Wednesday, September 30, 2015

अभिमान का आत्म-मोह सुख, वास्तविकता भंगिता क्षेत्र और राजनैतिक चुनाव


Visits as these, where he gets a Rock Star treatment, supply feed to some people's Narcissist pleasure of pride.  They get reinvigorated and take up a belief that our country is doing well, disregarding the actual ground conditions. The charmer is able to set up his Reality Distortion Field (RDF) with enhanced strength, which in turn helps him at the elections at hand.
   
इस प्रकार की विदेश यात्राताएं जिसमे की इनको किसी फिल्मी सितारे का अभिनन्दन दिया जाता है, एक भोजन देता है बहोत सारे व्यक्तियों के आत्म-मोह अभिमान सुख को। भोजन मिलाने से अभिमान सुख में नयी शिक्ति का प्रसार होता है, और एक नए सिरे से ऐसा अनुभव मिलता की मानो देश में सब कुछ कुशल-मंगल हो रहा है, वह वास्तविकता से भंगित हो जाता है। जादूगर नयी ऊर्जा के साथ अपने सम्मोहन का "वास्तविकता भगिता क्षेत्र" रच लेता है, जिसके प्रभाव से उसे अभी निकट भविष्य के चुनावों में सहायता मिलती है।

Friday, September 25, 2015

वकील और न्यायधीशों में बौद्धिक गुणवत्ता की कमी है।

(व्यक्तव्य: 20 सितम्बर के समाचारों से सम्बंधित)

वकील और न्यायधीशों में बौद्धिक गुणवत्ता की कमी है।
1)   ओला कैब टैक्सी प्रकरण में पीड़ित पक्ष ने एक याचिका डाली थी की वह गवाहों का मुआयना फिर से करवाना चाहते हैं क्योंकि पहले वाले वकील की काबलियत पर उन्हें शक हो रहा है कि वह अभयुक्त को उचित सजा नहीं दिलवा पायेगा।
    इस याचिका के प्रभाव में कोर्ट ने बार कॉउंसिल को निर्देश दिए हैं की वह देश भर में अपराधिक मामलो के वकीलों की समय-समय पर अपनी क़ाबलियत प्रमाणित करवाने के लिए वकालत के पेशेवर नियमों में सुधार करे।
    
2)  कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला दिया है कि भ्रष्टाचार मामलों में सिर्फ रिश्वत की रकम की प्राप्ति पर्याप्त सबूत नहीं माना जा सकता है किसी सरकारी बाबू के भ्रष्टाचार को प्रमाणित करवाने के लिए। काफी सारे 'भ्रष्टाचार-विरोधियों-के-विरोधी' इस फैसले से हर्षित नज़र आये की चुनावी राजनीति में जो लोग लोकपाल विधेयक जैसी नीतियों की भ्रष्टाचार का रामबाण समझ रहे थे उनकी अकल खुलेगी की भ्रष्टाचार प्रमाणित नहीं किया जा सकता है। असल में यह भ्रष्टाचार-विरोधियों-के-विरोधी खुद ही न्यायालय की बात को समझ नहीं पाये की संभवतः यह फैसला विशिष्ट परिस्थितियों में दिया उपचार है जब शायद फरयादी अपनी स्वयं की मूर्खता वश किसी असम्बद्ध बाबू को रिश्वत की रकम दे आया होगा, जो की उस फरयादी के कार्यवस्तु से सम्बंधित विभाग से ही नहीं जुड़ा था। ऐसे में बाबू ने जाहिर तौर पर बचाव में कहा होगा की 'जनाब, मैं क्यों यह रिश्वत लूँगा जबकि मेरा तो उसके कार्यवस्तु के विभाग से कोई जोड़ ही नहीं है'। बस , कोर्ट का फैसला उस बाबू के हक़ में , और इधर भ्रष्टाचार-विरोधियों-के-विरोधियों के सीने चौड़े की देखों तकनीकी तौर पर लोकपाल जैसे विधेयक असफल ही हो जाएंगे !!

3) अधिवक्ता विधेयक 1961 में बार कौंसिल पर एक जिम्मेदारी है की वह समाज में नियम-कानूनों के प्रति सामाजिक जागरूकता के लिए भी कदम उठाएगा। हालाँकि बार कॉउंसिल इस दिशा में कोई विशिष्ट कार्य करता बिलकुल भी दिखाई नहीं देता है। नियम-कानून के दायरे में रह कर कर्त्तव्यों को पूर्ण कर सकने की काबलियत जनता की तो छोड़िये, पुलिस में तक नहीं है। आख़िरकार वह निर्भया प्रकरण जैसे संगीन और संवेदनशील मामले में भी सिर्फ 10साल की सजा ही दिलवा पाये है। मीडिया में भी कोर्ट के फैसलों को उच्चारित कर सकने की कमी है - जो की यह संदेहजनक है की जानबूझकर है, या की मुद्रिक लाभ के प्रभाव में है। मीडिया न्यायलय के फैसलों को सही चौखटे में जनता के समक्ष प्रस्तुत नहीं करता है। और हम यह अच्छे से जानते है की अपनी ताज़ा ताज़ा स्वतंत्रता में जो कमी सबसे अधिक हमारे विकास के रस्ते में अड़चन बनाएगी वह जागरूकता ही है -- नियम कानुनों के प्रति।

मीडिया का उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार से बैर भाव

(व्यक्तव्य:  21 सेप्टेम्बर के समाचारों से)
इंग्लिश समाचार मीडिया प्रत्यक्ष तौर पर उत्तर प्रदेश की मुलायम -अखिलेश सरकार के पीछे पड़ा है। आज एक खबर, कि पिता मुलायम सिंह ने पुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश की राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए आलोचना करी, को भी इंग्लिश मीडिया ने मरोड़ कर पेश किया की उत्तर प्रदेश् में इस कदर कुप्रशासन चल रहा है ।
   मगर यही मीडिया मध्यप्रदेश के झबुआ में हुआ बम धमाके में जिस कदर चुप है, और किसी भी कुप्रशासन की बात नहीं करता, यह प्रत्यक्ष हो गया है की मीडिया द्वारा "कुप्रशासन" शब्दावली अब उत्तर प्रदेश के अखिलेश सरकार के लिए "आरक्षित" कर दिया गया है।
   अब अगर उत्तर प्रदेश में भैस ने गोबर भी कर दिया तो उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार का "कुप्रशासन" माना जायेगा, भले ही इंदौर में कोई रोड कांट्रेक्टर किसी गड्ढे में बेहोश पड़े व्यक्ति को रोड निर्माण कार्य के समय "अनजाने" में मिटटी से पाट कर उसकी जान ले ले। या फिर कि, बंगलोरे में कोई मोटर साईकिल पर सवार दंपत्ति में पत्नी किसी सड़क के गड्ढे में गिर कर जान गँवा बैठे, और इस हादसे की जिम्मेदारी उसके पति पर ही दर्ज़ कर दी जाये। याद रहे की भारतीय मीडिया के द्वारा "कुप्रशासन" तो बस उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार पर ही माना जायेगा।

Thursday, September 24, 2015

निश्चयकृत सुधार नीति का विश्वव्यापक उपयोग

Affirmative Action यानि निश्चयकृत सुधार नीति,  जिसका एक उदाहरण आरक्षण नीति है, दुनिया के तमाम देशों में प्रयोग किया जाता है।
    
    इंटरनेट सोशल मीडिया में कई सारे पोस्टर आरक्षण नीति का विरोध करते हुए अवधारणाओं को जन्म दे रहे हैं। मिसाल के तौर पर एक पोस्टर में दिखाया गया है की कैसे भारत में प्रयोग होने वाली आरक्षण नीति हमारे देश से बौद्धिकता पलायन (brain drain) का कारक साबित हो रही है जिससे की अमेरिका जैसे देश अन्यथा लाभान्वित हो रहे हैं। इस पोस्टर में दिखाए गए विचार के विपरीत अमेरिका खुद भी किसी न किसी प्रकार में एक निश्चयकृत सुधार नीति का प्रयोग करता है। तो यह पोस्टर सरकरी लक्ष्यों के विपरीत विचार को प्रसारित करता है, हालाँकि की यह कहना अनुचित होगा की कोई बाँधा पहुचता है।
    अगर भारत में प्रयोग होने वाले जाती-गत आरक्षण को एक समग्र रूप में समझे तो हम पाएंगे की दुनिया के तमाम देशों में उनकी सरकारें किसी मानववर्ण(ethnic), कायावर्ण(racial), लिंगवर्ण(gender) , क्षेत्र-वर्ण (regional), शारीरिक क्षमता वर्ण(physical capacity), आर्थिक वर्ण(economic), सांस्कृतिक वर्ण(cultural), इत्यादि के आधार पर अपने अपने देशों में सामाजिक समानता लाने के लिए प्रयत्नशील हैं।
     प्रशासन, यानि सरकार, का उत्तरदायित्व होता है की देश में राष्ट्र-निर्माण के लिए आवश्यक एक सभ्य समाज को विक्सित किया जाये। सभ्य-समाज के तत्व में समानता और सामाजिक न्याय एक मूल गुण होता है। दुनिया के करीब करीब सभी देशों में किसी न किसी प्रकार की भेदभाव वाली ऐतिहासिक त्रासदी घटी है जिसके चलते किसी भी देश को सभ्य समाज एक प्राकृतिक उपहार स्वरुप प्राप्त नहीं हुआ है। मानवता कभी भी, किसी भी युग में समानता वादी नहीं थी, भेदभाव सभी जगह अपने  अपने स्वरूप् में प्रस्तुत रहे हैं। इसलिए आज भी दुनिया के सभी देश अपनी अपनी सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप अपने मनवांछित सभ्य समाज को निर्मित करने के लिए निश्चयकृत सुधार नीति का प्रयोग कर रहे हैं।
    निश्चयकृत सुधार नीति का दूसरा पहलू इसे हमेशा एक विपरीत-भेदभाव नीति के रूप में प्रस्तुत कर देता है। जो कोई भी निश्चयकृत सुधार नीति से सीधे सीधे लाभान्वित नहीं हो रहा होता है, वह इस नीति की आलोचना एक विपरीत-भेदभाव नीति(Reverse Discrimination) के रूप में करता है। एक विचार के रूप में यह कोई गलत आलोचना नहीं है, क्योंकि यदि एक बारीक संतुलन से निश्चयकृत सुधार नीति को लागू न किया जाये तब यह अपने देश के निवासियों को ही देश के प्रति शत्रु भाव में परिवर्तित कर सकने की क्षमता रखती है।
    यदि श्रीलंका में घटे सिंघलि-तमिल विवाद को देखें , जिसके दौरान में हमें एक किस्म की निश्चयकृत सुधार नीति का प्रयोग दिखाई देगा,तब वहां से यह सबक लेना आवश्यक हो जायेगा की कैसे एक असंतुलित नीति देश की जनसँख्या के अंश को देश के शत्रु में परिवर्तित कर देती है।

     नीचे सलग्न विकिपीडिया का अभिलेख दुनिया के कई देशों में प्रयोग होने वाली निश्चयकृत सुधार नीति का ब्यौरा प्रदान करता है।

चाय वाला "छोटू".... असफल भारत का एक व्यक्ति नहीं, एक सोच है

(काल्पनिक कथा)
एक चाय वाले 'छोटू' से यूँ ही पूछ लिया की अगर तू बड़ा हो कर देश का प्रधानमंत्री बन गया तब क्या करेगा ।
चाय वाला बोला की वह बरी बरी से दुनिया के सभी देश जायेगा।
   मैंने पुछा की इससे क्या होगा ?
छोटू ने कहा की इससे हमारे देश की सभी देशों से दोस्ती हो जायेगी, हमारा रुतबा बढेगा और वह सब हमारी मदद करेंगे पाकिस्तान को हराने में।
    मैंने पुछा की क्या किसी और सरकारी अफसर या मंत्री को भेज कर यह नहीं किया जा सकता है ?
छोटू बोला की साहब, किसी छोटे मोटे नौकर के जाने से दोस्ती न हॉवे है, इसके लिए तो प्रधानमंत्री की खुद जावे को होना है।
   मैंने पुछा की तब देश के अंदर का काम कौन करेगा ?
  छोटू ने तुरंत जवाब दिया की वह सरकारी अफसर और बाकी मंत्री देख लेवेंगे।
   मैंने पुछा की अगर यूँ ही किसी के देश में बिना किसी काम-धंधे के जाओगे तब हंसी नहीं होगी की यहाँ का प्रधानमंत्री फोकटिया है, बस विदेश घूमता रहता है।
   छोटू ने कटाक्ष किया की ऐसा कोई नहीं सोचेगा। जब हम किसी के यहाँ जाते है तभी तो उससे हमारी दोस्ती होती है। अगर सिर्फ काम पड़ने पर ही किसी के यहाँ जाओगे तो वह क्या सोचेगा की सिर्फ मतलब पड़ने पर आता है।
     चाय वाले की अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध की समझ को सुन कर मुझे कुछ और ही सोच कर हंसी आ गयी।
  मैंने चाय वाले से पुछा की तू कहाँ तक पढ़ा लिखा है? छोटू बोला की वह स्कूल नहीं जाता है, बस यही चाय पिलाता है।
   मुझे उसके जवाब में समग्र शिक्षा नीति की असफलता, बाल-मज़दूरी के दुष्प्रभाव, संभावित नतीज़े दिखाई देने लग गए थे।
   मैंने पुछा की तुझे भारत के बारे में क्या मालूम है? भारत क्या है?
  चाय वाला बोला की हम सब लोग भारत है, जिनको पाकिस्तान हरा कर के गुलाम या फिर मुल्ला बनाना चाहता है। भारत एक महान देश है जहाँ पहले सभी दवाईया, हवाई जहाज़, पानी के जहाज़, बड़े बड़े साधू संत होते है जिनको इतना पता था जितना आज भी कोई बड़े बड़े कॉलेज के टीचर और डॉक्टरों को नहीं पता है।
   चाय वाले से मैंने पुछा की तुझे यह सब कैसे मालूम?
   छोटू ने बताया की उसने यह सब जो उसके यहाँ चाय पीने आते है, पास के कॉलेज के स्टूडेंट, उनकी बातें सुनता रहता है।
     छोटू से मैंने पुछा की क्या तुझे स्कूल जाने का मन नही करता है ?
  छोटू बोला की मन करेगा तो भी क्या? फीस भी तो लगती है। और फिर यह चाय के ढाभे पर काम कौन करेगा ।
   छोटू से पुछा की क्या उसे नहीं लगता की पढाई लिखाई जरूरी है।
  छोटू बोला जी जरूरी तो है, मगर सब करेंगे तो क्या फायदा। जो पढ़ रहे हैं उन्हें ही पढ़ने दो, बाकि की खेल कूद करना चाहिए। बाकि कामों के लिए भी तो आदमी चाहिए। यह ढाभा कौन चलाएगा। वह ट्रक का सामान कौन खाली करेगा।यह नाली और सड़क कौन साफ़ करेगा। बगल वाली मैडम के यहाँ कपडे-बर्तन कौन करेगा।
      छोटू की बातें और दुनिया देखने की नज़र में मुझे अपने देश के हालात और कारण समझ आने लगे थे। मुझे देश के भविष्य की सूंघ मिल रही थी, की अंधकार कितना घना और लंबा-गहरा, दीर्घ काल का है।
    मैंने पुछा की देश की भलाई करने के लिए सबसे पहले क्या करना चाहिए?
    छोटू बोला की सबसे पहले दुकान चलवानी चाहिए। जब दुकान चलेगी, तभी तो लोगों की काम मिलेगा, और सामान खरीदने को जाओगे। अगर दुकान नहीं चलेगी तब सामान बिकेगा भी नहीं। इसलिए सबसे पहले दूकान चलवानी होगी।
    मैंने पुछा की क्या उसे नहीं लगता की सबसे पहले हमें स्कूल चलवाने होंगे?
   छोटू बोला की साहब आपका दिमाग तो स्कूल में फँस गया है बस। अरे पढ़ लिख कर क्या कर लोगे। जब दुकान नहीं चलेगी तब कुछ बिकेगा ही नहीं, तब डॉक्टर के पास जाने के पैसे कहाँ होंगे लोगों के पास।
    मैंने कहा की भाई दूकान तो पढ़ लिख कर भी चलायी जा सकती है।
   छोटू ने साफ़ इनकार कर दिया की ना , पढ़ लिख कर न चलती है दुकान। छोटू को वह तमाम बड़े नाम पता थे जो की बिना पढ़े लिखे ही आज बड़ी बड़ी दुकाने चला रहे है और वह कितने अमीर है।
    मैने पुछा की फिर देश कैसे बनेगा।
  छोटू बोला की देश के लिए सैनिक होते है जो बॉर्डर पर लड़ते है।
   मैंने पुछा की यह सरकारी अफसर और नेताजी लोग क्या करते हैं, फिर।
  चाय वाले छोटू ने कहा की यह सब कुछ न करे हैं, बस बैठ कर पैसा काटे है, देश बेच कर लूट लेवे हैं।
     छोटू के "व्यवहारिक ज्ञान" से मैं हतप्रभ था। मुझे आभास हो गया था की अब तो इस छोटू को आदर्श और सैद्धांतिक समझ देना असंभव काम था। उसे अपने सही-गलत का ठोस नजरिया जिंदगी और हालात ने ही दे दिया था। अब अगर कोई तरीका है तो बस यह की आगे कोई चाय वाला छोटू न बने।
   छोटू करप्ट तो नहीं था, मगर करप्टिबल ज़रूर था क्योंकि उसकी समझ ही टूटी-फूटी और दुरस्त नहीं थी।

Monday, September 14, 2015

भ्रष्टाचार-विरोधी का विरोध करने की युक्तियाँ

  (दो-तीन वर्षों से चल रहे इस भ्रष्टाचार विरोध की मुहीम को देखते हुए कुछ सबक लेनी की सोची।। नीचे इन्ही सबक से रचित एक अध्याय है।)

प्रत्यक्ष विचार है की कोई भी व्यक्ति खुद को भ्रष्टाचार का सयोजक, तरफदार नहीं दिखाना चाहेगा। मगर फिर ऐसे में किसी भ्रष्टाचार विरोधी का सामना कैसे करेगा?
कुछ युक्तियाँ अभी भी है भ्रष्टाचार-विरोधियां का विरोध करने की :-

फार्मूला नंबर  1
1) उनका उपहास बनाओं।
    जैसे की " अबे ओ, राजा हरिश्चंद्र की औलाद", " बस तुम ही तो ठहरे दुनिया के अकेले ईमानदार", " हमें तुमसे अपनी ईमानदारी के सर्टिफिकेटे की ज़रुरत नहीं है"

फार्मूला नंबर 2
2) ईमानदारी को पराजय का पर्याय दिखाओ
    जनता में ईमानदारी के नुकसान और पराजय के विचार को प्रसारित करवाओ। फिल्में इत्यादि इस काम को बहुत ही धूर्त चपलता से प्रस्तुत करती है।फिल्मों में यदि अंत में ईमानदार की जय दिखाई भी जाती है तो तब वह किसी असंभवि, चमत्कारी, सुपरमैन, फौलादी शक्ति से प्राप्त करी हुयी दिखाई गयी होती है। इससे जनता में जो छवि, सन्देश जाता है वह यह की वास्तव ज़िन्दगी में तो ऐसा संभव नहीं है, इसलिए वास्तव जीवन में जीत हमेशा भ्रष्ट की ही होती है।
नतीज़तन, लोग स्वाभाविक तौर पर भ्रष्ट के प्रति आकर्षित होते है, तुरत नतमस्तक हो जाते है।

फार्मूला नंबर 3
3) ईमानदार को मूढ़, सीधा साधा, अयोग्य, बुद्धू,  बुद्धि तीव्रता-हीन साबित करो।
      आम जनता में अनैतिक, दुर्गुण, और अवैध में भेद कर सकने की अकल नहीं होती है। प्रत्येक भ्रष्टाचार-विरोधी को या तो मूढ़ साबित कर दो, या फिर की, वह भी किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ अनैतिक, गुपचुप भ्रष्टाचार करता है। यानि की, वह भी एक पाखंडी है। या  यह की,- वह अयोग्यता से भरा हुआ है, इसलिए अपनी असफलताओं को आफिस के भ्रष्टाचार का परिणाम बता रहा है।

फार्मूला नंबर 4
4) ईमानदारी के साथ यातना के सभी कानूनों को उस भ्रष्टाचार-विरोधी पर ही लागू कर के उसे परोक्ष रूप में प्रताड़ित करो।
    किसी भी व्यक्ति के लिए कानूनों का इकतरफा प्रयोग , यानि धूर्तता, को जन संज्ञान में पहुचना ज़्यादा मुश्किल होता है। वह एकतरफा कानून की प्रताड़ना का आसानी से विरोध  नहीं कर पायेगा क्योंकि उसके लिए सब कुछ यथा-नियम ही किया जा रहा होगा, मगर उसको अप्रत्यक्ष हानि और अपमान भी हो रहा होगा, क्योंकि उसके विरोधी सभी नियमो को तोड़ मोड़ कर, भ्रष्टाचार से प्रमाणों को नष्ट करवा कर, फिर भी आरामदायक और सफल जीवन यापन कर रहे होंगे।
      भ्रष्टाचार विरोधी खुद ब खुद अपने परिवार को अपनी असफलता को समझा न सकने पर कमज़ोर होकर टूट जायेगा। इससे समाज में भी ईमानदारी की कड़ी कीमत का सन्देश जायेगा।

The genetically wicked BJP

आरक्षण विरोध: सामाजिक अनुबंध को तोडने का मार्ग ही क्यों?

कानून अक्सर करके एक सामाजिक अनुबंध होता है। आरक्षण और कश्मीर को विशेष स्थिति के कानून एकतरफा कानून ही सही, कुछ ऐसे ही सामाजिक अनुबंध है जो की अपने समय की उन विशिष्ट परिस्थितियों में घटे एक दूसरे से किये हुए कुछ कसमें-वादे है जिनको हमने कई पीढ़ियों तक एक-दूसरे से निभाने के कसम रखी थी। यह कानून उसी सामाजिक कस्मे-वादे को चिरकाल तक याद दिलाने के लिए लिखे हैं। इन कसमों-वादों से आज़ाद होने का तरीका भी इन्ही में लिखा हुआ है।

फिर ऐसा क्यों की आज बातचीत इस कसमो वादों की तोड़ने की हो रही है, बजाये की इनमे लिखी इनसे आज़ादी की शर्तों को पूरा करने का रास्ता ढूढ़ने के? क्यों सारी बातचीत वोट की राजनीति में तब्दील हो गयी है की X को वोट दो , वह ही आरक्षण को ख़त्म करेग और दफा 370 को भी ख़त्म करेगा। यह कैसी नैतिकता है की मतलब निकल जाने पर अपने कस्मे-वादे तोड़ने पर उतर आते है बिना किसी संकोच और शर्म के ? क्या यह धूर्त व्यवहार नहीं है ?

Saturday, September 12, 2015

Debate: Should death penalty be abolished ?

The one single cause why I would not advocate an abolishment of Death Penalty is, if our Criminal Justice system is not perfect enough to award a death penalty with requisite accuracy, then so is our social structure, our governance structure and our sciences and technology .
      These all are imperfect and thereof providing a conciliatory justices for each other's imperfections.

        The society is full of criminals of various kinds. Some of them have a self-destructive inspiration for doing a extreme wrong. Others have psychological ill to be unable to reign on ownself to Commission a wrong. Our executive and political systems are not strong enough to prevent such a wrong of a mass scale which can upheaval a normal functioning society. Our medical science is not advanced enough to forewarn us of a developing mental-illness within some private individual, nor it is good enough to provide a conclusive cure which maybe applied afterwards.Why, then, should the judicial system alone bear a burden to concile all the imperfections that it may never to be able to weed out within the prevailing standards of Society and the sciences?

Secondly,
Demanding for justice only in one's time of weakness is an act of wickedness. A one-sided delivery of justice ia a corollary to the same set of wickedness. Therefore the Ideal of Justice will have to bear the burden to ensure to its own self that it reigns throughout , or else the one side delivery of Justice will itself become a mechanism to do some injustice.
    Often times, people demand for abolishment of death penalty only when they are caught by the law. People don't deliver mercy and kindnes when they are delivering a wrong whike with full knowledge and consciousness of themselves doing a wrong. Why, then, should the Judiciary adopt on itself to weed out the imperfections within itself when the society is not yet ridden of the unkind sentiments with the human beings. Any such one-side adoption of extreme kindnes will serve nothing but to give more breath and life to the unkind to act with more impunity.

Wednesday, September 02, 2015

राष्ट्रवाद/देशभक्ति की भावनाओं का कूटनैतिक उपभोग

(सन्दर्भ: केंद्र सर्कार का सर्वोच्च न्यायलय में दिया प्रश्नोतर की वह पाकिस्तान में कैद भारतीय युद्ध बंधकों को छुड़वाने के वास्ते किसी भी अंतराष्ट्रीय न्यायलय अथवा संस्था से हस्तक्षेप नहीं करवा सकते हैं।)

बड़ी बात यह नहीं है की मोदी-भाजपा की सरकार उन्हीं लोगों की है जो विपक्ष में रहते हुए मनमोहन-कांग्रेस की सरकार को कमज़ोर राष्ट्रवाद और कमज़ोर देशभक्ति के लिए कोसते नहीं थकते थे, उनकी पाकिस्तान और सैन्य नीतियों के लिए।
   
   बड़ी बात तो तब होगी जब देश की जनता को भारत-पाकिस्तान कश्मीर विवाद के वे अनबुझे पहलू समझ आने लगेंगे जिनकी वजह से हमारे देश के प्रत्येक राजनैतिक दल केंद्र सरकार में आने पर पाकिस्तान मामलों में एक जैसा आचरण करने को बाध्य रहता है, विपक्ष में वह दल भले ही जितनी भी "देशभक्ति/राष्ट्रवाद" के ढिंढोरे पीट ले।
     बड़ी बात तो तब होगी जब इस देश की जनता 'राष्ट्रवाद/देशभक्ति' के विचारों को अंतर करना सीख लेगी किन्ही पशु जगत की इलाके(के भोजन स्रोत और मादाओं पर एकाधिकार) की आपसी लड़ाई से।
   बड़ी बात तो तब होगी जब देश की जनता को समझ आ जायेगा की घरेलू कूटनीति में देशभक्ति/राष्ट्रवाद का ढिंढोरा असल में सिर्फ भावनाओं को भड़का कर वोट बटोरने के लिए ही हो रहा है।