हिंदी दिवस और हिंदी जगत का गिरता बौधिक स्तर

आज हिंदी दिवस है / समझ में नहीं आता की यह दिन हमें हिंदी बोलने के प्रोत्साहन के लिए स्मृति दिवस के रूप में देखना चाहिए, या फिर की हिंदी के गिरते हुए स्तर और हिंदी भाष्य की गिरती हुए बौद्धिकता / आजादी के पैंसठ साल बाद भी हम आज अंग्रेजी से ज्यादा लगाव रखते है / बल्कि शायद यह प्रेम  बढ़ा भी और निखरा भी / आज स्थिति यह है की अंग्रेजी भाषीपर ज्यादा विश्वास व्यक्त करते है / 
  ऐसा नहीं है की हिंदी बोलने वाले की संख्या कम हुए है / अगर आज भी केबल टेलीविज़न के चेनल पलट कर देखेंगे तो पाएंगे की हिंदी भाषी चेनल ही सबसे अधिक संख्या में है / हिंदी समाचार चेनल , हिंदी फिल्म चेनल, हिंदी संगीत , हिंदी नाट्य , इत्यादि /  तब मन में सवाल उठता है की हिंदी दिवस का महत्व किस बात पर होना चाहिए ? शायद भय यह है की इन सभी में अब थोड़ी की कहीं अधिक एक अन्य भाषा भी सुनाई देती है --अंग्रेजी / हिंदी का मुख्य शत्रु अंग्रेजी भाषा को समझा गया था, हालाँकि अब इसे शत्रु न मान कर प्रतिस्पर्धी के रूप में ग्रहण कर लिया गया है / 
बात जब हिंदी और अंग्रेजी की प्रतिस्पर्धा की आती है तो वाचक को अंग्रेजी हमेशा ज्यादा लुभावनी लगती है / तो आज के इस दिन को, हिंदी दिवस को , सही मायेने में हिंदी भाषी की गिरती हुई बौद्धिकता के निवारण में याद करना चाहिए / अगर हम हिंदी न्यूज़ चेनल और अंग्रेजी न्यूज़ चेनल के अंतर्वस्तु का अध्ययन करे तोह भी यह बात सामने आयेगी की असली कसौटी इन दोनों भाषा में अलग और बहुत गहरे बौधिक अंतर की है / 
हिंदी भाषी अक्सर कर के एक सिमित समझ का व्यक्ति होता है, जो विज्ञानं और अंतर्राष्ट्रीय विषयों में अधिक महत्त्व नहीं देता/ हिंदी भाषी व्यक्ति अक्सर किसी भी ज्ञान अथवा समाचार को एक ज्ञान कोष भण्डार के रूप में देखता है, जहाँ इसका महत्त्व वो इसे सही समय पर प्रतुत करने में देता है , इसका विश्लेषण पर नहीं / हिंदी भाषा और हिंदी समाज की सबसे बड़ी कमी शायद यह है की यहाँ समलोचात्मक बुद्धि (critical  Thinking ) पर बल नहीं दिया गया है / अच्छा , इस कमी के भी पीछे का कारण यह है की हिंदी समाज ने कहीं पर अपनी एक लड़ाई बौद्धिकता से भी कर ले है / बौद्धिकता को नए हिंदी समाज में मूल्यों की खोज न मन के बड़ी -बड़ी बातें करने के रूप में समझ लिया गया है / मूल्यों को कुछ ख़ास संस्कारो के रूप में ले लिया गया है / मूल्यों की तलाश में शास्त्रार्थ और वाद-विवाद को अपने महत्त्व से गिरा दिया गया है / "ज्यादा बकर-बकर कर के कुछ नहीं म्मिलने वाला " , या फिर की " बहस का कोई फायदा नहीं, कुछ नहीं मिलने वाला " -- यह नए हिंदी समाज का शब्दकोष और विचार धारणा हो चुके है / 
हिंदी जगत के एक नए समस्या है -- पुनरावृत होते विचार, और उसमे भी गिरता हुआ शब्दकोष / अशिक्षित , अशलील , अशिष्ट शब्द को अब और आसानी से स्वीकार कर लिया गया है / मुद्दा यह नहीं है की यह स्वीकार नहीं होने चाहिए, वरन की यह शब्द अब शिष्ट औपचारिक स्थानों पर भी प्रयोग में आने लगे है / असभ्य प्रयोग और असभ्य प्रयोग -- दोनों के एक जैसा महत्त्व देने पर एक भ्रम की स्थिति पैदा हुयी है, जहाँ अक्सर कर के व्यक्तव्य अपनी दिशा भूल कर कहीं और ही घूमने लग रहे है / हिंदी समाचार चेनल में होने वाली बहस में इस प्रकार का भ्रम अक्सर कर के देखने को मिल रहा है / 
यह शब्द- भ्रम (भ्रन्ति ) भी हिंदी भाषी के गिरते समलोचात्मक-बुद्धि में प्रभाव दे रहा है / 
 हिंदी जगत साधरणतः आर्थिक रूप से कमज़ोर और पिछड़ा हुआ है / यह पिछड़ा शब्द में बौधिक योग्यताओं की कमी भी स्पष्ट अर्थ में है / हिंदी जगत के लोग अक्सर कर के स्वयं को राजनेतिक और तकनिकी विचारों से जोदड़ सकने में असमर्थ होते है / वह पुराने संस्कारों और ग्रामीण मान्यताओं में गढ़ी हुई है / जैसे दहेज़ प्रथा, बाल विवाह, मादा भ्रूण हत्या , जात वाद, इत्यादि / 
  हिंदी जगत की यह कमियां हिंदी भाषा और साहित्य पर अपना शब्द कोष की छाप छोड़े हुए है / प्रमुख तौर पर,जात वाद संगर्ष में मनुवादी और मनु-विरोधी विचारों में ब्राह्मणों की तिरस्कार में जो सबसे ज्यादा हताहात हुए है वोह है -ब्रह्म --ज्ञान / कहने का अर्थ यह नहीं है की ब्रह्म सिर्फ जात-उत्पतित ब्रह्मण में मिलता है, मगर जहाँ भी ब्रह्म का विषय वष्टु अत है, उसे ब्रह्मण से जोड़ा कर फिर उसका विरोध करने के लिए है गुट तैयार हो चूका है / सत्य, न्यायपूर्ण , नैतिक समझ का बुरी तरह से पतन हो चूका है / ब्रह्मिन जात वादी बन गया, जात वाद का विरोध हो गया , और अंततः जो मारा गया वोह है ब्रह्म -- ज्ञान और बौद्धिकता का खोजकर्ता , प्रचारक / हिंदी जगत की यह दुविधा बहोत व्यापक हो गयी है / शास्त्रार्थ और तर्क बुद्धि का विघटन भी शायद येही से आरम्भ हुआ है / 
हिंदी जगत अभी भी प्रजातंत्र के नाम पर ज़मींदारी प्रथा में फंसा हुआ है / इस लिए की प्रजातंत्र और ज़मींदारी में अंतर कर सकने के लिए जो स्पष्ट , तार्किक और बौधिक ज्ञान होना चाहिए वह भी न्यूनतम है / प्राचीन या फिर ग्रामीण कहावतो और मान्यताओं से परिपूर्ण हिंदी जगत संस्कारों की रक्षा के नाम पर कुछ नहीं मूल्यों की तलाश में भटकना पसंद नहीं करता / परिवार को सर्वश्रेष्ट स्थान दे कर परिवार और धर्म के भीच के अंतर को साफ़ साफ़ परिवार की और मोड़ दिया है / आज का हिंदी जगत निष्पक्ष , सत्य और धर्म-संगत (नैतिक) मार्ग को तलाश कर सकने में बहोत कमज़ोर है / 
हिंदी जगत के यह कमियां अब हिंदी भाषा की भी कमी बन चुकी है / इस लिए जब भी अंग्रेजी से प्रतिस्पर्धा की बात आती है , हिंदी भाषा वाचक की तर्क बुद्धि पर इतना प्रभाव नहीं डाल पाती / हिंदी दिवस पर सही मायने में विचार करने के लिए हिंदी की यह दुविधा है / 

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