Wednesday, June 07, 2017

आरएसएस और उनकी भेदभाव को प्रसारित करती कानून व्यवस्था

आरएसएस का कहना है कि वह जातपात में विश्वास नही करता है। और फिर अपने खुद के गढ़े हुए *तथ्य* के मद्देनजर वह आरक्षण नीति का भीतर ही भीतर विरोध करता है यह तर्क देते हुए की *आरक्षण नीति से तो जातपात और अधिक फैलेगा* ।

खुद से मुआयना करने की ज़रूरत है कि क्या वाकई में आरएसएस जातपात में विश्वास नही करता, या सिर्फ एक lip service यानी मुंहजबानी बोल्बचन कर रहा है ।

जो संस्था *थूक कर चाटने* वाली नीतियों के लिए बदनाम है, कांग्रेस पार्टी की *gst, आधार* से *मनरेगा* तक जिन नीतियों का विरोध किया और फिर *थूक कर चाटते हुए* खुद वही ले आयी, यानी जो कि सामान न्याय व्यवस्था में विश्वास ही नही करती, क्या वह वाकई में भेदभाव नही करने वाली संस्था हो सकती है ?

जातपात आखिर है ही क्या ?
भेदभाव ।
और भेदभाव कैसे किया जाता है ?
असमान न्याय , अप्रकट न्याय, अघोषित कानून ही तो भेदभाव है।
अभी ndtv पर हुए cbi रेड की कहानी को ही देख लीजिए। या फिर भ्रष्टाचार निरोध के नाम पर आम आदमी पार्टी के लोगों पर आए दिन हो रहे कार्यवाही को देख लीजिए। मोदी पर सहारा और बिरला से करोड़ों रुपये लेने का सबूत तक है, मगर रेड केजरीवाल के दफ्तर पर होती है, या ndtv के लोगो पर। और फिर ऐसे भेदभाव वाली कानून व्यवस्था करने वाले लोग कितनी निर्लज्जता से कहते फिरते हैं कि वह लोग जातपात में विश्वास नही करते ।

आश्चर्य ..घोर आश्चर्य।

जातपात के अंधकार युग की दास्तान वही है जो कि आरएसएस और भाजपा आज  भी प्रशासनिक शक्तियों के माध्यम से कर रहे हैं।यानी,  किसी निम्म जाति के लिए वही कार्य गलत , पाप या फिर अवैधानिक होते थे, जो किसी उच्च जाति के लिए स्वीकृति और मान्य या वैधनिक, या फिर छोटी भूलचूक करके पारित हो जाते थे। यही तो थी वह ब्राह्मणपंती जिसका इतना विरोध हुआ इस समाज मे ।
और आज फिर हम आजादी के इतने सालों बाद उसी व्यवस्था से ग्रस्त हो गए है।
असमान न्याय।
यानी सोनिया, मुलायम, मायावती, लालू, ममता के लिए वह कार्य अवैध, अमान्य, पाप माना जायेगा जो कि मोदी, जेटली , मोहन, नितिन या सुरेश के लिए वैध माना जायेगा ।

और फिर कहो कि हम जातपात नही मानते, यानी कोई भेदभाव नही करते ।!
पूरा प्रशासन शक्ति खुल्लम खुला भेदभाव नीति पर चलवा रहे है और फिर सफेद झूठ बोलते है।

आरएसएस की समस्या ही यह है कि वह उन शब्दों के मूल विचार और अभिप्रायों को नही समझता है जिन्हें वह यूँ ही रट्टू तोते की तरह दिन भर बोलता फिरता है।

किसी भी किस्म के भेदभाव का दूसरा बड़ा स्रोत होता है व्यक्तिनिष्ठ पैमानों का उपयोग। और तीसरा बड़ा स्रोत है तार्किक प्रमाण के बजाए अंधविश्वास करने पर जोर देना।
भाजपा के शासन में यही हो रहा है । कही देशभक्ति के नाम पर, कही सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर, कही सेना के नाम पर, और कही गाय और गौमांस के नाम पर--- जनता को *तार्किक प्रमाण* नही, *अंधविश्वास* करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। जबकि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया को बुला कर अपनी सीमा क्षेत्र का निरक्षण कैमरे पर करवा कर प्रमाण देता है, तब भी मोदी जी की सरकार चाहती है कि देश की सशत्र सेना पर विश्वास करते हुए हम मान ले कि *सर्जिकल स्ट्राइक* हुई थी ! यह जनता पर अंधविश्वास करने का प्रशासन का दबाब नही तो और क्या है ? और फिर भेदभाव यहाँ से ही तो आरम्भ होता है। जब तर्कशक्ति नष्ट हो जाती है और सही-गलत का पैमाना किसी दूसरे की मनमर्ज़ी बन जाती है, जिस पर की अंधविश्वास करना जनता की मजबूरी होता है। तब आरम्भ हो जाता है भेदभाव, यानी जातपात, क्षेत्रवाद, वर्णवाद, भाषावाद, लिंगभेद। भेदभाव ही तो इंसान की गुलामी का स्वरूप है। आज़ादी का एक अर्थ यही है -- भेदभाव वाले कानून से मुक्ति। याद है न गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में ट्रैन से उतारे जाने वाली घटना।

आरएसएस मूर्खियात का गढ़ है। वह सिर्फ मुंहजबानी ही शब्दों का भोग करता है। उनके अर्थ और अभिप्रायों को नही समझता है। भाषण देने सीखना उनका दैनिक कार्य है। शब्दों और तर्क पर चिंतन करना नही। खोखले शब्दों को बोलता है।

आख़िर राष्ट्र भाव का भी क्या अर्थ और अभिप्राय रह जाता है यदि प्रशासन भेदभाव वाली नीतियों पर चलता रहे। क्या जनता का एक बड़ा हिस्सा मात्र किसी देशभक्ति नाम की अनजानी भावना को किसी दूसरे के दुख और भोग की खातिर अपनाने के लिए बाध्य होना चाहिए, जबकि प्रशासन उसके साथ भेदभावपूर्ण तरीके से पेश आता है ?