भाषा परिवर्तन की मिथ्या में खोता हुआ विवेक

भाषा के महत्व को क्या कभी भी कम आँका जा सकता है / भाषा का मनुष्य के विकास में जो महत्त्व है उसकी जितना भी चर्चा करें वह कम होगी / मगर दुखड़ा तब होता है की हम सारा का सारा श्रेय भाषा को देने की भूल कर बैठते है / भाषा के अलावा मनुष्य के विवेक की चर्चा होना भी उतनी ही जरूरी है / तर्क में अक्सर भारतीय यहाँ पर भ्रमित हो जातें है / ठीक है एक वस्तु, भाषा , बहोत महत्वपूर्ण है , मगर ऐसा नहीं की भाषा अकेला ही सारा कार्यभार संभाली हुयी है  / तर्क संवाद , और स्कूली वाद-विवाद प्रतियोग्तायों में अक्सर यह तर्क -भ्रम देखने को मिलता है / ख़ास तौर पर जब अंग्रेज़ी में यह तर्क-संवाद प्रतियोगिता आयोजित करी जाती है / इंग्लिश भाषा की अध्यापक( अथवा अध्यापिका ) प्रतियोगियों को सिर्फ उनकी अंग्रेज़ी बोलने की काबलियत पर ही अंक दे कर पक्ष और विपक्ष के बीच में न्याय कर देते हैं / वाद-विवाद प्रतियोगितायों में न्याय करने के मुख बिन्दुओं में प्रत्योगियों की तर्क को समझाने की बुद्धि, उसको सुलझाने की और उनमे छिपे चुनातियों को चिन्हित करने, उनके निवारण करने की काबलियत को देखना चाहिए / 

इंग्लिश में संवाद करने की इच्छा ने भी एक महत्व्कान्षा का रूप ले लिया है और हमारे विवेक पर एक पर्दा-सा गिरा दिया है / अब तर्क , कुतर्क, की समझ तो कुछ प्रभावकारी और सौन्दर्य-पूर्ण शब्दों ने ले ली है / इंग्लिश बोलने के चक्कर में थोड़ा सा बेवक़ूफ़ हो गए है हम लोग / 
    भाषा के महत्त्व पर वाद-विवाद में अपने आप एक थाम लग जानी चाहिए थी, जब बिंदु एक प्रभावकारी लुभावनी भाषा से कहीं अधिक व्यक्तव्य को सही-सही संतुलित रूप में समझा सकने का हो / और भाषा की त्रुत्यों पे कुछ ढील भी देने की भी ज़रुरत हो सकती है अगर वाद-विवाद में इंग्लिश नागरिक स्वयं न हो , क्योंकि बाकी अन्य तो अपनी मात्र भाषा से जुदा भाषा में यह संवाद कर के अपने विचारों को व्यक्त करने की कोशिश कर रहे होते है / 

Popular posts from this blog

BODMAS Rule सैद्धांतिक दृष्टि से क्या है?

The STCW 2010 Manila (Scam) Convention

Difference between Discretion and Decision making