Wednesday, December 14, 2016

सांस्कृतिक इतिहास की एक कहानी -- गणराज्य और प्रशासनिक सुधारों का जोड़

प्रशासनिक सुधारों के इतिहास के दृष्टिकोण से समझें तब आभास आता है की आज़ादी हमें जीत कर नहीं, बल्कि भीख में मिली है। असल में आज़ादी पाने के तरीके की बहस का माहौल राजनैतिक या सांस्कृतिक नहीं है। लोग अकसर इस बहस को नेहरू और गांधी वाद से जोड़ देते है, सुभाष चंद्र बोस को दूसरा सिरा बना कर पूरी बहस राजनैतिक उठा पटक में चली जाती है।
जबकि इस बहस का वास्तविक कक्ष प्रशासनिक सुधार है।
आज़ादी के बाद हमने भारत को जब गणराज्य बनाने का संकल्प लिया तब हमने अपनी खुद की वेदना के सांस्क़तिक इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। बल्कि अंग्रेज़ जो छोड़ कर जा रहे थे, उसको वैसा ही अपना लिया, और तीन साल बाद जो संविधान भी रचा तो उनके सांस्कृतिक इतिहास के पाठ को बिना सोचे समझे नक़ल कर लिया।
नतीजा यह है आज हमने सबसे बड़ा संविधान लिख डाला है, मगर हमारे यहाँ rule of law है ही नहीं, कोई  उस संविधान का पालन कर्ता और संरक्षक है ही नहीं।
क्योंकि हम यह चिंतन कभी कर ही नहीं पाये की हमने गुलामी में जो पीड़ा , क्रूरता, निर्दायित देखि और सहन करी, उसके वास्तविक कारण क्या थे।अधिकांश भारतवासी तो गुलामी की पीड़ा दयाक इतिहास में बस मुस्लिम और ब्रिटिश शासन का होना ही गलत मनाते हैं।
इसके विपरीत पश्चिम देशों में गणराज्य की स्थापना सामंतवाद की विस्थापित करने की लिए आई थी।
क्या थे सामंतवाद प्रशासन व्यवस्था के वह गुण जिनसे उत्पनम क्रूरता और बर्बरता से निजात पाने के लिए गणराज्य व्यवस्था की नींव डाली गयी ?

फ्रांस और ब्रिटेन की क्रांति के बाद जब वहां से राजशाही खत्म हुई तब उसके स्थान पर जो शासन व्यवस्था आई उसमे जो कुछ सुधारात्मक बदलाव किये गए थे, वैसा चिंतन भारत में कभी हुआ ही नहीं। हमारे लोगों ने सारा दोष पुराने शासकों के धर्म मुस्लिम पंथ और उसके बाद अंग्रेजों पर फोड़ दिया । जबकि सच यह है कि सुशासन के लिए शासक का धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है,जितना की उनके शासन की विधि। अकबर को महान इसलिए कहलाते है क्योंकि शासन की विधि अपने युग से बहोत उच्च कोटि की थी। जबकि भारतीय right wing nationalist का आरोप है की अकबर को महान कहने के पीछे mind wash की साज़िश है, जबकि राणा प्रताप उससे पराक्रमी थे । अब इन फर्ज़ी nationalist कौन समझाए की सुशासन के लिए पराक्रम नहीं, नीतियों का अच्छा होना ज़रूरी है। इतिहास में राणा प्रताप के शासन विधि का कोई अध्याय है ही नहीं, हालाँकि चेतक घोड़े से किले की दीवार से कूद लगाने के तमाम किस्से और मूर्तियां मौज़ूद है। उधर अकबर के नौ रतन, और जिसमे हिन्दू राजाओं को भी शामिल करने का इतिहास विश्व व्यापक दर्ज़ है। अकबर ने धर्मों के आगे निकल कर आदमियों को चुना, एक अच्छ शासन की नीव डालने के लिए। राजा तोडर मल का नौ रत्नों में चयन अकबर की यही क़ाबलियत दिखलाता है, उसके सुशासन के प्रति वचन बद्धता।

शासन विधि पर भारत में कोई चर्चा और चिंतन नहीं हुआ है। जन चेतना में आज़ादी के सारी चर्चा दोषारोपण से भरी हुई है -- नेहरू सही थे या गलत थे, गांधी सही थे या गलत थे, सुभाष बोस आते तो क्या हो जाता, सरदार पटेल प्रथम प्रधानमंत्री बनाये जाते तो right wing nationalist की काल्पनिक दृष्टि से क्या क्या हो जाता, भारत कितना महान बना दिया जाता, वगैरह वगैरह।

इस प्रकार की मानसिकता के विपरीत फ्रांस और ब्रिटेन में शासन विधि के सुधार पर ध्यान गया। बात सिर्फ यही तक नहीं थी की अब राजशाही खत्म करके नया शासक किसी चुनावी प्रक्रिया से जनता में से चुना जायेगा। उनका चिंतन सामंतवाद युग प्रशासनिक कमियों को चिन्हित करने में गया, जिसमे फेरबदल करके नयी प्रशासन विधि अपनायी गयी।
इधर भारत में प्रशासन सुधार में तो कोई जन चेतना बनने ही नहीं पायी। सारी बहस जिससे जन चेतना का प्रसार होता वह तो नेहरू-गांधी-सुभाष-पटेल प्रपंच में हड़प ली गयी।
  फ्रांस में प्रशासनिक सुधार के लिए एक व्यवस्था droit administratiff की नीव डली और ब्रिटेन में Dicey नाम के एक चिंतक के विचारों के आधार पर rule of law ने जन्म लिया। असल में गणराज्य के मूल प्रशासन विधि innocent until proven guilty और separation of power की नीव यही से डाली गयी थी। भारतीय जनता को इन सिद्धांतो का अभी तक ज्ञान नहीं है, न तो इनकी आवश्यकता को समझा है और न ही इनकी कमियां और लाभ को।
इसलिए संविधान के इतने बड़े लेख के बावज़ूद उसका पालन करने वाला शासक आज भारत में कोई है ही नहीं। आज़ादी के इतने सालों बाद हम लोग एक नकली प्रजातंत्र में जी रहे है, जहाँ नए प्रकार के सामंतवाद ने जन्म ले लिया है, कोई व्यवस्था सुचारू नहीं चलती है, कोर्ट अपनी मर्ज़ी से अपने राजनैतिक आकाओ को संरक्षण देते हैं, पुलिस के यही हाल है, और पोलिटिकल class नए सामंत है जो की अपनी तनख्वा बढ़ाने का कानून खुद ही पारित करते हैं। जनता से referendum करने का उपाय का मज़ाक बनाया जाता है की "गुसलखाने जाने से पहले भी जनता से पूछना होगा", और बदले में जनता को पञ्च साल में एक बार वोट देने की "महाशक्ति" दे दी गयी है और वह भी सिर्फ एक बुलेट वोट !!

सामंतवादी न्याय व्यवस्था प्रजा के कष्टों का मूल थी, न की शासक का धर्म या मजहब। प्रमाण , साक्ष्य , प्रमाण के उत्तरदायित्व की विधियां वह बिंदु थे जिनमे क्रांति के बाद सुधार हुआ। शासक का मजहब इन देशों में समस्या था ही नहीं।।मगर भारत में तो अभी तक जन चेतना में शासक की जाति और मजहब को दोष दिया जाता है। वैसे भेदभाव की जब बात आती है तब संतुलित न्याय प्रणाली इन बिंदुओं पर भी गौर करती है, मगर फिर सम्पूर्ण प्रशासन सुधारो में भेदभाव तो मात्र एक अन्य बिंदु ही है, एक बहोत बड़ी सूची में।
ऐसा लगता है की मानो भारत में कुशासन का पूरा दोष भेदभाव को ही मान लिया गया है, दूसरे कारणों को अनदेखा करके।

सामन्तवाद या राजशाही युग के प्रशासन विधि की जिन चारित्रिक विशेषताओं ने जनता को बहोत त्रस्त किया था वह थे :-
1) मनमर्ज़ी के कानून बनाना, जिनकी कोई पूर्व घोषणा या जनसूचना नहीं होती थी, मनमर्ज़ी से उन्हें हटा देना,बदल देना, या किसी भी समय से उनको लागू कर देना ; अलिखित या मौखिक दिए गए कानून
2) कानून सभी के लिए एक समान नहीं होना, राजाओं और उनके पसंदीदा लोगों को कानून से ऊपर मानना
3) विरोधाभासी कानूनों का बनाना, जिसमे खुद के लाभ और हितों को सर्वोपरि रखना, उनको जमाये रखना
4) व्यक्तिनिष्ठ व्यवस्था जिसमे प्रमाण , साक्ष्य, आंकलन, recruitment को वस्तुनिष्ठ आधारों पर नहीं, बल्कि व्यक्तिनिष्ठ आधारों पर तय करना।

प्रशासन विधि के इन अवगुणों से निजात पाने के लिए फ्रांस में droit administratiff प्रसार में आया। इसकी स्थापना नापोलीयन नामक शासक ने करी थी, जिसके लिए उसे आज तक का फ्रांस का सर्वश्रेष्ठ नागरिक माना जाता है।
उधर ब्रिटेन में dicey नामक चिंतक ने भी rule of law में इन्ही उवगुणों से निजात के प्रयास किये थे।
प्रशासन की दोनों ही विधियों में यह माना गया था यदि विधान बनाने की क्षमता और न्याय देने की शक्ति एक ही व्यक्ति या संस्था में आ जायेगी तब फिर इंसान और नागरिक कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकता है, उसे कभी भी नाना प्रकार के उत्पीड़नों से मुक्ति नहीं मिल सकती है। बस separation of power को यही से प्रशासन विधि का प्रथम मूलमंत्र मान लिया गया। हालाँकि इसकी कमी को भी पहचाना गया की व्यवहारिकता में ऐसी व्यवस्था पूर्णतः संभव नहीं है। इसलिए फिर शक्ति संतुलन और जन चेतना को प्रशासन विधि में प्रतिपल साक्ष्य बनाये रखने की चतुर विधियां विक्सित करी गयी।
 

rule of law व्यवस्था अभी भी औसतन भारतीय की समझ में नहीं आया है। rule of law व्यवस्था मनमर्ज़ी के कानून, अलिखित और पूर्व घोषणा के बिना बनाये कानून, असमान और विरोधाभासी कानूनों का समापम , व्यक्तिनिष्ठ प्रमाणों से निजात इत्यादि पहलुओं पर केंद्रित है। औसतन भारतीय जहाँ भी प्रबंधन में होता है वह बार बार सामंतवादी प्रशासन प्रणाली वाले नियमों को उत्पन्न करके लागू करता ही करता है। इसलिए श्रमिक हितों का उलंघन भारतीय प्रबंधकों का मूल "कौशल" बन गया है, जो की वैसे एक अवगुण और असामाजिक आचरण होना चाहिए। औसत भारतीय प्रबंधक या प्रशासक नियमों को इतना जटिल, अस्पष्ट और भूलभुलैया  बना देता है की misfeasance, malfeasance और non feasance आये दिन का प्रशासनिक दोष बन जाता है। नियम होते है, मगर उनको लागू करना या न करना वापस मनमर्ज़ी विधि पर आ टिकता है। यानि वापस सामंतवादी प्रशासन के अवगुण , एक विशाल कानून भूलभुलैया मार्ग व्यवस्था से होते हुए।

व्यक्तिनिष्ठता अभी भी औसत भारतीय प्रबंधकों का मानव नियंत्रण शक्ति का मूल स्रोत है। performance evaluation के माध्यम से भेदभाव, मनपसंद व्यक्ति को बढ़ावा, नापसंद का उत्पीड़न यह सब औसत भारतीय प्रबंधक के इर्दगिर्द शासन की आम कहानी है।
हम जब भी आज़ादी की बहस को नेहरू-गांधी-सुभाष-सरदार पटेल प्रपंच में डालते हैं , अपने लघुचिन्तन मस्तिष्क में हम व्यक्तिनिष्ठता से बाहर आने से मना कर बैठते हैं, जबकि प्रशासनिक सुधारों के एतिहासिक सबक में सामंतवाद युग की सर्वप्रथम त्रुटि तो प्रशासन और न्याय विधि ही मानी गयी है। तो, हम अनजाने में हम बदलाव तो मांगते है , मगर सुधार करने को मना कर देते हैं।