Tuesday, November 20, 2012

परिवार-वाद में गलत क्या है ? - Part 2

      परिवार-वाद में गलत क्या है ? इस प्रश्न की एक पुनः समीक्षा पर यह बोध भी प्राप्त होता है की परिवार-वाद योग्यता को अपने आधीन करने में लिप्त रहता है / परिवार में से आये "राज कुमार " अपनी योग्यताओं की सीमाओं की अपने अंतर-मन में भली भाति जानते है / इसलिए वह अपने आस-पास मौजूद योग्य व्यक्तियों का दमन करने की बजाये उन्हें अपना सहयोगी (या "गुलाम") बनाने की रणनीति रखते हैं / येह सहयोगी उन्हें सीमाओं के बहार उठा कर रखने में उपयोगी होते है /
      वैसे आपसी-सहयोग किसी भी अच्छे नेतृत्व का आधार स्तंभ भी होता है / इसलिए यह भ्रम हो सकता है की 'परिवार-वादी सहयोग' और 'आदर्श-नेतृत्व सहयोग' में क्या भेद होगा , या क्या अंतर होगा ? यह कैसे कह सकते हैं की 'परिवार-वादी सहयोग' किसी की पराधीनता के समान है ?
     इस भ्रम का निवारण यह है की 'परिवार-वादी सहयोगी' एक आदर्श योग्यता से प्राप्त उन नीतियों और न्यायों को पालन नहीं करते जो उनके परिवार को अगला शासक, (= नेतृत्व ) बनाने में बांधा दे सकते है / तो परिवार-वाद के संरक्षण में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण होता है जो वफ़ादारी , स्वामीभक्ति में लाभ प्रदान करवाती है / मगर प्राकृतिक नियमो के अनुसार , चूँकि स्वार्थ से निर्मित लाभ निष्पक्ष नहीं होता हैं इसलिए इस तरह के लाभ में किसी अन्य की हानि अवश्य होती है / अब आदर्श प्रजातंत्र में सरकार-व्यवस्था का उद्देश्य किसी को भी हानि में जीवन के न्यूनतम स्तर के नीचे ना गिरने देने का भी है / परिवार-वाद में विरोधी पक्ष की उपस्थिति में यह हानि विरोधियों की कही जाती है / यह न्यूनतम रेखा के नीचे तक की हानि हो सकती है /
                 परिवार-वाद अपने पूर्ण प्रसार ,व्यापकता में राजा-महराजा की राज नरेश-व्यवस्था के समतुल्य है / अंततः परिवार-वादी अपने सहयोगियों का भी दमन करने लगते हैं अगर यह सहयोगी उनके लाभ और आनंद के बीच में बांधा बनते हैं / दमन के समय "न्याय" (असल में वह अन्याय  हो रहा होता है , मगर उसे न्याय कह कर पुकारा जाता है के वही तर्क प्रयोग होते है जो आरम्भ में विरोधियों के दमन में प्रयोग हुए थे / तब यह प्रमाण मिलता है की क्यों परिवार-वाद में न्याय के तर्क असल में कुतर्क और अन्याय थे / योग्यता का परिवार-वाद का "पराधीन सेवक" होने का निर्णायक प्रमाण भी तभी प्राप्त होता है /
          आधुनिक राजनीति में बात चाहे कानून-व्यवस्था की हो , चाहे विकास की , परिवार-वादी व्यवस्थाएं उन निति का स्थापन नहीं करेंगी जो अंततः उनके परिवार-वाद को चोट दे सकता है / यह सही नीतियों इन परिवार-वादी के आय के स्रोत को भी बंधित कर सकता है / विचार-संग्राहक संस्थाएं ऐसी निष्पक्ष और जन-कल्याणकारी नीतियों का निर्माण करती रही है / भारत के बहार अंतर-राष्ट्रिय मंच पर ऐसी "योग्य" नीतियों अस्तित्व में हैं / यह जानकारी का अधिकार , या पारदर्शिता यही से आई है / अब आगे की "योग्य' नीतियाँ का दमन परिवार-वाद पराधीनो की स्वामीभक्ति की देन है /

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