आज 'भारतीय व्यवस्था और समाज' के जीवन का एक पूर्ण चक्र हो गया है

            अभी कुछ सालों पहले तक हमारे समाज में यह समझा जाता था कि बहस करना एक किस्म का मनोरोग होता है । एक डॉक्टर ने तो एक पूरा लेख ही लिख डाला था की बहसि व्यक्ति में किस मनोरोग के आशंकाएं हो सकती हैं । संस्थाओं में , ट्रेन में , सफ़र में यात्रियों में , ..अभी तक कई जगहों पर बहस को मनोरोग समझा जाता है । इस धारणा का परिणाम यह था की लोगों ने प्रशन करने के मस्तिष्क पर स्वयं ही विराम लगा लिया था कि कहीं उन पर "बेहसी" होने का इल्ज़ाम न लगे , और , फिर जैसा की डॉक्टर ने कहा , मनोरोगी होने का संदेह !
       असल में भारतीय तंत्र की निंदा तो बहोत लोगों ने करी- सरकारी सेवा से सेवानिवृत्र अधिकारीयों में यह 'मनोरोग' खूब दिखता है जो न जाने किस तंत्र, किस व्यथा की निंदा कर रहे होते हैं , और न जाने किस वस्तु, किस नियम , किस व्यक्ति की अपनी निंदा का केंद्र बना कर 'बहस' कर रहे होते हैं । और आस-पास बैठे युवा छात्र , 'प्रोफेशनल' , इत्यादि जो की देश की राजनीतिक , प्रशाशनिक और न्याय-कानून व्यवस्था से अनभिज्ञ होते है , धीरे से ऐसे बुजुर्गो को "पागल " समझ कर छुप लेते हैं , अन्यथा फिल्मी या क्रिकेटई ज्ञान चर्चा करने लगते हैं ।
     बस यही वह पल था जिसने २१वी शताब्दी के भारत की अब तक की पहचान बनायीं थी । "
" कुछ गलत है , मगर कौन ज़िम्मेदार है किसको पता ? इस लिए चल - फ़िल्म देख , सुन्दर सेक्सी हेरोइनो को देख , क्रिकेट देख और मज्जे कर । ज्यादा दिमाग लगाएगा तो ऐसा ही पागल बन जायेगा । "
               आज जब केंद्रीय मंत्री कमलनाथ , कोयला घोटाले में सीबीआई की इतनी कथनी के बाद , सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान/दर्शन के बावजूद अगर विपक्ष को बहस का न्योता देते हैं , तब मुझे "बहस" के इस मनोरोगी लक्षण का व्यक्तव्य फिर से याद आ रहा है। और इस बार जब की कोयले का अपराधी; और हमारे सरकारी , राजनैतिक , न्याय और प्रशाशनिक तंत्र की कमियों का ब्यूरा जग-जाहिर हो चुका है , तब बहस के आमंत्रण पर वही पुराना रवैया ही सही समाधान लग रहा है ।
       -- "चल यार , फ़िल्म देख , सुन्दर सेक्सी हेरोइनो को देख , क्रिकेट देख और मज्जे कर । ज्यादा दिमाग लगाएगा तो ऐसा ही पागल बन जायेगा । "

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