Sunday, December 21, 2014

Fanaticism, political exploitation and Emotional distress

The problem of the fanatic cults is that whenever their eyes become forced to see into the mirror, they manage to switch off the minds by taking recall of some past incidents when they were the victims.
Perhaps the better way of identifying who should we call a Fanatic is by determining who is it who is striving to SWITCH OFF THE MINDS by taking any impertinent recall of his victimized status.

Brainwashing is the only means by which Fanaticism can work. Fanatics need to be bigots, and to become a Bigot ,you need to trained how to avoid Reflective thoughts and Self-criticism. SWITCHING OFF THE MINDS is a typical trick the Fanatics exploit.
The truth of life is that it is filled with up and downs meeting us alternately. Every person ,every group has been a winner , and loser at one time of their other. Every person gets his chance to be the authority wielder at some occasions and to be Victim at the other occasions. Fanaticism brews when the victimhood is brewed persistently in a person by a psychopathic training.
   Unfortunately ,India having undergone those 600+200 years of bondage , has developed a lots of social groups which is hereditary Fanatic. The entire social atmosphere cultivates Fanatics, Bigotism and other psychologically distresses in the children belonging to these social groups. Their emotional condition as an adult is of vengeful, violent, sadistic person.
   It is in these groups that the political manipulators can so successfully address the Vedic philosophy of "Vasudhev kutumbkam" and "Ford Foundation CIA Funding" both at the same time ,EVER working to convince themselves of righteousness in their hypocrite conducts.
   It is here that the pains of Humanity are subsided by "Don't forget what's they done to you".
   These are routes of the unending sorrows to each one who endorses such fanaticism. Although the fanatics are typically the one who thrive and feed themselves of such sorrows, yet they work their energy to cause more sorrows. They are sadistic afterall . The more the sorrows of humanity, the more they convince themselves of their righteousness in their humanity-chilling deeds.
   Self-conscience and Internal peace, the "Om Shanti", is they only way we can help our ownselves escape from the self-feeding serpent of Fanatic sadism.

(हिंदी अनुवाद)

हमेशा से ही उन्माद चरमपंथियों की सबसे बड़ी समस्या यह रही है की जब भी उनकी आखों को आईने में आत्म-विश्लेषण के लिए विवाश होना पड़ता है, वह अपनी आँखें तो मजबूरी के आगे खोल देते है, मगर अपने मस्तिष्क को बंद कर देते हैं। मस्तिष्क को बंद करने के लिए वह स्वयं को अतीत की किसी त्रासदीपूर्ण घटना का स्मरण करवाते है जिसमे वह भुग्त भोगी रहे थे ,जब उनके साथ अन्याय हुआ था।
   शायद हमे किसी के उन्मादी चरमपंथी होने का सबसे पुख्ता प्रमाण यही से प्राप्त होता है की वह व्यक्ति अपने उन्मादी व्यवहार के क्षेत्र-रक्षण में कितनी बार अतीत की घटना का स्मरण करने का आदी है।
   बर्गलाया मस्तिष्क किसी भी प्रकार के उन्माद को पनपने के लिए सबसे उपयुक्त भूमि प्रदान करता है। उन्मादी व्यक्ति को अड़ियल व्यवहार का होना परम आवश्यक है, और अड़ियलता वाला व्यवहार प्राप्त होता है एक नकार देने के निरंतर प्रयास से, जब व्यक्ति आत्म-चिंतन और स्व:आलोचना से बचना सीख जाता है।
   मस्तिष्क को इन्द्रियों से प्राप्त संवेदनाओं के लिए बंद कर लेना उन्मादी व्यवहार का सर्वाधिक प्रकट लक्षण माना जा सकता है। यानी की संवेदना हीनता
  जीवन का एक सत्य हमेशा से रहा है कि यह कभी-धुप-कभी-छाँव की रेखा पर  चलता है। प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समुदाय कभी विजेता बना और कभी परास्त हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति कभी तो शक्ति-संहारक बना है, और कभी तो पीड़ित,भुग्तभोगी। उन्मादी व्यवहार तब पनपना शुरू करता जब व्यक्ति निरंतर अपने अन्दर एक पीड़ित अथवा भुग्तभोगी होने वाली भावना को अपनी स्मृतियों में संरक्षित करके रखता है। उन्मादी व्यवहार का जन्म इसी एक मनोविकृत प्रशिक्षण में से होता है जब व्यक्ति निरंतर स्वयं को एक पीड़ित के रूप में देखता है।
  दुर्भाग्य से भारतवर्ष की ६००+२०० वर्षों की दास अवस्था ने यहाँ कई समुदायों को जन्मातरण उन्मादी मनोविकृत बना दिया है।इन समुदायों का सामाजिक माहौल ही उन्मादी विचार से परिष्कृत होता है। इनमे जन्म लेने वाले शिशु अपने बाल्यकाल से ही किसी न किसी प्रकार की उन्मादी भावना से ग्रस्त होना शुरू कर देते हैं। अतीत की किसी त्रासदी का पीड़ित अथवा भुग्तभोगी होना वह अपने बाल्यकाल से ही अपने वातावरण से सोख लेते है। अपनी वयस्क अवस्था में यह व्यक्ति  प्रतिशोध, प्रतिहिंसा और दुखात्मा भावुकता वाले होते हैं।
   ऐसे ही व्यक्ति और समुदाय वह लोग है जिनको वर्तमान के राजनैतिक-कूटनीतिज्ञों ने अपने उपभोग के लिए एक साथ दो विरोधी विचारधारा , "वसुद्धैव कुटुम्बकुम" तथा "फोर्ड फाउंडेशन और सी.आई.ए से पोषित हुयी" , के लिए तैयार किया है। इस विरोधी विचारधारा के उपभोग से ही यह कूटनीतिज्ञ एक साथ दो विरोधी उद्देश्यों को पूर्ण करके सफल हो रहे है, और आत्म-तुष्टि भी कर लेते है की वह पाखंडी नहीं हैं।
   यही वह लोग है जो वर्तमान काल में मानवता पर घटी त्रासदी में भी स्वयं को संवेदना हीन बना लेते है की यह कह कर की "याद रखो की अतीत काल में तुम्हारे साथ तो तुम्हारे विरोधियों ने  इससे भी भीषण घटना अंजाम दी थी"।
   यह सब आचरण अनंत दुःख वाले जीवन मार्ग हैं। यह वह वाले आचरण है जो की मानवता से युद्धभीषक दुखों का अंत कभी भी प्राप्त नहीं होने देंगे। उन्माद दुखी भावुकता में से जन्म लेता है। और फिर और अधिक दुःख को जन्म देता है, जो की वापस उन्माद को ही जन्म देतें हैं। इस प्रकार से उन्मादी आचरण एक ऐसा सर्प है जो की अपनी ही केंचुली का भक्षण कर के जीवित रह जाता है। जितना अधिक दुःख फैलता है, उन्माद उतना ही स्वयं को सशक्त करता है की उसने मानवता के संहार के जितने निकृष्ट कर्म किये थे वह सब उचित ही तो थे।
  आत्म-मंथन और आत्म-शान्ति , ॐ शांति ,ही शायद वह एकमात्र मार्ग है जिससे हम स्वयं को उन्मादी आचरण करने से रक्षा कर सकते हैं।