Sunday, January 22, 2017

क्यों लबालब है भारतिय सामाजिक चेतना कुतर्क और कूट से

कभी कभी सोचता हूँ की भारतिय जनसँख्या में इतने कुतर्क और कूट (धोखा , भ्रम) आया कैसे ।
और जवाब में यही उत्तर मिलता है कि सदियों की ग़ुलामी और अथाह गरीबी से हमने खुद का मनोबल बनाये रखने के लिए जो ख़ुशी पाने की नुस्खे लगाये थे , उसमे हमारी संस्कृति ने विवेचना करना बंद कर दिया क्योंकि अत्याधिक विवेचना में दर्द और दुःख मिलता है। बस वही से यह कुतर्क और कूट हमारी सामूहिक चेतना में घर कर गए।
संक्षेप में समझे तो हमने अपने दुःखों से बच भागने के लिए जो "हंसते रहो", और "जिंदगी हंस के बिताएंगे" की दौड़ लगायी थी, तो बस वही पर हमने अपने चिंतन मस्तिष्क को पीछे रख छोड़ा था। संस्कृति और समाजशास्त्र के विद्धवान हम भारतियों के लिए कुछ ये ही नजरिया रखते हैं। वह यह समझ भारतीय फिल्मों की सफलता और उनके कथा पट के तत्वों को देख कर समझते हैं। मनमोहन देसाई से लेकर करन जौहर तक जिस प्रकार की फिल्में भारत में "हिट" होती आ रही है वह भारतीय लोगों की न सिर्फ पसंद बल्कि उनकी सामाजिक चेतना को भी छलकाती हैं। किसी दौर में तो मनमोहन देसाई और अमिताभ बच्चन ने नौ लगातार सुपरहिट फिल्में दी थी। और यदि कोई इन फिल्मों के दृश्यों और पटकथा की तार्किक समीक्षा करे तो शायद शर्म करेगा की भारतीयों को क्या पसंद था। खुद अमिताभ भी अपने एक साक्षात्कार में यह कहते सुने गए हैं की जब वह मनमोहन देसाई के साथ इन फिल्मों में काम करते थे तब आरम्भ में वह अपने करियर पर इस प्रकार की बेवकूफी वाले दृश्यों के लिए देसाई को अपनी चिंता बताते थे कि , 'क्या कर रहा है यार, ऐसी बेवकूफी दिखा कर मरवायेगा क्या'। मगर मनमोहन देसाई को अपनी समझ पर पूरा यकीन था कि उन्होंने भारतिय जनता की पसंद की नब्ज़ पकड़ ली है। अमिताभ भी मनमोहन देसाई को अपनी सफलता का श्रेय देते हुए कहते हैं की मनमोहन सही थे, क्योंकि उनकी जोड़ी ने एक के बाद नौ लगातार सुपरहिट फिल्में ऐसे ही दृश्यों और पटकथाओं पर दी।
जनता को सुखद अंत , काल्पनिक संजोग , करिश्माई शक्ति से मारधाड़ के दृश्य भाते थे और मनमोहन देसाई की फिल्में इस प्रकार के दृश्य और पटकथाओं से भरी हुई थी।

शायद कुतर्क और भ्रम/कूट वही से हमारी सामजिक चेतना में व्याप्त हो गया। अत्याधिक कुतर्कों के प्रसार कर नतीजा है की आज हममें भेद कर सकने का अंतःकरण ही नष्ट हो चूका है तर्क और कुतर्क के बीच में। आलम यो हैं की आज तो 10 भारतियों के मध्य 12 नज़रिये होते है। यानि प्रत्येक भारतीय के पास एक से अधिक नजरिया ।

बड़ी बात यह है कि आज भी राजनैतिक पार्टियां के IT Cell हमारी इसी "सदैव हँसते रहो" की कमज़ोरी पकड़ कर अपना उल्लू सीधा करने वाले रणनीत लगाये हुए है। वह हमें हल्के, छोटे मोटे jokes के माध्यम से हमारी चाहते और मस्तिष्क पटल पर उभरती छवियों को नियंत्रित करते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता और हम हंसने के लिए जो jokes पढ़ते है वह कुतर्क और कूट से लबालब हमारी चेतना को किसी और की सुविधा के लिए मरोड़ते रहते हैं, कुतर्कों और कूट को jokes की जीवनरक्षक सांस मिलती है।