Saturday, June 10, 2017

जॉर्ज ओरवेल का विकृत कलयुगी उपन्यास "1984"

4 अप्रैल 2017 को अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के विरोध में देश के करीब 200 सिनेमा घरों में एक 1956 में रिलीज़ हुई श्याम/श्वेत फिल्म को फ्री में जनता के लिए नुमाइश करवाया गया। फ़िल्म का नाम था "1984"।

 क्या है यह फ़िल्म "1984" , और क्या सम्बद्ध है इस फ़िल्म का राष्ट्रपति ट्रम्प से ? 

 "1984" नाम की यह फ़िल्म अंग्रेजी उपन्यासकार जॉर्ज ओरवेल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। इस उपन्यास को ऑरवेल ने 1949 में लिखा था, और काल्पनिक श्रेणी का उपन्यास है जो कुछ राजनैतिक-प्रशासनिक व्यवस्था पर रचा बुना है।  मगर इतने पूर्वकाल में भी लिखे हुए होने के बावजूद इस उपन्यास में ऑरवेल की काल्पनिक शक्ति इतनी सटीक है कि वह जिस कलयुगी-विपरीत(dystopic) भविष्य की कल्पना करके सं 1984 को अपने ख्यालों में गढ़ते है, काफी सारे लोगों का मानना है कि वह आज राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के काल में सत्य होता साबित हो रहा है। 

सिनेमाघरों के मालिकों का मानना है कि जन जागृति के लिए इस उपन्यास और उस पर आधारित फिल्म का मंचन मुफ्त में करना राष्ट्र और सामाजिक हित में आवश्यक हो गया है।

 Orwell का यह उपन्यास अपने प्रकाशन के बाद कई सारे देशों में प्रतिबंधित हुआ । क्योंकि इसमें एक विकृत समाज की कल्पना रची हुई थी। मगर काफी सारे देशों में इसे भविष्य की चेतावनी के रूप में भी देखा गया। आखिरकार यह उपन्यास 200 से भी अधिक भाषाओँ में लिखा गया, और कई सारे प्रकाशनों ने इसे इतिहास के सबसे बेहतरीन उपन्यासों की सूची में शामिल किया। आज यह उपन्यास और इस पर आधारित फिल्म, दोनों ही इन्टरनेट पर सहज उपलब्ध है, इस मंशा के साथ की समाज और देशों के नागरिकों और सरकारों के भले के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

 "1984" उपन्यास में क्या पदार्थ है ?

1984 में बताया गया है कि 'आज' दुनिया में सिर्फ तीन ही महादेश बस्ते है। विश्वयुद्ध और परमाणु बमबारी के बाद दुनिया और जटिल हो गयी थी। कहानी एयरस्ट्रिप वन की है, जो की ओशिनिया नाम के महादेश की उपराज्य है। कुछ ठीक से याद नहीं है , मगर शायद अतीत में इसी उपराज्य को ब्रिटेन या इंग्लैंड , ऐसे ही किसी नाम से बुलाया जाता था। 
   बाकि के दो महादेश है *यूरेशिया* और *ईस्टासिया* । ओशिनिया महादेश असल में अमेरिका द्वारा ब्रिटैन और दक्षिणी अमेरिका देशों पर कब्ज़ा कर लेने से बसा है। 

यूरेशिया बसा है रूस द्वारा अधिकांश यूरोप पर कब्ज़ा कर लेने से। 

और ईस्टासिया बसा है चीन, जापान, दक्षिणी एशिया, भारत, और गरीब अफ़्रीकी देशी के एक हो जाने से। यह देश पहले तो एक confused लड़ाई लड़ते रहे थे, मगर फिर बाद में एक महादेश बनाने को राजी हो गए।

आज, यानि 1984 में, यह तीनों महादेश आपस में न ख़त्म होने वाली लड़ाई लड़ रहे है। सभी की समझ में आता है कि इस लड़ाई में कोई भी विजेता कभी भी नहीं आने वाला है, मगर वह फिर भी लड़ते रहते हैं।
असल में इनकी लड़ाई के पीछे एक षड्यंत्र है। वह आरम्भ होती है इनकी राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था से। 
ओशिनिया में उपन्यास का मुख्य पात्र ,विंस्टन स्मिथ, एक मंत्रालय में काम करता सरकारी कर्मचारी है। ओशिनिया में जो सरकार है, उसे "पार्टी" कह कर पुकारा जाता है। और यहाँ अब सिर्फ चार ही मंत्रालय हैं, ministry of truth, ministry of love, ministry of plenty, और ministry of peace। आज यहाँ की सरकार, यानि "पार्टी" ने अपनी खुद की एक नयी भाषा भी ईज़ाद कर लिया है और जिसे ओशिनिया का आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया है। इस भाषा को न्यूस्पीक यानी newspeak , बुलाते है। न्यूस्पीक में चारों मंत्रालयों का नाम उनके संक्षिप्त रूप में बोला जाता है, minitrue, miniplenty , miniluv , और minipec। इन चारों मंत्रालयों का काम अपने नाम का ठीक उल्टा है। 

विंस्टन स्मिथ जो की minitrue में काम करता है, उसका काम झूठ फैलाने का, ऐसे की "पार्टी" हमेशा सकारात्मक छवि में ही रहे। इन लोगों के सोचने का तरीका को doublethink करके बुलाया गया है, जिसने एक साथ दी विरोधास्पद विचारों को एक साथ सच माना जाता है। कब कौन सा विचार लागू करना है, यह पार्टी ही तय करती है। नियम यही है कि विरोधियों और विपक्ष पर नकारात्मक विचार को लागू करो और पार्टी पर सकारात्मक विचार को। 
1984 के आज के युग में सच कुक भी नहीं होता है। पार्टी जो भी बोलती या करती है, mini true मंत्रायल में स्मिथ का काम है की वह तुरंत सभी report, तस्वीर, दस्तावेज़, ब्यूरे, तथ्य में फेरबदल करके पार्टी की छवि के प्रति अनुकूल बना दे। आज इतिहास नाम की कोई वस्तु रह ही नहीं गयी है, क्योंकि न जाने कितनों ही बार हर जगह दस्तावेजों और तस्वीरों में फेरबदल या छेड़छाड़ हो चुकी है। मगर "पार्टी" इस छेड़छाड़ या फेरबदल की कार्यवाही को "आवश्यक सुधार" कह कर बुलाती है।

1984 के युग में कोई कानून नहीं होता है। यहाँ वह काम गलत है जो की पार्टी को नापसंद है। यहाँ की पुलिस नहीं होती है, कोई टैक्स, कुछ भी नहीं है। बस एक ही पुलिस है, thought police, जो की मिडिल क्लास लोगों के ऊपर हर समय निगाह बनाये रहती है। मिडिल क्लास इसलिए क्योंकि इतिहास में सभी क्रांतियां मिडिल क्लास लोगो ने ही  शुरू करी  है। इसके लिए सभी मिडिल क्लास लोगों के घरों में हर जगह tele screen लगी है, जो की हर समय देखती और सुनती रहती है। आज व्यक्तिगत एकंकता (privacy) "पार्टी" को बिलकुल नामंज़ूर है। टेलेस्क्रीन को कभी भी बंद नहीं किया जा सकता है, और उसकी निगरानी क्षेत्र के बाहर जाना बहोत गंभीर अपराध है। 

 कोई अगर गलत काम के लिए सजा झेलता था, तब उसे unperson करा जा सकता था। unperson में न सिर्फ उस आदमी को नष्ट किया जा सकता था, उसके इतिहास और सभी किस्म के अस्तित्व के प्रमाण की भी ऐसे नष्ट कर दिया जाता था कि मानो उसने कभी जन्म ही नहीं लिया था।

"पार्टी" का सञ्चालन एक big brother नाम का अनदेखा, अंजान पदनाम से होता था। शायद यह कोई व्यक्ति नहीं था, बल्कि एक समूह का codename था। समूचे देश भर में बैनर लगा था big brother is watching you. और पार्टी की आइडियोलॉजी। 

Minipec का काम लोगों में "पार्टी" के विरोधियों और विपक्ष के प्रति नफरत फैलाने का था। इसके लिए अक्सर करके hate week यानि घृणा उत्सव का भी आयोजन करवाया जाता था, जिसमे लोग जम कर "पार्टी" के विरोधीयों को कोस सकें। घृणा और नफ़रत फैलाने का एक लाभ यह भी मिलता था कि इससे लोगों में विश्वास कायम रहता था कि देश का हर पल कोई दुश्मन है, जिसका सामना करने में देश एक युद्ध लड़ रहा है। 

मगर युद्ध लगातार लड़ने का असल मकसद था फैक्टरियों के व्यर्थकारी, अतिरिक्त उत्पाद का खपत होता रहे। फैक्ट्री और उद्योग के मालिक लोग अरबपति पैसे वाले लोग थे। और यही लोग "पार्टी" के सञ्चालन में भी बैठे हुए थे। असल में तेरहवी शताब्दी से ही उद्योगिक क्रांति के बाद से फैक्टिरी उत्पादन की एक भीतरी समस्या थी। वह यह की फैक्टरियों के मालिक को फैक्टिरी चलाने से लाभ दीर्घ संख्या में उत्पाद करने से ही मिलता था। ऐसे में वह समाज की वास्तविक जरूरत से अधिक उत्पाद बना देते थे। ऐसे में आने वाले अतिरिक्त उत्पाद को खपत करते रहने का तरीका चाहिए था। अतिरिक्त उत्पाद में पर्यावरण का अंधाधुंध उपभोग तो होता ही था, समाज से बुनियादी समस्याएं, भूखमरी, गरीबी, बिमारियां या तो और बढ़ रही थी या समाप्त नहीं ही रही थी। मगर उद्योगपति वर्ग समझता था कि किसी भी तरीके से पूरे समाज की पूर्ण समस्या मुक्त कर सकना असंभव था। तो ऐसे में समाज के अधिकांश लोगों का भला करते हुए अपनी प्रभुसत्ता कायम रखने का तरीका यही था कि फैक्ट्री उत्पादन वाली आर्थिक व्यवस्था कायम रखी jaye

और अतिरिक्त फैक्ट्री उत्पाद को कृत्रिम तरीके से नष्ट करवा कर नए की मांग रचने की विधि थी देश और समाज को किसी दुश्मन से युद्ध में ग्रस्त रखना। तो यहाँ से घृणा और नफरत का काम शुरू होता था।

Wednesday, June 07, 2017

आरएसएस और उनकी भेदभाव को प्रसारित करती कानून व्यवस्था

आरएसएस का कहना है कि वह जातपात में विश्वास नही करता है। और फिर अपने खुद के गढ़े हुए *तथ्य* के मद्देनजर वह आरक्षण नीति का भीतर ही भीतर विरोध करता है यह तर्क देते हुए की *आरक्षण नीति से तो जातपात और अधिक फैलेगा* ।

खुद से मुआयना करने की ज़रूरत है कि क्या वाकई में आरएसएस जातपात में विश्वास नही करता, या सिर्फ एक lip service यानी मुंहजबानी बोल्बचन कर रहा है ।

जो संस्था *थूक कर चाटने* वाली नीतियों के लिए बदनाम है, कांग्रेस पार्टी की *gst, आधार* से *मनरेगा* तक जिन नीतियों का विरोध किया और फिर *थूक कर चाटते हुए* खुद वही ले आयी, यानी जो कि सामान न्याय व्यवस्था में विश्वास ही नही करती, क्या वह वाकई में भेदभाव नही करने वाली संस्था हो सकती है ?

जातपात आखिर है ही क्या ?
भेदभाव ।
और भेदभाव कैसे किया जाता है ?
असमान न्याय , अप्रकट न्याय, अघोषित कानून ही तो भेदभाव है।
अभी ndtv पर हुए cbi रेड की कहानी को ही देख लीजिए। या फिर भ्रष्टाचार निरोध के नाम पर आम आदमी पार्टी के लोगों पर आए दिन हो रहे कार्यवाही को देख लीजिए। मोदी पर सहारा और बिरला से करोड़ों रुपये लेने का सबूत तक है, मगर रेड केजरीवाल के दफ्तर पर होती है, या ndtv के लोगो पर। और फिर ऐसे भेदभाव वाली कानून व्यवस्था करने वाले लोग कितनी निर्लज्जता से कहते फिरते हैं कि वह लोग जातपात में विश्वास नही करते ।

आश्चर्य ..घोर आश्चर्य।

जातपात के अंधकार युग की दास्तान वही है जो कि आरएसएस और भाजपा आज  भी प्रशासनिक शक्तियों के माध्यम से कर रहे हैं।यानी,  किसी निम्म जाति के लिए वही कार्य गलत , पाप या फिर अवैधानिक होते थे, जो किसी उच्च जाति के लिए स्वीकृति और मान्य या वैधनिक, या फिर छोटी भूलचूक करके पारित हो जाते थे। यही तो थी वह ब्राह्मणपंती जिसका इतना विरोध हुआ इस समाज मे ।
और आज फिर हम आजादी के इतने सालों बाद उसी व्यवस्था से ग्रस्त हो गए है।
असमान न्याय।
यानी सोनिया, मुलायम, मायावती, लालू, ममता के लिए वह कार्य अवैध, अमान्य, पाप माना जायेगा जो कि मोदी, जेटली , मोहन, नितिन या सुरेश के लिए वैध माना जायेगा ।

और फिर कहो कि हम जातपात नही मानते, यानी कोई भेदभाव नही करते ।!
पूरा प्रशासन शक्ति खुल्लम खुला भेदभाव नीति पर चलवा रहे है और फिर सफेद झूठ बोलते है।

आरएसएस की समस्या ही यह है कि वह उन शब्दों के मूल विचार और अभिप्रायों को नही समझता है जिन्हें वह यूँ ही रट्टू तोते की तरह दिन भर बोलता फिरता है।

किसी भी किस्म के भेदभाव का दूसरा बड़ा स्रोत होता है व्यक्तिनिष्ठ पैमानों का उपयोग। और तीसरा बड़ा स्रोत है तार्किक प्रमाण के बजाए अंधविश्वास करने पर जोर देना।
भाजपा के शासन में यही हो रहा है । कही देशभक्ति के नाम पर, कही सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर, कही सेना के नाम पर, और कही गाय और गौमांस के नाम पर--- जनता को *तार्किक प्रमाण* नही, *अंधविश्वास* करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। जबकि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया को बुला कर अपनी सीमा क्षेत्र का निरक्षण कैमरे पर करवा कर प्रमाण देता है, तब भी मोदी जी की सरकार चाहती है कि देश की सशत्र सेना पर विश्वास करते हुए हम मान ले कि *सर्जिकल स्ट्राइक* हुई थी ! यह जनता पर अंधविश्वास करने का प्रशासन का दबाब नही तो और क्या है ? और फिर भेदभाव यहाँ से ही तो आरम्भ होता है। जब तर्कशक्ति नष्ट हो जाती है और सही-गलत का पैमाना किसी दूसरे की मनमर्ज़ी बन जाती है, जिस पर की अंधविश्वास करना जनता की मजबूरी होता है। तब आरम्भ हो जाता है भेदभाव, यानी जातपात, क्षेत्रवाद, वर्णवाद, भाषावाद, लिंगभेद। भेदभाव ही तो इंसान की गुलामी का स्वरूप है। आज़ादी का एक अर्थ यही है -- भेदभाव वाले कानून से मुक्ति। याद है न गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में ट्रैन से उतारे जाने वाली घटना।

आरएसएस मूर्खियात का गढ़ है। वह सिर्फ मुंहजबानी ही शब्दों का भोग करता है। उनके अर्थ और अभिप्रायों को नही समझता है। भाषण देने सीखना उनका दैनिक कार्य है। शब्दों और तर्क पर चिंतन करना नही। खोखले शब्दों को बोलता है।

आख़िर राष्ट्र भाव का भी क्या अर्थ और अभिप्राय रह जाता है यदि प्रशासन भेदभाव वाली नीतियों पर चलता रहे। क्या जनता का एक बड़ा हिस्सा मात्र किसी देशभक्ति नाम की अनजानी भावना को किसी दूसरे के दुख और भोग की खातिर अपनाने के लिए बाध्य होना चाहिए, जबकि प्रशासन उसके साथ भेदभावपूर्ण तरीके से पेश आता है ?