Sunday, March 23, 2014

बनारस और वर्तमान भारतीय संस्कृति की अशुद्धियाँ

  बनारस नाम संभवतः वानर अथवा बानर मूल शब्द से आता है , जिस जीव को हम वर्त्तमान में बन्दर कह कर बुलाते हैं। यह शहर बंदरों से भरा हुआ था और उनके शरारतों से गूंजता है , और शायद इसलिए कुछ लोगों ने इस शहर को बनारस नाम दिया था। बन्दर इस शहर के आराध्य देव हनुमान जी का प्रतीक होता है और यहाँ शहर में हनुमान जी का एक प्राचीन संकट मोचन मंदिर स्थापित है। कहते हैं की गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामायण का अपना संस्करण इसी मंदिर के प्रांगण में लिखा था जो की हनुमान जी ने उन्हें स्वयं सुनाया था ।(हिन्दू मान्यताओं में हनुमान जी एक अमर देव हैं)। हनुमान जी को भगवान् शंकर का ही एक रूप माना जाता है, और आगे भगवान् शंकर और काशी (बनारस का वैदिक काल का नाम) का रिश्ता तो सभी को पता होगा।
  (बनारस से आये देश के बहोत बड़े संगीत शास्त्री, स्वर्गीय उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब का मानना था की बनारस नाम पान के रस से उत्पन्न हुआ है , क्योंकि यहाँ का पान बहोत प्रसिद्द है |)
    मौजूदा बनारस को मैं स्वयं एक पागल युवक के माध्यम से समझने की कोशिश करता हूँ जिसने चंडीगड़ शहर में सन 1995 में घटी एक लड़की रुचिका गिल्होत्रा की आत्म हत्या प्रकरण में घिरे हरयाणा के पूर्व पुलिस प्रमुख के चहरे पर हमले के लिए हिरासत में लिया गया था। उत्कर्ष शर्मा नाम के इस युवक को मानसिक तौर पर अस्थिरता के लिए इलाज के लिए छोड़ दिया गया था। शायद मेरी स्वयं की जानकारी में यह पागलपन का एकमात्र केस था जिसमे की पागल व्यक्ति ने धर्म और न्याय की चाहत में मानसिक अस्थिरता प्राप्त करी हो। साधारणतः पागलपन में अधर्म और अपराध होते हैं, मगर यहाँ पागलपन में न्याय के लिए लड़ाई हुई थी जो की शायद काल्पनिक हिंदी फिल्मो में ही होता है।
   यह सोच कर आश्चर्य होता है कि उत्कर्ष ने बनारस से हरयाणा की यात्रा सिर्फ इस प्रतिशोध में करी थी, जबकि वह उस लड़की रुचिका को जनता भी नहीं था। यह कहीं पर पढ़ा ज़रूर है कि एक पूर्णतः आदर्श समाज भी इतना ही अस्थिर विचार है जितना की एक अव्यवस्थित समाज (just world fallacy) , मगर बनारस की, और इस देश की, वर्त्तमान अव्यवस्था में उत्कर्ष की यह चाहत अटपटी नही लगी बल्कि एक नतीजा मालूम दी - प्रकृति का जवाब इस अव्यवस्था के लिए।
   धर्म और न्याय का बनारस से बहोत पुराना रिश्ता है। यह शहर आर्य संकृति और सभ्यता का प्राचीन केंद्र है और जो आज तक जीवित है हालाँकि कालान्तर में अशुद्धियों से भर गया है। यहाँ शास्त्रार्थ के प्राचीन रिवाज़ हैं और कहीं पर पढ़ा था की मैथली ब्राह्मणों ने सर्वाधिक बार यह शास्त्रार्थ विजयी किये थे। वैदिक संस्कृति में शास्त्रार्थ की क्रिया धर्मं की खोज और स्थापना का महत्वपूर्ण अंग हैं क्योंकि वैदिक संकृति में सब ही विचार स्वीकृत होते हैं भले ही कुछ विचार परस्पर विरोधाभासी हैं और सह-अस्तित्व नहीं कर सकते हैं। ऐसे में उन विचारों को एक संतुलित कर्म क्रिया के द्वारा ही निभाया जा सकता है। शायद यही बनारस की विचार संस्कृति का मूल गुण हैं - मध्यम मार्ग। भगवान् गौतम बुद्ध, जिन्होंने दुनिया को "मध्यम मार्ग" का दर्शन दिया, ने अपना प्रथम प्रवचन यहाँ बनारस के नज़दीक सारनाथ में ही दिया था।
   शास्त्रार्थ एक साधारण वाद-विवाद से भिन्न क्रिया होती है। वाद-विवाद में जहाँ दो पक्ष अपने अपने स्थान को सत्यापित करने का प्रयास करते हैं, शास्त्रार्थ में दो पक्ष मिल कर अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं और समन्वय सत्य का निष्कर्ष देते हैं। प्रकृति में कई ऐसे सत्य हैं जो की अपने दोनों चरम बिंदूओं पर एक समान होते हैं। उदहारण के लिए, एक भ्रष्ट समाज की अस्थिरता और एक परिपूर्ण आदर्श समाज की अस्थिरता - दोनों ही समाज एक समान अस्थिर हैं और नष्ट हो जाते हैं।
   बनारस का दर्शनशास्त्र और धर्म से रिश्ता बहोत ही गहरा है। श्रीमती एनी बेसन्ट ने बनारस में थीओसोफिकल सोसाइटी (Theosophical Society) की स्थापना करी थी। ईश्वर और दर्शन(philosophy) के योग से बना यह विषय, Theosophy, हिंदी में 'ब्रह्मविद्या' अथवा 'ब्रह्मज्ञान' कहलाता है। इसमें संप्रत्यय और विस्मयी विषयों में मंथन किया जाता है जो की पदार्थ की दुनिया से परे सिर्फ बौद्धिक चक्षुओं से ही गृहीत करे जा सकते हैं। Theosophical Society का मूल गढ़ अमरीका के न्यू यॉर्क शहर में है और भारतीय केंद्र मद्रास में है।बनारस में इसका उपकेंद्र है।
बाबु भगवान् दास जी बनारस में Theosophical Society के एक प्रमुख संयोजक थे। उन्होंने यहाँ केन्द्रीय हिन्दू विद्यालय की स्थापना करी थी। बाद में पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने इसी विद्यालय को आगे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पुन्र स्थापित किया था।
बाबु भगवान् दास जी को सन 1955 में पंडित नेहरु और इंजिनियर श्री विश्वेवाराया जी के साथ 'भारत रत्न' सम्मान से सुसजित किया गया था।
   भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति डाक्टर राधाकृष्णन यहाँ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। दर्शनशास्त्र और Theosophy से बनारस का गहरा सम्बन्ध हैं। डा राधाकृष्णन का उपाधि के समय शोध का विषय पुर्वी और पश्चिमी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन था। डा राधाकृष्णन एक उच्च कोटि के शिक्षक थे और उन्ही के जन्मदिन को आज हम उनकी स्मृति में शिक्षक दिवस में मनाते हैं। तत्कालीन विचारकों, जैसे स्वामी विवेकानंद , और स्वामी परमहंस की तरह डा राधाकृष्णन भी प्रस्तुत हिन्दू मान्यताओं में तर्क और विचारों की अशुद्दियों को साफ़ करने के हिमायती थे |
   बनारस और हिन्दू धर्म का सम्बन्ध यहीं ख़त्म नहीं होता है। पश्चिम में हिन्दू धर्म के सबसे बड़े जानकार, बेलजीय्म देश के एक नागरिक श्री कोइनार्द एल्स्ट ने हिन्दू धर्म पर अपनी शोध के लिए सन 1987 से आगे कुछ तीन-एक साल के लिए बनारस को अपना निवास बनाया था।
श्री कोएनार्द एल्स्ट ने भी वर्तमान हिन्दू धर्म की अशुद्धियों पर लेख लिखे थे और वर्तमान शिक्षा प्रणाली की कमियाँ उजागर करी थी की कैसे यहाँ कुछ एक जानकारी, जो समुचित विश्व में उपलब्ध है, को सरकारी व्यवथा द्वारा दबाया जा रहा है। उन्होंने भारत की वर्तमान सभ्यता में समझौते और सुलह से उत्पन्न अशुद्धियों को भी चिन्हित किया था जो की एक भ्रान्ति-पूर्ण तर्क, विचार में एक 'मद्यम मार्ग' मान कर पारित कर दी जाती हैं | यह अशुद्धियाँ भारतीय समाज के भीतर मौजूद है मगर उनको हमारी वर्त्तमान संस्कृति पहले तो चिन्हित नहीं कर पाती है; फिर दबा देती हैं, और अन्त में कोई समाधान नहीं करती है | भारत सरकार ने श्री एल्स्त के लेखों पर अंकुश लगाने के प्रयत्न करे थे हालांकि हिंदूवादी संघटन विश्व हिन्दू परिषद् इनसे खूब प्रभावित था और उसने तुरंत इसे प्रकाशित किया था।
 
   मेरी व्यक्तिगत समझ में बनारस न सिर्फ हिन्दू धर्म का केंद्र है बल्कि मौजूदा पिछड़ेपन का भी केंद्र है। मौजूदा बनारस एक बहोत ही तंग शहर है जहाँ सड़कों पर नाले बहते हैं और नालों में रास्ते बने हुए हैं। गंदे पानी की निकासी के लिए यहाँ नगर निगम की व्यवस्था मौजूद नहीं हैं | यहाँ का परिवहन एकदम अस्त-व्यस्त है और शहर में एक दो ऐसे उपर्गामी मार्ग निर्माणाधीन हैं जो की शायद पिछले एक दशक से बन ही रहे होंगे।
   मौजूदा बनारस शहर की सबसे बड़ी समस्या जल और विद्युत् की है। शहर वालों ने इनके जुगाडू समाधान दूंढ रखे हैं मगर जैसा की जुगाड़ का सत्य है एक समाधान दूसरी समस्या उत्पन्न करता है, हर घर में 'बोरिंग पंप' होने से भूमिगत जल स्तर नीचे चले गए हैं। और हर घर में विद्युत जनरेटर लगे होने से शहर डीजल के धुएं से भरा रहता है।
   मौजूदा बनारस एक अंधेर नगरी से कम नहीं है। अस्पताल बहोत ही असुविधाजनक हैं और प्रोद्योगिकी में पिछडे से भी पीछे है। शायद नए युग की तकनीक का इन्हें अनुमान ही न हो, यह अस्पताल इतने पुराने हैं। जनसँख्या भार को देखते हुए तो इनकी संख्या भी बहोत कम लगती है।
आर्थिक हालात में बनारस एकदम खराब है। आज भी रिक्शेवाले शहर की सड़कों पर कब्जे में है । यानी यहाँ आज भी इंसान इंसान को ढोता हैं। और शिक्षा और व्यवसायिक कौशल इतना विक्सित नहीं हुआ है की लोग रिक्शा चलाने के बहार कुछ अन्य व्यवसाय में अपनी जीविका दूंढ सकें।
   अपराधिक और असामाजिक तत्वों ने शहर की संस्कृति को अपने अनुसार ढाल लिया है। कन्धों को पीछे फ़ेंक कर सीनाजोरी करते युवक यहाँ आम ,सामान्य ,बात व्यवहार है। और फिर ऑटो या रिक्शावाले को रोक कर उससे वसूली कर लेना तो एकदम साधारण बनारसी 'बंदरी' शरारत जिसे की उतना ही पारित, समाजिक स्वीकृत, समझा जाता है जितना की बंदरों का उत्पात।
   ऐसे कई व्यवहार और क्रियाएं हैं जिन्हें सामान्य तौर पर हम अपराध मानते होंगे , मगर बनारस ने अपनी 'मध्यम मार्ग' की तर्क-भ्रांतियों में इन्हें सामान्य, या फिर कोई छोटी-मोटी गलती मान रखा है। एकदम 'रान्झाना' फ़िल्म के कुंदन के चरित्र जैसे।
मानो कि यहाँ इंसान की अंतरात्मा जन्म से ही भ्रमित करी जा रही हो।
गंगा नदी का प्रदुषण यहाँ की एक बहोत बड़ी समस्या है। यह सिर्फ एक नदी का प्रदुषण नहीं हैं बल्कि एक प्रतीक के तौर पर यह धर्म में मौजूद अशुद्धियों का भी सूचक है।    वर्त्तमान बनारस की साधारण विचारधारा ना धर्म समझ सकती है और न ही विज्ञानं। बल्कि कर्मकांड-धर्म पंथियों ने यहाँ पर विज्ञानं को कर्मकांड-धर्म का ही तत्व बना रखा है| धर्म और विज्ञानं का मानव विवेक पर जो अंतर है उसे यहाँ की वर्तमान की विचित्र 'मध्यम मार्ग' विचारधारा ने कैसे भी करके भर दिया है। मौजूदा बनारस में मानव विवेक अपने पतन की दिशा में जाता हुआ लगता है।
   अतीत में बनारस का साहित्य से भी एक गहरा जोड़ था। भारतेंदु हरिश्चन्द्र और मुंशी प्रेमचंद जैसे लेखक बनारस में से ही आये हैं। मगर अभी बनारस सिर्फ अतीत में ही जीता हैं और नया कुछ नहीं दे रहा है।
   शिक्षा क्षेत्र में भी बनारस बहोत पिछड़ा हो चुका है। स्कूलों की कमी नहीं है, बल्कि यहाँ स्कूल खोलना एक उद्योग हो चुके हैं। मगर किसी युग में ब्रह्म विद्या की शोध में डूबा यह शहर आज एक जागृत शिक्षा प्रणाली दे सकने में भी असक्षम है।
   बहोत संकरी, तंग और अनियंत्रित परिवहन से भरे बनारस को कुछ बुनियादि नवीनीकरण की आवश्यकता है।

Friday, March 21, 2014

Is the entire corporate world behind the BJP's PM Nominee as the way it is made to appear ?

 Logic dictates that there has to be some kind of a lobby-division among the corporate houses too. In India, the way crony capitalism has delivered itself, there are least of odds that all the corporates were gainers from it while only the common man stood to lose, that too a non-PERSONALISED fund as the "national ex chequer."
   The forces of nature balance themselves out so achieve a stability. Therefore if the losses from corrupt disbursement of India's natural resources were so "impersonalisd" as in the form of " a loss to the national ex chequer" alone, perhaps the corruption wouldn't have been a corruption at all , rather it would have become a solemn national policy. If this government policy is perceived as corruption, it ought to create a disbalance among the corporates too, who, therefore, should the be the first to join the brigade in crying out "foul".
   Some corporate houses have time and again put up their product advertisement meant to lobby the people against the faults and the shortcomings of our governance systems. This is a sign of corporates not happy with the Government Policies. There are big name corporates, too, in such advertising and "public motivations". And surprisingly a few of those corporates too which have themselves featured in the crony gains through the governmental corruption.
   Why would they do so and take such a huge risk of reputation even when they have investment overseas?
     A loss of reputation is all about having a negative perceptions of the self, and then the public and the government scrutiny automatically follows. This, in itself, creates the first of the obstructions in creating the wealth of a trust, which is a necessary ingredient of a successful business.
      Therefore, it can be assumed that the old, settled corporates would not take risk until the business competetions of a changed order of governance, and the business fear of the "cream" vanishing away from the supply market, which forces them to adopt the unfair means. This "Wrong means" is what they resort to, but only when they see the natural oversight mechanism to have fallen down.
   Those business houses which run on the community wealth will have the deepest understanding of this theory. It is a different vindiction of the proposed theory above that all the big business strive to promote themselves as a community alone so to win the hearts. There is a distinct economy and legal logic in this behaviour.
   Therefore it comes as a due self-enquiry that, "will not the corporates want a fair and an honest government systems around themselves?" . Honesty and Integrity have a specialised meaning from the point of view of the coporates regarding the Government Policies. For businesses, "Honest and Integrity" means, "someone who keeps up with his contracts".
   Arvind Kejriwal's message to the CII now makes a better sense, " The governments have no business to be in business". "Many business people want to live with honesty but the government policies don't let them live so". - the natural oversight mexhanism forced on the corporates to take risks on their community reputations.

सिद्धांतवाद -- एक बेतुकी राजनीति का अंत

   यह सिद्धान्तवाद का ही कमाल है है की जनता में यह स्पष्ट हो पा रहा है कि समाचार मीडिया भी पैसे के बल पर मरोड़ा हुआ चल रहा है। सिद्धान्तवाद आदर्शवाद में से ही प्रवाहित होता है मगर फिर भी आदर्शवाद से थोडा जुदा सा है।
   सिद्धान्तवाद को बस यूँ समझिये कि माध्यमिक स्कूलों में रसायनशास्त्र विषय में पढ़ाये जाने वाले "गैस के नियम" के सामान है। विभिन्न गैस कैसे आचरण करती हैं, यह अगर हम परस्परता में अध्ययन करते तो कभी भी किसी भी गैस को समझ नहीं पाते। अगर ऑक्सीजन की तुलना करके नाइट्रोजन और नाइट्रोजन से मुकाबला कर के हाइड्रोजन को समझते तब तो आजतक इंसानों की समझ में कुछ भी बढ़त नहीं हो पाती।
   तो इस समस्या का समाधान किया गया एक काल्पनिक गैस, "आदर्श गैस", को अपनी बुद्धि में ही, कल्पना में जन्म दे कर। एक बार जब हमने आदर्श गैस के आचरण को समझ लिए तब हमने कुछ सिद्धांतों का अविष्कार कर लिया। जैसे की "चार्ल्स लॉ" , " बॉयलस लॉ", और एक परिपोषित "गैस लॉ"।
   फिर इन सिद्धांत के प्रयोग से ही हमने अपने आस-पास के वास्तविक जीवन में विद्यमान सभी गैसों और मिश्रणों को समझना आरम्भ किया। अपनी आवश्यकता के अनुरूप "वंडर वाल करेक्शन " निर्मित किये और गैसों की दुनिया पर काबू पा लिया।
   आदर्शवाद में हमने एक आदर्श गैस का निर्माण किया था। उस पर आप सब "अत्यधिक आदर्शवादी ", "हवा में बाते करता है" , "कल्पनाओं की दुनिया में रहता है" , वगैरह का इलज़ाम लगा सकते थे।
   मगर उसी आदर्शवाद में से उत्सर्जित सिद्धान्तवाद पर यह इल्जाम लगाना संभव नहीं है। सिद्धान्तवाद वह परिथिति है जब सारी राजनीति का अंत हो जाता है। यहाँ वह 'परम निवारण' प्राप्त हो जाता है जब, जहाँ से हम प्रकृति को समझाना आरम्भ कर देते हैं। यहाँ नित नए निवारण और नित नए चैलेंज (समस्याएं) मिलती हैं।
   सिद्धान्तवाद वह सूत्र है जो हमे एक सूत्र में बाँध देता है। वह स्थान जहाँ से निकले तर्क हमे अपने विश्वासों और अंधविश्वासों दोनों से ही मुक्ति दे देता है और हमे तथ्यों की भूमि प्रदान करवाते है जिस पर एक दूसरे के साथ बिना किसी आपसी विवाद के एक सह-अस्तित्व कर सकें। यह विज्ञानवाद है, जिसमे सांप्रदायिक मान्यताओं का अस्तित्व स्वयम ही घट कर छोटा हो जाता है। हमे अपने धर्म और मजहब को त्यागने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती और इनका आकार स्वयं से ही घट कर इतना छोटा हो जाता है कि हम आपस में बिना किसी विवाद के रह सकें और तब भी एक सामान विचार, एक-रुपी निष्कार्ष रख लें।

   सिद्धान्तवाद तमान राजनीति, तमाम भिन्न-विचारधाराओं का अंत है, जब मानवों की अध्ययन बुद्धि अपनी समस्याओं को सुलझाने के काबिल बन जाती है।

भाजपा के जाली विज्ञापन

"अमेरिका मोदी से डरता है क्योंकि मोदी भ्रष्ट नहीं हैं।"--भाजपा द्वारा एक प्रचारित विकीलीक्स के नाम-अंतर्गत एक जाली विज्ञापन

    बीते कुछ वर्षों में जिन-जिन देशों में जन-क्रांति हुई है वहां के तानाशाहों ने उसे "सीआईए (CIA)" का , "पश्चिमी देशों की साज़िश" , और यहाँ भारत में "फोर्ड फाउंडेशन (Ford Foundation) की साज़िश" करार दिया गया है।
   जन-क्रांतियाँ चले आ रहे तंत्र को पलट देने का उद्देश्य पूर्ण करती हैं। स्पष्ट हो जाना चाहिए कि भाजपा और आप पार्टी के मध्य कौन सी पार्टी जन क्रांति से उभरी है? और कौन इस स्थापित तंत्र में बदलाव को रोकना चाहता है? किस पर फोर्ड फाउंडेशन से चन्द लेने का आरोप मथा जा रहा है (तब जब कि फोर्ड फाउंडेशन ने चंदे तो उनको राज्य की गैरसरकारी संस्थाओं को भी दिए हैं) और कौन स्वयं को "भ्रष्ट नहीं किये जा सकते हैं" कि दलील जनता में बेचना चाहता है।
   "अब उल्लू मत बनाओ क्योंकि उल्लू बनना कोई अच्छी बात तो नहीं हैं।"- टीवी पर आने वाले एक विज्ञापन में दिया गया जन सन्देश।
   वर्तमान में भारत और अमेरिका के व्यग्तिगत सम्बन्ध बहोत गहरे रहे हैं। प्रवासी भारतियों ने अमेरिका को अच्छे से अपना लिया है और वहां के विकास, संस्कृति और प्रशासन का अभिन्न अंग हैं। अगर हाल में घटे भारतीय राजदूत प्रकरण को एक अपवाद घटना माने तो भारत अमेरिका सम्बन्ध बहोत अच्छे और मैत्री पूर्ण हैं। ऐसे में अमेरिका को भारत की स्वायत्ता का शत्रु दिखा कर चुनाव प्रचार करना उनकी मंशाओं पर एक सवाल खड़ा करता है । शायद यह अमेरिकी वीसा नहीं दिए जाने की खसियाहट है।

अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम और भविष्य में भारत के लिए कड़ा रास्ता

   क्या यह भारत की विदेशनीति का आश्चर्यचकित करने वाला विरोधाभासी व्यवहार नहीं है कि हम रूस द्वारा यूक्रेन के क्राईमीया क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लिए जाने पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जा रहे रूस पर प्रतिबंधो में उनका साथ नहीं दे रहे हैं?
   क्या 21वी शताब्दी में आज भी कोई देश किसी दूसरे देश के क्षेत्र पर ऐसे अतिक्रमण कर सकता है? और क्या भारत ऐसे अतिक्रमण को जायज़ मानता है? तब यदि हमारे किसी भूभाग पर कोई यदि ऐसे अतिक्रमण करे तब क्या समूचे विश्व को हमे हमारे ही द्वारा उत्पन्न तर्कों में उत्तर देने का मौका नहीं मिलेगा?
   शायद दुनिया वापस शीत युद्ध के दौरान वाले राजदूतिया समीकरणों पर लौटने लगी है। यह एक अशुभ समाचार होगा।
   सुब्रमनियम स्वामी द्वारा लगाए गए कांग्रेस अध्यक्षा पर आरोप भी याद आते हैं। क्या रूस ने भारत से रिश्ते इतना गहरे "खरीद" रखे हैं।
   क्या भारत फिर से कम्युनिस्ट ब्लोक से सम्बद्ध हो जायेगा जिसे कभी किसी समय श्री अटल वाजपायी जी की सरकार ने मुक्त कराया था? क्या हम फिर से एक "समाजवादी प्रजातंत्र" बनेंगे जिसका प्राकृतिक अस्तित्व उतना ही सत्यापित है जितना किसी "गरम-गरम बर्फ" का।
   यह भी सच है की भारत-रूस मैत्री एक आजमाई हुई दोस्ती है। तत्कालीन "सोवियत संघ" ने ही अंत में भारत का साथ दिया था और आज भी हमारा आधे से अधिक सैन्य उपकरण रूसी ही है। मगर प्रवासी भारतियों ने प्रवास पश्चिमी देशों में किया है। स्वभाव से हम एक अंग्रेजी भाष्य अधिक है रूसी भाषी नहीं। हमे अपने आपसी लड़ाई करने की आज़ादी पसंद है, आपसी "बतकही" की स्वतंत्र अभिव्यक्ति भाति है। हम अपने पूर्व शासक अंग्रेजों को कोस-कोस कर उन्हें पसंद करते हैं क्योंकि हमें अंत में 'लन्दन और कनाडा घूमना' खूब भाता है।
   रूस या की पश्चिमी देशों वाली स्वतंत्रता - यह भविष्य में भारत के लिए एक मुश्किल चुनाव होने वाला है।

यूक्रेन और क्रेमीया प्रकरण पर एक विचार

   पश्चिमी देशों ने हाल मे घटी कई सारी जन-क्रांतियों में सराहनीय धैैर्य प्रदर्शित करा है। जहाँ-जहाँ (मिस्र, लीबिया, सीरिया ) भी यह क्रांति घटी थी वहां के इतिहासिक पटल पर एक तथ्य एकरूपी (common) था। वह यह कि वहां का शासक वहां लम्बे अरसे से शासन कर रहा था । जनता का असंतुष्ट होना एक विश्व व्यापी सत्य है - मगर यदि बदलाव को स्थान नहीं मिले तब यह असंतुष्टि एक क्रांति बन जाती है। फिर भले ही वहां की सरकारें इसे एक विद्रोह या एक विदेशी खुफिया साज़िश करार देती रहे।
    यही हुआ। सीरिया में असाड के शासन ने उत्पन्न क्रांति को असाड ने पश्चिमी देशों की साज़िश ही करार दिया है। फिर इस विद्रोह को दबाने के लिए उसने देश की सैन्य क्षमता को देश की जनता के विर्रुध ही झोंक दिया है। दो तीन माह पहले एक अत्यंत मार्मिक, मानवाधिकारों का उलंघन करते हुए, एक बहोत निर्मम रासायनिक हतियारों का हमला अपनी ही जनता के विर्रुध कर दिया । और आरोप यह लगाया कि यह पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित विद्रोहियों ने किया था।
शायद यह बेहतर होता की एतिहासिक सत्य को देखते हुए असाड खुद त्यागपत्र दे देते। मगर उनका चुनाव था कि विद्रोहियों को दबा दें।
   इन सभी देशों में एक अन्य समान तथ्य यह भी है की यहाँ शासक पुश्तौनी होते जा रहे हैं, यानी परिवारवादी । असाड से पहले उनके पिता ही सीरिया के "निर्वाचित" शासक थे।
   पश्चिमी देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, इत्यादि) ने जब असाड विषय में सीरिया में हस्तक्षेप करना चाहा तब इस बार उनके सांसदों ने यह अनुमति नहीं दी। उधर संयुक्त राष्ट्र में भी एक सामूहिक कार्यवाही के प्रस्ताव को रूस ने अवरोधित कर दिया ।
   गौर करने की बात है की रूस खुद एक प्रकार के दीर्घकालीन शासक की कठपुतली बना हुआ है। व्लादामीर पुटिन वहां खुद बहोत लम्बे अरसे से "निर्वाचित" हैं।असल में निर्वाचन क्रिया इन देशों में राज्य के नियंत्रण में होती है और खुफिया तौर पर हस्ताक्षेपित रहती है।
   यूक्रेन के क्रेमीया इलाके में रूस के हस्तक्षेप को, जाहिराना तौर पर, रूस की संसद ने पारित कर दिया है। यहाँ युक्रेन में भी विवाद यही से शुरू हुआ था कि यूक्रेन को यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहिए या नहीं। वहां की सरकार इसके विरूद्ध थी जबकि जनता का एक हिस्सा इसका पक्षधर है। जब जनता के इस हिस्से ने वहां तख्तापलट कर दिया तब रूस ने रातों-रात क्रिमीय पर अतिक्रमण कर लिया। रूस ने पश्चिमी देशों जैसा धैर्य प्रदर्शीत नहीं किया। रूस ने सीरिया प्रकरण में असाड का साथ पहले ही दिया हुआ है।
   यह अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम एक व्यापक निति को बनाने और समझने में आवश्यक होंगे।

हास्य और सिद्धांतवाद

      सिद्धान्तवाद में हास्य के लिए स्थान नहीं होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कई बार सिद्धांतों को स्वयं भी तानों और जग हँसाई के बाच से ही गुज़र कर आना होता है। हास्य एक दिशाविहीन विचार प्रविष्ट कराते हैं और कभी-कभी तो यह सिद्धांतो के विपरीत को सत्य दिखलाने की त्रुटी कर देते हैं।
      हास्य के दो प्रकार - ताना कशी ( एक प्रकार का नकारात्मक व्यंग्य) और उपहास (किसी की क्षमताओं पर लगे प्राकृतिक अंकुश के कारणों से एक नकारात्मक, निकृष्ट आनद लेना) - हास्य कहने वाले के, और हास्य के पात्र- दोनों पर ही शब्दों का दबाव बनाते हैं।
     इतिहास में पलट कर देखें तो पता चलता है की फूहड़ हास्य ने कहाँ-कहाँ सिद्धांतों के साथ क्या त्रासदियाँ करी हुई हैं। जीवविज्ञानी डार्विन को ही लीजिये। जब डार्विन ने 'क्रमिक विकास' का सिद्धांत दिया था तब तत्कालीन ब्रिटेन के समाचारपत्रों ने डार्विन के बन्दर की शक्ल वाले व्यंग्य चित्र प्रकाशित कर के उन पर ताने कसे थे, कुछ ने डार्विन के पूर्वजों को बन्दर की शक्ल का दिखाया था, और कुछ ने डार्विन को इश्वर के स्थान पर बंदरों की पूजा करने वाला। सिद्धांत कितना सिद्ध      निकला यह तब एक आशंकाओं से भरा भविष्य था मगर आज एक सर्व ज्ञात इतिहास है।
यही हश्र एंटी बॉडी टीके के अविष्कारक का हुआ था। कहने वालों ने ताने कसे थे की यह घोड़ों के लहू से इंसानों के मर्ज़ ठीक कर देने की बात कर रहे हैं।
हास्य जीवन का महतवपूर्ण रस है । ताने का हास्य तब एक सक्षम शब्द हतियार माना जाता है जब सामने वाला अड़ियल व्यवहार प्रदर्शित करे जिसे साधारण विचार विमर्श से भेदा नहीं जा सके। मगर दो पक्षों के मध्य तानों के वाक् युद्ध को आपसी संवाद का पूर्ण विच्छेदन समझा जाता हैं। राजनीति में यदि ताना-कशी ही दो पक्षों के मध्य समान व्यवहार हो जाए, तब समझ लेना चाहिए की सिद्धांतों का नाश हो रहा है और देश तबाही की ओर बढ़ रहा है।
     साधारणतः राजनैतिक संवाद सिद्धांतों को तय करने के लिए ही होना चाहिए। संसद नाम की संस्था का निर्माण ही इसी उद्देश्य से हुआ है। राजनीति शास्त्र के विज्ञानं में संसद का कार्य और उद्देश्य ही यह है कि यहाँ सब जन-प्रतिनिधि विचार विमर्श करे और बहुमत के आधार पर देश चलाने के नियम बनाए। मगर जब विचार विमर्श अधिक लंबे होते हैं तब यह वाक् युद्ध बन जाते हैं, और फिर ताना कशी और उपहास । शायद अंत में यह पूर्ण विच्छेदन में आ जाते हैं।
कल्पना करिए एक ऐसे युग की जहाँ गैस के सिद्धांतों का अभी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था। वहां हास्य तो आदर्श गैस की कल्पना मात्र पर इतने ताने कसता की शायद गैस के सिद्धांतों की खोज संभव ही नहीं होती। शायद असलियत में यही कारण है की खोजी और वैज्ञानिक विचारधारा के व्यक्तियों को एकाकी जीवन गुज़ारना पड़ जाता है , - क्योंकि साधारण विचार, वार्तालापों और हास-परिहास में उनकों अपने विचारों के भंग हो जाने की आशंका लगती है।
     हमारे संसदीय व्यवहार में हम फूहड़ हास्य की सिद्धांतों की विलीन कर देने वाली अवस्था से गुज़र रहे हैं। यदि तानों का जवाब तानों से ही होगा तब सिद्धांत तो खुद ही विलयित हो जायेंगे और देश बदहाली में आ जायेगा। शायद यही हो रहा है आज की राजनीति में। हास्य होते तो बहोत सरल है और मन-मष्तिष्क को खूब भांते हैं मगर हास्य में संवाद का मीठा ज़हर भी हो सकते हैं।
     ऐसा नहीं हैं की हमे सदा गंभीर रहना चाहिए, मगर तीखे हस्यों से सतर्क रहना भी आवश्यक है । शायद दीर्घ कालीन विचार विमर्श से उत्पन्न गंभीरता हमारे विचार विमर्श को असफल बना देती है। मगर इसके प्रतिफल में उपजा तानों और उपहासो का हास्य भी कोई कम क्षतिपूर्ण नहीं होता। यह आपसी संवाद के पूर्ण विच्छेदन की निशानदेही है।

     खुद ही विचार करिए कि क्या तानों और उपहासों के बल पर विजयी हुई पार्टी क्या कल संसद को चला भी पायेगी? और यह अंत में कर भी क्या रही है - सिद्धंतों का तिरस्कार । तब यह देश और देश वासियों को सामान न्याय और तर्क के आधार पर कैसे नियंत्रित करेगी? यही हास्य , ताने, उपहास और चुटकुले सुना कर के?

Saturday, March 08, 2014

सिद्धांतवाद और आदर्शवाद की राजनीति की वापसी

    सिद्धांतवाद और आदर्श वाद की राजनीति में उन विचारों को त्यागना ही पड़ता है जो स्थापित सिद्धांतों से मेल नहीं रक् सकते हैं। अर्थात जन लोकपाल विधेयक चाहने वालों और नहीं चाहने वालों को एक साथ रख कर नहीं चला जा सकता है।
     मगर लगता है की मौकापरस्ती की राजनीती करने वाली मौजूदा सभी राजनीति पार्टियां सिद्धान्तवाद के आरंभिक अध्याय को भी भुला चुकी हैं। और उनहोंने यह तो मन ही मन यूं ही मान लिया है की भारत की जनता सदियों की गुलामी के बाद अंतरात्मा विहीन हो चली है इसलिए उनमें यह काबलियत ही नहीं बची है की सिद्धान्तवाद और आदर्शवाद को वापस स्मरण कर सकें।
     देखिये न कैसे कैसे आरोप लगा रहे हैं विपक्षी दल केजरीवाल पर। " केजरीवाल सभी को साथ ले कर नहीं चल सकता है। उसकी राजनीति इस देश में नहीं चलने वाली है।" । और फिर अंत मेंन स्वयं की अंतरात्मा की ध्वनि होने का सूचक देते हुए यह भी कह देते हैं कि "जनता जाग चुकी है। इसे अब और बेवक़ूफ़ नहीं बनाया जा सकता है"। "सब को साथ लेकर नहीं चल सकते " ...यह अन्त्योष्टि किसके सन्दर्भ में प्रयोग करते है? "सब को साथ नहीं ले रहे" का क्या अर्थ हुआ - यही की केजरीवाल कोई 'खिचड़ी' और 'नाला' बनने को तैयार नहीं हो रहे हैं। भाई सब को साथ लेकर तो 'खिचड़ी' या फिर 'नाला' ही बनते हैं। सिद्धान्तवाद में "खिचड़ी" या "नाला" नहीं चलता है। यहाँ सिद्धांत उद्देश्य की पवित्रता को बनाए रखते हैं, "खिचड़ी" और "नाला" नहीं बना देते हैं।
         तो कहीं यह कोई गुप्त सन्देश तो नहीं हैं जन-संचार माध्यम से देश के तमाम भ्रष्टाचारी और काला धन रखने वालों को कि सब एक साथ हो कर केजरीवाल को हराओ। दल-बदलूओं की गन्दी राजनीति को सिद्धान्तवाद के तर्क बिलकुल भी समझ नहीं आ रहे हैं। इसलिए तर्क न सही, तो कुतर्क सही-- कुछ भी कर के विरोध कर रहे हैं।

आत्मनिष्ठ प्रश्नों के हल --- मत-विभाजन से कहीं महतवपूर्ण है मत-संयोजन

   कभी न कभी ,कहीं किसी पल हमे, हम सभी इंसानों को एक समाज का निर्माण करने के उद्देश्य से इस प्रकार के प्रश्नों पर भी एक राय, एकरुपी विचार रखना पड़ेगा की, "वह जो लाल रंग है वह कितना लाल है ?"।
          आत्मनिष्ठ विषय(subjective issues) उन्हें कहा जाता है जिनको हम निष्पक्षता से माप नहीं सकते हैं। एक उदाहरण के लिए इस प्रशन के उत्तर के विषय में मंथन कर के देखिये, " राम अपनी माता से अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कितना अधिक प्रेम करते थे?" ( क्या प्रेम को नाप सकने वाले यंत्र भी बने हैं ?!!!)
यह एक आत्मनिष्ठ प्रशन है जिसको की सर्वश्रेष्ट तर्कसंगत व्यक्ति भी उत्तर्रित नहीं कर सकते हैं। जहाँ तक आज के, आधुनिक विज्ञान का सवाल है अभी तक तो इंसानों ने इस प्रशन के निष्पक्ष(objective) उत्तर दे सकने के संसाधन विक्सित नहीं किये हैं।
        मगर दुविधा तो देखिये - एक समाज का निर्माण करने के लिए हमे ऐसे ही प्रशनों का एकरूपी उत्तर दूंढ कर ही आगे का रास्ता मिलता हैं। ऐसे उत्तर जो समान रूप से सर्वस्वीकार्य हों। हम इन प्रशनों को अनउत्तरित कर के एक समाज का निर्माण कभी नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार के प्रशन बार-बार हमारे बीच में आकर हमारे आपसी सोहर्दय को चोटिल करते रहेंगे अथवा हमारे विकास में बाँधा देते रहेंगे।
       हमारे आसपास चलने वाले अधिकाँश वाद-विवाद ऐसे ही आत्मनिष्ठ प्रश्नों की देन होंती हैं। हमारी वह निष्ठा जो कभी हम में हमारी सांस्कृतिक विरासत से उत्पन्न होती है, कभी कभी हमारे भिन्न दृष्टिकोण से तो कभी हमारे भिन्न भिन्न आस्थाओं के चलते।
        ज़ाहिर सी बात है, हम कभी भी किसी व्यक्ति को यह बहस करते नहीं सुनने वाले हैं की "आप की क्या राय है कि 2 + 2 कितना होना चाहिए?" । इस प्रकार के विषय तर्क की विचार क्ष्रेणी में होते हैं और इन्हें स्पष्टता से नापा जा सकता है। तर्क की चौखटे में होने वाले वाद-विवाद अक्सर कर के मात्र इस बिन्दु पर टिकते हैं की भिन्न विचारों की किस तर्क क्रम में रखना था, या की तार्किक भ्रान्ति कहाँ हो रही हैं। तर्क सम्बंधित विवादों को हम आपसी मशवरा, मंथन, संगोष्ठी इत्यादि के माध्यम से सुलझा सकते हैं।
        मगर आत्मनिष्ठ विषयों से जुड़े विवादों का हल कैसे करेंगे? यह ऐसे विवाद होते हैं जिनमे स्वयं से भिन्न मत रखने वालों से हमें हट्ट और अड़ियल व्यवहार ही सामना करने को मिलता है। मत-विभाजन की विधि से हम बहुमत तो पता लगा सकते हैं मगर सिद्धांतों की सिद्ध नहीं कर सकते हैं। बहुमत तो केवल लोकप्रियता का सूचक होता है , यह कैसे सिद्ध होगा की बहुमत प्राप्त करने वाला विचार सिद्धांतों के अनुरूप है। सिद्धांतों के बिना किया गए निर्णय दिल्ली के शासक बीन-तुगलक के निर्णयों के सामान होते हैं- "मूर्खतापूर्ण सयाना गिरी"।

    बडी जनसँख्या और क्षेत्रफल को कुछ बुनियादी सिद्धांतों से ही संचालित किया जा सकता है, केवल लोकप्रियता से नहीं।

        मगर तब कैसे किसी विवाद सुलझाएंगे जब हमे बुनियादी सिद्धांतों की तलाश के दौरान ही भिन्न मत मिलने लगें। क्या यह सिद्धांतों की तलाश वाला विवाद भी मत-विभाजन से ही सुलझाएंगे?!
       अरे बुद्धू , मत-विभाजन से तो लोकप्रियता मिलती है , सिद्धांतों के सिद्ध होने का प्रमाण नहीं मिलता है।
इसका हल यह है कि यहाँ हमें मत-विभाजन के स्थान पर मत-संयोजन करने की आवश्यकता होती है। यानि की एक-राय, एकरुपी विचार। बल्कि शायद जहाँ-जहाँ इंसानों में राय/विचार एक जैसे होते हैं, और जब वह वैज्ञानिक पद्धति द्वारा प्रमाणित होते हैं, तब हम उन्ही विचारों को "सिद्धांत" कहते हैं।
      विवाद ऐसे भी हो सकते हैं जब दो या अधिक सिद्धांतों को किसी एक निर्णायक परिस्थिति में एक समान प्रयोग किया जा सकता है। ऐसी अवस्था में कैसे तय करेंगे कि कौन सा वाला सिद्धांत उपयुक्त रहेगा?
इसका प्रस्तावित उत्तर है कि अगर हम गौर से समझें तब हम ऐसी अवस्था में वापस लौट चुके होते हैं अपनी वही पुरानी अवस्था में जब हमे तमाम विचारों में से एक नया सिद्धांत तलाशना होता हैं। अर्थात, इस समस्या का हल वही है -- मत-सयोजन की विधि, मत-विभाजन नहीं।
       आत्मनिष्ठ विषयों पर एक-राय प्राप्त करने के लिए उपयोगी पाठ्यक्रम "मानवीयता (humanity)" का होता है। मानवीयता का पाठ्य समूह उन विषयों से बना होता है जिनसे की इंसान और उसकी प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं। मानवियता विषय समूह में आने वाले विषय हैं- भाषा, साहित्य, नाट्य कला, मनोविज्ञान, दर्शन, समाजशास्त्र इत्यादि।
       हमारी शिक्षा-व्यवस्था ने यहीं पर हमारे देश को असफल बना दिया है। आर्थिक हलांत ऐसे हो गए हैं की तकनिकी शिक्षा और व्यवसायिक शिक्षा मानवियता की शिक्षा से अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाने लगे हैं। यह हमारी सामाजिक असफलता का मूल बनता जा रहा है। हमारी फ़िल्म नगरी ने भी हमें इस दिशा में सही से पोषित न हीं किया है। आत्मनिष्ठ विषयों में सामान राय प्राप्त करने के लिए समाज के सभी सदस्यों को एक घटनाक्रम को एक सामान आकलन करने का प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता होती है। इसके लिए हमें एक सर्वव्यापक साहित्य की आवश्यकता होती है जिससे हम सब ही एक सामान निष्कर्ष निकालें और सबक लें। अतीत में वैदिक युग में यही सामाजिक प्रशिक्षण हमने रामायण और महाभारत जैसी संरचनाओं के माध्यम से प्राप्त करी है। तभी हम एक संस्कृति रच सके थे। मगर बदलते युग के साथ हर समाज को अपनी सभ्यता की स्थापना के लिए अपने युग के साहित्य की आवश्यकता होती है। हमारे युग में जहाँ फिल्मों ने साहित्य को पूरी तरह शिकंजे में ले लिया है, या विस्थापित कर दिया है, हम इस तरह के सर्वव्यापक साहित्य को रच सकने में करीब-करीब असफल हो चुके हैं।
        मानवियता की सामान आधारभूत समझ हमारे समाज से वाष्पित हो चुकी है। ऐसे में राष्ट्रिय एकता ,अखंडता जैसे शब्द मात्र एक कूटनैतिक आवाहन होते हैं नागरिकों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर लगाम लागने के लिए। वास्तविक अखंडता विचारों के मिलने से आती है, भिन्न विचारों पर पाबंदियां लगा कर नहीं। और एक सामान विचार के लिए सामान भावनात्मक दृष्टिकोण आधार होते हैं।-संयोजन