Posts

Showing posts from November, 2013

Not everybody is comfortable knowing the truth

Not everybody is comfortable living life while knowing the Truth. It is because Truth has different derivations, different meanings in different context. It's here I figure out that the Truth is a small, narrow and a focused description of a larger form of behaviour , called the Fair-minded-ness. Fair-minded-ness correlates with the IQ, the analytical ability of Human mind. The higher the analytical mind, the higher is the Fair-minded-ness. There is a misconception amongst people who see 'street smart' chirps as the mark of intelligence. In truth, it is not. As one unravels the links between Intelligence, Intellectualism and Wisdom , the analytical ability emerges as the thread which connects one with another. it is this ability which is generated from the quality of empathy, explains how the Fair-minded-ness is a significant trait of higher skilled analytical brains. The higher IQ are capable of perceiving the different aspects of a problem by their Imagination skills its…

अब और कितने पतन की और जायेंगे हम /

खुर्शीद सही कहते हैं : "इस हमाम में तो सब नंगे हैं "|
  क्या नेता , क्या अभिनेता , क्या क्रिकेट खिलाडी , क्या दर्शक , क्या साधू बाबा , और क्या तांत्रिक योगी बाबा , क्या जज और क्या मुजरिम , क्या पत्रकार , और क्या भावी प्रधानमंत्री, और क्या आम आदमी  -- यह भारत नमक देश एक ऐसी सभ्यता बन गयी है जो एक 'नंगा हमाम' की तरह ही है | मानो की जैसे भारतीय सभ्यता ख़त्म ही हो चुकी हो |
   यह वो देश नहीं रह गया है जहाँ सभ्यता का विकास यहाँ की कला, विज्ञानं ,सत्य . धर्म और न्याय की खोज को एक शिखर की और अग्रसर करे , जहाँ सभ्यता विक्सित हो और प्रफ्फुलित हो| यह पतन और खात्मे की कगार पर खडी एक सभ्यता है जो की फिर किसी विदेशी ताकत के आधीन होने के लिए तत्पर है |यहाँ लोग सिर्फ हमाम में ही नंगे नहीं होते, अब तो महफिलों और शासन के गलियारों में भी नंगे लोग पहुच चुके हैं| यहाँ जन-विश्वास पारदर्शिता के द्वारा नहीं , गोपनीयता में दूंढा जाता है | यहाँ शक्ति ने धर्म को अपने आधीन कर लिया है | यह धर्म का अर्थ सत्य और न्याय से नहीं , शक्ति के उपयोग से तय किया जाता है | लोकप्रियता का अर्थ फिल्मी सितारा क…

भाग 2 : पश्चिम का 'सेकुलरिज्म' और भारत का 'सेकुलरिज्म'

पश्चिमी देशों में प्रयुक्त 'सेकुलरिज्म' , इधर भारत में अभ्युक्त सेकुलरिज्म से और भी कई मायनों में अलग है | वहां के मुख्य ईश पंथ, Protestantism में ही सेकुलरिज्म के वो बीज हैं जो समूची सभ्यता को स्वतंत्र-अभिव्यक्ति  को प्रयुक्त करने का रास्ता खोलते हैं| ऐसे में सेकुलरिज्म प्रजातंत्र से गठ-जोड़ कर कर लेता है , क्योंकि स्वतंत्र-अभिव्यक्ति प्रजातंत्र का मूल स्तम्भ है | और फिर सेकुलरिज्म खुद भी प्रजातंत्र का एक भौतिक गुण बन जाता है | Protestantism में मनुष्य और उसके इश्वर के बीच में नए सम्बन्ध, स्वतंत्र और व्यक्तिगत संपर्क माध्यम के चलते वहां का प्रत्येक व्यक्ति अपने आस-पास, बगल में किसी भी दूसरे विचार के व्यक्ति को खुल के रहने की आजादी देता है | इसमें नास्तिकता और वैज्ञानिकता के विचार वाले व्यक्ति भी शामिल हैं,जो की बिना सेकुलरिज्म के विधर्मी  (heresy) और ईश निनादायी (blasphemes) सुनाई देने लगेंगे |
       इधर भारत में सेकुलरिज्म को हिन्दू-मुस्लिम राजनैतिक एकता में देखा जाने लगा है | एक धर्म का हो कर दूसरे के वस्त्र पहन लेना , दूसरे की भाषा बोलना, दूसरे धर्म के व्यक्ति से शा…

पश्चिम का 'सेकुलरिज्म' और भारत के 'सेकुलरिज्म'

पश्चिमी यूरोप और उतरी अमेरिका का सेकुलरिज्म (Secularism, = धर्म निरपेक्षता ) भारतीय प्रसंग की धर्म-निरपेक्षता से कैसे भिन्न है यह समझने के लिए हमे इन पश्चिमी यूरोपीय देशों के सांस्कृतिक इतिहास को समझना होगा जहाँ से प्रजातंत्र और सेकुलरिज्म , दोनों का ही जन्म हुआ है |
     सेकुलरिज्म के इस प्रसंग की कहानी हम पश्चमी यूरोप के मुख्य धर्म , इसाई धर्म, को सेकुलरिज्म की उत्त्पत्ति की इस कहानी मध्य में रख कर समझ सकते हैं | सोलहवी शताब्दी के युग तक इसाई धर्म का केन्द्रीय गढ वैटिकन चर्च था , जो की इटली की राजधानी रोम के मध्य में स्थित एक स्वतंत्र धर्म-राज्य है | इस चर्च के अनुपालकों को रोमन कैथोलिक , या सिर्फ कथोलिक , कह कर बुलाया जाता है | सोलहवी शताब्दी तक इसाई धर्म में पादरियों और चर्चो की आम ईसाईयों की ज़िन्दगी में हस्तक्षेप बहुत चरम पर था | उस समय की मान्यताओं के अनुसार वह इंसानों को अपनी समझ और अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुसार कभी भी सजा दिया करते थे | यह याद रखना ज़रूरी होगा की तब विज्ञानं का करीब-करीब न के बराबर प्रसार था | इस लिए तत्कालीन विज्ञानियों का कथन तो एक ईशनिंदा (blasphemy) और अ…

तो सीबीआई के निर्माण से हुआ है भारत मुर्ख-तंत्र का निर्माण !

एटोर्नी जनरल, ज़ी ई वाहनवती जी ने CBI से सम्बंधित फैसले पर सर्वोच्च न्यायलय में अपनी दलील दे कर फिलहाल के लिए स्टे आर्डर ("ठहरना" का आदेश ) प्राप्त कर लिया है | यह ज़रूरी भी है क्योंकि जैसा की उन्होंने अपनी दलील में कहा -- सीबीआई आज एक ६००० से भी अधिक लोगों से सुसजित संस्था है , जो की आज भी १००० से भी अधिक केस को जांच कर रही है | गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले यह सब के सब , और करीब ९००० फैसले प्रभावित होंगे |
    एटोर्नी जनरल जी का मुख्य नजरिया यह है की गुवाहाटी हाई कोर्ट ने जो प्रश्न किया था वोह ही गलत था, फिर उन्होंने एक त्रुटिपूर्ण आधार से आंकलन किया , और एक त्रुटिपूर्ण समाधान प्राप्त किया . जो की उनका फैसला बन गया |
     भारतीय मूर्ख्तंत्र की दिक्कत यह है की हमारा मीडिया भी तर्क, वाद-विवाद को सही से समाचार में कभी दिखाते ही नहीं है | उनको तो बस भाषणों को दिखाने की लत लग चुकी है और तर्क, वाद-विवाद तो खुद उनके भी मस्तिष्क में घुसता नहीं है , इसको समाचार में दिखाने की आवश्यकता इनके सहज बोद्ध में नहीं आने वाली| यह क्या जन -जागृती लायेंगे | दिक्कत यह है की जनता का विधि -विधान , …

'मंगलयान' अभियान का प्रेरणा उद्देश्य क्या होना चाहिए ?

हिंदी भाषा के एक समाचार चेनल IBN-7 पर एक उच्च पदस्त अंतरिक्ष वैज्ञानिक को भारत के मंगलयान मिशन(अभियान) के प्रेरणा-उद्देश्य का व्याख्यान करते सुना की क्यों भेजा हैं भारत ने यह मिशन | उनकी बातों और विचारों को सुन के मुझ में फिर से वहीँ ग्लानी , वही शमंदिगी महसूस हुई जो बार-बार  , कितनो ही बार मैंने स्वयं के एक भारतीय होने की वजहों से महसूस करी हुयी है | वही बेईज्ज़ती और शर्मंदिगी, जिसमे की मेरे मन में वह संदेह होता हैं की क्या यही वह भारतीय सभ्यता थी जिसने समूचे विश्व को सभ्यता का पाठ अपने काव्य रचना, रामायण, के माध्यम से दिया था , और क्या यही वह सभ्यता है जिसने घर्म और न्याय के महाग्रंथ , श्रीमद भगवद गीता, की रचना करी थी |
  अंतरिक्ष वैज्ञानिक जी का कहना था की मगल यान मिशन का प्रेरणा-उद्देश्य है इस दुनिया में भारत का नाम ऊँचा करने का -- यह साबित करने का की भारत के पास भी काबलियत है ऐसे उच्च तकनिकी मिशन को सफलता पूर्वक पूर्ण कर सकने की , और भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में लोहा मनवाने की | भारत ने यह मिशन मात्र रुपये 450 करोड़ में ही भेजा है , जब की रूस, अमरीका , यूरोपीय संघ …

क्या है 'राजनैतिक महत्वाकांक्षा' - एक विचारविमर्श

मोदी जी के भाषणों को टीवी पर लगभग सभी समाचार चेनल , हिंदी और अंग्रेजी , 'सीधा प्रसारण' में दिखा रहे हैं । इसलिए मेरे जैसे दर्शक अपनी इच्छाओं से दूर हट कर भी इन्हें सुन ही बैठते हैं । इनको सुनते-सुनते मोदी के आलोचकों के विचार भी सुनाई दे ही जाते हैं । मोदी के आलोचकों का एक प्रमुख आरोप "राजनैतिक महत्वाकांक्षा" का है ।
 क्या सन्दर्भ है इस आरोप का - "राजनैतिक महत्वाकांक्षा", और इसमें क्या गलत है ?
सभी व्यक्तियों को जीवन में एक न एक लक्ष्य तो रखना ही चाहिए । लक्ष्य के बिना तो जीवन व्यर्थ हो सकता है , बिलकुल किसी आवारा की भाँती । तब फिर 'जीवन के लक्ष्य' और 'महत्वाकांक्षा' में क्या भेद हुआ ?
'जीवन का लक्ष्य' और 'महत्वाकांक्षा' के बीच का अंतर एक मनोवैज्ञानिक दर्शन के माध्यम से ही समझा जा सकता है । हर व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य का चुनाव अपनी स्वयं की क़ाबलियत के एक आत्म-ज्ञान के आधार पर ही करता है । वैसे विचारों और इच्छाओं पर कहीं कोई अंकुश नहीं होता , मगर इसका यह मतलब नहीं है की एक स्वस्थ मानसिक अवस्था के व्यक्ति को अपने 'जीवन क…

Really! a case of Indiscipline and Disrespect ??

Acts of 'Indisciple' and 'Disrespect' are two accusations which in themselves are deprived of any logical substance to sustain themselves. What is 'indiscipline' and what is 'disrespectful' or 'insulting' in an action is never revealed by the use of word itself. Where one person will judge 'indiscipline' in an action, the other person may still see discipline while negotiating hard to change a culture towards the deliverance of the justice. Given the manner these words are used, it can be said that the parameters of 'discipline' and 'indiscipline' are very much subjective and particular to the cultural environment of the claimant and the organisation.
  More often than not, the claims of a perceived 'indiscipline' or a 'disrespect','insult' comes as a front for the suppression of Free-speech , or to overthrow what ought to be the course of Justice in a given case. It is very common to see the claim…