किस धोखे का नाम है Free Basics और Digital Equality

फेसबुक को जब internet (dot)org  के माध्यम से इंटरनेट के उपभोग से मुनाफा कमाने के नए तौर तरीक में सफलता नहीं मिल रही है तब उसने एक नए अवतार में जनता को उल्लू बनाने के तरीका निकला है।  फेसबुक ने खुद को गरीबों का साथी बता का Free Basics नाम से एक नया मार्केटिंग का तरीका निकला है। इसी को वह मार्केटिंग के दौरान digital equality भी कह कर पुकार रहे हैं। बात को गहराई से समझने के लिए पहले अपने अंतर्मन में कुछ पैमानों को पुख्ता कर लेते हैं:-
  !) क्या आपको अमीरी और गरीबी के सामाजिक ओहदों को महसूस करके सुख महसूस होता है ? ध्यान से समझियेगा : अमीरी और गरीबी की धन सम्पदा अवस्था की  बात नहीं हो रही है , बल्कि सामजिक स्थान की भी बात हो रही है ।
  यानि , जैसा की आज की तारिख में हम किसी bmw कार को देख कर ही अंदाज़ा लगा लेते हैं की इसका स्वामी ज़रूर कोई बड़ा अमीर व्यक्ति होगा,
  किसी की iphone को देख कर अंदाज़ा लगा लेते हैं की ज़रूर कोई मालामाल आदमी है ।  उसके पहनावों के ब्रांड से , उसके पर्स के ब्रांड से, उसके सामाजिक औहदे का पता चल जाता है। यह सामाजिक ओहदा हैं, मात्र धन सम्पदा का अंतर भाव नहीं ।
    यदि नहीं तब फिर digital equality के नाम पर बेचीं जा रही पद्धति का समर्थन आप से धोखे में लिया जा रहा है, आपको वास्तविकता बताये बिना।

२) क्या आप कल को साइबर दुनिया में भी इस प्रकार के सामाजिक ओहदों का अंतर चाहेंगे ? यानि साइबर वर्ल्ड में भी अमीरी और गरीबी का अंतर ?
              अमीरी गरीबी इंसान के बनाये भेद हैं , और अब साइबर वर्ल्ड में भी उसे चालू करने की तैयारी का नाम है digital equality और free basics .   इसके आने पर जो लोग गरीब , यानि काम धन शक्ति के होंगे, वह 2g जैसे low bandwidth के द्वारा ही internet और साइबर दुनिया में दाखिल हो सकेंगे। वह 2g  bandwidth के चलते सभी वेबसाइट नहीं खोल सकेंगे । इसके विपरीत उन गरीबों को low bandwidth में कुछ एक website फ्री यानि मुफ्त में खोलने को दे दी जाएँगी । जैसे सभी सरकारी वेबसाइट और कुछ वह जो की किसी की समझ से "आवश्यक" है । कहने के लिए, जो की नौकरी अवसर की जाकारी देती हैं । जबकि सच यह है की नौकरी से सम्बंधित कई सारी जानकारी तो आज भी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हो पाती  है ।
      वर्तमान में साइबर दुनिया में आप प्रवेश के लिए कोई भी बैंडविड्थ का प्रयोग करे, अंतर मात्र प्राप्त गति (access speed ) का होता है, आपको कही रोक टॉक नहीं देखनी पड़ती है। मगर इस "digital equality " के आने के बाद गरीब इंटरनेट उपभोकताओं को अमीर लोगों के वेबसाइट पर आने की ही इज़ाज़त नहीं होगी । यानि आपके पहनावे से ही चौकीदार आपको बड़े पांच सितारा होटल के दरवाज़े पर रोक देगा, भले ही आपकी जेब में पैसे हों या न ।  बदले में आपको कुछ free hotel दे दिए जायगेंगे जहाँ आप अपनी हैसियत के हिसाब से जा कर खाना खा आइएगा !
स्वागत है आपका डिजिटल इक्वलिटी वाली दुनिया में ! high bandwidth , जैसे कि 3G, 4G और भविष्य में आने वाली अन्य नयी उच्च तकनीक की वेबसाइट के दामों को मनमौजी दरों से बढ़ाया जा सकेगा । कोई TRAI या कोई Court और सरकारों का उस पर नियंत्रण नहीं रहेगा , क्योंकि इसके बदले में "जीवन आवश्यक " वेबसाइट तो free basics के माध्यम से पहले ही मुफ्त दी जा रही होंगी ।

बेचने और मार्केटिंग की चाल-चालाकियों के इस सामाजिक अंतर का नाम digital equality एक धोखा देने के मकसद से इस लिए पड़ा है कि इसको बेचने वाले कहते है की आज भी कई सारे गरीब इंटरनेट पर आने के लिए वर्तमान की जो भी दरें है, उसके चलते वह इंटरनेट पर नहीं आ सकते हैं । कल को जब कुछ free basics वाली वेबसाइट आ जायेंगे तब कम से कम उसको मुफ्त में तो इंटरनेट पर आने का अवसर मिलेंगे ! तो एक प्रकट दर्शन (apparent view) में कहा जा सकता है कि free basics और digital equality के आने पर उन गरीबों को मुफ़्त में कुछ वेब्सिट्स खोलने की सुविधा मिल जायेगी।
   है न सयानापन ! अमीरी को बढ़ाना है तोह फिर गरीब को कुछ तो मुफ्त दे कर और गरीब होने का लाभ दो ! और खुद को गरीबों का पोषक दिखलाओ ।

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