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Showing posts from November, 2016

भक्त बुद्धि की प्रबंधन और प्रशासन में भेद न करने की गलती

अच्छे योद्धा को अपनी सत्ता कायम रखने के लिए अच्छा शासक होना बहोत ज़रूरी है।
अच्छे योद्धा की वरीयता नापना भले ही बहादुरी (brave), शौर्य (chivalry, bravery in combination with gentleman behavior), निडरता (daunting), आक्रामकता (aggression),
   जैसे आचरण से हो ...मगर अच्छे शासक की वरीयता नापना तो उसकी न्यायप्रियता (justice), समता(equality), निष्पक्षता (impartial), विमोह (dispassionate), निषभेदता (unbiased) से ही मानी जाती है।#भक्त_बुद्धि_को_सद्ज्ञानमगर भक्तों की समस्या का मूल तो कुछ और ही है। समस्या यह नहीं है की भक्त की मंडली अच्छे योद्धाओं से नहीं बनी है जो की अच्छे शासक साबित होने लायक नहीं है। समस्या यह है की भक्त की मंडली व्यापारी वर्ग और आदर्शों वाले लोगों से बनी हुई है जिन्हें प्रबंधन (Management) और प्रशासन (Administration) के बीच का अंतर वाला आरंभिक अध्याय याद नहीं है।
भक्तों की समस्या है की वह rule of law को न तो समझ पा रहे हैं, न उसका पालन कर रहे हैं। सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या कारण है की भक्तों की मंडली में उच्च पढ़े लिखे लोग दिखाई देते हैं, मगर फिर भी असमतल व्यवहार…

मनोरोग के लक्षण : विपक्षियों और विरोधियों का अपमान, तिरस्कार, उपहास करने की प्रवृत्ति

अमेरिकन साइकोलॉजिस्ट एसोसिएशन की मनोरोग मैन्युअल में देख कर परख करने की ज़रुरत है ... मैन्युअल में जो लक्षण दर्ज़ है उनके अनुसार मेरा दावा है की भक्तों को यौन चरम आनंद जैसा अनुभव प्राप्त होता है केजरीवाल को भिखारी, भगोड़ा जैसा तिरस्कार करके ।
रावण ने भी अंगद, और हनुमान से ऐसे तिरस्कार किये थे ,
और दुर्योधन और दुशासन ने द्रौपदी और पांडवों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया था ।
narcissism मनोरोग से पीड़ित लोग ऐसा विरोधियों का तिरस्कार वाले व्यवहार करते है जिससे उन्हें यौन आनंद जैसा अनुभव मिलता है ,"मज़ा आता है"।

Vedic Sholks have wisdom to speak "diplomatically" , the glorified name for speaking lies.

interestingly, the follow up lines of "satyam bruyat" reveal the inspiration of when and where to "not to speak the truth", "priyam brutyat प्रियं ब्रूयात् .
!!!!!
And they expect us to accept their "satyam", whose property is that it is compromisable, accepted to be concealing  or misleading ... It is still "truth" as per them !!
Hail Indian philosophy and divinity !!
And we wonder why we are so self-centred, self-absorbed, egoistic, narcissist , almost mentally challenged --autistic -- race , while our own Makers of the Constitution undermined our societal intelligence - rather did not find us mentally and intellectually equipped, lacking the Collective Conscience -- and therefore denied to we the people, the power to enjoy the Democracy in fullness by way of depriving of those democratic power which is available in all other countries in the form of Right to Recall, Right to Reject.

Uniform civil code IS NOT SAME as Common Civil code

The Civil Code which we want to be made Uniform , meaning that Civil Code should be applied in the same manner to every citizen in the country ..refers toa collection of laws in regard to Marriage, Divorce, Inheritance, Succession of property, religious affairs , etc. Since Democracy by its ver nature have been about pluralism, such laws have started to become pluralistically accepted by the courts and constitutions in many other democratic societies. IT MUST BE EMPHASISED THAT THE CIVIL CODES are different from the CRIMINAL CODE , which remain HOMOGENOUS ALREADY in all the democratic countries. The CRIMINAL CODES are a collection of laws which deal with crimes as Homicide, Evidencing, Adultry, Nuisance, Torts laws. For the information of interested readers, the other set of laws which too remain homogenously applied already for natural reasons are Administrative laws, Corporate and Business laws, such as Contract Laws. There are not many issues faced by the citizens in regard to any …

UNIFORM civil code NOT TO BE CONFUSED with COMMON civil code

The problem would have been tremendous had Lord Cornwallis not worked to remove the laws which prevailed at the times the Moghuls were ruling in India. The Sharia Laws in regard to Crime, Evidencing are something which are not globally accepted. The larger set of democratic countries accept the Brtish Legal and Judicial System which by efforts of Lord Hastings and Lord Cornwallis got adopted within the Indian land too , in the form of Indian Evidencing Act. The specific areas of differences are that Evidencing within the Sharia Law is compeletely by EYEWITNESS -that too, a precise, undoubtful one-- and it dismisses out space for HUMAN LOGIC to work in the form of INEVITABLE LOGICAL CONCLUSION. Also , Sharia Laws depend a lot on the CHARACTER REPORTS of the parties in dispute from a few EMINIENT PEOPLE, instead of verifcation, cross-examination et al of SUBJECTIVE and the OBJECTIVE evidence presented within the court in regard to claims raised by each of the parties. In Sharia Laws, AD…

Non-uniform civil code : आज़ादी के रास्ते आज़ादी को खत्म करने के उपाय

संविधान और प्रजातंत्र के चिंतकों का मानना हैं की प्रजातंत्र की आज़ादी का दुरूपयोग वापस अपने अपने धार्मिक गुट के भीतर अप्रजातंत्रिक मूल्यों को प्रसारित करने के लिए किया जा सकता है, ---जिसको करने से सुदूर भविष्य में एक ऐसी पीढ़ी निर्मित हो जायेगी जो की आज के इन प्रजातान्त्रिक मूल्यों को न तो जानती होगी और न ही इसके लिए संघर्ष करेगी ।
यानि आज मिली आज़ादी का उपयोग करके वापस गुलामी और दास प्रथा को सुलगाया जा सकता है ।
इसके लिए चिंतकों का कहना है कि संविधान में दिए गए व्यक्तिगत आज़ादी और अधिकारों के संरक्षण के लिए धार्मिक मूल्यों के विरुद्ध जा कर भी प्रत्येक इंसान को वह उपलब्ध करवाने ही होंगे। अगर किसी व्यक्ति के साथ कुछ अन्याय, यानि वर्तमान प्रजातंत्र और संविधान के मानकों से कुछ गलत हो रहा है, जो की उसके धार्मिक मूल्यों से भले ही कुछ गलत न हो, तब भी उसे संविधान से दिए गए अधिकारों के अनुसार न्याय दिलवाना ही होगा, चाहे इस तरह उसके धार्मिक मूल्यों को चोट पहुचे।
इस प्रक्रिया को UNIFORM नागरिक संहिता बुलाया गया है।
COMMON नागरिक संहिता का अर्थ है की सभी नागरिकों पर , चाहे वह किसी भी धर्म के हो, उन …

महा धूर्त पॉलिटिशियन के लिए एक आईडिया

भाई ,
एक आईडिया आया है की कैसे कोई कुटिल , महा धूर्त पॉलिटिशियन जनता से आने वाले सुधार के प्रेशर को तोड़ सकता है ।
1) सबसे पहले तो बिगड़ी हुई एक व्यवस्था की नीव डालिए , उसमे सुधर की गुंजाइश की उम्मीद डलवा कर ।
२) अगर कोई आपत्ति भी ले की इस तंत्र में इतनी  गलतियाँ हैं , तब उनको यह झंसन दीजिये की देखो इसमें सुधार की गुंजाईश हैं । भविष्य में धीरे धीरे इसे हम दुर्सुत कर देंगे ।
३) फिर जब समयकाल में महंगाई इतनी बढ़ा दो की जनता को प्रशासनिक सुधार मांगने का समय ही न मिले । अगर कोई समय निकालने की कोशिश करे तो वह भूखा मर जाये , महंगाई से । वरना वह भ्रष्टाचार करने के लिए मजबूर हो जाये , और फिर जब खुद भी हाथ काले कर ले तब उसका कलेजा ही न बचे की वह सुधार यह इमानदारी के लिए कोई जंग लड़ सके ।
४) फिर धीरे धीरे लोगों को आईडिया दो की गलत को खत्म करने के लिए गलत का सहारा लेना ही पड़ता हैं । इस आईडिया पर कुछ और लोग कुछ न कुछ गलत करके अपना ज़मीर गिरवी रख देंगे और फिर ठन्डे पड़ जायेंगे ।
५) एक आध बार गलत तरीके से सही काम भी कर दिया करो , जिससे की बाकी बाख सिविल सोसाइटी भी टूट जाये की गलत तरीके से यदि सही काम करें तो ग…

The FICN-Black money twine

It may impact the FICN (fake indian currency notes) holders, but it will hardly impact the *black money* holders.
It is a myth to assume that the black money keepers will be impacted by this move. Except the ones who have the hauls, which tactically implies the government officials who stockpile the bribe money in cash under their beds, inside the mattresses, inside the pillow , and so.
The real black money keeper have it in their bank accounts abroad, which is put into buisness investments through a *layering network  of stakeholder companies*. The Transparency International, the NGO dealing in anti-corruption crusade, has explained the technique many times, but received only by those who have a genuine interest , not a mere political "lip service" interest.

Infact the indicators of closing down the notes were up there much in advance. It is just the timing and the good number of denomination which were missing. Even in that, the sword hanging over the Rupess 500 denominati…

खबर के दो पहलू

हर खबर के भी दो पहलू होते हैं, जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते है।
जनता में से किस तरह की प्रतिक्रिया निकलवानी है, इसको तय किया जाता है की खबर को किस पहलू से चमकाना है।
और प्रतिक्रिया कैसी चाहिए, यह तय होता है दाम देने पर।
अब चाहो तो खबर चमकवा लो की
1) मोदी जी ने पूर्वसूचना के साथ काले धन पर "छापा" मारा
या फिर चमकवा लो की
2) मोदी जी ने लाख चेतवानी दे कर भी नहीं मानने वालों पर छापा मार ही दिया ।

उत्सव, जुलूस जैसा माहौल

गौर करने की बात है की इस सरकार में निरंतर, एक के बाद एक , एक्शन किये जा रहे है जो की euphoria (उत्सव, जुलूस जैसा माहौल) के साथ हो रहे है। surgical strikes, अब FICN ₹500/1000 के चलन नोटों पर पाबन्दी, वगैरह।
जबकि अपनी समीक्षा में यह सब कार्यवाही जनता में पहुंचाई गयी बातों से कही दूर,  एक अर्धसत्य साबित हो रही है।
सोचने की बात है की रणनीति क्या है इनकी ?
क्या यह की,
झूठ बोलो,
तो
ज़ोर से बोलो,
बार बार बोलो
तब तक बोलो
जब तक की
वह सच न मान लिया जाये
euphoria फैलाने से क्या मकसद सधता हैं ?? शायद यह की जनता के एक वर्ग में ,खास कर भक्त वर्ग में , यह आभास बना रहता है की सब ठीक है, अब सब ठीक हो जायेगा ।
शेक्सपियर के नाटक जूलियस सीज़र में राजनीति और जुलूसों का यह सबंध खूब दिखाया गया है। एक रोमन कूट (धूर्त) शासक ने कहा भी था की अगर जनता को रोटी नहीं दे सकते हो तो सर्कस ही दे दो। यह मुद्दों को और भूख को , दोनों ही भूल जायेंगे। आखिर ग्लैडिएटर और अम्फिठेटर का निर्माण ऐसे ही कूटनैतिक कारणों से ही करवाया गया था।
मकसद था, जनता को उल्लू बनाना।

भारतीय फिल्में, सामाजिक चेतना और भोपाल फर्ज़ी एनकाउंटर

समाज की सोच वैसी ही होती है जैसा की उस देश का साहित्य और कला होती है। साहित्य और कला ऐसे माध्यम है जिनका इंसान की सोच पर प्रभाव बहोत गेहरा और व्यापक हो सकता है। इसलिए यह माध्यम एक बार में ही पूरे समाज को उत्तेजित कर सकने, या आक्रोशित कर सकने का भी माद्दा रखते है। और जिस वजहों से प्रशासन को साहित्य और कला से परोसी जा रही सोच पर भी नज़र बनाये रखनी पड़ती है।
    भारत में साहित्य और कला को जो वाहन सबसे अधिक प्रभावशाली है वह है हमारी सिनेमा।
  भोपाल एनकाउंटर पर जब मैं पब्लिक की प्रतिक्रियाओं को देखता हूँ तब मुझे बरबस जन चेतना पर भारतीय सिनेमा की गहरी छाप दिखने लगती है।
  अधिकांश भारतीय भोपला में हुए घटनाक्रम पर यह मानते है की यदि वह एनकाउंटर फर्ज़ी भी था तो क्या हुआ, ऐसे क्रूर संगिग्धों के साथ ऐसा ही होना चाहिए था, वरना फिर वह लोग कोर्ट-कचहरी से तो बरी हो कर बच निकलते।
   दूसरे तर्कों में सोचें तो एक बात तो साफ़ है की भारतीय जनता को खुद कॉर्ट कचहरियों की योग्यताओं पर शायद कुछ ज्यादा ही यकीन है  (या कहें की यकीं नहीं है ) कि ऐसे संगिग्धों को उनके मुकाम तक ले जाने में हमारे तंत्र की काबलियत क्य…

A message to the brats of Indian Army

Indian Army is a British creation. It is the same Army composed of the very Indians which was built by the British to rule over the people of this very land which we call today as India. It is that very Army which was used for crushing the Indian sepoy mutiny, which hanged its own fellow man Mangal Pandey when he rose to stand for certain values.
    Army and it's "brats" must therefore abandon the conceit and self centered narcissism which they so deeply develop taking for granted the civil society's need for being respectful to their soldiers.
    The Army didn't fight for India's freedom from the British. It was people as Bhagat singh and Gandhi- None of these martyrs were Army men-. they were ordinary civilian. Army protects the *Country*, the civil society builts a *Nation* from that country. A Country is merely a piece of land, nation is the value that makes it worth living and giving your life for it. The courage of a soldier to give his life doesn&#…