समाचार प्रसारण उद्योग में 'सुपारी जर्नलिज्म' का चलन

अंग्रेजी समाचारपत्रों , विशेषकर की Times Of India, का आचरण उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी और उनके मुख्य मंत्री अखिलेश यादव के लिए "सुपारी पत्रकारिता" वाला प्रतीत होता है।
    इस समाचार पत्र को मैंने बार-बार उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार और अखिलेश यादव के लिए campaign उठाते देखा है जबकि दूसरे प्रदेशों में घटी सामानांतर घटना में यही अख़बार इस प्रकार का कोई campaign नहीं रचता है।
  सुपारी जर्नलिज्म का प्रकार campaign के प्रयोगों के द्वारा होता है। campaign अक्सर कर के जन संवेदनशीलता और चिंता की घटनाओं पर रचे जाते हैं। मगर सुपारी जर्नलिज्म के दौरान राजनैतिक पार्टियां अपने विरोधी की जन छवि धूमिल करने के लिए अक्सर बिकाऊ, वैश्य समाचार सूचना कंपनी को गुप्त भुगतान करती है। अंग्रेजी अख़बार का समाजवादी पार्टी के लिए सुपारी जर्नलिज्म दिखाई देता है।
    अभी हाल में घटी मेरठ के पत्रकार की मृत्यु का मामला लिजिये। अपने खुद के अनुभव से यह आभास होगा कर्णाटक में युवा ias अधिकारी dk रवि का मामला इससे कही ज्यादा गंभीर था क्योंकि वहां इस काण्ड में उनकी पुलिस और मुख्यमंत्री तक ने सभी ने मिल बाँट कर सबूतों को नष्ट किया है। इसके बनस्पत, उत्तर प्रदेश में अखिलेश किसी सबूत के साथ छेड़खानी नहीं कर रहे हैं, और न ही उस अभियुक्त मंत्री का बचाव कर रहे हैं।
   मगर toi ने अखिलेश के विरुद्ध campaign रच दिया है।
   आज फिर एक ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश में घटी है। अब यही अख़बार शिवराज चौहान के विरुद्ध ऐसा campaign रचता है या नहीं, इससे हमें आभास मिल जायेगा सुपारी जर्नलिज्म का।
   मध्य प्रदेश में व्यापन घोटाले में सबूत मिटाने के लिए कितने ही गवाहों को जान से मारा जा चूका है। मगर वहां toi ने कोई कैंपेन नहीं रचा।
  इसी तरह पंजाब में दिल्ली वाली निर्भया प्रकरण जैसी एक और घटना हुई थी, मगर toi ने पंजाब में भी कोई कैंपेन नहीं किया।
    महाराष्ट्र में इसी कैलेंडर वर्ष में अब तक 1000 से अधिक किसान आत्म हत्या कर चुके हैं, मगर अभी तक किसी भी अखबार ने कोई कैंपेन मोर्चाबंदी नहीं करी है। जबकि महाराष्ट्र में और केंद्र में दोनों ही जगह भाजपा की सर्कार है।
   राजस्थान में और महाराष्ट्र में दिल्ली की तरह ही अमुक पीड़ित लोगों ने मुख्यमंत्री की उपस्थिति में आत्म दाह किये है, मगर यहाँ कोई कैंपेन नहीं हुआ है।
  
शायद सुपारी जर्नलिज्म में पैसे की ताकत ही वह अतिरिक्त वजन देता है जिससे तय किया जाता है की कहाँ कैंपेन करना है और कहाँ चुप्पी मार देनी है।

http://timesofindia.indiatimes.com/india/Madhya-Pradesh-journalist-set-afire-and-buried-in-Maharashtra/articleshow/47756154.cms

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