अपशब्द क्या हैं, और उनका भाषा विज्ञानं की दृष्टि से क्या योगदान होता है ?

अपशब्द क्या हैं, और उनका भाषा विज्ञानं की दृष्टि से क्या योगदान होता है ? 

साधारणतः वाक्य में, अथवा किसी वार्तालाप में बिना किसी तर्क के प्रवाह से, यों ही अर्थहीन तरह से प्रेषित करे गए वह शब्द जो हमे किसी मलिन (गन्दा ) ,अशिष्ट वस्तु का स्मरण कराते हैं , वह अपशब्द होते है ।
    यहाँ कुछ विचार आवश्यक है । सबसे पहले की (अप )शब्द का प्रयोग वार्तालाप के विषय से किसी स्पष्ट तर्क से नहीं जुड़ा होना चाहिए । अर्थात अगर शब्द किसी तर्कसंगत रूप से विषय से सम्बन्ध रखता है तब वह अपशब्द नहीं है,भले ही वह किसी मलिन वस्तु का स्मरण कराता हो ।
   साधारणतः यौन , यौन क्रिया , प्रजनन प्रक्रिया आदि से सम्बंधित शब्दों को अपशब्दों के लिए प्रयोग करा जाता है । हालाँकि फिर इस प्रकार के प्रयोग के लिए इन शब्दों के किसी स्थानीय रूप का प्रयोग होता है , स्थापित भाषा के स्वरुप का नहीं । स्थापित भाषा के स्वरुप वाला शब्द का प्रयोग वैज्ञानिक , चिकित्सीय अथवा न्यायायिक तथ्य के सन्दर्भ में किया जाता है ।
   भाषा में अपशब्दों का प्रयोग मानव मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है । मनुष्य अपशब्द का प्रयोग बहोत अधिक भावुक हो जाने पर करता है। भावनाओं में भी क्रोध भावना सबसे आम प्रेरक है जब मनुष्य अपशब्दों से इस भावना को व्यक्त करता है। अपशब्दों का प्रयोग मानव द्वारा रचित बहोत पुराने साहित्यों में , यहाँ तक की कुछ धार्मिक ग्रंथो में भी पाया गया है । (अधिक जानकारी के लिए विकीपेडिया से शोध करें। )
    भावुक मनुष्य अपने विवेक, तर्क पूर्ण विचारों की धारा को खो चुका होता है । इस समझ के सह-प्रसंग में ऐसा भी कहा जा सकता है को अपशब्दों के प्रयोग से अपने प्रतिद्वंदी के विवेक को नाश करने का प्रयोजन भी होता है। न समझ में आने वाले विचार , अथवा अपने विश्वासों के विरूद्ध खड़े विचारों के विरोध में भी अपशब्द प्रयोग होते है । यहाँ अपशब्द का उद्देश्य मात्र अस्वीकारिता , अथवा क्रोध दिखलाना होता है , जब स्वयं का विवेक अपने विचार के समर्थन में कुछ तर्क नहीं दूंढ पा रहा हो ।
    आपसी व्यवहार के दौरान दो मनुष्यों में एक मनोवैज्ञानिक गतिविधि चल रही होती है । यह गतिविधि अपनी सत्ता को सिद्ध करने से सम्बंधित होती है । यह मनोवैज्ञानिक गतिविधि प्रायः अन्य जीवों में भी देखी जाती है । मनुष्यों में यह द्वन्द थोडा शिष्टाचार और सभ्यता के दबाव में परोक्ष हो जाता है । तब यहाँ अपशब्द का प्रयोग अपनी सत्ता के परोक्ष प्रदर्शन में होता है ।
   अपशब्दों का प्रयोग महिलायों की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा पाया गया है ।
   डिस्कवरी टीवी चेनल के एक कार्यक्रम , " मिथबस्टर ", में एक वैज्ञानिक प्रयोग के द्वारा यह दिखाया गया है की अपशब्दों के प्रयोग से मनुष्य में पीड़ा सहन कर सकने की क्षमता बड़ती है । ( अधिक जानकारी के लिए विकीपेडिया से शोध करें। ) यह कुछ ऐसे ही है की चोट लगने पर अधिकतर जीव-जंतु एक स्वक्रिया में चिल्लाने लगते है । संभवतः प्रकृति ने ही जीवों को यह प्रतिक्रीय नैसर्गिक प्रदान करी है , पीड़ा को सहन कर के जीवन के संरक्षण के लिए । मनुष्य , जिसमे ध्वनि- उच्चारण की प्रणाली सबसे अधिक विकसित है , वह चिल्लाने की क्रिया से आगे बढ कर अपशब्द का प्रयोग भी कर देता है ।
    बरहाल , राजनैतिक विज्ञान में मनुष्यों ने 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' को सबसे सहेज कर रखी स्वतंत्रता बनाया है । मगर इस स्वतंत्रता पर अंकुश लेते हुए अपशब्दों को वर्जित किया हुआ है । वास्तविकता में अपशब्दों को भी सामाजिक सन्दर्भ में बहोत संरक्षण होता है , क्योंकि इनका प्रयोग करीब-करीब सभी मनुष्य प्रायः कर ही लिया करते है । इसलिए यदि स्थिति बहोत विकट न हो , तब अपशब्दों को भी वार्तालाप में अनुमति दे ही दी जाती है ।
     अपशब्द का प्रयोग , चूंकि यह मानव मनोविज्ञान से सम्बंधित है , वार्तालाप की विषय वस्तु से हमे भटका देने का कार्य सिद्ध करता है । हमे किसी विषय से विपरीत वस्तु का स्मरण करवा कर उस वस्तु को विचार का विषय बना देता है । सामाजिक सन्दर्भ में अपशब्द का अत्यधिक प्रयोग अथवा निरंतर प्रयोग अशिष्ट , असामाजिक माना जाता है । यह निम्न कुलीन वर्ग के मनुष्यों में अधिक प्रयोग होता है , जहाँ अधिक विकसित विचारों का अभाव स्वाभाविक होता है । क्रोध आ जाना , या अपने विश्वासों के अनुरूप कार्य को संचालित नहीं कर पाना - अपशब्दों को प्रेरित करने के कारण ज्यादा संभावित होते है ।
   अंग्रेजी व्याकरण में अपशब्दों को कुछ क्ष्रेणी में में रखा गया है । यह आवश्यक नहीं है की सभी अपशब्द यौन क्रिया अथवा यौन से सम्बंधित हो । कुछ शब्द मात्र किसी विशेष तथ्य को व्यक्ति के सन्दर्भ आवाहन (आह्वान) से भी निर्मित हो सकते है । जैसे की अफ़्रीकी काले चर्म-गुण के व्यक्ति को "कल्लू" कहना , या किसी कम कद के व्यक्ति को 'नाटा' कहना , या किसी को उसके धर्म/ जाती के नाम के आह्वान करना । इस प्रकार के आह्वान से व्यक्ति को उसके अन्दर की किसी कमी की स्मृति होती है और वह दुखी होता है । इसलिए सामाजिक रूप में यह शब्द अशिष्ट माने जाते है । इन्हें Derogatory शब्द कहा जाता है ।
Derogatory को राजनैतिक संवाद से अलग कर के देखना आवश्यक है । समाचार पत्रों के व्यंग चित्रों में किसी बड़ी नाक वाले राजनेता को प्रदर्शित करने के लिए तथ्य के रूप में उसकी बड़ी नाक का प्रयोग होता है । तब यहाँ "बड़ी नाक " को Derogatory नहीं मानते हैं । वैसे फिर व्यंग चित्र का केंद्र राजनेता की बड़ी नाक नहीं होती , अपितु कोई राजनेतिक घटनाक्रम होता है । और जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक राजनैतिक स्वतंत्रता ही है , राजनैतिक कार्यों में तो इसको संरक्षित करना और अधिक अनिवार्य हो जाता है ।
साधारणतः derogatory को वर्जित नहीं करा जाता है , जब तक की वह racial (किसी समुचित प्रजाति पर भद्दा इशारा ) और discriminatory (भेद -भाव पूर्ण ) न हो ।

    यौन और यौन क्रिया से सम्बंधित अपशब्दों को Sexual Abuse कहते हैं । पुरुषों में यह ज्यादा अशिष्ट नहीं माने जाते। मगर किसी महिला की उपस्थिति में इनका प्रयोग बहोत अशिष्ट माना जाता है । आधुनिक समय में अपशब्द महिलाएं भी अधिक प्रयोग करने लग गयी है । ऐसे में अपशब्द का अर्ध स्वरुप , जैसे "Sh... ", या कोई प्रासंगिक परिवर्तित स्वरुप (जैसे "जंगल का इकलौता पेड़ " ) प्रचलन में आता है।
   धार्मिक गुरुओं , इश्वर , इत्यादि के सन्दर्भ में अपशब्दों का प्रयोग (profanity ) पूर्णतः वर्जित होता है ।
    यहाँ अपशब्द के विचार में थोडा विस्तृत हो कर समझाना आवश्यक है। अपशब्द का प्रयोग , और ईशनिंदा (Blasphemy ) दो अलग-अलग शब्द विचार हैं । अपशब्द जहाँ वर्जित है , ईशनिंदा का प्रसंग ऐतिहासिक दृष्टि से ऐसा देखा जाता है-- जब विवेकपूर्ण , तर्क संगत विचार जो समाज में स्वीकृत कर्मकांड धर्म के अनुरूप नहीं पाए गए तब उन्हें "ईशनिंदा " के आरोप दे कर अभिवेचित (सेंसर ) कर दिया गया था । और ऐसे विचार वाले व्यक्तियों को सजा भी दी गयी । आज उन्ही लोगों की जीवन की बलि पर मनुष्यों और वैज्ञानिकों ने इतनी वैज्ञानिक और तकनीकी विकास हासिल किया है । इसलिए , मात्र अपशब्दों का प्रयोग वर्जित है । जो विचार ईशनिंदा जैसे लगते हैं , नए प्रजातान्त्रिक युग में उन पर पाबंदी नहीं लगी है । आज मनुष्यों को सभी प्रकार के विचार रखने की 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' उपलब्ध है । यानी, अगर किसी के विचार किसी के धार्मिक भावनाओं के अनुसार न हो , तब उस विचारों पर 'ईशनिंदा' का आरोप लगाना स्वीकृत नहीं किया गया है ।
    जैसे - "सूर्य धरती की परिक्रमा करता है" । इस धार्मिक विचार के विरूद्ध कॉपरनिकस के विचार की "धरती सूर्य की परिक्रमा करती है ", उस युग में एक "ईशनिंदा" माने गए थे ।
   जो विचार सामाजिक समझ के अनुरूप नहीं होते उन्हें heresy (विधर्म) कहा जाता है । ईशनिंदा की ही भांति , विधर्म विचारों को भी सेंसर करना स्वीकृत नहीं होता । वह मात्र एक मत-विरोधी विचार है , विरुद्ध-विचार है । विज्ञान के इतिहास में ऐसा अक्सर हुआ है की नए क्रांतिकारी विचार आरम्भ में Heresy के रूप में देखें गए है ।
     फ्रासिसी युवती 'जोन ऑफ़ अर्क ' के द्वारा अंग्रेजी सेना का परास्त होना अपने युग में एक विधर्म माना गया था , क्योंकि तब यह माना जाता था की इश्वर खुद अंग्रेजों के साथ ही युद्ध करते है । यानि अंग्रेजी सेना को परास्त करना स्वयं इश्वर को परास्त करने जैसा था , और यह कृत्य सिर्फ शैतान ही करना चाहेगा । इसलिए "जोन ऑफ अर्क " को शैतान का प्रतिनिधि मान कर फ्रांसिसियों ने ही (क्योंकि फ़्रांसीसी भी धर्म से उसी इश्वर के उपासक थे ) आग में जिन्दा जला दिया गया था (धार्मिक और कूटनीति -राजनैतिक अन्य कारणों से भी )।

Popular posts from this blog

BODMAS Rule सैद्धांतिक दृष्टि से क्या है?

The STCW 2010 Manila (Scam) Convention

Difference between Discretion and Decision making