Tuesday, October 15, 2013

It's not "anarchy" as they say, it is a new order of Hierarchy

The clash of Anti-corruption against the Corrupt is becoming a clash of the Hierarchy-against- Anarchy at one of its fronts. There is a due logic on how this transforming is happening. the first observable point is that it is not Anarchy, but something of a euphemism to denote the desire to demolish the presently installed system of 'hierarchy'. Hierarchy in itself is a natural force which comes to existence on it's own in any organisation, whether the people like it or not. Indeed there is a legal-purpose hierarchy in the AAP too, no matter it claims to be a band of volunteers. Therefore the agenda of anti-corruption by AAP has the potential to demolish NOT what is Hierarchy BUT what is the *present* Hierarchy which has come into being in this climate of immense corruption.
What kind of Hierarchy does a corrupt system bring up? Look at BJP which is continuously on an inward fight for leadership. It found it's peace in Nitin Gadkari who remains a prime accused in massive corruption. This lone man was their agenda when the BJP set out to extend the presidency to any person for morn than one term, their original rules. So where did they find their leadership stability? In Nitin Gadkari ! Look at Congress which found its peace in the Dynasty-led "Gandhi" family, which is itself heavily indulged in corruption. The hierarchy of corruption damages the rise of Merit, and has allowance for rise by way of crime and monetary manipulations. It is this hierarchy which will be unsettled, not the all kinds of Hierarchy per se. But in a apparent glance, this contest have been labeled away as 'Anarchy', this to deceive the people.
Once people are deceived, this fight of the new order is labeled away as the Anarchist only to keep them fooled for a long time, perhaps for ever.

Sunday, October 13, 2013

एक उत्तर- “सारी दुनिया बेईमान हैं, और सिर्फ तुम ही एक ईमानदार”

भगवान् ने इंसान को सम्पूर्ण दोषमुक्त कभी भी नहीं बनाया | बल्कि इस पूरी धरा पर जीवन कहीं भी सम्पूर्ण दोषमुक्त नहीं बना है| किसी को कुछ दिया है तो कुछ और नहीं भी दिया है| हाँ जीवन जी सकने का इन्साफ ज़रूर किया है|यदि शेर को नाखून दिए हैं, तब हिरण को मजबूत, उछल-दार पैर| फिर यदि दोषमुक्त कोई है ही नहीं, तब क्या इस धरा पर दोषियों का साम्राज्य नहीं कायम हो जाना चाहिए ? हम क्यों किसी बेवकूफों की भांति बार-बार अरविन्द केजरीवाल से सवाल करते हैं की "तुम सारी दुनिया को भ्रष्ट बताते हो और खुद को इमानदार"|
     अरविन्द केजरीवाल ने भ्रस्टाचार को एक सांकृतिक समस्या जरूर दर्शाया हैं, जिसको दूसरे शब्दों में ऐसा प्रस्तुत करने की भी एक संभावना है की "सारी दुनिया भ्रष्ट है", मगर खुद को इमानदार नहीं कहा है| खुद के लिए हमेशा यही कहाँ है की "भाई जांच करवा लो, कहीं कुछ मिले तो सजा दे देना|" 'भ्रष्टाचार हमारी एक सांकृतिक समस्या है',- इस विचार का इस दुनिया के तमाम जीवन में परिपूर्णता से क्या सम्बन्ध है, इसको समझने की जरूरत है| यदि परिपूर्णता का अभाव इस धरा के सभी प्राणी जगत का सत्य है, तब मनुष्य का अपने भगवान् से क्या सम्बन्ध हैं? खुद ही तर्क कर के देखिये, यदि "सभी में कुछ न कुछ कमी हैं, कुछ गलत किया हुआ है" - हम इसी विचार को सत्य मान लें तब फिर धरती पर शैतान का साम्राज्य होना चाहिए, भगवान् का नहीं| तब भगवान् क्या हैं, और उसने क्यों जीवन-जगत को परिपूर्ण नहीं बनाया?
    प्राचीन विचारकों ने इसका उत्तर कुछ इस तरह दिया हैं: कहते हैं मनुष्य भगवान् का ही एक अंश हैं, और उसके अन्दर की कमी उसको अपने भगवान् को प्राप्त करने की लालसा देने के लिए ही बनायीं गयी है| शायद मनुष्य कभी भी परिपूर्ण होने की लालसा न पूरी कर सके, मगर उसकी यह यात्रा ही उसके जीवन की दिशा और उद्देश्य तय करती है|
      परिपूर्णता का अभाव मनुष्यों को दो विस्तृत विचारधाराओं में बांटता है : एक वह जो परिपूर्णता के अभाव को एक सत्य मान लेते हैं और उसको न प्राप्त करने का भी मन बना लेते हैं की "भाई जब परिपूर्णता मनुष्य को कभी मिलनी ही नहीं है तब उसके पीछे भाग कर क्या फायदा"; और एक वह जो परिपूर्णता को कभी भी न प्राप्त कर सकने के सत्य को जानते हुए भी उसको पाने के लिए निकल पड़ते हैं|
      पहली वाली विचारधारा के मनुष्यों का स्वभाव अपने आस-पास की व्यवस्था में सुधार नहीं करने वाला होता हैं | क्योंकि वह बार-बार अपने ही विश्वास से उपजे तर्कों में फस जाते हैं की जब कुछ-एक थोड़े सुधार से भी परिपूर्णता नहीं ही मिलने वाली हैं, तब फिर अभी भी क्या खराब हैं, क्या कमी हैं| ऐसे विचार के व्यक्ति विकास और गुणवत्ता जैसे शब्दों को एक छलावा ही मानते हैं, क्योंकि किसी भी सुधार से, गुणवत्ता कार्यक्रम से , परिपूर्णता तो मिलने वाली शायद नहीं ही है , जो की पहले से ही उनका विश्वास है| ऐसी विचारधारा के व्यक्ति तमाम नियम-कानूनों को भी छलावा ही मानते हैं, क्योंकि उनके विचारों में "इससे कुछ नहीं होने वाला" होता है| वह नियम-कानूनों के प्रति एक आस्था-विहीन स्वभाव रहते हुए उसको छलावा-पूर्ण अनुपालन से निभाने को ही देखते हैं| उनके विचारों में दुनिया वाले (यानि उनके प्रतिद्वंदी विचारधारा के लोग) इन नियम-कानूनों और गुणवत्ता की बातों से एक पाखण्ड, एक छलावा कर रहे होते हैं|
इधर दुनियावालों की समझ से खुद ऐसे लोग ही पाखंडी होते हैं जो नियम-कानूनों और गुणवत्ता के विचारों से हांमी तो देते हैं, मगर अपने मन से और गहरे कर्मों से निभाते नहीं|
तर्क-भ्रान्ति विज्ञानं में ऊपरी दोनों विचारों को 'परिपूर्ण-जगत-भ्रान्ति'(Perfect-world fallacy) के नाम से जाना जाता है| इसे 'सम्पूर्ण-न्यायपूर्ण-विश्व-भ्रान्ति'(Just-world fallacy) भी बुलाते हैं|
प्राचीन चिंतकों, राजनैतिक सिद्धातों के विचारकों ने मनुष्य जगत में परिपूर्णत के अभाव से जन्मी इस तर्क-भ्रान्ति के निवारण में ये ही सिद्धांत दिया है की परिपूर्णता मनुष्यों में नहीं हैं, और शायद वह कभी प्राप्त भी नहीं करी जा सके, मगर मनुष्य समाज को सामूहिक उद्देश्य इसी परिपूर्णता को प्राप्त करने का ही हैं और यही वह उद्देश्य है जो एक मनुष्य को दूसरे से बांधता हैं| परिपूर्णता की असीम यात्रा मनुष्य को एक समाज के रूप में हमेशा के लिए बांधे रखने का उपयोग सिद्ध करगी| राजनैतिक विज्ञानं में भी किसी भी परिपूर्ण-से दिखने वाले कानून को इस तर्क के द्वारा बंधित करना की "सिर्फ तुम ही इमानदार हो, बाकी सारी दुनिया भ्रष्ट", कोई समझदार विचार नहीं हैं| बल्कि ऐसी विचारधारा हमारे अन्दर शैतान को बढ़ावा देने का कार्य ही करती हैं| इस तर्क के आधार पर तो हम सारे ही दोषनिवृति के विचारों को, प्रशासनिक सुधारक नियमों को परास्त कर देंगे और अपने आस-पास एक बेहद गन्दी, कुकर्मी व्यवस्था तैयार कर लेंगे|
    हम सभी को यह सोचने की आवश्यकता है कि कहीं हमने अतीत में कुछ ऐसा ही तो नहीं किया जिसके नतीजों में आज हम इस गन्दी व्यवस्था के शिकार होने की शिकायत खुद ही एक-दूसरे से कर रहे हैं|
किसी परिपूर्णता की ओर बढते हुए नियम को यह कह कर परास्त करना की "अभी क्या गारन्टी की सब सही हो जायेगा", यह भी उसी परिपूर्ण-जगत-भ्रान्ति का ही दूसरा स्वरुप हैं, जो हमारी दुनिया में पाखंड और छलवा को जन्म देता हैं, हमे अपने भगवान् से दूर करता हैं|
     लगातार गुणवत्ता को प्राप्त करने की हमारी यात्रा ही हमारे अंदर इश्वर की भक्ति का सिद्ध प्रमाण है| जैसे की कहते हैं, स्वछता इश्वर-मई होती हैं, शायद इश्वर की साधना का सही सम्बन्ध पवित्रता से हैं, जिसमे की शुद्धता, स्वच्छता, निर्मलता एक छोटे-छोटे अंश हैं| और लगातार गुणवत्ता की ओर प्रयासरत्त रहना इसी इश्वरमई पवित्रता का एक दीर्घ स्वरुप |

Saturday, October 05, 2013

Do you say, "AAP is being too much idealistic".

Are you among those people who accuse the Aam Aadmi Party of being too much idealistic.
Do you find something too much wrong with the too-much-idealism , which unfortunately you are not able to describe in exact, coherent terms.

Here is one reply I want to send to you:

There is a purpose of Idealism, although it is something akin to the perfection and divine-ness which the humans cannot achieve. Idealism sets the benchmark around which we measure our imperfections. This theory will help define the purpose and contribution of AAP to the current Indian Politics. It is alleged that AAP is highly idealistic and therefore likely to be unstable , something which cannot exist in the real world. It is so true a thought, i would concede. But the issue is, even if this idealism is of highly transient and rather illusionary and imaginary nature, this idealism has the potential to change the political landscape, the signs of which are already emerging through various legislative and justice changes we are seeing. In the past, revolutions have scripted changes in course of history very successfully. They all fade away but their impacts have remained with us till this day. AAP is doing the same in the current scenario, in the current times. It is the change which would aspire to achieve, no matter we actually achieve or not. hence the tendencies will change. Till now, post our Independence, Gandhi was setting those standards, but could never redeem himself for the modern times. Anna and AK are doing that hopping of Gandhi into our times. This will set the standards for future.

Understanding the purpose of Idealism to human existence, it can be said that AAP as a movement is but the progress of those smaller movements of the past, such as those by Jantantrik Party, TN Sheshan, Assam Gan Parishad , all of which have apparently failed. But then , if AAP exist today, it is a testimony that they never died out in the war, even if the battles have been lost. And the growing success of AAP over those pre-cursors speaks about what the future trend would be like.
One must note that the political trends which last long in a society are set by only those who have the social justice and the voice of reason standing with them. The huge imperfection of human nature ascends to power through the Hypocrisy, by hiding itself behind those standards which are actually set by the Idealist.
The extreme idealism of the Aam Aadmi Party has risen to popularity only when the hypocrisy of the prevailing political culture has become too much blatant , shameless.

That should make clear what AAP would eventually achieve. The clearest of vision I have about the impact of AAP in the future is that the lesser mind-skills, the inferior mentalities which are today ruling the political landscape of india will vanish , to give way to the higher brains and advanced, more urbanised minds to come to play. That will be an indirect statement of how India will progress into the 21st century as more advanced , matured nation.