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Showing posts from August, 2015

एक राष्ट्र का निर्माण कौन सी सोच पर होना चाहिए ?

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How do you make India ?
A) By instilling a political apprehension in the minds of men that they should stand united else someone will conquer and rule over them ? (~The Military thesis of a Nation)
OR
B) Bringing a common standard of Justice -- a Code - where same standards of morality may be followed, same belief of ethics, a guaranteed linearity of compliance of the Justice code ? (~The civil thesis of a Nation)Think about what is it that makes a Nation.एक देश में से एक राष्ट्र का निर्माण कैसे करोगे आप ?
अ) सभी मानवों के मस्तिष्क में एक भय व्याप्त करके की अगर तुम सब विखंडित रहोगे तब कोई बाहरी मानव शक्ति तुम को पराजित करके तुम पर शासन करेगा ।(~ राष्ट्र निर्माण का सैनिकिय सिद्धांत)
या
ब) देश और समाज में एक सामान न्याय व्यवस्था स्थापित करके- एक विधान- जहाँ उच्च आचरण के मापदंड एक समान हों, जहाँ सभी मानव एक प्रकार की नैतिक मूल्यों में आस्था रखते हों, जहाँ यह प्रमाणित रहे की सभी समाधानों में एक ही विधान का पालन किया जायेगा। (~राष्ट्र निर्माण का नागरिक सिद्धांत)सोचें की एक राष्ट्र का निर्…

why ancient hindus didn't create historical records

Hindus believe in माया , by which is meant a temporary cacophony of the world which keeps trying to interfere in the union of Soul with the God. So hindus never considered creating any monument or record for a 'temporary' thing...the entire History, as we believe it to be, now. Because such a record would strengthen the interfering force, the माया .
The result is that, in real scientific terms of today all our "history" is just a mythology, a figment of some one's imagination.

Legal knowledge is not a must for conducting himself judiciously by a leader

A shipping company was looking to arrest revenue losses through, inter alia, controlling Overtime payments onboard ships. The labour union agreements between shipowners association and the sea crew Unions stipulated a "guaranteed" overtime of 109hours to each crew, and additional payments for every hour of overtime performed above the guaranteed hours at a rate mutually agreed.
     At the same time, the international labour related administration had desired and accepted the general social-economic necessity to reduce overtime payments and instead, to employ additional persons where such overtime payments were observed to be a regular feature. Yet, it validated the Natural Justice that wherever the overtime works shall have been performed, the payments will have to be necessarily made and in accordance with the agreement terms mentioned in the above paragraph.
      The shipping company sent out a circular onboard its fleet of ships that the shipboard management staff shall…

Nonfeasance, Misfeasance and Malfeasance

जनप्रसाशनिक कर्मचारियों(Public officials), अथवा किसी भी सेवादार या प्रोफेशनल के द्वारा अपने कर्तव्यों से सम्बंधित किये जा सकने वाले दोष पूर्ण आचरण(wrongful conducts) के तीन  प्रकार :Nonfeasance (उच्चारण:नॉनफीसांस) : निष्आचरण (जब अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं किये जाने से किसी व्यक्ति का या फिर सर्वजन की हानि हो जाये।)Misfeasance (उच्चारण: मिस्फीसान्स) : कुआचरण (जब अपने कर्तव्यों का पर्याप्त निर्वाह नहीं किये जाने से किसी व्यक्ति का या फिर सर्वजन की हानि हो जाये।)Malfeasance (उच्चारण: मॉलफीसान्स) : दुष्आचरण (जब अपने कर्तव्यों के विपरित कार्य किया हो जिससे की न किसी व्यक्ति का या फिर सर्वजन की हानि और तीव्र हो जाये।)उधाहरण : एक सरकारी कर्मचारी, मानिए की नगरनिगम के सफाई विभाग से कोई व्यक्ति, जिसका उत्तरदयित्व शहर में सफाई सुनिश्चित करवाने का है, यदि वह कभी भी सफाई का कार्य करवाता ही नहीं है, तब जनहित विधानों की दृष्टि से उसने निष्आचरण(Nonfeasance) का अपराध किया है।
   यदि वह कर्मचारी सफाई तो करवाता है मगर सिर्फ मंत्रियों और उच्च पदअधिकायों के रिहायशी क्षेत्रों के आस पास की, तब वह कुआचरण…

क्या वाकई में अग्रेजों ने जाते जाते भारत पाकिस्तान बटवारे में divide and rule किया था ?

क्या वाकई में अग्रेजों ने जाते जाते भारत पाकिस्तान बटवारे में divide and rule किया  था ?

     मेरा ख्याल है की स्वतंत्रता के 67 सालों के दौरान हम भारतियों ने अपनी आत्ममोह मनोविकृति के चलते हमारे समाज में पहले से ही विधमान विभाजन के कणों को नकारने के लिए यह तर्क विक्सित कर लिया है की अंग्रेजों ने जाते जाते भी भारत-पाकिस्तान बंटवारा करके divide and rule को हमेशा के लिए यहाँ की भूमि में रोपित कर दिया है।
   अगर वाकई में यह बंटवारा अंग्रेजों की देन होता तब पिछले 67 सालों में किसी भी पश्चिमी ताकत ने इन दो देशों को नहीं रोक की वह वापस मिल कर एक न हो सकें।
   शायद हम सच का सामना करने से डरते है की बंटवारा अंग्रेजों की अंतिम सैनिकिय और कूटनैतिक रणनीति नहीं था, बल्कि खुद हमारे समाज और हमारी मनोविकृति की स्वतंत्रता के उपरांत की प्रथम देन था। समयकाल में हमारे समाज में विभाजन के अधार बड़ते-बड़ते जातिगत, क्षेत्रीय, भाषय्, लिंग, ग्रामीण-शहरी, आय वर्ग, और न जाने कितने हो गए हैं।
   दुखद यह है की भारतीय इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने भी स्वतंत्र भारत की पीढ़ियों को सच को अपने अंदर झाँक कर सामना करन…

Why reservation policy maybe be doing more good to India than laurels brought on our nation by achievements of a handful Indians ?

Why reservation policy maybe be doing more good to India than laurels brought on our nation by achievements of a handful Indians ?If you really want to be a modern age reformer who wants to rid his society of Caste prejudices, you will have to begin by making admission of the logical consistency of the claims raised by Dr BR Ambedkar and likes about those beliefs of Hindu faith which in our centuries old history had lead to the social discrimination.
    Would you admit that Forbidding of eating Cow flesh, which is otherwise an innocuous Hindu way of showing reverence to nature and animals having association with our gods, yielded the social impact of Caste based discrimination towards those craftsmen who worked with the hides of dead cow ?
    Would you admit that everytime you project the personal achievements of a person to be achievement of his high social caste against the odds of modern Reservation policy, you reactively come to denial of achievement of those lower social caste…

भाजपा के रामराज्य का रामबाण

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भाजपा की राजनीति और ढोंगी बाबाओं के बीच का nexus

गौर करने वाली बात यह है की यह सब पाखंडी और ढोंगी बाबा भारतीय जनता पार्टी के समर्थक है। यह वही लोग है जो की कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को Sickular बुलाते हैं, और वास्तविक secularism से जनता को भ्रमित करते हैं। वास्तविक secularism का सम्बन्ध ऐसे ढोंगपने से मानव समाज की मुक्ति का है। england में church of england की शुरुआत secularism के प्रभाव में ही हुई थी। वह लोग Vatican Pope के अनुयायी नहीं थे। सच यह है कि secularism का विचार democracy का इतना सलंग्न है की वास्तविक डेमोक्रेसी बिना secularism के पनप ही नहीं सकती है।
   भारत में कांग्रेस पार्टी ने सेकुलरिज्म के वास्तविक विचार को तोड़ मरोड़ कर इस लिए अपनाया था की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण करा जा सके। कांग्रेस के इस हरकत के विरोधियों ने इस प्रकार के सेकुलरिज्म को ही व्यंग्य में Sickularism नामकरण कर दिया।
   आगे का सच यह है की भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के sickularism का विरोध तो किया है मगर फिर वास्तविक secularism को भी नष्ट हो जाने दिया है जिसके फल स्वरुप आज यह सब ढोंगी और पाखंडी लोग लोगों के दिलो दिमाग पर बिना रोक टोक के छाये हुए हैं।भ…

वो भुला दिए गए हिंदुत्व मूल्य...

रावण को मारने के बाद भी धर्म ने गुहार लगायी थी। ब्राह्मणों के एक दल का कहना था की रावण ब्राह्मण था, शिव भक्त था, अच्छा शासक था, बस थोडा अभिमानी हो गया था। इसलिए वह रामचंद्र जी से प्रायश्चित करने को कह रहे थे। शायद वही दल बाद में सर्यूपारिणी ब्राह्मण बना, जिसमे की "बाजपेयी" उपनाम भी आता है। याद रहे की अटल बिहारी वाजपेयी ने ही टिपण्णी दी थी की राजधर्म नहीं निभाया। यही मंथन और शास्त्रार्थ ही हिन्दू धर्म था जिसके लिए ब्राह्मणों के आगे क्षत्रियों से शूद्रों को नतमस्तक होना पड़ता है। वरना फिर तो कृष्णा ने द्रोणाचार्य से लेकर कृपाचार्य का भी संहार करने की शिक्षा द्वापर युग में ही दे दी थी। यह तो कलयुग है।×××××××××××××××××××××××××
पश्चाताप और प्रायश्चित ही वास्तविक वैदिक संस्कृति है। महान वैदिक विचार जिसमे की महाभारत युद्ध के समय भगवद् गीता , और सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन , यह दोनों ही प्रायश्चित की अग्नि से ही निकले थे। प्रायश्चित और उसके गुणों की पहचान हिन्दू धर्म का मूल है।

Entries related with Yakoob Memon's hanging sentence

Dtd 27th July 2015
Judiciary doesn't award capital punishment for sins. It does so when a person, for his deeds, is seen as a threat to society; when a person cannot be reformed; or his deeds need to be checked by  strong deterrence.
   But what happens when someone has adopted reformation due to his own inner calling? Do we still stay put at punishing him for a maniac reasoning of "sending a strong message"?  Is his reformation, and the judiciary's mercy in itself no message to those who adopt violent means to achieve their goals ?
   We are a free democracy. We resist violence, not the opinion however divisive the opinion may be. Therefore someone holding a thought of separatism is not a threat to our harmonious existence, only the violence is. Once we put out faith in someone of having reformed ,sending him to gallows only for a cause of sending a strong message to an unknown enemy is nothing short of a mania, a mental inadequacy
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Yet another Heterogeneous Justice of the BJP and ModiBhakts

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Heterogeneous standards of Justice

सत्यम् ब्रूयात् VERSUS निंदक नियारे राखिये

In my opinion, the sanskrit quote given below has caused a great internal damage to values of vedic religion. Sycreticism and Dichotomy has become an idiosyncratic feature of Hinduism , something which the BJP and the RSS seem to be excelling in. -
सत्यम ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम अप्रियम् |
प्रियम् च नानृताम्ब्रुयात्, एष: धर्म सनातनः ||
(meaning)
सत्य बोलो , प्रिय बोलो |
अप्रिय मत बोलो, अगर वह सत्य हो तो भी | प्रिय और सत्य बोलना ही सनातन धर्म है I keep wondering that if the truth be spoken at the mercy of the listener's pleasure and convenience, then, of what value is that religion which yet teaches us the motto of सत्यम शिवम् सुंदरम ?×××××××××××××××××××××××++++++++++++++++++++++++++××××××××Whereas a sanskrit shlok सत्यम ब्रूयात् teaches us to not to speak too much critical of someone, the below kabir das ji's doha teaches us to learn to tolerate even the harshest of our critic.Choice is yours.कबीर के दोहे:निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन ब…

पाखंडियों के हाथ में हिंदुत्व रह गया...

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उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गयासुनने में भले ही यह कलाम इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखता हुआ लगे, मगर कटु सत्य यह है की आज हिन्दू धर्म की हालात भी ऐसे ही हैं। न जाने हिन्दू और वैदिक धर्म के किस संस्करण को समाज में प्रसारित कर दिया गया है की आज क्षमा, प्रायश्चित , संवेदना, दया, सभ्यता, शिष्ट व्यवहार, इत्यादि के लिए इंसानी मस्तिष्क में कोई कोना नहीं बचा है।
   एक से एक पाखंडी लोग महात्मा और साधू बने हुए पकड़े जा रहे है, "wrong number", जो मानवता के बहोत बड़ी आबादी की सोच पर कब्ज़ा करके सरे अधर्मी और पापी क्रियाकर्मों को अंजाम दे रहे हैं। आसाराम, बाबा रामपाल, स्वामी नित्यानंद, निर्मल बाबा, सत्यसाई , और अभी एक दम नयी, राधे माँ। शायद अभी भी सेकड़ों ऐसे नाम होंगे जिन्हें इस सूची में भुला दिया हो।
   धर्म पाखंडियों के हाथो में चला गया है। वह जो की खुद योग और आयुर्वेद के नाम पर करोड़ों करोड़ का औद्योगिक साम्राज्य बिछाये हुए हैं। वह सामाजिक नैतिकता को धन की बिसात पर पलट रहे हैं। समाज को मूर्खता, अभद्रता, असहनशीलता जैसे दुर्व्यवहारों से व्याप्त कर रहे हैं। ऐ…

जस्टिस मार्कंडेय काट्जू की वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रतिभा और bold old man की भूमिका

जस्टिस मार्कंडेय काट्जू हमारे देश के नए कटू-सत्य वाचक की भूमिका निभा रहे हैं।
  जस्टिस काट्जू ने हाल के दिनों में अपनी फेसबुक पोस्ट के द्वारा न सिर्फ वर्तमान काल की राजनैतिक हस्तियों को आढ़े हाथों लिया है, बल्कि अतीत और स्वतंत्रता काल की महान विभूतियों, जिनमे की गांधी जी, सुभाष बोस, रबिन्द्र नाथ ठाकुर, और बाल गंगाधर तिलक सम्मलित हैं, के सन्दर्भ में भी अनकहे कटु विश्लेषण प्रस्तुत किये हैं। बेशक अपनी आस्था के स्वाधिकार में आप जस्टिस काट्जू के विचारों से सहमत या असहमत होना चाहेंगे। मगर फिर भी तर्क की कसौटी पर जस्टिस काटजू के ज्ञान को, तथयिक जानकारियों के संग्रह को, और वैज्ञानिक मानसिकता से परख करने की पद्धति को पदक अर्पण करना ही पड़ेगा।
    वैज्ञानिक अन्वेषण की प्रक्रिया को हम एक तरह से एक किस्म की मानसिकता मान सकते हैं। जिन व्यक्तियों में वैज्ञानिक अन्वेषण और विश्लेषण का व्यवहार विक्सित हो जाता है वह जीवन के हर क्षेत्र में इसी वैज्ञानिक विश्लेषण का मुजाहिरा करते हैं।
  वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में छात्रों को वैज्ञानिक विश्लेषण के प्रति जागरूकता तो प्रदान करी जाती है मगर पर्याप्त प्रशिक्…