अच्छे दिन के वादे बकरे से भी और कसाई से भी ! - एक व्यंग्य

अच्छे दिन का वादा तो सभी से ही कर दिया था।बकरे से भी और कसाई से भी।
    बकरा झांसे में आ गया की अच्छे दिन आयेंगे तब उसको अच्छी हरी घांस खाने को मिलेगी और कसाइयों से सुरक्षा। बकरे समझ रहे थे की अच्छे दिन आने पर बकरे कम कटेंगे।
    फिर जब अच्छे दिनों का सौदागर परवान चढ़ गया तो सभी लोगों ने अपने अपने अच्छे दिन मांगे। कसाई के अच्छे दिन होते जब मोटे ताज़े बकरे बड़ी संख्या में रोज़ काटने को मिल जाए अपनी मर्ज़ी के मुताबिक।
   तो असल बात तो थी की बकरे और कसाई का एक साथ अच्छे दिन ले आना तो मुमकिन ही नहीं था। यही तो !! बकरा यूँ ही नहीं बकरा होता है। सौदागर जानता था की साले बकरे तो बने ही हैं बकरा बना बना कर काटे जाने के लिए ही।
   तो सौदागर ने कानून ले आया की बकरे के अच्छे दिन उसके कटने के बाद दे दिए जायेंगे।
  बकरे आवाक रह गए। इतनी उम्मीद से वोट दिया था सौदागर को।
   जब अच्छे दिनों को निभाने में देरी का आरोप लगता तब सौदागर के दोस्त बकरों पर ही गुस्सा झाड़ते थे की सालों जब बोला है की अगर तुम्हें अच्छे दिन चाहिए तो कटने के लिए तुम खुद-ब-खुद राज़ी हो जाओ, तो अब अच्छे दिनों की देरी होने में हमारी क्या गलती है।
    बकरे किसान और मज़दूर जैसे लोग हैं। और कसाई ..... आप खुद ही समझ लें।

सौदागर तो कस्साइयों का भेदीया था।

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