Wednesday, September 17, 2014

गुरुत्व के नियम, इस्साक न्यूटन और भाजपा के अंधभक्त समर्थक

गुरुत्व के नियम, इस्साक न्यूटन और भाजपा के अंधभक्त समर्थक
(व्यंग रचना)

सोलहवी शताब्दी की बात है। इस्साक न्यूटन नामक एक युवक ने पेड़ से एक सेब को गिरते देख कर कुछ नया सोचा और उन्हें गुरुत्व के सिद्धांत कह कर प्रकाशित करवा दिया।
  न्यूटन के सिद्धांत के अनुसार सेब वृक्ष से धरती की ओर इस लिए गिर था क्योंकि एक अदृश्य ताकत 'गुरुत्व' उसे धरती की और खीच रही थी। और ऐसी ही एक ताकत धरती को सेब की और भी खींचती थी।
  भारतीय जनता पार्टी के रामदेव तथा मोदी के उपासक भक्तजनों को यह विचार कतई पसंद नहीं आया की कोई अनियंत्रित ताकत वस्तुओं का व्यवहार समान रूप से नियंत्रित करती थी। वह सब भगवान् कृष्ण तथा भगवत गीता में अथाह विश्वास रखते थे और उनका मानना था की सब कुछ इश्वर की इच्छा से नियंत्रित होता है ,तथा ईश्वर मनुष्य के द्वारा कर्मो के अनुसार उसको फल देता है।
  अंधभक्तो के इस श्रद्धा के अनुसार वृक्ष से गिरा सेब किसी गुरुत्व-फुरुतव की वजह से नहीं धरती पर आया था, बल्कि यह इश्वर की इच्छा थी। और सेब द्वारा धरती को अपनी ओर खींचने की सोच तो पूरी तरह बकवास ही थी।
  तो अंधभक्तों ने न्यूटन का विरोध करने की ठान ली। पता नहीं इस आदमी न्यूटन और इसके सिद्धांत समाज को कैसे अव्यवस्थित और भ्रष्ट कर दें। क्या पता कल को लोग ईश्वर में विश्वास करना ही छोड़ दें।
  न्यूटन को जब लोगों के विरोध का पता चला तब उसने अपनी प्रयोगशाला में तमाम प्रयोग विक्सित करे की लोग स्वयं से अपनी इन्द्रियों से आकर सत्यापन कर लें कि उसके द्वारा रचे सिद्धांत सत्य है या कि नहीं।
  अंधभक्तों और न्यूटन के मध्य तर्कों का वाद आरम्भ हो चूका था।
न्यूटन ने अपने द्वारा रचे सिद्धांतों के आधार पर कुछ घटनाओं के संभावित नतीजों की घोषणा करी जिसे यह पता चले की उसके सिद्धांत ठीक ठाक हैं कि नहीं।
   अंधभक्तों ने तुरंत कटाक्ष करते हुए बताया की उनके साथ भी कितनों ही पीर फकीर और सिद्ध योगी भविष्य वाणी करने वाले लोग है जो की न सिर्फ अजीवित पदार्थ बल्कि जीवित मनुष्यों के जीवन की भी भविष्य घोषणा कर लेते हैं।
  अंधभक्तों में से कुछ ने न्यूटन के साथ थोडा सयंम से वाक् युद्ध करने की ठान ली। उन्होंने न्यूटन से सर्वप्रथम यह पुछा कि उसे यह किस ने,किस मुर्ख ने बताया है की संसार में कोई भी दो वस्तु, दोनों एक दूसरे को अपनी और आकर्षित करते हैं।
   उन्होंने प्रयोग के तौर पर दो गेंदों को एक मेज पर आमने सामने रख दिया और न्यूटन से पुछा कि क्या यह दोनों एक दूसरे की और स्वयं से ही चलना आरम्भ करेंगी ?
  न्यूटन परेशान हो रहा था। उसने इस प्रयोग के औचित्य पर प्रशन उठाते हुए बताया की घर्षण की वजह से ऐसा नहीं होगा यद्यपि गुरुत्व शक्ति यहाँ भी विद्यमान होगी ।
  अंधभक्तों ने व्यंग करते हुए न्यूटन को अपनी बात से पलटने का आरोप लगाया। फिर पुछा की अब यह घर्षण क्या ताकत है। यह सब बातें न्यूटन को किसने सिखाया है? कौन उसे बेहका रहा है?
   न्यूटन ने पहले तो यह स्पष्ट करने की सोची की उसके विचार उसे किसी ने भी नहीं बताये है बल्कि उसके मूल रचना हैं।
  कुछ अंधभक्तों ने तो ठहाका ही लगाया की यह मुर्ख तो कुछ भी अपने मन ही उलूल-जुलूल बोल्ता रहता है। यह तो पागल है। किस शास्त्र में , किस उपनिषद में ऐसी किसी ताकत का ज़िक्र है। किसी भी प्राचीन और वैदिक ऋषि-मुनि ने इसका कही भी ज़िक्र नहीं किया है।
   कुछ अंधभक्तों ने न्यूटन की मूल रचना के प्रेरणा-स्रोत को जानना चाहा। तब न्यूटन ने उन्हें पेड़ से सेब के गिरने के वाकये का ज़िक्र किया।
   इसपर अंधभक्तों ने न्यूटन पर अपने बौद्धिक मैथुन करने के व्यंग्य वाण चलाये। कि सेब को पेड़ से गिरता देख कर इस मूर्ख न्यूटन ने देखों न जाने क्या क्या उलटी कर दी है। क्या मूर्ख को यह नहीं दिखा की आकाश में कितने पक्षी विचरण कर रहे हैं। इसको यह समझने में कितना समय लगेगा की इन पक्षियों के पर है जबकि सेब के पर नहीं होते ।इसलिए सेब नीचे गिर गया जबकि वही कोई चिड़िया का बच्चा होता तब वह पेड़ से गिर कर भी आकाश में उड़ जाता। कुछ अंधभक्त जिनकी सहन शीलता का बाँध टूट रहा था वह बोले कि जब तक इस मुर्ख को इसी पेड़ से नीचे नहीं गिरा देते इसको समझ में नहीं आने वाला है।
   अंधभक्तों ने तुरंत न्यूटन को अपने प्रतिद्वंदी आपियों का भी बाप करार दे दिया।
  कुछ अंधभक्तों ने फिर भी न्यूटन को और जलील करने के उद्देश्य से उससे वाक् युद्ध आरम्भ रखने की ठान ली।
  उन्होंने न्यूटन से प्रशन किया की भई यह गुरुत्व है क्या,जो दिखती भी नहीं है और कुछ ऐसा भी नहीं करती कि हम उसमें "अपनी श्रद्धा ईश्वर में से स्थानांतरित कर के पुन:स्थापित कर दे",यानी कि "मान ले"। इन्द्रियों से सत्यापन का हश्र तो तुमको हमने समझा दिया है। अब बोलो...? यदि हम गुरुत्व को माने तब तो कर्मो का कोई अंतर रह ही नहीं जायेगा। कोई जितना भी पर फड़-फड़ा ले,गुरुत्व तो सब ही को नीचे उतार देगी? यह कौन सी चीज़ है जो ईश्वर के कथन के विरुद्ध चलती है। भई कर्मों का फल नहीं मिलेगा क्या..? कहाँ देखा है तुमने गुरुत्व को?
   न्यूटन अब पागल हो रहा था। उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इन मुर्ख, समालोचनात्मक चिंतन से अस्त लोगों को कैसे समाझाऊँ। न्यूटन ने फिर भी हार नहीं मानी और एक प्रयास किया। उसने बताया की यदि आप किसी ऐसे आदर्श स्थान की कल्पना करें जहाँ घर्षण भी न हो,और गुरुत्व को कोई और स्रोत न हो, दोनों गेंदों का वजन आपस में तुलनात्मक हो तब मेरे यह सिद्धांत अवश्य सिद्ध हो जायेंगे।
   अब तो अंधभक्तों की हंसी का ठीकाना ही नहीं रहा। उन्होंने सीधे उपहास उड़ने वाली हंसी में न्यूटन से पुछा की अमां यार ऐसा स्थान है कहा?ज़रा हमें भी बताओ। ज़रा हम भी तो जाने कि वहां क्या क्या होता है?और तुम्हे क्या ख़्वाबों में ही यह सब दिख गया कि ऐसी किसी जगह में क्या-क्या होता है?
   न्यूटन बावरा हुआ जा रहा था। वह थक रहा था। उसने सोचा कि इससे बेहतर है की वह विदेश चला जाए जहाँ की संस्कृति में विरोधात्मकता उपज चुकी है और पंथनिरपेक्षता जन्म ले रही है। शायद वहां का प्रजातान्त्रिक प्रशासन उसकी बातों को सुन ले।
   इधर अंधभक्तों ने न्यूटन को तर्कों में परास्त कर के भगोड़ा घोषित कर दिया।
  अंधभक्तों के एक गुप्त समूह ने न्यूटन पर अपमानजनक ,कामुत्तेजित व्यंग्यों अथवा शत्रु राष्ट्र का शुभचिन्तक होने मिथक ताना बाना कस दिया कि उसकी बात कोई व्यक्ति सुने ना।और यदि सुन भी ले तब भी उसे अपनी श्रद्धा न दे। जनता विश्वास को श्रद्धा का पर्याय समझती है। विश्वास सत्यापन से होता है,प्रमाणों की परख से होता है, न्याय करने से होता है। श्रद्धा मन का एक भाव है, जो अंतःकरण का ही एक स्वरुप है।
   खैर, विदेश के प्रशासन को अपनी कॉपरनिकस वाली ऐतिहासिक और सामाजिक भूल याद थी,इसलिए उन्होंने न्यूटन का अपमान नहीं किया और उसके विचार और प्रयोगों पर अमल किया और आगे शोध कार्य आरम्भ कर दिया। नतीजों में उन्होंने गुरुत्व को नियंत्रित करने की क्षमता भी विक्सित कर ली-और राकेट और उपग्रह जैसे उच्च तकनीक वैज्ञानिक संसाधन विक्सित कर के न्यूटन के दिए गुरुत्व के सिद्धांतों को प्रकृति का अटूट नियम के रूप में स्वीकार कर लिया। वहां की पंथनिरपेक्ष संस्कृति में गुरुत्व तथा अन्य ऐसे ही कई वैज्ञानिक  नियम 'ईश्वर की शक्ति' का स्वरुप तथा 'उचित ईश्वरीय ज्ञान' समझ कर पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकार कर लिए गए।
   इधर अंधभक्तों ने पीड़ी बदलने के साथ ही न्यूटन को विदेश में मिली इस कामयाबी पर तुरंत सुधार करते हुए अपने वैदिक ज्ञान कोष ,वेदों तथा उपनिषदों में गुरुत्व के प्राचीन ज्ञान का सुधार कार्य किया ताकि यहाँ की श्रद्धा सुमन अंधभक्त अब आगे से न्यूटन के सिद्धांतों को स्वीकार करना आरम्भ कर दें।
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उपसंहार:
   न्यूटन को अपने देश में कुछ एक समर्थन फिर भी प्राप्त हुआ था।क्योंकि कुछ लोग ज्ञान और श्रद्धा में अंतर करना जानते थे। श्रद्धा जब अत्यधिक विकराल हो जाती है तब वह ज्ञान की बाधक हो जाती है। वह अंतःकरण को ही निगल जाती है और सही और गलत का आत्मज्ञान नष्ट होने लगता है। अत्यधिक श्रद्धालु लोग ज्ञान(अथवा तथ्य) का भी श्रद्धा के दृष्टिकोण से मूल्यांकन करते हैं, इन्द्रियों से नहीं। उनके अनुसार सही ज्ञान वही है जो उनकी श्रद्धा से तालमेल रखे। यह अत्यधिक आस्तिकता का अनवांछित परिणाम होता है।
   कम श्रद्धालु लोग अथवा नास्तिक लोग ज्ञान और श्रद्धा में अंतर रखते हैं तथा ज्ञान को इन्द्रियों के प्रयोग से मूल्यांकित करते हैं। इसलिए वह तर्कों के आधार से प्रमाण करने के कुछ नियमों को विक्सित कर लेते हैं। इसके प्रयोग से वह ज्ञान के सही अथवा गलत होने का न्याय करतें हैं।
   श्रद्धालु कहते है कि वह कोई वकील या जज नहीं है कि कचहरी के जैसी कार्यवाही जीवन में हर चीज़ में करें। इसलिए श्रद्धालुओं को नास्तिकों का "वकील गिरी" वाला आचरण बिलकुल भी नहीं भाता है।
   श्रद्धालु अंधभक्तों के अनुसार दुनिया ईश्वर की इच्छा से चलती है। नास्तिकों के अनुसार दुनियां कुछ सिद्धांतों पर चलती है। यह अटूट नियम ही वैज्ञानिक सिद्धांत है,और यही प्रकृति की शक्ति है। यह सब स्थानों और काल में समान रूप से चलते हैं।
  अंधभक्त स्वाभाविक तौर से किसी व्यक्ति में श्रद्धा और समर्पण का ही रास्ता चुनते है। उनके अनुसार समस्या का समाधान वह परम श्रद्देय व्यक्ति ही दिला सकता है,और वह स्वयं सभी इच्छाओं से ,भ्रष्ट होने के कारणों से विमुक्त है।
  नास्तिक लोग सिद्धांतों को तलाशते है। वह प्रकृति में और प्रशासनिक प्रावधानों में सिद्धांत की सटीकता को ढूँढते हैं। इसलिए वह सिद्धांतों की तलाश में किसी आदर्श आचरण परिस्थिति की कल्पना करने में हिचकते नहीं है, फिर भले ही वास्तविक दुनिया में वह आदर्श परिस्थिति का अस्तित्व न हो।
   अंधभक्तों को "हिन्दुत्व" किसी देवी देवता की उपासना और कर्मकांड में दिखता है।
  नास्तिकों को "धर्म" सत्य की तलाश में दिखता है। भग्वद गीता में चर्चित "कर्म का फल" से तात्पर्य प्रकृति के नियमों से है, किसी घटना का  अन्य किसी अतार्किक प्रतिक्रिय से नहीं।