उन्माद वाला व्यवहार क्या है?

qAFanatics are created when people are lacking the foundational analytical sense- mostly of the science of judgement. Fanatics cannot tell a 'Fact' from a 'belief'. For them, everything is a result of human mind admiring to existence of thing by certain environmental conditioning. This type of thinking process is similar and classic to famous the Rene Descartes's way of thought described by his famous quote, ''I think and therefore I am''.
Rene Descartes was a famous french philosopher and a mathematician whose greatest work we know about is the Co-ordinate Graph System of representations, also known in his memory as the Cartesian Co-ordinate System.  But his quote of Existentialism mentioned above was quite a cocaine of human Intellectualism, by which it would become impossible for human senses to have confidence to differ between a Car and  Truck, a table and a bed-- those most basic objects which normally the human senses pick the difference without having to apply any discerning mind.
The fanaticism I see in the 'Hindutva' brigade is something which erupt  from the Descartes Existentialism predicament.
This predicament is directly about What is a a Fact and what is a Belief.

Conventionally FACTS IS what the two and all the parties have mutually AGREED TO by virtue of human senses having experienced it same all across.
Beliefs are those claims which are not agreed because the human senses are not directly experiencing it, but the subjective Human MIND is being used for the interpretation of the experiences received by the senses.

Fanatics never succeed in reaching to this widely held definition of 'Facts' and 'Beliefs'. For them, everything is the Descartesian admission of its Existence by each individual. Thus one person's facts may differ from another !! . Therefore there is no common ground of Facts available to be able to argue, debate or discuss something with such a person. He becomes a Bigot, and eventually a Fanatics of his own beliefs.

हिंदी अनुवाद:
यह धार्मिक उन्माद (पागलपन) वाले व्यक्ति उत्पन्न कैसे होते हैं?

मेरे अपने देखने भर में उन्मादी व्यवहार वाले व्यक्तियों में प्रकट आम समस्या - न्यायायिक बुद्धि का अभाव है, जिसे वह अपनी दृष्टिकोण से 'कानून की विशेष शिक्षा' मान बैठे होते हैं।
   क़ानून की विशिष्ट जानकारी प्रत्येक नागरिक को आवश्यक नहीं है, मगर एक उचित न्यायायिक समझ सभी व्यक्तियों को सामाजिक जीवन जीने के लिए होनी ही चाहिए। ख़ास तौर पर उच्च प्रबंधन पदों पर आसीन व्यक्तियों को।
     उन्मादी व्यक्ति एक समझ के अभाव को दूसरे से भ्रमित करने से यह उन्मादी व्यवहार अपने में विक्सित कर लेते हैं।
  न्यायायिक बुद्धि का सर्वप्रथम धरातल ज्ञान इससे आरम्भ होता है की इंसान 'तथ्य' और 'विश्वास' के मध्य अंतर करना जाने। मगर उन्मादी व्यवहार के व्यक्तियों में यह सहज आत्म ज्ञान कभी भी- उनके बचपन से ही - विक्सित नहीं हो पाया होता है। इसका कारण यह है की ऐसे व्यक्ति के बुनियादी दर्शन के अनुसार सभी मनुष्यों के पास उपलब्ध सभी ज्ञान उसके द्वारा उस ज्ञान को मानने (=विश्वास) करने का नतीजा होता है। उद्धहरण के तौर पर "यह जो चमकता हुआ गोलाकार वस्तू जो आकाश में प्रति'दिन' दिखाई देती है वह सूर्य है क्योंकि सर्वप्रथम मनुष्य ने आस्था में इसको सूर्य माना है।"
   संक्षेप में कहें तो उन्मादी व्यक्ति की विचारधारा में किसी भी वस्तु का अस्तित्व उस वस्तु का दर्शन करने वाले व्यक्ति की आस्था से ही आरम्भ होता है। सूर्य को सूर्य सबसे पहले मनुष्य की आस्था मानती है इसलिए वह सूर्य है(!!!)।  यदि आस्था उसे सूर्य न माने तब वह सूर्य नहीं होगा!  सूर्य के सूर्य होने का तथ्य कुछ होता है नहीं, तथ्य जो की आस्था से विमुक्त हो, क्योंकि सभी ज्ञान सर्वप्रथम उस ज्ञान में आस्था से ही आरम्भ होता है।
  यह ऊपर लिखी समझ उन्मादी और पागल लोगों के व्यवहार का आरम्भ हैं।
    साधारणतः संतुलित बुद्धि वाले व्यक्तियों की दुनिया में 'तथ्य' उसको कहा जाता है जिसको की विवाद में प्रस्तुत दोनों पक्षों ने, या दुनिया के सभी व्यक्तियों ने (बिना किसी जाती, धर्म, सम्प्रदाय, रंग, सांकृतिक, क्षेत्र, भाषा इत्यादि के भेदभाव के) -- एकमत में उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लिया हो। अर्थात , 'तथ्य' वह है जो सर्वसम्मति का परिणाम है (FACT is what has been mutually and/or universally AGREED UPON), और इसलिए व्यक्तिगत आस्था (BELIEF) से परे है।
   किसी भी विचारविमर्श , मंथन अथवा तर्क-विवाद के लिए आवश्यक उचित न्याय और निष्कर्ष की भूमि इन तथ्यों(FACTS) की आम सहमति से ही आरम्भ होती है।
  साधारणतः 'तथ्य' वह है है जो मनुष्य की पाँचों उपलब्ध इन्द्रियों द्वारा गृहीत होते है-और उसमे प्रत्येक मनुष्य की बुद्धि अथवा विवेचन का कोई स्थान नहीं होता है।
  विचारों का अंतर भिन्न-भिन्न विवेचन से ही प्रकट होता है, इसलिए 'तथ्य' की सूची तैयार करने में विवेचन से प्राप्त ज्ञान को अलग करना आवश्यक है। यदि तथ्यों में आम-सहमति नहीं होती है तब सर्वप्रथम प्रमाणों और सबूतों से तथ्य का स्थापन किया जाता है जिससे की आगे का विवेचन आरम्भ हो सके।
   मगर "आस्थावान" उन्मादी(एक प्रकार का पागलपन व्यवहार) व्यक्तियों के साथ यह क्रिया संभव ही नहीं हो पाती क्योंकि उनकी बुनयादी समझ में सभी प्रकार का ज्ञान तो आस्था से ही आरम्भ होता है !!!!

आपके विशिष्ट सांस्कृतिक इतिहास के ज्ञानवर्धन के लिए बताता चालू की उन्मादी व्यक्तियों के जीवन दर्शन की यह प्रवृति एक प्रसिद्द फ्रांसिसी दार्शनिक और गणितज्ञ रेने डेस्काटेस के मूल विचार से मेल खाती है जिसे उनहोंने अपने प्रसिद्द वाक्यांश में कुछ ऐसे प्रकट किया था "मैं सोच सकता हूँ, और इसलिए मेरा अस्तित्व है।"("I think and therefore I am")., डेस्कारटेस का सबसे चर्चित योगदान आज की स्कूली शिक्षा की गणित में उपलब्ध "ग्राफ" का है जिसको उनकी स्मृति में "कार्टेसन को-ओर्डिनेट" भी बुलाया जाता है।
   गणित और अन्य उप्लाधियों के लिए उनका बहोत सम्मान है, मगर अधिकाँश दार्शनिक और विधिविशेज्ञ डेस्कार्टस के उपरलिखित कथन को विचारशैली का भांगखोर आत्म-घाती नशा मानते हैं। इस प्रकार के विचार वाले व्यक्तियों से शांतिप्रिय सर्वसम्मत न्याय की सम्भावना नहीं करी जा सकती है। ऐसे व्यक्ति अपने व्यवहार में अड़ियल(bigot) होते हैं, और नतीजे में वह अपनी श्रद्धा से सम्बंधित जो आचरण प्रदर्शित करते हैं उसे ही धार्मिक उन्माद अथवा पागलपन बुलाया जाता है।

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