Sunday, September 30, 2012

Supreme Court verdict on natural resources Auctioning,-- ground work to the next level 'Thieving Decisions'

So, the teachers of the old High School were now involved in a cheating scam. The walls were all scribbled with the answers and students were writing the exam sitting in this same room. Despite many request to have the walls painted, the Principal were (deliberately ?!) not having it done, and this being publicly known that his family relatives children are also writing the exams sitting in the room. When the flying squad caught the Principal for cheating happening, the principal defended himself saying Painting the wall was cost-incurring and therefore could not be made mandatory by the Flying Squad on the School management. The principal and the school management take the matter to the court, where the court has already given first ruling in favour of the Flying Squad that the Principal and School management was involved in facilitating cheating.
In the second lawsuit, that Whether Painting the Wall should be made mandatory or not, the Court rules in favour of the School, saying that "Painting is truly not mandatory" (( considering that Class 10th students can be made to sit in Kindergarten class rooms where, despite the walls still being scribbled with the answers , will be of no good worth to the class 10th students. ))
The principal and school came out jeering, "see we told you, our position on painting the walls was never wrong".

Friends, introducing the latest 2G Spectrum scam related Natural Resources Auctioning Supreme Court verdict to you.
The purpose of this fallacy being promulgated by the government (read ''the UPA ministers'') through the latest SC verdict is no less sinister. At the rock bottom of such scams sits the very typical Indian Jugaad-minded Decision-making skill, "if ignorance is bliss, you may feign the ignorance to enjoy the bliss". As they say in Hindi, "aidda ban ke pedda kaho". This recent verdict of the SC can be (mis-)used by the politicians and the bureaucrats to continue on their trails to exploit the nation under the defense, "I didn't know clearly what this case-law means in the whole". Additionally, the verdict gives an opportunity to confuse the voters, "the UPA was right, see i told you".

A typical indian-national manager quite often makes use of the feigning ignorance trick to proceed on the illegal track. The courts in India until now have been soft and merciful on the issue of a possible ignorance and allow the decision-makers to get away. but were this fallacy ever to be corrected, which I am sure people in the west like to see getting corrected in their system, the competency of the person who is either actually Ignorant or feigning ignorance , can be taken into the docks. It is high time we start tightening noose on such 'ignorant' decision-makers and dismount them from the high end tables where they will destroy the organisation for their personal gains, either way- due to actual ignorance or the feigned ignorance .


Friday, September 28, 2012

उत्तराधिकारी चुनने के नियम -- भारत के सर्व-प्राचीन चुनौती


अभी कुछ दिनों से यह विचार आ रहा है की गहरायी में समझे तो इस समय 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' में भी जो मत-भेद और विभाजन हुआ है, उसका भी वही कारण है जो की कितने ही हजारो सालो से भारतीय सामाजिक तंत्र के लिए एक चुनौती रहा है - उत्तराधिकारी का चुनाव (law of succession)/ जब अभी आप ने 'अंतरी जन लोकपाल व्यवस्था' का एलान किया तब मन में यह बात आई की यह लोकपाल कार्य क्या करेगा और इसका मकसद(objective ) क्या होगा / सोच घूमते हुए अमरीका के democrat और republican की बीच होने वाली चुनावी-दौड़ पर गयी / वहां मुख्य चुनाव से पहले दोनों पार्टी में अंदरूनी "शास्त्रार्थ" (debate  contest )  होता है / यह "शास्त्रार्थ" हज़ारों लोगो के द्वारा देखा जाता है / और उसमे प्रचलित या विजयी हुए उमीदवार को आगे बड़ने का अवसर मिलता है /  उस दौड़ में दिए जाने वाले त्वरित वाक्-पटुता  (quick wits ) भी अक्सर अखबारों की सुर्खियाँ बने रहते है /
सोचता हूँ की क्या किसी प्रजातंत्र में "market competition " ही सही और विधिवत माध्यम है गुणवत्ता लाने का / और उत्तर मिलता है -- "हाँ" /
सरकरी "सक्षमता प्रमाण पत्र " (license ) तो सिर्फ न्यूनतम योगता  दर्शाता है , गुणवत्ता तो आपसी-प्रतिस्पर्धा से ही प्रसारित होती है /
   आपके 'अंतरी लोकपाल' का कार्य येही होना चाहिए / आपके उम्मेद्वारो के बीच एक स्वस्थ अंतरी प्रतिस्पर्धा को moderate करवाना / तो जहाँ उमीदवार की लोकप्रियता जनता ही तय करेगी, जनता तो लोकप्रियता नापने के लिए संसाधन बनगे उमीदवारों के बीच का शास्त्रार्थ / और लोकपाल का कार्य होगा लिखित रूप में इन्टरनेट , या अन्य मीडिया के माध्यम से इस शास्त्रार्थ को जनता तक पहुचाने का / शास्त्रथ का माध्यम से उमीदवारो को शैक्षिक जानकारी की गहराई भी नाप लेंगे , असल में यह जनता ही नाप कर आपको बताएगी / अंदरूनी लोकपाल को यह सुनिश्चित करना होगा की सभी उमीदवारो के कार्यो और तर्कों को स्पष्टता और पारदर्शिता के साथ जनता तक पहुचाये / और यह  भी सुनिश्चित करे की सभी उमीदवार जायज़ , विधि सांगत तरीके से एक *स्वस्थ* प्रतिस्पर्धा करें / कोई भी "गला काट " प्रतिस्पर्धा नकारात्क्मक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक है जिसमे गुणवत्ता बड़ने की बजाये ख़तम होने लगती है / जुगाड़-बुद्धि की यह कमजोरी होती है की वह अक्सर अपने ही बुने जान में फस जाते है/ सही को गलत और गलत को सही दिखाते दिखाते धर्म-अधर्म में भ्रमित हो जाते है/ सही तर्क की समझ को ख़त्म कर लेते है / और फिर धीरे-धीरे अज्ञानता वश में बेशर्मी के साथ खुल्लम-खुल्ला अनैतिक कार्य-विधि अपना लेते है / 

सही उत्तराधिकारी के चुनाव के यह तरीका आज से कहीं पहले ही दूंड लिया गया था / मगर हमेशा से जो मुश्किल रही है वह यह की जनता को तो कई बार यह भी नहीं पता होता की उनके क्षेत्र से उमीदवार कौन -कौन थे और जीता कौन /  ये आकास्मक नहीं है की आपका ये आन्दोलन आज इस सूचना-युग में 'सोसिअल नेट्वोर्किंग वेबसाइट' के माध्यम से ही सबसे अधिक प्रचलित हुआ / शायद सूचना-युग की सबसे बड़ी उपलब्धि येही है की  कई प्रशाशनिक क्रियाओं का सही तर्क अब जा कर जनता तक पंहुचा है / बलकी अभी भी जब में 'भारत निर्माण " के कुछ विज्ञापन टीवी पर देखता हूँ तो लगता है की शायद "rights" (हक) की सही समझ तो हम भारतीय अभी तक नहीं बना पाए है / ऐसा आभास होता है की 'हक ' का कार्य आपसी झगड़े करवाने का है , आपसी झगड़े सुलझाने के सही अंदरूनी रास्ता नहीं ! विज्ञापन में ऐसा लगता है की "हक की लड़ाई " में हक मिल जाने पर अब जम कर और ज्यादा झगडा होगा / और यह की हमारी  सरकार  कितनी दयावान बन गयी है जिसने हमे यह हक मुहैया करवा दिए है/ ऐसे जैसे की ये हक एक नागरिक का दूसरे नागरिक से प्रतिबद्धता और करार नहीं है , सरकार और संविधान की भीख मिली है सभी नागरिको को !
    और मौजूदा राजनीतिज़ भी येही सूचाते है की 'हक' कभी भी निंकुश और असीम नहीं होते / सब पुरानी ज़मीदारी व्यवस्था के पुलिंदे , या तो डंडा चलते है या डंडा खाते आये है / इसलिए परस्परता के इस समझ को कहीं भी सही संतुलन से नहीं समझ पाते है / हमारी सामाजिक प्रथाओं में जहाँ "साम, दाम, दंड, भेद " भी एक बहोत प्रचलित कार्य विधि बन गयी है , अब संतुलित समझ का जागरण और भी असंभव हो गया है / इसलिए उम्मीदवार के चुनाव का तरीक अज्ञानता के शुन्य में भटका कर "साम, दाम, दंड, भेद" की राह पकड़ता रहा है /
आपके अंदरूनी जन्लोक्पाल का कार्य बस इतना ही होगा की सुनिश्चित करे की जो कार्यविधि तय हुयी है, उसका पालन हो / और इसके लिए वह रोज़ की कार्यो को " लॉग बुक" के सामान वेबसाइट पर अपडेट करे / और कार्य विधि का बदलाव (change ) भी एक विधि के सामान पालन किया जाये / अभी तक की सभी पार्टिया येही पर अज्ञानता का फायेदा उठाती रही है / वेबसाइट का प्रयोग सिर्फ "पार्टी प्रचार" के लिए ही हुआ है, अंदरूनी पारदर्शिता और कार्य विधि में सुधार के लिए नहीं / सिर्फ आप की वेबसाइट ही अपने दैनिक कार्यो (कृत्य, उपलब्धि , विचार और तर्क)  को अपडेट कर वेबसाइट के माध्यम से पारदर्शिता देने की कोशिश कर रही है /  आपके भावी जन्लोक्पल को यह सुनिश्चित करना होगा की यह कार्य बंधित न हो और ऐसे ही चलता रहे / और की यह उसकी पोल खोल कर करंक न बने इसलिए कहीं कोई 'पोल' (गुप्त भेद) को बनाने ही न दे / अंदरूनी रण-नीतियों की  गोनियता को भी इसी प्रकार का न बनायीं की अगर वह खुल गयी तोह "पोल खोल" हो जाये /
  कभी कभी में यह सोचता हूँ की क्यों किसी भी corporate को अपने Hatchet Man को सभी कर्मचारयों में से सबसे इम्मंदार कर्मचारी को ही चुन्ना चाहिए / जो पारदर्शिता और इमानदारी की राह से होते हुए कठिन मंजिल का रास्ता डूंडा निकले वही असली गुणवान है/ वरना राह चलती, देहाती "जुगाड़ बंदी" तो सभी कर लेते है , और ये भूल-भुला कर की कल को उनकी ही कार्य प्रणाली दूसरा भी अपनाएगा तो नैतिकता का पतन हो जायेगा, राष्ट्र की मृत्यु , और असामाजिकता का उत्थान / फिर उस जुगाड़  बुद्धि  का लोहा रह ही क्या जायेगा , क्या उसकी शिक्षिक योग्यता और तीव्र-बुद्धि जब वह सभी सामाजिक मान्यता का तिरस्कार ही कर रहा है !?  और अगर शैक्षिक तौर पर सक्षम है और तीव्र बुद्धि है, तो उसका प्रयोग ऐसे हो की ये स्थिति न बने की अनैतिक कार्य करना पड़े /


For Indians, the greatest of unfulfilled managerial challenge since pre-history has been regarding the Laws of succession. Earlier, in vedic Era, when the four Varna were created by lord Manu in Manu smriti, the Varns were about the profession-based classification of people of different Jaati. Indians erred on the Laws of Succession by converting it into by-birth system. Brahmin , a designation fo
r any arbitrary man who may know the Brahm (the supreme cosmic knowledge), was solidified into by-birth transmission (succesion of 0 Knowledge from father to child. RESULT- A 'caste system' de-humanisation of human
being, worst ever on this planet.
Then, so many fights and killing on who will be the next king, and India was captured away by foreign power.
The Battle of mahabhrat is all about the battle of Succession, who will rule Indraprasth and who will rule Hastinapur. Ramayan revolves around succession, who will be the king of Ayodhya-- Ram or Bharat?
India continues to struggle to find the good merit based solution to its first prehistorical managerial challenge. In 20th century , we have the rule of Dynasty Politics. And last but not the least, in 21st century, if Final War Against Corruption and India Against Corruption have to succeed in defeating corruption they will eventually have to solve this biggest crisis for India - good , democratic Law of Succession.

Monday, September 24, 2012

Thieving Decision-making

Thieving Decision-making

In India, due to general ignorance on law matters, people at decision-making positions sometimes act a little whimsical by allowing themselves to assume that if any decision they are taking is being reasoned by someone else to be 'prima facie' wrong then someone would complain against that decision. This kind of decision-making has double advantage..it gives them liberty to stand and live lifelong ignorant of the law, and later claim/feign ignorance of the law if they are caught in a misdeed which they 'might have' intentionally carried out .

 Is their a name for Such actions of the bureaucrats, Politicians, or Managers at Senior Ranks? Can these acts be prosecuted under the claims of "Mental anguish"? Can the person be held liable to be 'incompetent for the Rank', as he might erect on line of defence for his decision-making as "Nobody told me! I thought if my decisions were wrong then someone will come out with the problem he is facing" .

Afternote :
I call the above as "thieving" because this is one the ways a friendly and proficient theft was being done at one place in my seeing.
A thief guy would surreptitiously pull out the objects from backpacks of his friends and quickly hide them somewhere close by, making sure that the location of hiding may also be made to appear such that the object had by accident fallen from the backpack in that location. If the owner would reflexively catch the thief guy doing all this, the thief guy would quickly 'joke it away' that he was only trying to train him that someone else might steal away this object if the owner would keep the backpack loose. !
And if the owner never could realize the loss , the thief guy would have made his successful kill.

This is the same strategy many decision-making manager do when they have to make a evil decision which can otherwise prima facie be called wrong.

विधि (Laws ) और प्रथाओं (Customs ) के बीच का सम्बन्ध

विधि (Laws ) और प्रथाओं (Customs ) के बीच का सम्बन्ध 
(हिंदी भाषा में सीधा अनुवाद  http://rebirthofreason.com/Articles/Perigo/Law_vs_Custom.shtml)

अपने एक उत्कृष्ट निबंध , " अभी पूर्ण न्याय नहीं हुआ है " ( " Not Enough Justice ") में लेखक जो राओलैंड निष्-भाव दार्शानियों को अक्सर दी जाती विधि और कानून सम्बन्धी उस चुनौती पर प्रकाश डालते है जिसमे की कुछ इस तरह की विवाद आते है जिसमे कोई कानून का उलंघन तो नहीं हुआ होता है मगर अन्याय ज़रूर हुआ होता है, जिसमे की उदहारण आता है : किसी पशु पर की जाने वाला अमानवीय व्यवहार; या , किसी माता-पिता द्वारा अपनी संतान को शिक्षित न करने का निर्णय; या एक बॉयफ्रेंड जो की अपनी प्रेमिका को भावनात्क्मक तौर पर पीड़ित करता है ; या , एक पत्नी जो सिर्फ घास-पात का पका भोजन ही परोसती है /
                इन सभी क्रियाओं में किसी विधि का उलंघन नहीं है, मगर एक किस्म का अन्याय होता है / किसी फुरसत के विचारों जब इस उदाहरण पर गौर करे जिसमे एक पत्नी सिर्फ घास-पात वाला भोजन ही परोसती है , तो यह खास ध्याने देने का विचार है की किसी को घास पात का भोजन देने की क्रिया ही अपने-आप में एक बल और विवशता को प्रारंभ करने वाला पहला कृत्य है / और यही वह कृत्य है जिसका की विधि-विधान में निवारण नहीं मिलता ( हालाँकि किसी को घास-पात को भोजन बतला कर परोसने का धोखा भी एक छोटे किस्म की धोखा-धड़ी मानी जा सकती है, और धोका-धड़ी का विधि में निवारण है, जैसे दफा ४२० के तहत / ) सोचिये उन माता-पिता के बारे में जो अपनी संतानों को स्कूल न भेजने में उनका और सामाजिक हित मानते है (परन्तु शिक्षा गृहीत करने से उनका कोई विरोध नहीं है /) सभी बातो में इस पल वह मुख्य बिंदु जो विचारणीय है वह यह है की किसी भी स्वतंत्र-विचारक समाज (Libertarian Society ) में असल में प्रत्येक व्यक्ति को अशिष्ट, बे-अदब , क्रूर, असभ्य , गाली-गलोज, छिछला या तुच्छ विचारों वाला , षडयंत्र कारी , और छेड़खानी और जुगाड़-बुद्धि --- कुल मिला कर एक सम्पूर्ण मुर्खानंद-- होने की भी स्वतंत्रत होती है जिसे की सिर्फ विधि और क़ानून के प्रयोग से काबू में नहीं रखा जा सकता/

         स्वतंत्र-विचारक समाज को विधि के बाहर भी कुछ न कुछ अन्य व्यवस्था भी रखनी ही पड़ेगी मनुष्य में पायी जा सकने वाली इन सभी विक्रित्यों पर कोई बल और शक्ति का प्रयोग कर इन्हें काबू में रखने के लिए / और ठीक ऐसे ही पलो में स्वतंत्र-विचार--विरोधियों (Anti -Libertarians ) को भी मौका मिलता है यह बात स्थापित करने का की "सरकार क्या कर रही है लोगो को ऐसे कृत्यों को काबू में लेने के लिए ", "नहीं चाहिए हमे ऐसी स्वतंत्रता और ऐसी स्वतंत्र-विचारक व्यवस्था "/ ऐसे ही किसी पल में स्वतंत्र-विचार--विरोधियों को यह अवसर मिलता है की, "एक दमदार नेतृत्व और सरकार क्यों होनी ही चाहिए "/ स्वतंत्र-विचार--विरोधियों को यह  'समझाने'  का मौका मिल जाता है की क्यों किसी भी सरकार को नागरिक की " अभिव्यक्ति  की स्वतंत्र" पर भी नियंत्रण रखने की आवश्यकता है वरना लोगो कैसे एक-दूसरे की भावनाओं को चोटिल करते फिरेंगे /

        निबंध की पूरी चर्चा यह दर्शाती है की कैसे स्वतंत्र-विचारक समाज में जहाँ विधि और क़ानून का कार्य की सीमा-क्षेत्र समाप्त होती है वहां से सामाजिक प्रथाओं, आस्थाओं और कर्मकांडो के कार्य का दायरा आरम्भ होता है /

Tuesday, September 18, 2012

Controversies - An explosion from 'the Expression'

Ours is an era of Controversies. A celebrity sneezes and a controversy explodes. Some people loath controversies as it penetrates into their privacy zones in the guise of Transparency; and some people love controversies as it gives them their much desired shine in the dust.

What is it with the nature of Controversies?

  Controversies are uncivilized primitive format of the basic human nature-- to enq uire and then to argue. As with all the arguments, the heat which it creates smelts away the crude to exposes out the pure metal, the truth. Some people loath the heat and some people think they can play with fire. But in the deepest end of it only the truthful can standout, the one made of pure mettle. The issues of controversy are increasing because people are becoming free. They each have begun to hold opinions. Jimmy Wells of Wikipedia says in India there are twelve opinion per ten persons.
                 While we each hold opinions we are still naive in our decision-making, to know the right from the wrong. The knowledge of the method of evidencing which is essential to doing Justice in the plethora of opinions is becoming more scant. A sure inference, then, is that- rising controversies are a sign of growing Independance-- to be free, to hold opinion and then to express oneself. But the road still has to lead ahead otherwise this will be our collective grave. Justice and evidencing can no more be dispensed off from the scope of our duties on grounds of specialized knowledge. We each will have to hold them as a general knowledge.

Sunday, September 16, 2012

"इंडिया अगेंस्ट करप्शन " के लिए सुझाव--> भावी प्रत्याशी की पात्रता

आधुनिक जन शाशन व्यवस्था में एक "राजनीतिज्ञ" का प्रारूप किस  तरह का होना चाहिए ? परंपरागत व्यवस्था में "राजनीतिज्ञ" एक शाशक के रूप में देखा जाता है जो की कहने को तोह जनता का सेवक है , सिर्फ नाम मात्र, क्योंकि उसको मिली सुविधाए उसे किसी राजा महाराजा से कम नहीं रखती / यह अचंभित , विरोधाभासी व्यक्तित्व किस तरह से उतपन्न हुआ इसे एतिहासिक स्थान से समझना बहोत आवश्यक है अगर किसी नए तरह की "राजनेतिक" व्यवस्था की नीव डालनी है /  शायद इसकी नीव हमे यहाँ से मिले की नयी "प्रजातंत्र' व्यवस्था पुरानी "सामंत वादी " ज़मीदारी व्यवस्था में से ही निकली है / प्रजातंत्र नें सामंवाद को विस्थापित किया मगर सामंत को मृत्युदंड नहीं दिया था / वह सामंत ही फिर "जन-मानस में एक आम व्यक्ति " का चोंगा पहन कर प्रजातांत्रिक व्यवस्था में "जनता का सेवक" बन कर वापस  शाशक  बन गया / कई **जुगाडात्मक कारणों** से इस तथ्य को भली भांति जानते हुए भी सभी ने इस व्यवस्था को लागू होने दिया क्योंकि इसमें भी सभी को 'जुगाड़' के माध्यम से मौका मिल रहा था/ और फिर प्रजातंत्र का भी तोह येही आह्व्हान था - सभी को बराबर का सुअवसर / भ्रम और भ्रान्ति के लिए इससे अच्छा और क्या चाहिए था - कह देना था अज्ञानी, बौद्धिकता से अनजान जनता से  , "यही होता है प्रजातंत्र " /
 वैसे इस तर्क की सामंतवादी मर्म(core) वाली प्रजातंत्री व्यवस्ता ने इस बात को प्रमाणित भी किया की "अवसर तो सभी को सामान रूप से मिला " , जिसने जहाँ चाह लूट लिया / जात-पात, धर्म-संप्रदाय और स्थान - भू-भाग से आगे निकलते हुए सभी को मौका मिला / मगर जैसा की जुगाड़ात्मक कार्य प्रडाली में होता है, तुरंत कार्य तोह सध जाता है , मगर जब प्रतिस्पर्धी भी यही  जुगाड़ात्मक कार्य प्रडाली अपना लेते है तो फिजा में सिर्फ ज़हर रह जाता है, सही और धरम सांगत कोई नहीं रह जाता /

साफ़ साफ़ और संक्षेप बोले तो दो-तीन बातें "जन सेवक " की पद संरचना से ताल मेल नहीं रखते / पहला यह की, "इन्हें कोई बड़े बड़े बंगले नहीं दिए जायेंगे / कोई लाल बत्ती की गाड़ी नहीं , कोई १ लाक रुपये की तनख्वाह नहीं" / यह तर्क में नहीं बैठता / आखिर "जन सेवक " का कर्त्तव्य क्या होगा ? सिर्फ एक पोस्ट मन , जनता की बात "आप" तक पहुंचाएगा / और निर्णय होगा ? कुछ काल्पनिक सा व्यक्तव्य हो गया / आम दिनों में जनता अपने जीवन संघर्ष में तल्लीन होती है / वह हर विषय पर अपनी राय बना ही नहीं पाती /  फिर जन सेवक ही 'विचारक' की भूमिका निभाता है / "निर्णय " लेने की क्रिया में एक महत्वपुर्ण क्रिया है विचारो का आदान-प्रदान / जन सेवक बाकि दूसरे जन-सेवक से भी उनके विचार का आदान प्रदान करता है / फिर एक तीसरी क्रिया होती है / भिन्न-भिन्न विचारों को आपस में एक दूसरे से अधिक से अधिक नज़दीक लाना / जैसे की एक गाँव में बिजली की कमी है,  और बगल के गाँव में बिजली और सड़क , दोनों की , तो सीमित बजट की स्थिति में बिजली या सड़क में से किस कार्य को परिपूर्ण करें , यह निर्णय होता है/ "निर्णय" और 'न्याय' में थोडा अंतर होता है / शैक्षिक , तकनीकी पहलुओं का ज्ञान तो दोनों ही जन सेवक में नहीं होगा ! इस लिए जन-सेवक इस पर एक तीसरे स्थाम्भ पर भी निर्भित होगा - कोई तकनीकी संसथान , इत्यादी /

संछेप में, इन सभी  बातों  का आभास यह है की  -- जन- सेवक को सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए / कर्म योगी को उसका फल तोह उसके कार्यों की श्रेणी की अनुसार दिया ही जाता है / यानि, "लाल बत्ती" न सही, एक अच्छी गौरवान्वित वाहन / एक कार्यालय / एक मकान / काम करने की तनख्वा / और तनख्वा उनके कर्तव्यों की सामाजिक मर्यदा के अनुसार, साथ ही जन सेवको में "भ्रस्टाचार " को मोह-भंग करने लायक / असल में लाल-बत्ती होना या न होना मुद्दा नहीं है / मुद्दा है "लाल बत्ती" की प्रतीकात्मकता -- "आत्म -पूजन " (feudal Narcissism ) (जिसे साधारण समझ में 'अहंकार' भी समझ लेते है /) आप इसे एक मनोरोग के रूप में देखें और मनोचिकित्सीय ज्ञान से अपने भावी "जन सेवकों" में निदान करें/ प्रत्याशी का ज्ञान को परखने का एक बिंदु 'आत्म पूजन व्यक्तित्व विकार ' (Narcissist Personality Disorder ) और सम्बंधित मनो-विकार नहीं होना चाहिए / 
 यहाँ पर, संविधान में पहले ही व्यवस्था है की चुनाव प्रत्याशी मानसिक तौर पर अस्वस्थ नहीं होना चाहिए / आप इस थोड़ा  कड़ा करते हुए  ऐसे  लोगो का चुनाव करें जो की मानसिक तौर पर आत्म-जागृत , और स्वस्थ होना चाहिए, ख़ास तौर पर सत्ता से सम्बंधित मिली ताकत से भ्रमित न होने वाला / इतिहास , जन प्रशाशन , वगेरह वगेरह विषयों के तकनिकी ज्ञान के परख लेने का एक मनोवैज्ञानिक कारन यह भी है की आप इस NPD मनो-विकार से अस्वस्थ व्यतित्व को प्रत्याशी बनाने से पहले पहचान ले / 

Saturday, September 15, 2012

हिंदी दिवस और हिंदी समाचार पाठन

हिंदी दिवस पर हिंदी न्यूज़ चेनल से एक अनुरोध :- कृप्या समाचार के प्रसारण में इतना अधिक भावुक न होए की समाचार के कई तरह के विश्लेषण के लिए श्रोताओं में समलोचात्मक बुद्धि न रह जाये / सही , शिष्ट  निर्भाव शब्द कोष का प्रयोग करें , और कहावतो , मुहावरों के अन्यथा प्रयोग न करें / वैचारिक शब्दों को ठोस ,घनाकार न करें की यह वैचारिक व्यक्तव्य का उपहास बन जाये / अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी सभ्यता आप /तुम का अंतर रखनें वाली भाषा है / यहाँ अलंकार का प्रयोग कम होता है , समाचार को अधिक सजाने से अर्थ और मीमांसा में अंतर आ जायेगा / 

Friday, September 14, 2012

हिंदी दिवस और हिंदी जगत का गिरता बौधिक स्तर

आज हिंदी दिवस है / समझ में नहीं आता की यह दिन हमें हिंदी बोलने के प्रोत्साहन के लिए स्मृति दिवस के रूप में देखना चाहिए, या फिर की हिंदी के गिरते हुए स्तर और हिंदी भाष्य की गिरती हुए बौद्धिकता / आजादी के पैंसठ साल बाद भी हम आज अंग्रेजी से ज्यादा लगाव रखते है / बल्कि शायद यह प्रेम  बढ़ा भी और निखरा भी / आज स्थिति यह है की अंग्रेजी भाषीपर ज्यादा विश्वास व्यक्त करते है / 
  ऐसा नहीं है की हिंदी बोलने वाले की संख्या कम हुए है / अगर आज भी केबल टेलीविज़न के चेनल पलट कर देखेंगे तो पाएंगे की हिंदी भाषी चेनल ही सबसे अधिक संख्या में है / हिंदी समाचार चेनल , हिंदी फिल्म चेनल, हिंदी संगीत , हिंदी नाट्य , इत्यादि /  तब मन में सवाल उठता है की हिंदी दिवस का महत्व किस बात पर होना चाहिए ? शायद भय यह है की इन सभी में अब थोड़ी की कहीं अधिक एक अन्य भाषा भी सुनाई देती है --अंग्रेजी / हिंदी का मुख्य शत्रु अंग्रेजी भाषा को समझा गया था, हालाँकि अब इसे शत्रु न मान कर प्रतिस्पर्धी के रूप में ग्रहण कर लिया गया है / 
बात जब हिंदी और अंग्रेजी की प्रतिस्पर्धा की आती है तो वाचक को अंग्रेजी हमेशा ज्यादा लुभावनी लगती है / तो आज के इस दिन को, हिंदी दिवस को , सही मायेने में हिंदी भाषी की गिरती हुई बौद्धिकता के निवारण में याद करना चाहिए / अगर हम हिंदी न्यूज़ चेनल और अंग्रेजी न्यूज़ चेनल के अंतर्वस्तु का अध्ययन करे तोह भी यह बात सामने आयेगी की असली कसौटी इन दोनों भाषा में अलग और बहुत गहरे बौधिक अंतर की है / 
हिंदी भाषी अक्सर कर के एक सिमित समझ का व्यक्ति होता है, जो विज्ञानं और अंतर्राष्ट्रीय विषयों में अधिक महत्त्व नहीं देता/ हिंदी भाषी व्यक्ति अक्सर किसी भी ज्ञान अथवा समाचार को एक ज्ञान कोष भण्डार के रूप में देखता है, जहाँ इसका महत्त्व वो इसे सही समय पर प्रतुत करने में देता है , इसका विश्लेषण पर नहीं / हिंदी भाषा और हिंदी समाज की सबसे बड़ी कमी शायद यह है की यहाँ समलोचात्मक बुद्धि (critical  Thinking ) पर बल नहीं दिया गया है / अच्छा , इस कमी के भी पीछे का कारण यह है की हिंदी समाज ने कहीं पर अपनी एक लड़ाई बौद्धिकता से भी कर ले है / बौद्धिकता को नए हिंदी समाज में मूल्यों की खोज न मन के बड़ी -बड़ी बातें करने के रूप में समझ लिया गया है / मूल्यों को कुछ ख़ास संस्कारो के रूप में ले लिया गया है / मूल्यों की तलाश में शास्त्रार्थ और वाद-विवाद को अपने महत्त्व से गिरा दिया गया है / "ज्यादा बकर-बकर कर के कुछ नहीं म्मिलने वाला " , या फिर की " बहस का कोई फायदा नहीं, कुछ नहीं मिलने वाला " -- यह नए हिंदी समाज का शब्दकोष और विचार धारणा हो चुके है / 
हिंदी जगत के एक नए समस्या है -- पुनरावृत होते विचार, और उसमे भी गिरता हुआ शब्दकोष / अशिक्षित , अशलील , अशिष्ट शब्द को अब और आसानी से स्वीकार कर लिया गया है / मुद्दा यह नहीं है की यह स्वीकार नहीं होने चाहिए, वरन की यह शब्द अब शिष्ट औपचारिक स्थानों पर भी प्रयोग में आने लगे है / असभ्य प्रयोग और असभ्य प्रयोग -- दोनों के एक जैसा महत्त्व देने पर एक भ्रम की स्थिति पैदा हुयी है, जहाँ अक्सर कर के व्यक्तव्य अपनी दिशा भूल कर कहीं और ही घूमने लग रहे है / हिंदी समाचार चेनल में होने वाली बहस में इस प्रकार का भ्रम अक्सर कर के देखने को मिल रहा है / 
यह शब्द- भ्रम (भ्रन्ति ) भी हिंदी भाषी के गिरते समलोचात्मक-बुद्धि में प्रभाव दे रहा है / 
 हिंदी जगत साधरणतः आर्थिक रूप से कमज़ोर और पिछड़ा हुआ है / यह पिछड़ा शब्द में बौधिक योग्यताओं की कमी भी स्पष्ट अर्थ में है / हिंदी जगत के लोग अक्सर कर के स्वयं को राजनेतिक और तकनिकी विचारों से जोदड़ सकने में असमर्थ होते है / वह पुराने संस्कारों और ग्रामीण मान्यताओं में गढ़ी हुई है / जैसे दहेज़ प्रथा, बाल विवाह, मादा भ्रूण हत्या , जात वाद, इत्यादि / 
  हिंदी जगत की यह कमियां हिंदी भाषा और साहित्य पर अपना शब्द कोष की छाप छोड़े हुए है / प्रमुख तौर पर,जात वाद संगर्ष में मनुवादी और मनु-विरोधी विचारों में ब्राह्मणों की तिरस्कार में जो सबसे ज्यादा हताहात हुए है वोह है -ब्रह्म --ज्ञान / कहने का अर्थ यह नहीं है की ब्रह्म सिर्फ जात-उत्पतित ब्रह्मण में मिलता है, मगर जहाँ भी ब्रह्म का विषय वष्टु अत है, उसे ब्रह्मण से जोड़ा कर फिर उसका विरोध करने के लिए है गुट तैयार हो चूका है / सत्य, न्यायपूर्ण , नैतिक समझ का बुरी तरह से पतन हो चूका है / ब्रह्मिन जात वादी बन गया, जात वाद का विरोध हो गया , और अंततः जो मारा गया वोह है ब्रह्म -- ज्ञान और बौद्धिकता का खोजकर्ता , प्रचारक / हिंदी जगत की यह दुविधा बहोत व्यापक हो गयी है / शास्त्रार्थ और तर्क बुद्धि का विघटन भी शायद येही से आरम्भ हुआ है / 
हिंदी जगत अभी भी प्रजातंत्र के नाम पर ज़मींदारी प्रथा में फंसा हुआ है / इस लिए की प्रजातंत्र और ज़मींदारी में अंतर कर सकने के लिए जो स्पष्ट , तार्किक और बौधिक ज्ञान होना चाहिए वह भी न्यूनतम है / प्राचीन या फिर ग्रामीण कहावतो और मान्यताओं से परिपूर्ण हिंदी जगत संस्कारों की रक्षा के नाम पर कुछ नहीं मूल्यों की तलाश में भटकना पसंद नहीं करता / परिवार को सर्वश्रेष्ट स्थान दे कर परिवार और धर्म के भीच के अंतर को साफ़ साफ़ परिवार की और मोड़ दिया है / आज का हिंदी जगत निष्पक्ष , सत्य और धर्म-संगत (नैतिक) मार्ग को तलाश कर सकने में बहोत कमज़ोर है / 
हिंदी जगत के यह कमियां अब हिंदी भाषा की भी कमी बन चुकी है / इस लिए जब भी अंग्रेजी से प्रतिस्पर्धा की बात आती है , हिंदी भाषा वाचक की तर्क बुद्धि पर इतना प्रभाव नहीं डाल पाती / हिंदी दिवस पर सही मायने में विचार करने के लिए हिंदी की यह दुविधा है / 

Tuesday, September 11, 2012

Understanding the protest of a political cartoonist

The protest of political cartoonist Aseem Trivedi presents a ponder-able situation to political thinkers of India. Thinkers from the West would have adorned a matter-of-fact look, were they asked to ponder on this situation. It is because they had already considered such a proposition even when they were documenting their laws. Against this, the Indians gave grand umbrella coverage to all protest involving Symbols surrounding the concept of Nation, thereby avoiding the need to deeply investigate and make distinctions in these situations.
Thus, Indians today have been met with the challenge they avoided long ago in their law-making. Challenges whose solutions, they felt, were not confirming to their Cultural ethos. "Laws should be a product of logic or a product of belief, however cultural " , is a question we have to ask.


National Symbols...what are they? have we ever questioned to ourselves what is Symbolism and what function does Symbolism serve? Symbolism is a means of functioning of Intellectualism. An idea , a thought, created is etched into permanence by creation of a symbol. There is no 'thing', a commodity, called Nation; there is no object called 'Respect'. 'Nation', 'respect', are the abstract things created by Human Intellectualism in its endeavor to achieve what it wanted to.
To what degree can the concept of "Nation", "National Duty" or "respecting national symbols" be applied on a free man. 'Free' does not confine its meaning to 'being politically free', Free means emancipated, liberated from all his fears and all his boundations . Free from the personal, social, cultural, religious and all other kinds obligations. Do not ask me if there can ever be such a man, or if such a man can ever be alive, or that any man can so much be emancipated except by his death,-- for the endeavor of human kind is to march towards such a perfection which we otherwise cannot achieve. the spiritual purpose of our existence is chosen by our own decision. It is individual to each of us, the lack of freedom binds us to seek happiness in whatever boundations we each have been subjected to. Boundation can not apply what the happiness has to mean to us, and then ask of us to "learn to stay happy within those boundations". Task of human collaboration is not to further bind a man, but to help each man in the collaboration to liberate away himself from the rest of his boundations and eventually from the collaboration too.
This is in the same tone as the spirit of Love. Love is 'when he returns back to you when you set him free'. love is not when you keep him bound by fear to losing love if he attempts to free himself from the obligations of love.

Indian constitution did not have the concept of duties of a citizen in its original form.
Originally, the Constitution of India did not contain these duties. The Forty Second Constitution Amendment Act, 1976 has incorporated ten Fundamental Duties in Article 51(A) of the constitution of India. The Eighty-Six Constitution Amendment Act, 2002 has added one more Fundamental Duty in Article 51(A) of the constitution of India. As a result, there are now 11 Fundamental Duties of the citizen of India.

An analysis of the above duties reveals that they are applicable only to citizens and not to the aliens. It is expected that a citizen of India. While enjoying fundamental rights, should also perform these duties. Although there is no provision in the constitution for direct enforcement of any of these duties, yet. the courts are guided by these duties while interpreting various laws. These duties have Sanctity as these are included in the Directive Principles of State policy.
(http://www.preservearticles.com/201012251614/fundamental-duties.html)

The object of creating the constitution was not to create some obligations , some duties , so to speak, on the citizens, object was to grant freedom and to form the framework towards resolution of conflict areas when one's freedom will conflict with another. The "duties" or "responsibilities" of a citizen were created naturally, they were carved from such a mutual contract. They were , therefore, in the form of "responsibilities" than in the form of "duties" -- in the vein of serving somebody or someone. 'To serve' is antithesis to the idea of Freedom. 'To be responsible' is more aligning with the idea of Freedom -- making distinction from freedom due to madness and psychometric troubled state of a man - that , "you can do whatever you feel like".

But the balance of human mind is suspended on a thin tight rope. Therefore, to solidify any of the symbolic duties created from the object of Constitution is also kind of madness and psychometric troubled state of a man -- that ,"if you are not doing these duties, it means you are not giving respect to our nation". The cause- and-effect relationship is uni-directional proposition, it cannot be reverse applied.







Indian democracy -- A Contest of the negatives

Eventually we Indians have made Democracy and its freedom as a 'contest of the negative'. here, we don't choose between 'the good and the better', or between 'the good and the bad', BUT between 'the bad and the worse'. Has any one of us ever wondered how did to come to such a 'contest of the negative' ? Did we ever think that the bad has a self-sustaining logic to promulgate its existence, the cover of Political Freedom given to the Madness within the Human mind has become its means self-sustenance. And then, like poison cuts the poison, there is more Madness done by the sane ones to beat the madness of the insanes. In this whole fight rises the Dust of Madness which is what we see as the "contest of the negative".

A 'Nation' is concept of Human intellectualism, represented by 'national' symbols, which forms the geographical congregation of the people who have agreed to live harmoniously by means of a common idea and logic to Justice, and who share their common resources. As with all products of Human Intellectualism, the Nation also works though Symbols. Symbols give the desired *permanence* to the abstract products which emerge from intellectualism. The soldier fighting at the border is the defender of this intellectualism in the core, which otherwise he too carries in his mind. Without the abstract idea being preserved in our mind, there is no such thing as "Nation", nor the "national symbols". The dishonor to "national symbols" is message of disharmony with our social living due to disagreements with our common idea of Justice. It is a Dishonour when the symbol is being contorted to protest against the Government, which is the only authorised body of the people of India to use those symbols.
But remember, in democracy, the Government in itself is the political party which is in power. The government is NOT the King Ruler or the Maker of our Destiny, a representation of the 'Shadow of God on earth'. It is a choice of the Majority, with the condition attached the choice of the minority too is not disagreed if the choice is morally right or in agreement with the Spirit of the The Common Agreement of our peace co-existence. The common agreement is what we call the Constitution.

In truth, with Freedom there ARE NO duties of a free man. There are only responsibilities. Those responsibilities which ensure the survival of his ownself and his surroundings. The political thinkers of India often mistake at when the rhetorically enquire "freedom does not mean 'X' " . This is a logical Fallacy. Freedom is absolute, freedom is liberation from basic physiological needs of Maslov's Need hierarchy, freedom is eventually aimed to emancipate human from all his boundations. An emancipated man has NO DUTIES, he is free to do all that he wants. The purpose of political freedoms is to help each man align with the spiritual aim of his existence. The political rights, therefore, are *inalienable*. Such Freedom is curtailed only by what the English philosopher John Stuart Mill calls "the Harm Principle" - you can do whatever you want with your freedom , except those which may harm others.




To enforce the concept of 'national duty' on a person who has otherwise also been promised  Freedom is a a form Madness in subtle ways. The Constitution , the common agreement , provides for this freedom to each of us. It is not the 'national duty' which is the purpose of our spiritual existence. 'National Duty' of the nature as 'respecting national symbols' is merely a symbolic act to show a citizen's concurrence to the Common Agreement . Even while not 'respecting the national symbols', one might still be honouring the Common Agreement by ways of discharging those duties which are meant to preserve or enhance this Agreement, such as , by ways of defending the Common Agreement, by ways of enhancing the reach of the Common Agreement. The agreement is meant to provide something to each of us, not to exact something from each of us under some unchallenged condition. The agreement should not and must not used by one group of citizens, all of then party to the agreement, to seize control of the other group of citizens, also a party to the Common agreement, by demanding something like "national duty" formed under the aegis of the Agreement. This will defeat the purpose of Agreement-- the key to our peaceful co-existence.