Monday, November 12, 2012

परिवार-वाद में गलत क्या है ?

परिवार-वाद (Dynasty) में गलत क्या है ? क्या किसी राजा, या फिर किसी  राजनेता के पुत्र को महज इसलिए  मौक नहीं दिया जाना चाहिये क्योंकि वह किसी राजा या राजनेता की संतान है ? 
   साधारण मानवाधिकारो के तर्कों से यदि समीक्षा करें तब उत्तर मिलगा की परिवारवाद का समर्थन न करना मानवाधिकरो के उलंघन जैसा है / मगर इतिहास के अध्यायों से विषय पर सोंचें तब यह आशंका आएगी की व्यवहारिकता में परिवारवाद कितना बड़ा राजनैतिक और  संकट है / 
    परिवार को समाज की इकाई माना गया है / प्रत्येक परिवार को जान -माल की सुरक्षा और पारिवारिक एकान्तता प्रदान करवाना हर एक प्रजा-तांत्रिक व्यवस्था और हर 'संयुक्त-राष्ट्र' (the UN ) के सदस्य राज्य का कर्त्तव्य है  ऐसे / ऐसे में यह तर्क  भी पूर्तः स्वीकार्य है की हर व्यक्ति अपने जीवन का श्रम अपने परिवार के लिए ही तो करता है , और वह यही चाहेगा की उसके उपरान्त उसका स्थान उसके संतान लें /
    मुद्दा है की क्या यह सदगुणी सत्य एक भ्रम तो  नहीं बन जाता है जब बात आती है की पिता का व्यवसाय समाज-सेवा थी , या कहें तो राजनीति थी / यह प्रश्न को समझ लेना जरूरी है की आप राजनीति को एक समाज-सेवा (services ) मानते है या कोई व्यवसाय (business ), या फिर की लाभार्त-कर्त्तव्य ( profession ) / क्योंकि यदि राजनीति एक सेवा है , जो की राजनीति को माना भी जाता है , तब सेवा-कर्म में याग्यता का तिरस्कार इतिहास की दृष्टी से एक जातवाद प्रथा के आरम्भ के सम-तुल्य है / समाज अपने हर एक क्रांति या युग परिवर्तन के उपरान्त यही व्रत लेता है कि अब से आने वाले युगों  किसी भी संस्थान में  नेतृत्व  को उसकी योग्यता के आधार पर ही चुना जायेगा / मगर धीरे-धीरे सभी संस्थान यह व्रत भुला देती है, साथ ही यह सत्य भी की हम सब ही नशवर हैं / वह सब परिवार के मोह में पड़ कर परिवार-वादी बन जाना चाहती है /  
    प्रकृति ने कई सारे सिद्धांत द्वि-स्तरीय तर्कों में रचे है / साधारण तौर पर एक-स्तर के तर्कों पर कार्य करने वाला मानव मस्तिष्क  अकसर कर के द्वि-स्तरीय तर्कों को भी मिथ्या -आडम्बर मान लेने की त्रुटी कर देता है / और भ्रम की राजनीति करने वाले आपकी इस त्रुटी के आत्म -ज्ञान को ही आपका भ्रम होने का विश्वास दिलवा कर राजनीती सेंक निकलते हैं / 
    परिवार-वाद पर तमाम तर्कों का विश्लेषण अपने आप में एक ज्ञान है की मिथ्या-आडम्बर इंसान को कैसे विश्वास में ले कर गलत कर देते हैं  / भ्रम और सत्य के इस युद्ध बिंदु को विधि (laws ) और न्याय (justice ) के द्वारा 'दूध का दूध ,पानी का पानी ' कर सकना करीब करीब असंभव हैं / न्याय कभी भी योग्यता को नहीं ठुकराना चाहेगा / ना ही वह किसी को उसके जन्म के कारण अवसरों से विमुक्त करेगा / 
   इंसानों को खुद्द ही इस उलझन का समाधान निकलना होगा / चाहे फिर ऐसा कर के कि हर एक को उसकी योग्यता के आधार पर ही अवसर दिया जाए , और परिवार-वाद से आये संतानों को योग्यता के प्रमाण के परिक्षण से गुजरना हो /

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