क्यों मोदी सरकार और आरएसएस का यह प्रयोग असफल हो जायेगा ?

मुझे लगता है की कांग्रेस वापस आ रही है...भाजपा और मोदी जी इस गणित में पूरी तरह हार गए हैं। मेरी गणना में 2019 चुनाव तो क्या 2024 में भी कोंग्रेस का आना तय है। मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी बदस्तूर चालू रहे, बस।

   यह देश छोटे छोटे वर्गों में बंटा है। कई सारी छोटी क्षेत्रीय पार्टियां इस पर राज करती हैं। उन छोटी पार्टियों में ज्यादा कुछ एक दूसरे से सम्बन्ध बनाने के लिए common नहीं है। और जो कुछ है, वह कांग्रेस ही संभाल सकती है । दो सबसे बड़ी वोट कुञ्ज हैं
1) मुसलमानो को सुख शांति और भागीदारी
2) आरक्षित और पिछड़ा वर्ग को हिस्सेदारी।

भाजपा ने दोनों पर ही आत्म घात कर लिया है
1) मुस्लमान विरोधी है
2) आरक्षण विरोधी है।
यानि की भाजपा ने अपने ही गोल में गोल दाग दिए हैं। हिट विकेट आउट हो गयी है।

मोदी और भाजपा की सरकार ने यह सबक लेने में बहोत देर लगा दी है। मोदी शासन में आरएसएस की छवि एक जाति ब्राह्मणवादी संस्था के रूप में तो स्थापित हुई ही है, जो की माड़वाड़ियों और बनियों के समर्थन में एक दम निर्लज है। धूर्तता , यानि अस्थिर न्यायायिक मापदंड का गुण हमेशा से जाति वादी ब्राह्मणों और बनियों/माड़वाड़ियों यानि धंधेबाज़ों का माना जाता है। लालू का कुशासन था, मगर धूर्तता नहीं थी। यहाँ मोदी में वह गुण है। न ऐसे ब्राह्मण को समाज में सम्मान के योग्य है, और न ही ऐसे व्यापारी समाज के लिए हितकारी, राष्ट्र निर्माण के सहयोगी।  तो कोंग्रेस और लालू का उत्थान तय है क्योंकि यह धूर्त नहीं है। कोंग्रेस ने धूर्तता से त्रस्त वर्ग को हमेशा उच्च स्थान दिया था और करीब करीब सब ओहदों तक पहुचाया। सर्वोच्च न्यायाधीश से लेकर राष्ट्रपति भवन तक। और यही मुसलमानो के साथ किया। इसके दौरान उसने भ्रष्टाचार को पनपे दिया क्योंकि यही वह भोजन है जो की विखंडित वर्ग आपस में मिल कर खाने को तैयार हैं, वरना वहां कुछ भी common नहीं हैं।
भाजपा और मोदी ने भ्रष्टाचार का विरोध की छवि बनायीं, मगर असल में व्यापारी वर्ग के सेल्समेन बन कर रह गए। न भ्रष्टाचार पर लगाम लगी, उलटे हिंदूवादी हो गए, और आरक्षण विरोधी भी । यानी आम भाषा में बोले तो, "भाजपा ने किया क्या, मोदी शासन में ??"। जी हाँ, मोदी चाहे जो उपलब्धि गिनाते रहे, वोट कुञ्ज वर्ग में असल में भाजपा और मोदी ने अपने अभी तक के देढ़ साल से ऊपर के शासन में "कुछ नहीं" किया है।
कृष्ण भाई, आप समझ रहे हो न 'कुछ नहीं' का अभिप्राय ? यानि की भाजपा और मोदी हो गए total फ़ैल।

कोंग्रेस की दृष्टि से आनंद की बात यह थी की यह रिलायंस और अडानी तब भी खा रहे थे, और आज भी खा रहे हैं। यानी भ्रष्टाचार का भोजन उसके काल में सभी वर्गो को मिल रहा था। अब धूर्त काल मोदी युग में यह सीमित हो कर सिर्फ रिलायंस और अम्बानी अडानी को ही मिल रहा है। मोदी ने rti पर अलिखित शिकंजा कस दिया है। और मौखिक तौर पर उसके समर्थन में हैं। बस उनकी धूर्तता पकड़ी गयी है। अब और कुछ तो साबित करना ही नहीं है।
    एक अकेला आदमी जिसपर सब नज़ारे टिकाये थी की यही शायद मोदी के युग में अच्छे दिन लाएगा वह था सुब्रमनियम स्वामी। वही 2g और 3g घोटाले में पी चिदंबरम को किस मुकाम तक ले गया की मनमोहन सरकार हिल गयी। मोदी ने उसे वित्त मंत्री नहीं बनाया। असल में वास्तविक अर्थशास्त्री वही था, यहाँ तक की iit delhi और horward में वह प्रोफेसर तक रहा है। वित्त मंत्री अरुण जैटली को बना दिया जो की जीवन भर कॉर्पोर्टेस का वकील था। बस, मोदी ने आत्म घात करना आरम्भ कर दिया। कोंग्रेस बैठ कर हंसने लगी है, और टकटकी लगाये है की अब मोदी अपनी राजनैतिक जी लीला खुद खत्म करेंगे। उसके बाद के वैक्यूम में वह खुद ब खुद आ जायेगी।
   उधर केजरीवाल की मज़बूरी और कमी यह है की वह धन संपन्न नहीं है। और साथ ही सौरभ भाई जैसे घाघ, धूर्तता के प्रचारक भी बहुसंख्या में है देश में । वह लाख केजरीवाल को भ्रष्टाचारी साबित कर दें, मगर जनहित मंशा में धूर्तता में नहीं पकड़वा पाएंगे। याद रहे की जनता अपना प्रशासनिक हित हर युग और हर देश में पहचानती है। वह लाख गन्दी, अशिक्षित और बेवक़ूफ़ हो, मगर कुल मिला कर धूर्तता को भेद सकने में सक्षम होती है। तो केजरीवाल जम जायेंगे, मगर विस्तार नहीं कर पायेंगे। सभी वर्गो को यह व्यवस्था भी जमेगी। आखिर कर दिल्ली और मुम्बई जाने के प्रति जो गरीबों में छवि होती है, केजरीवाल उसे साकार ही करेंगे, भले ही पूरे देश में वह सुशासन न ला पाये। यह अरेंजमेंट चलेगा। आशा के दीप जलेंगे की शायद कोंग्रेस वाली केंद्र सरकार केजरीवाल से प्रतियोगिता प्रतिद्वंदिता में शायद देश भर में उसके बनाये नमूनों को पीछे चल कर ला सके।
  कुल मिला कर केजरीवाल मॉडल चल निकलेगा कुछ ख़ास और शायद शहरी , महानगरीय क्षेत्रों के लिये। भाजपा न घर की रहेगी, न घाट की। यानि, न शहर की, और न ही गाँव की। वह गौमांस और आरक्षण विरोध में आत्म घात कर गुज़रेगी।

कोंग्रेस की सफलता को सौरभ भाई जैसे घाघ और घूर्त प्रवृत्ति की आबादी सुनिश्चित करेगी, देखने में वह लोग भले ही भाजपा के समर्थक दिखें।
        अच्छा , कृष्ण भाई, अगर हम ऊपर लिखे सिद्धांत से सोचे तो समझ में आएगा की क्यों लालू प्रसाद का पतन कोंग्रेस के युग में आया, और क्यों लालू का उत्थान भाजपा के युग में आ रहा है। कारण यह है की ऊपर लिखे दो बड़े वोट कुञ्ज की गणित सर्वप्रथम देश में लालू प्रसाद ने ही पकड़ी थी। कोंग्रेस के युग में कोंग्रेस खुद दूसरा विकल्प बन कर लल्लू प्रसाद की गणित को फ़ैल कर देती है। मगर भाजपा के युग में भाजपा उस गणित में फैल हो गयी है और इसलिए लालू प्रसाद का उदय हो जायेगा। यानि एक बात और तय है-- देश की राजनाति का एक बहोत बड़ा गणितज़ लालू प्रसाद ही साबित जायेंगे। और यही सिद्धांत हमें आज कल मोदी सरकार और समाजवादी पार्टी की बढ़ती नज़दीकियों की कुछ झलक खोल कर देगा, शायद। भाजपा और नरेंद्र मोदी अंदर ही अंदर मुलायम सिंह को इस चुनावी वोट कुञ्ज सिद्धांत में उपयोगी समझ गयी है, और उसे पटाने के लिए कोशिश करेगी।
   यानि सौरभ भाई का उत्तर प्रदेश वाला दर्द बढ़ने वाला है, घटेगा नहीं। 😂

एक बात और,
भ्रष्टाचार के तार हमारे देश में जातिवाद और मुस्लमान तुष्टिकरण से कैसे जुड़े हुए है...इस बात पर गौर करें। ऊपर लिखे सिद्धांत में यह दिख जायेगा। भ्रष्टाचार को न मुस्लमान चाहता है, और न ही पिछड़ा या आरक्षित वर्ग। भ्रष्टाचार का लाभार्थी है पूंजीवादी वर्ग और राजनेता। छोटा , सरकारी पेशेवर लोगों वाला भ्रष्टाचार समस्या है ही नहीं। मूर्खदास मोदी उसे ही समस्या समझे पड़े हैं। वास्तव में सरकारी आफिस का भ्रष्टाचार तो दर्द तब देता है जब पैसा खिला कर भी काम न हो, और complain करने पर कार्यवाही भी न हो। आदमी को खलता तब है जब पैसा तो हाथ से गया ही, काम भी न हो। मुम्बई की कैम्प कोला बिल्डिंग के प्रकरण में मुझे यह अंश और सिद्धांत दिखाई पड़े हैं। बिल्डिंग निवासियों को शुरू से ही बिल्डिंग पर नियम उलंघन का मामला पता था। 1970 के युग में उन्होंने तब भी वहां घर खरीदे थे। दो कारणों से।
1) घर की आवश्यकता और मज़बूरी थी।
2) उन्हें देश में व्याप्त भ्रष्टाचार में यक़ीन था !!!! कि भ्रष्टाचार उनकी बिल्डिंग को बचा ही लेगा। मगर वह मुकद्दमा हार गए। मगर फिर राजनैतिक भ्रष्टाचार ने उन्हें बचाया, जो की सरकारी भ्रष्टाचार असफल हो गया था।
   सरकारी भ्रष्टाचार का बड़ा संरक्षक है राजनैतिक भ्रष्टाचार।
राजनैतिक भ्रष्टाचार होता है नेता और पूंजीवादी की मिली भगत में। सरकारी कर्मचारी इसे पकड़ने के लिए कर्तव्य बद्ध होता है। मगर वह भ्रष्टाचार करके उसे होने देता है, बदले में अपना हिस्सा लेता है, और बाकी सरकारी मुलाज़िमो के लिए सरकारी भ्रष्टाचार करने की छूट निकलवाता है राजनेताओं से।
   तो दोनों भ्रष्टाचारों की symbiotic रिश्तेदारी यूं बंधी है।
यहाँ जनता को डंडा चलाने का मौका देती है जनहित याचिका और सूचना का अधिकार। मज़े की बात है की यह दोनों भी कांग्रेस ही लायी थी। भाजपा के राज्यों में तो rti कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है, pil को ख़ारिज किया जाता है। न्यायपालिका में घुसपैठ करवाई गयी है।
   मोदी युग में ब्यूरोक्रेसी को pmo ने कड़ा नियंत्रण पर रखा है। काफी सारे बड़े पद के ब्यूरोक्रेट को निकाल दिया गया है। विदेश सचिव सुजाता सिंह, और iit mumbai प्रमुख। अब आप सोचेगे की pmo अच्छा काम कर रहा है ब्यूरोक्रेसी को बाँध कर। मैं कहूँगा की वह भ्रष्टाचार के symbiotic रिश्तेदारी को तोड़ रहा है सिर्फ अपने लोगों तक अवैध फायदा सीमित रखने के लिए। सरकारी पेशेवरों का बड़ा वर्ग भाजपा और मोदी से नाराज़ है। मोदी सूधार नहीं कर रहा है, बल्कि फायेदे के बंटवारे में हिस्सेदारी समेट रहा है।

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