Thursday, March 03, 2016

मानवाधिकार और कुछ सामाजिक समस्याएं -- श्री चमन लाल जी की अभिभाषण

श्री चमन लाल जी, IPS, सेवानिवृत पुलिस महानिदेशक (नागालैंड राज्य) एवं भूतपूर्व सदस्य राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग,ने government law college, मुम्बई  में श्री julio rebiero जो, सेवानिवृत पुलिस आयुक्त मुम्बई, की अगुवाई में विमोचन कार्यक्रम (conference) की सभा को संबोधित किया। श्री रेबीएरो जी के शब्दों में श्री चमन लाल जी को मानवाधिकार विषय में श्रेष्ट ज्ञानी (an authority) माना जा सकता है, और श्री चमन लाल जी राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग से सम्बद्ध जांच विभाग में director general की भूमिका में सेवा दे चुके हैं।
  सभा में घोषणा करी गयी की संघोषटी के उपरांत उसका सार लिखने की एक प्रतियोगिता रखी गई है जिसको सर्वश्रेस्ठ लिखने वाले को ₹5000/- का आयोजक संघटन, People's Concern for Good Governance की तरफ से पुरस्कार दिया जायेगा। शर्त थी कि यह सार किसी निश्चित शब्द सीमा में लिखना था।
   श्री लाल जी ने जन रूचि के किन्ही तीन विषयों पर मानवधिकार की दृष्टि से अपने विचारों को प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखा। सभा में शांति बनी रही इसलिए उन्होंने यह तीन विषय खुद ही चुनाव करते हुए भ्रष्टाचार, आरक्षण तथा आतंकवाद निरोधक सख्त कानून जैसे कि TADA अथवा POTA को पकड़ा तथा इन विषयों के प्रति मानवाधिकार कानून के अपने पक्ष को सबके सम्मुख प्रस्तुत किये।
     भ्रष्टाचार के प्रति मानवधिकार कानूनो का अपना पक्ष रखते हुए श्री लाल ने कहा की भ्रष्टाचार को अखिल समाज के प्रति श्रंखलाबद्ध वित्तीय अपराध समझा जा सकता है जिसके चलते समाज को निरंतर अथवा हमेशा के लिए उसके सभी अधिकारो से वंचित कर दिया जाता है। समाज को संविधान की ओर से जो कोई भी अधिकार प्राप्त है, जैसे की मौलिक अधिकार (fundamental rights), वैधानिक अधिकार (legal or statutory rights), इत्यादि ,यह सब के सब तब ही प्राप्त हो सकते है जब नागरिक स्वयं ही सक्षम हो इनको मांग सकने के लिए। मगर भ्रष्टाचार के कारण सरकारों के पास आर्थिक और वित्तीय आभाव आने लगते है जिसके बाद वह जन उत्थान की योजनाओं में उनकी पहुँच या गुणवत्ता में आर्थिक कटौतियां करने लगती है, तथा फिर नागरिक को हमेशा के लिए इतना निम्म कुटी शिक्षित अथवा वित्तीय संकटों(महंगाई के रूप में) से ग्रस्त करके छोड़ देती है की या तो उसके पास अपने अधिकारों का ज्ञान ही नहीं रह जाता अथवा वह दैनिक चर्या में जीवन यापन के लिए इतना संघर्षशील रह जाता है कि उसके पास समय और वित्तीय संसाधन ही नहीं बचते की वह अपने अधिकारों के लिए एक और अन्यथा संघर्ष कर सके।
    आरक्षण विषय पर अपने विचारों को रखते हुए श्री लाल जी ने बताया की संविधान के अनुच्छेद 16 में right to equality (परस्परता का अधिकार) की बात रखी गयी है। मगर किसी भी ऐसे समाज में जो की पहले से ही परस्पर नहीं है, उनमे किसी भी परस्परता के अधिकार को अंधाधुंध प्रोत्साहित करने से उस समाज में पहले से ही जमी उसकी विषमता और अधिक तीव्र हो जायेगी घटने की बजाये। (Promoting the Right to Equality in a society which is already unequal will only be perpetuating the inequality within it.)
    आतंकवाद निरोधक कानून जैसे कि TADA और POTA के प्रति मानवधिकार कानून का अपना पक्ष रखते हुए श्री लाल ने कहा की आज मानव समाज इतना जटिल हो चुका है जिसमे तमाम विचारधारा के लोगो को संतुष्ट कर सकना एक साथ संभव नहीं है। ऐसे में कानून पलान को सुनिश्चित करने के लिए दुनिया के तमाम देश यदा कदा सख्त कानूनों को अपनाते हैं। सख्त कानून वह हैं जो की प्रमाण और साक्ष्य के कानूनो के विरुद्ध जाते हुए पुलिस या सेनाओं को कार्यवाही का अवसर देते हैं। मगर सभी उन्नत देशों में जब कभी ऐसे कानूनों को लगाया जाता है तब उनका दुरूपयोग रोकने की संघठनों को भी सशक्त , सुदृढ़ करा जाता है जिससे उनका दुरूपयोग कम होता बराबर होता है। मगर भारत में दुरूपयोग रोक सकने के प्रबंध पुख्ता नहीं हैं। जब tada लाया गया था तब राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग ने tada कानून की अवैधानिक, गैर लाइसेंसी हथियारों वाली धारा के तहत सर्वाधिक मामले गुजरात राज्य से पाये थे जबकि उस समय गुजरात में आतंकवाद था ही नहीं। tada कानून आने के पूर्व ऐसे मामले आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज़ होते थे जिनकी दर्ज़ मुक़द्दमो की संख्या इतनी नहीं थी। tada आने से यकायक संख्या वृद्धि सूचक बन गया की पुलिस इस कानून का दुरूपयोग कर रही थी। आर्म्स एक्ट जिसमे पुलिस को प्रमाण और साक्ष्य के अन्य कानून के तहत आरोपी को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना होता था, अब पुलिस tada कानून का अवैधानिक लाभ लेते हुए आरोपी को बिना वारंट अरेस्ट करती थी और तीन दिन तक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के प्रावधान से मुक्त थी।
    श्री लाल ने मानवाधिकारों के दुरूपयोग पर भी अपने विचार रखते हुए कहा की अधिकांशतः इन कानून का उपयोग किसी न्यायलय बद्ध दोषी या आतंकवादी को बचाव करने के लिए देखा गया है। जिसके चलते समाज में मानवाधिकार के प्रति अवस्वाद आये है। अब समाज ऐसे कर्मों को स्वीकृति या फिर मांग रखने लग गया है जो की आपराधिक हैं। कही कोई आतंकवादी या विशिष्ट आरोपी यदि जीवित पकड़ा जा सकता है तब समाज राज्य से मांग रखने लग गया है कि उसको वहीँ (फर्ज़ी) मुठभेड़ में मृत दिखा दो अन्यथा बाद में तमाम मानवाधिकार संघठन उसकी पैरवी करने आ जायेंगे। पुलिस में सख्त कानून के दुरपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है और समाज में राज्य नियोजित अपराधिक क्रियाओं की स्वीकृति, तथा मानवधिकारों के लिए अवस्वाद। इस खिंचा तानी का शिकार वह स्थान और पुलिस अथवा सैन्य बल हुए है जिनको किसी सख्त कानून की वास्तव में ज़रुरत है। यह सब किसी भी नवकाल प्रजातंत्र समाज के लिए विनाशकारी हो सकता है।
     श्री लाल ने बताया की कैसे राष्ट्रिय मानवधिकार आयोग आज भी देश का सबसे स्वतंत्र और सशक्त आयोग है। सशक्त होने के लिए यह एकमात्र ऐसा आयोग है जिसके पास अपना खुद का जांच विभाग है। और स्वतंत्र होने के लिए इसकी वित्तीय स्वतंत्रता ऐसे संचालित है कि कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार अकेले अपने दम पर इसके धन कोष को बंधित नहीं कर सकती है। साथ ही, इस आयोग का अध्यक्ष हमेशा ही कोई सेवानिवृत न्यायधीश ही होता है जो की इसकी निष्पक्षता को सुनिश्चित करता है। कई पार्टियों की सरकारों ने अध्यक्ष पद में फेर बदल करके किसी नौकरशाह अथवा अन्य नागरिक को लाने का प्रयास किया है मगर अभी तक सफल नहीं हुए हैं।