Saturday, October 27, 2012

सम्मान क्या है , और किसी राजनेता का सम्मान क्यों होना चाहिए

            बहोत दिनों से विचार कर रहा था की किसी राजनेता का सम्मान क्यों होना चाहिए ?
   पहले तो, की यह भी एक बहुत जटिल सूझ का विचार है कि सम्मान है क्या और किसी का सम्मान करने में क्या घुमावदार उलझी बातें है ।
   सम्मान को ज्यादातर कुछ शब्दों और कुछ ख़ास संस्कारो के द्वारा दर्शाते है, जैसे बात-चीत में 'आप' का प्रयोग और चरण स्पर्श इत्यादि से । एक उलझी हुई बात यह है की ऐसा नहीं की सभी भाषाओँ में "आप" या उसके सम-तुल्य शब्द है किसी के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए । उधारण में अंग्रेज़ी को लीजिये , जिसमे सिर्फ "यू" शब्द ही है, हर एक के लिए, चाहे बड़ा, चाहे छोटा। और सम्मान के लिए खोई ख़ास अलग शब्द नहीं है, या यूँ कहे की सभी के लिए एक समान का सम्मान है।  कुछ ऐसे ही हाल इधर भारत में भी कुछ भाष्यों में मिलता है, जैसे मुंबई की मुंबईया-हिंदी में,या हरयाणवी-हिंदी में । इसके विपरीत हिंदी (और उर्दू) में अगर "आप" सम्मान के लिए है, तो फिर "तू" या 'तुम" किस मनोभाव के लिए यह आप खुद ही सोचने के लिए आज़ाद हैं ।
            यानी अगर किसी वार्तालाप में सम्मान का व्यक्तव्य नहीं है तो फिर बातचीत मुश्किल हो जाती है । क्यों कि सम्मान तो किसी को खुद स्वेच्छा से देना चाहिए। मगर अगर किसी संस्कृति में सम्मान को पहचाना ही नहीं जाता और देने की बात ही नहीं है तब "सम्मान"-संवेदशील संस्कृति के व्यक्ति के मन को चोट पहुँच सकती है। अब अगर यह व्यक्ति सम्मान को वसूल्वाने लगे तो बात बहोत भ्रमकारी होने लगती है-- कि यह व्यक्ति संस्कृति-वाद से प्रभावित है; या फिर कि अहम्-वादी है जो कि सिर्फ अपने लिए कुछ-ख़ास कि मांग करता है ;  या फिर कि और भी अधिक गंभीर हालत में आत्म-पूजन मनोविकृत है , जो लोगों से अपनी पूजा-अर्चना कि चाहत रखता है ?
       ठीक उलटे, "सम्मान" न देने वाले पर भी बात आती है कि क्या वह ऐसी सभ्यता है जहाँ सम्मान का व्यक्तव्य नहीं? 
मगर यह स्मरण रहे कि फिर ऐसी सभ्यताओं में सभी को एक दृष्टि से "सम्मान" दिया जाता है , और कुछ अन्य कर्मो द्वारा उससे दर्शाया जाता है। जैसे कि अंग्रेजी सभ्यता में आफिस में बड़े-छोटे का अंतर नहीं होता और आफिस के 'बॉस' को भी उसके नाम से ही पुकारा जाता है। वहां कि न्याय व्यवस्था में भी इस बात के अंश है कि कनिष्ट को जयेष्ट से डरे बिना अपना पक्ष रखे में कोई सामाजिक रोक टोक नहीं , और अक्सर जयेष्ट को उनके गलत मांगो और निर्णयों के लिए सज़ा भी हो जाती है , वह भी कनिष्ट कि शिकायत पर।
      इधर, कुछ अन्य सभायतों में "सम्मान" के न तो शब्द है , न ही कर्म और न्यायिक समझ। यानी यह "कम" विकसित सभ्यताओं से ताल -मेल रख कर काम करवाना मुश्किल होता है।
   ( सामाजिक-न्याय कि समझ किसी भी समाज के निर्माण और विकास कि सूचक है। जहाँ न्याय नहीं, या कमज़ोर है वह सभ्यता कम विकसित समझी जा सकती है / ) 
        तो अब "सम्मान" कि लड़ाई में आप 'सांड' के सामने खड़े होते है /
      अगर सम्मान न देने वाला ऐसी सभ्यता से नहीं है जहाँ सम्मान का व्यक्तव्य है , मगर वह फिर भी नहीं दे रहा है, तब बात यह आती है कि सम्मान कि मांग करने वाले को शायद यह सम्मान के लायक ही नहीं समझते। ऐसे में नापा-तुला सही रास्ता है होगा कि-- या तो उसकी शिकायतों को सुन कर उसे दूर करें, या फिर चुप-चाप काम पूरा कर के वहां से चलते बनें।

    भारत की अधिकतर भाषाओं में सम्मान का व्यक्तव्य अलग शब्द के माध्यम से होता है।। इसलिए भारतीयों के लिए आवश्यक होगा कि वह सम्मान दें, अथवा न देने का निर्णय विषय व्यक्ति को सोच कार दें। यह विचार राजनेताओं के सम्मान के विषय में भी लागू होगा। अन्यथा सम्मान न देने पर इस व्यवहार का एक प्रतिकूल निष्कर्ष हमारे विरुद्ध होगा कि हम लोगो अपने राजनेताओं का सम्मान नहीं करते है।
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       अब बात आती है कि राजनेता का सम्मान किस लिए होना चाहिए ? 

        जब अरविन्द केजरीवाल अपने म़तदान उम्मीदवार से यह अपेक्षा रखतें है कि वह उम्मीदवार चुनाव जीतने के उपरान्त लाल-बत्ती वाहन का प्रयोग नहीं करें , या बड़े बंगले कि मांग नहीं करेंगे , तब मेरे मन में प्रश्न आता है कि भाई किसी मंत्री को क्या वाकई लाल-बत्ती नहीं मिलनी चाहिए ?
      जैसे-जैसे हम टी-वी पर हो रही बहसों को सुन रहें हैं, हम किसी एक प्रजातान्त्रिक व्यवस्था कि सच्चाइयों से सम्मुख हो रहे है , कुछ समाजशास्त्र , राजनीतिशास्त्र, प्रशासनीय और न्यायायिक 'सत्य' उभर कर सामने आने लगे है । यह 'सत्य' वही विचार है जो पहले भी सभ्यता में थे, मगर अपने सही तर्क के प्रत्यक्ष हुए बिना थे-- किसी सांस्कृतिक कर्मकांड के भाँती  कि राजनेता का सम्मान एक सांस्कृतिक कर्मकांड है।
    आज हम इस 'सत्य' ,कि " सभी राजनेता वाकई में सम्मान के काबील ओहदा है", को उचित तर्कों में तब ही समझ  पायेंगे जब स्वयं से अनुभव करेंगे किसी राजनेता के द्वारा सामाजिक, प्रशासनीय और न्यायायिक कारणों को समझते हुए उसको अपनी एकान्तता(Right  Privacy) का स्वेच्छा से परित्याग करते देखें । 
     कल्पना करिए, यदि कोई राजनेता यूँही अचानक एक दिन अपनी जमा पूँजी, आर्थिक स्थिति को छिपाने के लिए व्यक्तिगत एकान्तता के मौलिक अधिकार कि मांग न रखे , या कि उसके जीवन में चल रहे प्रेम-प्रसंग हमे अचानक सकते में ना डाल दें- कि, कहीं कुछ और भी तो नहीं जो हमसे छिपा हुआ है,जैसे निति-निर्माण अधिकार और व्यावासिक समीकरण से उपजा भ्रस्टाचारी काला-धन ,इत्यादि। 
   यह वह परित्याग होगा जो जन विश्वसनीयता के लिए परम आवश्यक है। मगर साथ ही ऐसे परित्यागी के विषय कोई साधारण त्यागी नहीं होगा। सभी नागरिक व्यक्तिगात्ता और एकान्तता की चाहत रखते है और इसलिए इस प्रकार का परित्याग नहीं करना चाहेंगे। इसलिए यदि कोई व्यक्ति अगर जन हित में ऐसा करता है तब वह सही मायने में सम्मान के काबिल होगा।

   राजनेताओं को जनता से सम्मान पाने के लिए क्या क्या करना होगा? 
      राजनेता को आत्म-उदघोषण(self disclosures) के अलावा सामाजिक न्याय (social justice) कि सही उचित समझ का भी प्रदर्शन करना होगा। वह संस्कृति कि आड़ में गलत मन-गड़ंत निर्णय नहीं कर सकते, मनो संकृति कोई कु-तर्क या तर्क-विहीन वस्तु होती है । प्रत्यक्ष को प्रमाण कि आवश्यकता नहीं होती। इसलिए जीवन के कार्यों और विचारों को प्रत्यक्ष रख कर अन्धकार-मयी राजनीति से बचाने वाले सच्चे राजनेता को सम्मान तो देना ही चाहिए। और ऐसे व्यक्ति कि खुद कि तनख्वा भी अधिक से अधिक होनी चाहिए। जो समाज में सभी लोगों कि एकान्तता(privacy) के लिए खुद कि एकान्तता का त्याग करे उसका खुद का जीवन कष्ट पूर्ण न हो उसका ख्याल समाज को रखना ही पड़ेगा। अगर अब भी हम सम्मान न दे तो फिर तो शायद हम "कम" विक्सित सभ्यता बन जायेंगे।

            आधुनिक राजनेताओं कि चपलता तो देखिये। व्यतिगत "जेड प्लस " सुरक्षा के नाम पर यह राजनेता और अधिक से अधिक अन्धकार में छिपाने लगे है , और अब सम्मान को भी मौलिक या मानव-अधिकार कह कर मांगने (या यु कहें वसूल-वाने ) लगे हैं। यह गुंडागर्दी का व्यवहार है , सभ्यता को अन्धकार में धकेलना के कदम।
        राजनेता को व्यवसाय या फिर पेशे दोनों का ही त्याग करना पड़ता है। वह 'लाभ के पद' पर नहीं रह सकता। मगर आधुनिक राज नेता कोई "ट्रस्ट " बना कर उस पर विराजमान हो जाते हैं। विधान में सभी पदों के तीन वर्गों में रख कर चिन्हित किया जाता है -- लाभ का पद, सम्मान का पद (ऑफिस ऑफ़ हॉनर) और विश्वास का पद। "ट्रस्ट" के अध्यक्ष में वह "लाभ" का पद न ले कर 'सम्मान' और 'विश्वास' का पद ले लेतें हैं। अब वह राजनेता और "ट्रस्ट" के अध्यक्ष दोनों बन जातें हैं। आज कल के राज नेता पहले वकील बन कर कोर्ट में मुकद्दम लड़तें है और फिर राजनेता बन कर अपने मुकम्विल को नीति-निर्माण और विधान-अधिकार से फायदा न पहुचाने का दावा भी देते हैं। राजनेता को व्यवसाय या फिर पेशे दोनों का ही त्याग करना पड़ता है। वह 'लाभ के पद' पर नहीं रह सकता / मगर आधुनिक राज नेता कोई "ट्रस्ट " बना कर उस पर विराजमान हो जाते हैं / विधान में सभी पदों के तीन वर्गों में रख कर चिन्हित किया जाता है -- लाभ का पद, सम्मान का पद (ऑफिस ऑफ़ हॉनर) और विश्वास का पद । आज कल  के राजनेता पूर्व में  पेशे स वकील होते है और अपने मुवक्किल को बचते है। फिर  बाद में नेता बन कर दावा भी देते हैं की निति  निर्माण में कोई पक्षपात  नहीं हुआ है;  --  कहीं कोई "विरोधाभासी अभिरुचि का संकट" नहीं है। एक इंसान एक रूप में उसका वकील बन कर उससे बचाता है , और दुसरे रूप में नीति-निर्माण कर्ता बन कर उसके हितों के विरुद्ध भी सही नीति बनाएगा -- यह दावा करता है। 

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विचारों के पहेली में उलझते हुए यह बात मन में आई की कहीं ऐसा तो नहीं की भारत में जब समान(= परस्पर) दृष्टि से सभी का सम्मान की सभ्यता नहीं है तो क्या यहाँ की न्याय प्रक्रिया भी समान नहीं हो सकती?  यानी बड़े लोगों की अलग न्याय और छोटे लोगों के लिए अलग न्याय । जब हिंदी में 'आप" और 'तुम" अलग-अलग नाप-तौल के सम्मान को दर्शाते हैं तब हमारी समान न्याय व्यवस्था तो वही मात खा चुकी होती है की "आप' वाले के लिए अलग सम्मानिन्य न्याय  और 'तुम' वाले के लिए उसके ओहदे के लायक न्याय /