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Showing posts from September, 2012

Supreme Court verdict on natural resources Auctioning,-- ground work to the next level 'Thieving Decisions'

So, the teachers of the old High School were now involved in a cheating scam. The walls were all scribbled with the answers and students were writing the exam sitting in this same room. Despite many request to have the walls painted, the Principal were (deliberately ?!) not having it done, and this being publicly known that his family relatives children are also writing the exams sitting in the room. When the flying squad caught the Principal for cheating happening, the principal defended himself saying Painting the wall was cost-incurring and therefore could not be made mandatory by the Flying Squad on the School management. The principal and the school management take the matter to the court, where the court has already given first ruling in favour of the Flying Squad that the Principal and School management was involved in facilitating cheating.
In the second lawsuit, that Whether Painting the Wall should be made mandatory or not, the Court rules in favour of the School, saying tha…

उत्तराधिकारी चुनने के नियम -- भारत के सर्व-प्राचीन चुनौती

अभी कुछ दिनों से यह विचार आ रहा है की गहरायी में समझे तो इस समय 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' में भी जो मत-भेद और विभाजन हुआ है, उसका भी वही कारण है जो की कितने ही हजारो सालो से भारतीय सामाजिक तंत्र के लिए एक चुनौती रहा है - उत्तराधिकारी का चुनाव (law of succession)/ जब अभी आप ने 'अंतरी जन लोकपाल व्यवस्था' का एलान किया तब मन में यह बात आई की यह लोकपाल कार्य क्या करेगा और इसका मकसद(objective ) क्या होगा / सोच घूमते हुए अमरीका के democrat और republican की बीच होने वाली चुनावी-दौड़ पर गयी / वहां मुख्य चुनाव से पहले दोनों पार्टी में अंदरूनी "शास्त्रार्थ" (debate  contest )  होता है / यह "शास्त्रार्थ" हज़ारों लोगो के द्वारा देखा जाता है / और उसमे प्रचलित या विजयी हुए उमीदवार को आगे बड़ने का अवसर मिलता है /  उस दौड़ में दिए जाने वाले त्वरित वाक्-पटुता  (quick wits ) भी अक्सर अखबारों की सुर्खियाँ बने रहते है /
सोचता हूँ की क्या किसी प्रजातंत्र में "market competition " ही सही और विधिवत माध्यम है गुणवत्ता लाने का / और उत्तर मिलता है -- "हाँ" …

Thieving Decision-making

Thieving Decision-making

In India, due to general ignorance on law matters, people at decision-making positions sometimes act a little whimsical by allowing themselves to assume that if any decision they are taking is being reasoned by someone else to be 'prima facie' wrong then someone would complain against that decision. This kind of decision-making has double advantage..it gives them liberty to stand and live lifelong ignorant of the law, and later claim/feign ignorance of the law if they are caught in a misdeed which they 'might have' intentionally carried out .

 Is their a name for Such actions of the bureaucrats, Politicians, or Managers at Senior Ranks? Can these acts be prosecuted under the claims of "Mental anguish"? Can the person be held liable to be 'incompetent for the Rank', as he might erect on line of defence for his decision-making as "Nobody told me! I thought if my decisions were wrong then someone will come out with the probl…

विधि (Laws ) और प्रथाओं (Customs ) के बीच का सम्बन्ध

विधि (Laws ) और प्रथाओं (Customs ) के बीच का सम्बन्ध 
(हिंदी भाषा में सीधा अनुवाद  http://rebirthofreason.com/Articles/Perigo/Law_vs_Custom.shtml)

अपने एक उत्कृष्ट निबंध , " अभी पूर्ण न्याय नहीं हुआ है " ( " Not Enough Justice ") में लेखक जो राओलैंड निष्-भाव दार्शानियों को अक्सर दी जाती विधि और कानून सम्बन्धी उस चुनौती पर प्रकाश डालते है जिसमे की कुछ इस तरह की विवाद आते है जिसमे कोई कानून का उलंघन तो नहीं हुआ होता है मगर अन्याय ज़रूर हुआ होता है, जिसमे की उदहारण आता है : किसी पशु पर की जाने वाला अमानवीय व्यवहार; या , किसी माता-पिता द्वारा अपनी संतान को शिक्षित न करने का निर्णय; या एक बॉयफ्रेंड जो की अपनी प्रेमिका को भावनात्क्मक तौर पर पीड़ित करता है ; या , एक पत्नी जो सिर्फ घास-पात का पका भोजन ही परोसती है /
                इन सभी क्रियाओं में किसी विधि का उलंघन नहीं है, मगर एक किस्म का अन्याय होता है / किसी फुरसत के विचारों जब इस उदाहरण पर गौर करे जिसमे एक पत्नी सिर्फ घास-पात वाला भोजन ही परोसती है , तो यह खास ध्याने देने का विचार है की किसी को घास पात का भोज…

Controversies - An explosion from 'the Expression'

Ours is an era of Controversies. A celebrity sneezes and a controversy explodes. Some people loath controversies as it penetrates into their privacy zones in the guise of Transparency; and some people love controversies as it gives them their much desired shine in the dust.

What is it with the nature of Controversies?

  Controversies are uncivilized primitive format of the basic human nature-- to enq uire and then to argue. As with all the arguments, the heat which it creates smelts away the crude to exposes out the pure metal, the truth. Some people loath the heat and some people think they can play with fire. But in the deepest end of it only the truthful can standout, the one made of pure mettle. The issues of controversy are increasing because people are becoming free. They each have begun to hold opinions. Jimmy Wells of Wikipedia says in India there are twelve opinion per ten persons.
                 While we each hold opinions we are still naive in our decision-making, to kn…

"इंडिया अगेंस्ट करप्शन " के लिए सुझाव--> भावी प्रत्याशी की पात्रता

आधुनिक जन शाशन व्यवस्था में एक "राजनीतिज्ञ" का प्रारूप किस तरह का होना चाहिए ? परंपरागत व्यवस्था में "राजनीतिज्ञ" एक शाशक के रूप में देखा जाता है जो की कहने को तोह जनता का सेवक है , सिर्फ नाम मात्र, क्योंकि उसको मिली सुविधाए उसे किसी राजा महाराजा से कम नहीं रखती / यह अचंभित , विरोधाभासी व्यक्तित्व किस तरह से उतपन्न हुआ इसे एतिहासिक स्थान से समझना बहोत आवश्यक है अगर किसी नए तरह की "राजनेतिक" व्यवस्था की नीव डालनी है /  शायद इसकी नीव हमे यहाँ से मिले की नयी "प्रजातंत्र' व्यवस्था पुरानी "सामंत वादी " ज़मीदारी व्यवस्था में से ही निकली है / प्रजातंत्र नें सामंवाद को विस्थापित किया मगर सामंत को मृत्युदंड नहीं दिया था / वह सामंत ही फिर "जन-मानस में एक आम व्यक्ति " का चोंगा पहन कर प्रजातांत्रिक व्यवस्था में "जनता का सेवक" बन कर वापस शाशक  बन गया / कई **जुगाडात्मक कारणों** से इस तथ्य को भली भांति जानते हुए भी सभी ने इस व्यवस्था को लागू होने दिया क्योंकि इसमें भी सभी को 'जुगाड़' के माध्यम से मौका मिल रहा था/ और फिर प्र…

हिंदी दिवस और हिंदी समाचार पाठन

हिंदी दिवस पर हिंदी न्यूज़ चेनल से एक अनुरोध :- कृप्या समाचार के प्रसारण में इतना अधिक भावुक न होए की समाचार के कई तरह के विश्लेषण के लिए श्रोताओं में समलोचात्मक बुद्धि न रह जाये / सही , शिष्ट  निर्भाव शब्द कोष का प्रयोग करें , और कहावतो , मुहावरों के अन्यथा प्रयोग न करें / वैचारिक शब्दों को ठोस ,घनाकार न करें की यह वैचारिक व्यक्तव्य का उपहास बन जाये / अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी सभ्यता आप /तुम का अंतर रखनें वाली भाषा है / यहाँ अलंकार का प्रयोग कम होता है , समाचार को अधिक सजाने से अर्थ और मीमांसा में अंतर आ जायेगा /

हिंदी दिवस और हिंदी जगत का गिरता बौधिक स्तर

आज हिंदी दिवस है / समझ में नहीं आता की यह दिन हमें हिंदी बोलने के प्रोत्साहन के लिए स्मृति दिवस के रूप में देखना चाहिए, या फिर की हिंदी के गिरते हुए स्तर और हिंदी भाष्य की गिरती हुए बौद्धिकता / आजादी के पैंसठ साल बाद भी हम आज अंग्रेजी से ज्यादा लगाव रखते है / बल्कि शायद यह प्रेम  बढ़ा भी और निखरा भी / आज स्थिति यह है की अंग्रेजी भाषीपर ज्यादा विश्वास व्यक्त करते है / 
  ऐसा नहीं है की हिंदी बोलने वाले की संख्या कम हुए है / अगर आज भी केबल टेलीविज़न के चेनल पलट कर देखेंगे तो पाएंगे की हिंदी भाषी चेनल ही सबसे अधिक संख्या में है / हिंदी समाचार चेनल , हिंदी फिल्म चेनल, हिंदी संगीत , हिंदी नाट्य , इत्यादि /  तब मन में सवाल उठता है की हिंदी दिवस का महत्व किस बात पर होना चाहिए ? शायद भय यह है की इन सभी में अब थोड़ी की कहीं अधिक एक अन्य भाषा भी सुनाई देती है --अंग्रेजी / हिंदी का मुख्य शत्रु अंग्रेजी भाषा को समझा गया था, हालाँकि अब इसे शत्रु न मान कर प्रतिस्पर्धी के रूप में ग्रहण कर लिया गया है /  बात जब हिंदी और अंग्रेजी की प्रतिस्पर्धा की आती है तो वाचक को अंग्रेजी हमेशा ज्यादा लुभावनी लगती …

Understanding the protest of a political cartoonist

The protest of political cartoonist Aseem Trivedi presents a ponder-able situation to political thinkers of India. Thinkers from the West would have adorned a matter-of-fact look, were they asked to ponder on this situation. It is because they had already considered such a proposition even when they were documenting their laws. Against this, the Indians gave grand umbrella coverage to all protest involving Symbols surrounding the concept of Nation, thereby avoiding the need to deeply investigate and make distinctions in these situations.
Thus, Indians today have been met with the challenge they avoided long ago in their law-making. Challenges whose solutions, they felt, were not confirming to their Cultural ethos. "Laws should be a product of logic or a product of belief, however cultural " , is a question we have to ask.


National Symbols...what are they? have we ever questioned to ourselves what is Symbolism and what function does Symbolism serve? Symbolism is a means of fu…

Indian democracy -- A Contest of the negatives

Eventually we Indians have made Democracy and its freedom as a 'contest of the negative'. here, we don't choose between 'the good and the better', or between 'the good and the bad', BUT between 'the bad and the worse'. Has any one of us ever wondered how did to come to such a 'contest of the negative' ? Did we ever think that the bad has a self-sustaining logic to promulgate its existence, the cover of Political Freedom given to the Madness within the Human mind has become its means self-sustenance. And then, like poison cuts the poison, there is more Madness done by the sane ones to beat the madness of the insanes. In this whole fight rises the Dust of Madness which is what we see as the "contest of the negative".

A 'Nation' is concept of Human intellectualism, represented by 'national' symbols, which forms the geographical congregation of the people who have agreed to live harmoniously by means of a common idea an…