Posts

Showing posts from May, 2015

Logic is only an element of Human Conscience, but not its complete essence

I think that we Indians first need to become honest with our own conscience in order that we may shake off the tags of being the worst Racist, and the Rapist class of citizens.
   The one single lack of ability which has, and which shall always be keeping us a laggard clas of people for many more generation to come is our attitude to deny a certain truth to our conscience.
    Take the example of the Reservation Policy.
How many more generations are our people going to deny the truth to our own souls that Even a nation as advanced and developed as the United States of America could not avoid the need for an Affirmative Action Policy to overcome a social class disparity observable in their society based on the ethnic skin color difference . In their affirmative action policy, even the American College also adopted the Quota System to provide at-par opportunities to their society's oppressed class of people.
   How long are we going to deny to our souls that in our own backyard, …

The perpetual denial of Caste prejudices and the Limitations of Logic in human issues Judgement

Your denial of caste based discrimination happening even on this date is what is keeping it going. Two recent incidental, one in Rajasthan where Dalits were killed by Jats under tractor's wheels, and one in MP where the upper caste have refused clean water access to Dalits from their well -- is the most recent indicating proofs of its existence. 
     How long do you wish to continue with the domestic 'Holocaust denial' ???
   Prejudices are not measurable entities. Yet the world acknowledges the effects of prejudices on social justice. It is same as Corruption, because all corruption is done under the obfuscation of something apparently legal.
   दूध और पानी को अलग करना आज भी, तमाम वैज्ञानिक उन्नति के बावजूद, उतना ही मुश्किल है जितना पहले हुआ करता था। और बेचने वाले जानते है की पानी अकेला नहीं बिकता है। उसमे थोडा तो शुद्ध दूध मिलाना ही पड़ता है। ठीक वैसे ही, थोडा सा जातिगत भाईचारा की आढ़ में जाति भेदभाव किया जाता है। और थोडा सा कानून-पालक दिखते हुआ भ्रष्टाचार किया जाता है।

शब्द जनित भ्रम से पैदा हुआ बौद्धिक दिवालियापन

Anarchy शब्द का वास्तविक और संतुलित अर्थों में प्रयोग आज भाजपा और नरेंद्र मोदी की दिल्ली में करी जा रही हरकतों के लिए होना चाहिए था।
    मीडिया , यानि बिकाऊ समाचार सूचना व्यापर, ने भारत की जनता को भाषा और शब्दावली के संतुलित ज्ञान और सम्बद्ध अर्थ , अभिप्रायों के उपयोग में अयोग्य , मूर्ख बुद्धि बना दिया है।
   anarchy शब्द केजरीवाल के धरनाओं और विरोध प्रदर्शन के लिए किया गया था, जबकि वह संवैधानिक ढांचे से नागरिक अधिकार होता है,
  जबकि सही मायनों में आज नरेंद्र मोदी दिल्ली के राज्यपाल के माध्यम से जो कर रहा है वह असंवैधानिक और anarchy है।

बिकाऊ मीडिया के तौर तरीके

बिकाऊ , वैश्या समान आचरण करने वाली समाचार सूचना की व्यापारिक कंपनियां, अर्थात मीडिया, के बिकाऊ खबरों के तौर तरीके समझना एक रुचिकार विषय हो सकता है। बिकाऊ खबरे दिखाना कोई आसान काम नहीं होता है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती होती है की एक विशाल दर्शक समाज के समक्ष झूठ बोलते हुआ हुए पकड़े नहीं जाना चाहिए। विशाल दर्शक समूह में तमाम तरह के व्यक्ति और नागरिक होते है जिनके खुद की जानकारी क्षेत्र विशाल और विस्तृत होते हैं। ऐसे में मीडिया का झूठ पकड़े जाने से बच सकना करीब करीब असंभव है। हाँ, मगर मीडिया को फायदा इस बात का मिलता है की अधिकांशतः किसी भी विषय वस्तु पर सच और सही सिद्धांत को जाने वाला बौद्धिजीवि समूह अक्सर करके छोटा पड़ जाता है, जिस सांख्यिकीक तथ्य के भरोसे मीडिया यह खेल खेलता है की जनता को कुछ पल के लिए भ्रमित करा जा सकता है।
   You can't fool some of the people any time, you cannot fool all the people all the time, but you CAN definitely fool MOST of the people, for a long time.                      "अश्वस्थामा मरो, नरो वा कुंजरो"।
   बिकाऊ मीडिया के लिए सबसे आसान और सुविधाजनक…

BODMAS Rule सैद्धांतिक दृष्टि से क्या है?

Image
गणित विषय में बोडमास(BODMAS) नियम किसी भी बहु-संक्रिय(multiple operation) सवाल को हल करने का क्रम(Order of operation) निर्धारित करता है। इस नियम की अनुपस्थिति में दो अलग अलग व्यक्ति एक ही समीकरण (equation) के लिए दो भिन्न भिन्न समाधान ले आएंगे। ((और फिर जैसा की भारतियों की कुसंस्कृति में रोज़ाना होता है, साधारण बीज गणित के सवालों पर भी हमारे बीच राजनैतिक-कूटनीति आरम्भ हो जायेगी की कौन सही है !!!))
   बरहाल, उधाहरण के लिए एक समीकरण लीजिये:
     3×5 +7-9 =?
यदि हम इस सवाल को बोडमास नियम से समाधान करें तब इसका हल कुछ यूँ होगा
    15+7-9
-->  22- 9
--> 13
जबकि यदि बोडमास नियम नहीं हो तब एक अन्य व्यक्ति इसी सवाल को कुछ यूँ भी हल कर देगा
    3×12-9
-->3×3
-->6
  बल्कि एक तीसरा व्यक्ति इसी प्रश्न का तीसरा समाधान भी ले आएगा।
तो समझा जा सकता है की बोडमास नियम सामंजस्य बनाये रखने के लिए कितना आवश्यक है।सवाल यह है की बोडमास नियम की उत्पत्ति कहाँ से हुयी है?  क्या यह नियम किसी विशिष्ट व्यक्ति की धारणा से अस्तित्व में आया है? या प्रकृति की कोई एक शक्ति ने दुनिया भर …

The STCW 2010 Manila (Scam) Convention

Image
The case for STCW 2010 Manila Convention being a Government Policy promoted money-making racket is not so worthwhile. But it presently stands tightly protected within the covers of legitimacy.
    The Refresher courses are there aimed with a purpose; NOT out of need for upgrading of skills due to some new technological innovation, BUT by creating of legal need towards CONTINUED DEMONSTRATION of the basic seamanship survival skill ON-SHORE, WHICH *in the opinion of government authorities*, can NOT be refreshed and evidenced by on-board training. It should be noted that the assessors for what skills CAN be and what CANNOT be refreshed on-board is the Government authorities themselves. The in-service seafarers have hardly a recognized lobby to make case for them during the above assessments. Government authorities, therefore, acquire unchallenged authority to call the shots.
    It now becomes of less value when some random seafarer observes that there is no difference between what he …

What's the difference between Refresher Course for AFF and Refresher Course for BFF ??

The MMD seems to be still reeling in confusion about this whole STCW 2010 thing. The frequency of amendment circular by the MMD causing the change of eligibility for various certificates and endorsement is a tell-tale of what brain the MMD is in about the STCW.
    Sample this:
Until April 2015, the senior management shipboard officers were not required to have the refresher course in BFF and PST. Since the STCW 2010 has been put into processing by the MMD from January of 2015, the effect of April 2015 circular will raise a natural question about the quantifiability of those applicant who have escaped the burnts of this change. Why should those candidates not be retro-declared as "disqualified" unless they too undergo training (in a true sense, those cost-incurring changes) as stipulated by the circular ?? All candidates who have obtained any certificate or endorsement between Jan and Apr 2015 should be held null and void. Isn't it ??!!!
      The April 2015 circular ra…

अच्छे दिन के वादे बकरे से भी और कसाई से भी ! - एक व्यंग्य

अच्छे दिन का वादा तो सभी से ही कर दिया था।बकरे से भी और कसाई से भी।
    बकरा झांसे में आ गया की अच्छे दिन आयेंगे तब उसको अच्छी हरी घांस खाने को मिलेगी और कसाइयों से सुरक्षा। बकरे समझ रहे थे की अच्छे दिन आने पर बकरे कम कटेंगे।
    फिर जब अच्छे दिनों का सौदागर परवान चढ़ गया तो सभी लोगों ने अपने अपने अच्छे दिन मांगे। कसाई के अच्छे दिन होते जब मोटे ताज़े बकरे बड़ी संख्या में रोज़ काटने को मिल जाए अपनी मर्ज़ी के मुताबिक।
   तो असल बात तो थी की बकरे और कसाई का एक साथ अच्छे दिन ले आना तो मुमकिन ही नहीं था। यही तो !! बकरा यूँ ही नहीं बकरा होता है। सौदागर जानता था की साले बकरे तो बने ही हैं बकरा बना बना कर काटे जाने के लिए ही।
   तो सौदागर ने कानून ले आया की बकरे के अच्छे दिन उसके कटने के बाद दे दिए जायेंगे।
  बकरे आवाक रह गए। इतनी उम्मीद से वोट दिया था सौदागर को।
   जब अच्छे दिनों को निभाने में देरी का आरोप लगता तब सौदागर के दोस्त बकरों पर ही गुस्सा झाड़ते थे की सालों जब बोला है की अगर तुम्हें अच्छे दिन चाहिए तो कटने के लिए तुम खुद-ब-खुद राज़ी हो जाओ, तो अब अच्छे दिनों की देरी होने में हमारी क्या ग…

Development ज़रूरी है , या की Democracy ?

छात्र जब प्रोफेसर आनंद कुमार से पूछते है की कौन अधिक आवश्यक है : development या की Democracy तब मैं सोच के जंजाल में फँस जाता हूँ की छात्रों को कैसे समझाया जाये की वह किस विचार की तुलना किस विचार से कर रहे हैं। क्या कार के पहिये की हवा और कार में ईंधन कितना डलवाना है के बीच किसी एक को चुनने को बोला जा सकता है ??शायद development से अभिप्राय पदार्थवाद (materialism) का है, मानव जीवन(human development) का उत्थान नहीं। पदार्थवाद का  विकास होता है बिजली, विद्युत ऊर्जा के बे-रोक टोक इस्तेमाल से उत्पन्न चमचमाती रौशनी , सडकों पर चमकते हुए विज्ञापन बोर्ड जिनमे सेक्स और बाकी सब अभद्र वस्तुओं का विज्ञापन हो; ठन्डे वातानुकूलित माल सामानों से भरे हुए जबकि प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार दबाव बना हुआ है; चिकनी तीव्र गति कारें जबकि सड़कें हादसों से, परिवहन चालन नियम उलंघन से, नाबालिग चालाक और शराब पी कर गाडी चलाने वालों से भरी हुई हैं।
   यह है पदार्थवादी विकास, खपत-खोरों(consumerists) का समाज जो विकास के नाम पर धीरे धीरे सामूहिक विनाश की और बढ़ रहा होता है। खपतखोर समाज का उद्देश्य बस जीना, खाना, सेक्स और…

खान उपनाम और उसका मंगोलों से सम्बन्ध

खान' शब्द मंगोल भाषा से है। इसका अर्थ होता है 'राजा'। चंगेज़ एक मंगोल था। मंगोल का अर्थ है मंगोल देश का निवासी। मंगोल देश, यानि मंगोलिया , चीन के उत्तर में रूस और चीन के बीच एक शीत मरूभूमि वाला देश है।
  व्यापक मान्यताओं के विर्रुद्ध, चंगेज़ मुस्लमान पंथ का अनुयायी नहीं था। वह एक प्राकृतिक मंगोल पंथ, शमाम, था। शमाम पंथ कुछ कुछ प्राचीन वैदिक पंथ के समान है। इसमें भी प्रकृति की वस्तुओं, जैसे पर्वत, नदी, पशु, वृक्ष, सूर्य, वर्षा, बादल, धरती, आकाश, अग्नि इत्यादि की पूजा करी जाती है। वास्तव में आरम्भ में धरती के सभी मनुष्य , सभी पंथ प्राकृतिक पंथ ही थे। एक पैगम्बर वाला सबसे प्रथम और प्राचीन पंथ बुद्ध धर्म था। धीरे धीरे करके यहूदी, ईसाई, और इस्लाम , सिख, इत्यादि पैगम्बर-पंथ समय के साथ प्रकट होते चले गए।
     चंगेज़ खान के तीन और अनुज थे। चंगेज़ के मरने के बाद उसके दो भाइयों ने उसके राज्य को संभाला था। चंगेज़ का राज्य आज तक के इतिहास का सबसे विशाल राज्य है। पश्चिम में, जो की वर्तमान तुर्की, ईरान, इराक जैसे देश का क्षेत्र है, उसे हगलू खान ने संभाला। जबकि पूर्व में पहले मंगू खान ने, और…

Why should the owner of the vehicle be held liable too for the mistakes of his driver? An ethical-legal explanation

जब कोई परिवहन संसाधन में कोई अपराधिक घटना घटती है तब उसके मालिकों को भी उत्तरदायी क्यों बनाया जाता है?
   अपराधिक घटना में मूल अभियुक्त तो वही लोग होते हैं जिन्होंने उस घटना को अंजाम दिया होता है। अगर कोई ड्राईवर अपने मालिक की कार लेकर कहीं जाता है और कोई घटना कर आता है , तब उस घटना का अभियुक्त वह ड्राईवर ही होता है। यह सोच कर अजीब लगता है की मालिक को क्यों पुलिस पकड़े जब की मालिक तो उस स्थान पर था भी नहीं। मगर एक कारण है की मालिक को उत्तरदायीं क्यों माना जाता है। वह यह की मालिक अपने वाहन को पुलिस से छुड़ाने आएगा की नहीं?
   अगर मालिक छुड़ाने नहीं आता है तब वह संदिग्ध बनता है की क्या उसने अपना वाहन इस घटना को करने के लिए ही नियुक्त किया था ?
   अन्यथा उस मालिक की जिम्मेदारी है की वह वाहन का प्रयोग उसी को करने दे जो मालिक के जैसे ही वाहन की जिम्मेदारी का निर्वाह करे। यानि, न्यायिक दृष्टि से कार का ड्राईवर को ही सभी कृत्यों के लिए कार का मालिक माना जाता है। साथ ही, यदि वह ड्राईवर पूर्ण मालिक नहीं है, तब उस कार के पूर्ण मालिक को ड्राईवर के कृत्यों का सह-भागी माना जाता है।
    दूसरे शब्दों म…

My message to Justice Markandey Katju on his use of inappropriate terms for a historical analysis

Markandey Katju  sir, i wish to express my reservation on your using of the terms such as "British Agent" while making an analysis of a historical information. I am of the mind that a literature which contains analytical information should use the terms in their literal sense so to help the reader grasp in a precise sense the outcome of the analysis, instead of getting swayed away by the beliefs and opinions of the writer. Therefore, "british agent" should imply that there was a case of deep penetrated espionage, and not that someone whose actions in the beliefs and opinion of the writer appeared to favour some third party.
     Justice @Markandey Katju , indeed by a figurative use of the term "British Agent" in a presumably dissertation work , YOU become guilty of working out certain political mileage by manipulating the minds of the UNSUSPECTING readers. It can be ssuggested that perhaps you have certain secret affinity with any of those group who thriv…

हाई कोर्ट से सलमान खान को सजा निलंबन की राहत के विषय में

सलमान का केस लगता है की दूसरी बार सब कुछ गोल-मटोल होने की राह पर निकल पड़ा है। मेरी समझ से न्यायलय इतिहास की दृष्टि से कुछ चुनिंदा केसों में है जिसमे की दूसरी बार सत्य-परिक्षण करने के लिए विवश होना पड़ा है। किसी केस का दूसरी बार पुनः परिक्षण अपने में न्यायलय और जांच संस्था के ऊपर एक दाग और शर्मिंदगी लाने वाला मसला होना चाहिए। जो न्याय की इस बारीकी को समझते होंगे उन्हें एहसास हो गया होगा की हमारा देश कैसा मूर्खिस्तान बना बैठा है।
   बरहाल अब हालात यह है की इस दूसरे पुनः परिक्षण सत्र में भी फिर से वैसी ही गलतियां मिलना शुरू हो रही है जो की जाँच एजेंसी और न्यायलय में भ्रष्टाचार और बेहद मूर्खता भरे कृत्यों की और इशारा कर रही है।
   आज का उधाहरण लीजिये। अब यह हाई कोर्ट में पहुँच जाने पर एक नए गवाह और उससे प्राप्त होने वाला नया तथ्य पूरे केस को सत्र न्यायलय में फिर से कुछ लंबी अवधी के लिए लटकाने वाला है। बचाव पक्ष नए गवाह कमाल खान को key witness बुलाएगा जबकि अभियोजन पक्ष पूछेगा की कौन है यह, और अब तक कहाँ था ? और फिर एक बार पुनः इस नए गवाह New Evidence के दिए बयानों से मिले तथ्यों की जाँच होग…