टूट जाने को ले कर आपसी विवाद हो जाता है । एक पक्ष दूसरे पक्ष पर अनुबंध को तोड़ने का आरोप लगता है ,..
..आगे कम बुद्धि के चलते भ्रमो में, आरोप और प्रमाण की त्रज्या में दोनों पक्षों की दुनिया भटक जाती है ।
स्वतंत्र-मन के अस्तित्व का प्रमाण बहोत मुश्किल होता है । यदि अनुबंध के अस्तित्व में स्वतंत्र मन एक कसौटी है , तब अनुबंध के खुद के अस्तित्व का प्रमाण खुद ही एक मुश्किल काम हो जाता है । ज्यादा तर व्यवसायिक अनुबंध तो लिखित तौर पर होते है इसलिए उनका प्रमाण तो मिल जायेगा , मगर अन्य मानवी सम्बन्ध जैसे शादी से पहले या शादी के बाहर सम्बन्ध को स्वतंत्र-मन से उत्पन्न है या नहीं प्रमाणित करना मुश्किल हो जाता है । यदि दोनों पक्ष किसी कारन वश , जैसे पारिवारिक सम्बन्ध , एक दूसरे को पहले से जानते हो तब स्वतंत्र-मन के प्रमाण को और भी मुश्किल हो जाती है । 
   कलकाता के बलात्कार आरोप में येही देखने को मिल रहा है, जहाँ बार-बार स्त्री के चरित्र को नीचा दिखा कर स्वतंत्र-मन के एक पल , उस समय जब दोनों में सम्बन्ध बना,के अस्तित्व को दिखलाने का प्रयास हो रहा है । यह स्वतंत्र-मन ही है जो यह दूरी को बतलायेगा की नारी-पुरुष का सम्बन्ध बलात्कार था , या फिर आपसी मंर्जी से बना सम्बन्ध ।
  स्वतंत्र मन एक बहोत ही भावनात्मक वस्तु है । कुछ केस में तोह यह स्पस्ट प्रमाणित हो जाता है की स्वतंत्र मन था की नहीं, जैसे राह चलते किसी को पकड़ के कुछ सम्बन्ध करना स्पस्ट तौर पर बलात्कार ही है , मगर आस पास की किसी महिला , जैसे घर में काम कर रही कर्मचारी के केस में यह मुश्किल हो जाता है / 
स्वतंत्र-मन के अस्तित्व के प्रमाण की इन चुनौतियों को समझते हुए ही शायद कोर्ट ने स्त्री न्याय अध्यक्ष स्थापित करने का निर्णय लिया / स्त्री न्यायधीश भाव्नात्क्मक पहलुओ को समझते हुए शायद बेहतर निर्णय दे सके की स्वतंत्र-मन अस्तित्व में था की नहीं ।
  बरहाल , आये दिन घटते इन घटना कर्मो से यही पता चलता है की भारतीय समाज अभी सही व्यवसायिक अनुबंधों से कितना दूर खड़ा है । बढ़ता हुआ भ्रस्टाचार भी हमारे समाज में स्वतंत्र-मन के सामान की कमी को दिखलाता है । हम कभी भी एक नापा तुला संवेधानिक और मानवता सांगत करार नहीं बना सकते । और यदि बनाते भी है तब उन्हें मानवता और सम्वेधानिकता की कसौटी के अनुरूप पालन नहीं कर पाते । दोपहर के टीवी धारावाहिकों में तोह कम से कम यही पता चलता है की भारतीय घर-परिवार में स्वतंत्र-मन की संतुलित समझ का कितना आभाव है । विज्ञापन , और विज्ञापनों में की गयी संभावित ग्राहक को प्रभावित कर सकने की कोशिश भी अक्सर सम्वेधानिकता के दायरों को तोड़ रही होती है । 
बलात्कार तो आज एक घटना है , स्वतंत्र-मन का अनादर करना हमारा सांकृतिक स्वभाव है।