Saturday, November 10, 2012

उदारवादी तानाशाही में उदारवादिता का प्रजातान्त्रिक मूल के मानवाधिकारों से भ्रम

उदारवादी तानाशाही और प्रजातंत्र में भ्रम करने के स्रोत कुछ और भी हैं / जब लोग यह पूछते है की अगर वाकई एक भ्रष्टाचार -विमुख "जन संचालन प्रतिष्ठान" अगर अस्तित्व में आ जायेगा तो उनका जीना दुषवार हो जायेगा क्योंकि छोटी मोटी गलतियाँ तो सभी कोई आये दिन करता है , और ऐसे प्रतिष्ठान उनके इन छोटी-छोटी गलतियों पर भी सजा दे देगा , तब लोगो के मन में आसीन आज की "सरकारों" की उदारवादिता के प्रति सम्मान समझ में आता है / लगता है की लोगो को मानवाधिकारों की न तो समझ है न ही एक सच्चे प्रजातंत्र में उनके औचित्य की जानकारी / वह सरकारों की उदारवादिता के आधीन जीवन जी रहे होते है /
      उदारवादी तानाशाही एक "सरकार" की भांती कार्य करती है , जो की लोगो को उनके अपराधो की सजा देने की ताकत रखती है , मगर उदारवादी बन कर ऐसा नहीं करती / लोग अपनी उदारवादी सरकार का साभार मानते हैं / परन्तु प्रजातंत्र में "जन संचान प्रतिष्ठान " होते है , जो की अपराधो को चिन्हित करते हैं, और उनके सजा तय करते हैं, मगर कोई व्यक्ति सजा की पात्रता पर है की नहीं यह न्यायलय तय करतें है / कुछ प्रजातांत्रिक देशों में तो "पब्लिक जूरी " तक होती है जो की आम आदमियों में से निर्मित होती है और वह तय करती है की कोई सजा की पात्रता पर है की नहीं /
       अरे भई अगर कभी कोई भ्रष्टाचार -विमुख "जन संचालन प्रतिष्ठान" अस्तित्व में आ भी गया तो क्या मानवाधिकार ख़तम हो जायेंगे ? या फिर की भ्रष्टाचार -विमुख प्रतिष्ठान आम आदमियों के ऊपर कारवाही करेगा, न की अन्य प्रतिष्ठान के ऊपर जैसे की पुलिस प्रतिष्ठान , न्यायलय प्रतिष्ठान इत्यादि ? यह तो सर्व समझ की बात है की भ्रष्टाचार -विमुख प्रतिष्ठान सिर्फ अन्य प्रतिष्ठान में भ्रष्टाचार की रोक थाम करेगा, बाकी सब के सब प्रतिष्ठान अपने कर्तव्य पहले जैसे ही करेंगे /

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