Monday, February 20, 2017

जीलैंडिया की खोज और मापदंड में इंसानी चाहत की प्रभुसत्ता से मुक्ति

जीलैंडिया असल में जल मगन महाद्वीप (continent) है जिसका सिर्फ 5~8 प्रतिशत ही सतह पर है। जलमग्न जीलैंडिया के पर्वतों में से कही पर पानी से बहार निकलते तीन पर्वतों की चोटी पर ही बसा द्वीप देश है न्यूज़ीलैंड ।
बड़ी बात यह है की जलमग्न होने के बावज़ूद वैज्ञानिक इसको एक महाद्वीप के रूप में सम्मानित करने को बाध्य महसूस कर रहे हैं। कारण यह है की इसकी संरचना अपने आस पास के जलमग्न भू-plate के मुकाबले भिन्न पायी गयी है। फिर आगे की शोध में इसका पशु जीवन ,वन्यजीवन और वनस्पति भी एकदम नज़दीक की ऑस्ट्रेलिया भू -प्लेट से भिन्न पाया गया है।  भूकंपो के अध्ययन में भी ज़ीलैंडिया tectonic प्लेट को ऑस्ट्रेलिया plate से घर्षण करते समझा जा चुका है जो की इसका ऑस्ट्रेलिया से भिन्न होने का एक और प्रोत्साहित करता प्रमाण है।यह सब प्राकृतिक तथ्यों का समावेश वैज्ञानिकों को बाध्य कर रहा है की वह राजनैतिक या इंसानी मनमर्ज़ियों के बाहर आ कर प्राकृतिक तथ्यों के आगे नतमस्तक हो का ज़ीलैंडिया को धरती के आठवें महाद्वीप के रूप में स्वीकार करने लगें, तब जबकि इसकी 90 % से ज्यादा बड़ी भूमि जलमग्न है।

कभी कभी किसी की पहचान इंसानी चाहतों या राजनैतिक प्रभुसत्ता की मोहताज नहीं रह जाती है। तब जबकि प्रकृति ने खुद उसको विशिष्ट चिन्हों से नवाजा हो की उसके प्रोत्सहन प्रमाण सर्वप्रकट हो कर उसकी घोषणा करते हों।

Friday, February 17, 2017

The meaningfullness of the SOPs to the investigators in the aftermath of an incident

i was wondering what is the meaning of the SOP that is so fashionably talked about these days.
What is an SOP or the Standard Operation Procedures and what is its significance ?
The investigators in the aftermath of an incident/accident so pointedly ask you to hand them your SOP , and in turn you given them some computer printed papers with a bold written heading on in ,'Standard Operation Procedure'.
Thereafter it becomes as if the needful have been accomplished ,and the parties move on without making any critical point about what have they done with that copy of that ordinary printed stapled piece of papers , having the title 'SOP' .
Well, in first place we all need to contemplate over what is an SOP, so that we may proceed to do something meaningful with that document.
To understand about the SOP , I think that we first need to understand the Principles of Legalism which are the driving force behind the management techniques which create documents as the SOP to ascertain accountability . The legal principles accepted all over the world do not allow a single innocent man to punished, even if that may require of the fair judges to let off a thousand guilty persons. That simply means that determination of accountability is most critical if one wants to run his organization efficiently. Because , without the precise determination of the wrong doer, the judicial system will only be of very little help to you to reward or punish the persons according to how they have fulfilled their employment contracts, or the duties with you.
There comes the mechanism of exercising the control over the employees , something , by which you may guarantee that works are performed exactly as you want them to be. Logically  therefore, you will have to lay down the set of procedure or the STANDARD OPERATION PROCEDURES describing in precise details as to how an employee has to conduct a certain business.
Logically, then, you will also need to lay down the procedures on how to conduct the incidence where a departure from the SOP may be required. This , you will require as a necessity to prevent the employee from conducting the business as per his whim and later seeking the defense of inability to judge the incident Vi-a-Vis the SOP applicable to it. And ofcourse, in a fair process, how would you expect to let something happen to your business without your good knowledge of it. Therefore, you would lay down as a necessity that every single departure can happen only and only by your permission of it, or the permission of the person who you have delegated.
Since the SOP are meant to provide the accountability in the court of law, all the SOP actions will have a tight framework of paper trails around them. That means the rigorous paper work.
This , in turn , will mean that the SOP documents themselves need to start with the correct, legally sound paper trail around them !
Now what does that mean ??
It means that SOP themselves cannot be allowed to undergo amendment, retrieval, deletion, insertion, addition without a paper trail of who did it, when, under whose authority , and perhaps the why.
That means that no ordinary computer printed paper can be accepted for an SOP written in the face of it. The paper must mention the name and description of the issuing authority, the version, issuance date, receipt of having been read or the Reading Acknowledgement and so.
It will follow from the logic of it that once an *SOP* has been issued about any operation or the business, all actions pertaining to that business *must* necessarily happen by that *SOP* alone. That  means, no single incidence of departure can be tolerated with *SOP* being claimed of yet being in place. Because there cannot be any logical place for compliance and non-compliance both at the same time.
That also means that people thereafter cannot take defenses such as  *"as a practise..."*, or *"on grounds..."*, etc. None of such defenses are consistent with the compliance of the *SOP*. _'One has to be proven practicing only and only what he has himself laid down as a means of operation control_.
from the above theory we may proceed to contemplate as to what should the investigators do with the *SOP* which they so fashionably ask for.
first of all, they must keep tallying that all the answers given as confirming with the SOP that they have taken custody of. They must check that no departure have happened, and if there be any, the records of receiving permissions from the designated authorities exist.
the SOPs are very important to determine the admission of guilt in the court of law. But the SOPs can achieve that only if they themselves have been created with a sound legal admissibility around themselves. Shabbily written SOPs should have no place in the court of law. Such SOPs are but a disguised form of *arbitrary and discretionary* , the feudal era judicial procedures being practised in an organization.

Saturday, January 28, 2017

what could be the mission assignments of the BJP IT Cell ?

(from fb post dated 21st Jan 2017)

अब कोई मैन्युअल तो लिखी नहीं है ,इसलिए खुदी से यह समझना पड़ेगा की बीजेपी ने अपनी IT Cell को क्या क्या जिम्मेदारियां दे रखी है। सबसे प्रथम यही है की ज्यों ही मोदी सरकार की किसी भी मज़बूरी या बेवकूफी से कोई भाजपा और भक्तों की झेंप कराने वाली हरकत हो जाये, त्यों ही बाजार में तस्वीर का रुख पलट कर दिखाने वाले joke और meme सामग्री बाजार में उतार दो जिसे की भक्त लोग whatsapp वगैरह से वितरित और प्रसार करके हालात को अपनी जीत में प्रस्तुत कर सकें ।

BJP IT cell जल्लिकट्टू से प्रतिबन्ध हटाने से हुई झेंप से बचने के लिए पूरे मामले का मुखौटा बदलने वाले meme बाजार में वितरण शुरू कर दिया है। IT Cell अब जोक को PETA और बकरीद पर बकरा काटने के मोदी सरकार के "मुंहतोड़ जवाब" के रूप में दिखाना चाहता है, जबकि किसी समय में जल्लिकट्टू पर प्रतिबन्ध लगवाने में PETA से मेनका गांधी जी आगे आई थी, जो की भाजपा की सदस्या है 😜😎


non-linear logic में भारतिय न्यायालय

भारतिय न्यायालयों की भी यही आलोचना होती रही है। यहाँ कुछ भी साधारण तर्क की परिधि में नहीं होता है। कब किसको क्यों bail (जमानत) दी जाती है, क्यों जल्लितकट्टू पर प्रतिबन्ध लगता है, और बकरीद पर नहीं; और फिर क्यों वह प्रतिबन्ध  हटा लिया जाता है, और पशु संवेदन संस्था PETA ही प्रतिबन्ध की आशंकाओं से घिर जाती है..इन सभी के पीछे कोई एक linear logic तो है ही नहीं।
बार कॉउंसिल कहता है की भारत में करीब 45% वकील तो फर्ज़ी है। मेरा अनुमान है की इन हालात को देखते हुए तो शायद यह संख्या कही अधिक है। और जज कितने काबिल है कितने फर्ज़ी है इसका तो बार कॉउंसिल ने कुछ हिसाब ही नहीं दिया है। फर्ज़ी से अभिप्राय सिर्फ यह नहीं की उनकी डिग्री नकली है, phony scholar की भी समस्या है -- यानि ऐसे स्नातक जिनकी उपाधि तो कागज़ी मानकों पर असली है , मगर वह विषय की गहराई में कुछ भी ज्ञान नहीं रखते हैं।
सब कुछ उल्टा पुल्टा है भारत में । प्रतिदिन कम से कम एक खबर मिलती है की  कैसे भारत के किसी हिस्से में कोई न्यायलय मनमर्ज़ी के 'तर्कों' पर कोई निर्णय दे रहा है। अभी चाँद दिनों पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने किसी दो दंगे के हत्यारों को bail दी इस बिन्हा पर कि  इन्होंने हत्या सिर्फ उकसावे में तो करी थी, पीड़ित के मजहब की वजह से।
सरकार से संबधित विषयों पर तो करीब करीब हर विषय पर कोर्ट उनके पक्ष में ही फैसला करता है। क्यों और कब किसी पॉलिटिशियन का नाम किसी लेन देन की किताब में आने पर जाँच आवश्यक होती है, और कब यही अपर्याप्त सबूत बन जाते है , यह सब आम आदमी के linear लॉजिक में तो नहीं रह गया है।अब तो कोर्ट की मर्ज़ी ही न्याय का तर्क बन कर रह गया है।

Friday, January 27, 2017

समीक्षा : सिर्फ 57 भारतियों की सम्पदा बाकि नीचे से 70% जनसँख्या के बराबर है

कुछ् पुरानी उदघोषणाएं सच साबित होने लग गयी है।

कुछ दशकों पहले एक डाक्यूमेंट्री सिनेमा zeitgeist (सजग और उत्सुक लोग youtube पर देखें) में बताया गया था कि कैसे दुनिया की सभी बुराइयों की जड़ इंसान की पैदा करी हुई एक वस्तु , पैसा, की देंन हैं। आगे कुछ और डाक्यूमेंट्री (ताथयिक ) सिनेमा , जैसे the hidden secret of money (part 4) (उत्सुक लोग youtube पर देखें) में बताया गया था की पैसा छापने के तरीके में ही यह पेंच छिपा है कि दुनिया में महंगाई आती ही रहेगी और महंगाई के दबाव में इंसान जीने के सभी कोशिशों में अपराध करता ही रहेगा।
पैसा छापने के पीछे के पेंचों का खुलासा करते हुए डाक्यूमेंट्री the hidden secret of money (part 4) बताती है की कैसे दुनिया का सम्पदा असल में कुछ मुठ्ठी भर लोगों की निजी सम्पदा समझी जा सकती है। यह गुप्त , सुमड़ी में रहने वाले लोग कैसे बैंक और सेंट्रल बैंक(जैसे की RBI) से सांठ गाँठ करके जब चाहे पैसा अपनी सुविधा से छाप कर हमेशा अमीर बने रहते हैं। देशों और दुनिया की आर्थिक तंत्र की असल चाबी इन्ही लोगों के पास में है, और इसलिए असल में यही मुठ्ठी भर लोग दुनिया की सभी गरीबी और बुराइयों के जिम्मेदार माना जा सकता है। यह लोग अपने को निरंतर समृद्ध बनाये रखने के लिए जब चाहे मुद्रा छाप सकते हैं ,जिसके सह उत्पाद में दुनिया में महंगाई बढती ही जा रही है। फिर आम आदमी इस मेहंगाई से संघर्ष में अपने स्वतंत्र मन की चाहत पूरी करने से हट कर कोई 'professional' (कामगार) बन कर वही व्यवसाय करने लगता है जिसमे अधिक पैसा है। यह मुट्ठी भर लोग इस तरह अपनी मर्ज़ी से पैसा वितरण का नियंत्रण करके दुनिया में लोगों को आर्थिक गुलाम की तरह नियंत्रित करते हैं। इन मुठ्ठी भर लोगों पर दुनिया के तमाम नियम कानून का कोई प्रभाव् नहीं पड़ता जब तक इनके पास पैसा छापने के तंत्र में कुछ भी अंश का हस्तक्षेप मिलता है, जो की यह निजी बैंक संस्थाए बना कर करते हैं।  पेंच यही पर छिपा है। और जिसे की अर्थशास्त्री तकनीकी घुमाव दार भाषाओँ में गढ़ कर आम आदमी को समझना मुश्किल कर देते हैं जिससे की कोई जन विद्रोह न हो जाये।

दो मुँही समस्या है परिवारवाद

परिवार वाद में समस्या का दो तरफ़ा अंश है। इसलिए परिवार की समस्या से निजात किसी एक व्यक्ति के कंवारे होने से उनको वोट दे कर *नहीं ही* मिलने वाला है।

परिवार वाद समस्या के दो तरफ़े मुँह को गौर करें :--
1) अगर किसी अमुक व्यक्ति 'अ' को उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के प्रभाव में जनमानस स्वीकृति करता है , *तो यह गलत है* क्योंकि *_किसी और योग्य की योग्यता की अनदेखी उसका तिरस्कार होगी_*।

2) अगर किसी अमुक व्यक्ति 'अ' को उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि के प्रभाव में जनमानस *अस्वीकृत* करता है, तो भी यह गलत होगा, क्योंकि यह एक प्रकार का भेदभाव, जात-पात का स्वरुप ही होगा।

यानि, बड़ा भेद यह है कि परिवारवाद की समस्या खुद ही *दोहरे चरित्र* की समस्या है।

इसलिए इसका निवारण यह तो हो ही *नहीं* सकता की *कंवरों को वोट दो*, या *_उनके परिवार ने देश को 70 साल लूटा, इसलिए अब हमें मौका दो_*।

इसका असल समाधान तंत्र सुधार में है। पद को ही सीमित कर दो। उधाहरण के लिए, अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए कोई भी व्यक्ति 2 से अधिक बार निर्वाचित नहीं हो सकता।
हालाँकि यह भी कोई पुख्ता समाधान साबित नहीं हुआ है, मगर यह इस *दो मुँही समस्या* का *सर्वाधिक उपयुक्त* समाधान ज़रूर है। दुनिया के किसी भी देश में परिवारवाद का एकदम *पुख्ता समाधान* आज तक खोजा नहीं जा सका है। मगर *सर्वाधिक उपयुक्त* समाधान सभी अच्छे देशों में लागू है।

Sunday, January 22, 2017

क्यों लबालब है भारतिय सामाजिक चेतना कुतर्क और कूट से

कभी कभी सोचता हूँ की भारतिय जनसँख्या में इतने कुतर्क और कूट (धोखा , भ्रम) आया कैसे ।
और जवाब में यही उत्तर मिलता है कि सदियों की ग़ुलामी और अथाह गरीबी से हमने खुद का मनोबल बनाये रखने के लिए जो ख़ुशी पाने की नुस्खे लगाये थे , उसमे हमारी संस्कृति ने विवेचना करना बंद कर दिया क्योंकि अत्याधिक विवेचना में दर्द और दुःख मिलता है। बस वही से यह कुतर्क और कूट हमारी सामूहिक चेतना में घर कर गए।
संक्षेप में समझे तो हमने अपने दुःखों से बच भागने के लिए जो "हंसते रहो", और "जिंदगी हंस के बिताएंगे" की दौड़ लगायी थी, तो बस वही पर हमने अपने चिंतन मस्तिष्क को पीछे रख छोड़ा था। संस्कृति और समाजशास्त्र के विद्धवान हम भारतियों के लिए कुछ ये ही नजरिया रखते हैं। वह यह समझ भारतीय फिल्मों की सफलता और उनके कथा पट के तत्वों को देख कर समझते हैं। मनमोहन देसाई से लेकर करन जौहर तक जिस प्रकार की फिल्में भारत में "हिट" होती आ रही है वह भारतीय लोगों की न सिर्फ पसंद बल्कि उनकी सामाजिक चेतना को भी छलकाती हैं। किसी दौर में तो मनमोहन देसाई और अमिताभ बच्चन ने नौ लगातार सुपरहिट फिल्में दी थी। और यदि कोई इन फिल्मों के दृश्यों और पटकथा की तार्किक समीक्षा करे तो शायद शर्म करेगा की भारतीयों को क्या पसंद था। खुद अमिताभ भी अपने एक साक्षात्कार में यह कहते सुने गए हैं की जब वह मनमोहन देसाई के साथ इन फिल्मों में काम करते थे तब आरम्भ में वह अपने करियर पर इस प्रकार की बेवकूफी वाले दृश्यों के लिए देसाई को अपनी चिंता बताते थे कि , 'क्या कर रहा है यार, ऐसी बेवकूफी दिखा कर मरवायेगा क्या'। मगर मनमोहन देसाई को अपनी समझ पर पूरा यकीन था कि उन्होंने भारतिय जनता की पसंद की नब्ज़ पकड़ ली है। अमिताभ भी मनमोहन देसाई को अपनी सफलता का श्रेय देते हुए कहते हैं की मनमोहन सही थे, क्योंकि उनकी जोड़ी ने एक के बाद नौ लगातार सुपरहिट फिल्में ऐसे ही दृश्यों और पटकथाओं पर दी।
जनता को सुखद अंत , काल्पनिक संजोग , करिश्माई शक्ति से मारधाड़ के दृश्य भाते थे और मनमोहन देसाई की फिल्में इस प्रकार के दृश्य और पटकथाओं से भरी हुई थी।

शायद कुतर्क और भ्रम/कूट वही से हमारी सामजिक चेतना में व्याप्त हो गया। अत्याधिक कुतर्कों के प्रसार कर नतीजा है की आज हममें भेद कर सकने का अंतःकरण ही नष्ट हो चूका है तर्क और कुतर्क के बीच में। आलम यो हैं की आज तो 10 भारतियों के मध्य 12 नज़रिये होते है। यानि प्रत्येक भारतीय के पास एक से अधिक नजरिया ।

बड़ी बात यह है कि आज भी राजनैतिक पार्टियां के IT Cell हमारी इसी "सदैव हँसते रहो" की कमज़ोरी पकड़ कर अपना उल्लू सीधा करने वाले रणनीत लगाये हुए है। वह हमें हल्के, छोटे मोटे jokes के माध्यम से हमारी चाहते और मस्तिष्क पटल पर उभरती छवियों को नियंत्रित करते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता और हम हंसने के लिए जो jokes पढ़ते है वह कुतर्क और कूट से लबालब हमारी चेतना को किसी और की सुविधा के लिए मरोड़ते रहते हैं, कुतर्कों और कूट को jokes की जीवनरक्षक सांस मिलती है।

Saturday, January 21, 2017

syncreticism और विशेषण उपनाम - धार्मिक पंथ

हिन्दू प्रथाओं में आपसी विवाद के अंश बहुतायत है।इसे अंग्रेजी भाषा में syncreticism कहते हैं। मेरा मानना है की पश्चिमी विचारकों का हिन्दू पंथ को 'धार्मिक पंथ' कहने का आशय सारा यही नहीं था कि यहाँ कृष्ण और उनके भगवद् गीता में किसी धर्म नाम की वस्तु की शिक्षा दी गयी है।
पश्चिमी दार्शनिकों के अनुसार धर्म का अर्थ सिर्फ मर्यादित आचरण, रीत रिवाज़ का पालन, वगैरह तक सिमित नहीं था। उन्होंने सफलता से हिन्दू प्रथाओं में syncreticism को तलाश लिया था, और इसलिए वह अचरज में थे कि आखिर इतने सारे अंतर्कलह प्रथाओं के बावज़ूद यह सब समुदाये एक सह अस्तित्व में कैसे कायम हैं। वह सोच रहे थे की यह समुदाये कैसे तय करते है की कब आपसी समानताओं को विशिष्टता देना है और कब अन्तरकलहि भिन्नताओं को । इसका उत्तर उन्होंने तलाश किया था हिन्दू प्रथाओं में एक विशिष्ट प्रथा में -- निरंतर न्याय करते रहने की विधि में। और जिसको की हिन्दू पंथ में फिर से यही "धर्म" केह कर धर्म के विविध अर्थो में पुकारा जाता है।
बस इसीलिए पश्चिमी विचारकों ने हिन्दू भूमि पर चलन में प्रथाओं को विशेषण नाम दे दिया - धार्मिक पंथ।

आज़ादी चाहिए तो सबसे पहले गुलामी के आचरण और मूल्यों को चिन्हित कीजिये

किसको चाहिए आज़ादी और किससे ?

भई, इंसान को कैद इंसान की मानसिकता ही रखती है। जब मानसिकता में मनोविकृति बन जाती है।  कैसे आई होंगी यह सब प्रकार की गुलामियां जिनसे आज़ादी के लिए संघर्ष हुये और हो रहे हैं :- भारतियों को अंग्रेजों से आज़ादी चाहिए थी। देश आज़ाद हुआ, आज़ादी मिली; कश्मीर को भारत से आज़ादी चाहिए थी, विशेष प्रावधान अधिनियम बना, आज़ादी मिली ; दलितों को उच्च वर्गों से आज़ादी चाहिए थी, आरक्षण बना, आज़ादी मिली ; स्वतंत्र चिंतन को धार्मिक उन्माद से आज़ादी चाहिए थी, देश सेक्युलर भी बना, आज़ादी मिली।
मगर फिर क्यों यह सब गुलामियों के तौर तरीके आज भी देखने सुनने को मिल रहे हैं। क्यों फौजों में ख़राब खाना खिलाया जाता है और शिकायत करने वाले को प्रताड़ित किया जाता है? क्यों फौजदार सिपाहियों से व्यक्तिगत सेवा लेता है? क्यों ऑफिसों में boss is always right कल्चर चलता है ? क्यों प्रशासन में पॉलिटिशियन और ब्यूरोक्रेट की धाक चलती है ? क्यों खेल में कोच की मर्ज़ी चलती है, जी हजूरी और खुशामद चलती है , खिलाड़ियों का कौशल नहीं ?

शायद कही कुछ गलती हुई है हमारी शिक्षा नीति में। उसने हमें कुछ गलत पढ़ाया है, कुछ छिछला सा यह बताया है कि 'देश को किसने ग़ुलाम बनाया था ? -- अंग्रेजों ने' । उसने हमें यह नहीं बताया कि ग़ुलामी का अंश काया का रंग नहीं था, बल्कि असमान न्याय था । और असमान न्याय होता है सामंतवाद में। इसलिए ग़ुलामी खत्म करने के लिये अंग्रेजों को भारत छुड़वाना इलाज़ नहीं था, बल्कि सामंतवाद का ख़ात्मा ग़ुलामी से मुक्ति का जरिया था।
और सामंतवाद का निवारण होता है rule of law से । जब मनमर्ज़ी वाले कानूनों , व्यक्तिनिष्ठ पैमानों से मुक्ति मिलती है, जब discretion और arbitrariness से मुक्त कानून का चलन आता है। आज़ादी क्या खाक मिलेगी अगर ऑफिसों में आज भी performance evalutaion में व्यक्तिनिष्ठता को खेल करने का अवसर मिलेगा । जब बिना किसी स्पष्ट कारण ही सेना प्रमुख अपने दो वरिष्ठों को लांघ कर बन जायेगा। जब कुछ रंगीन "कारणों"  का बहाना दे कर मनमर्ज़ी करी जाती रहेगी। जब शिकायत कर्ता भुगतभोगी  को ही और यातना दी जाती रहेगी ।

आज़ादी की लड़ाई तो स्वाभाविक अंतहीन चलती ही रहेगी, बड़ी इकाई की छोटी इकाई से, फिर छोटी इकाई की और अधिक छोटी इकाई से । मगर असल आज़ादी कभी मिलेगी ही नहीं  अगर हमने सामंतवाद से मुक्ति के मार्ग को नहीं पहचान किया तो। सामंतवाद खुद इंसानी मनोविकृति में से ही तो आता है।इसलिए कहते है की इंसान को ग़ुलाम उनकी मानसिकता ही तो बनती है।

Tuesday, January 17, 2017

On the propagation of Bhakt mentality in India

How did so much illogical ness spread ?
I often ponder that even while Indian culture is knowledge oriented, --the great vedic culture,- and imbibes so much spirituality in it yet how come we have so significant population of the Bhakt mentality people living amongst us. Because, if we are to have the right knowledge and an awakened conscience truly, the arguments of the Bhakt would not have been so much perverse, the language so much unruly and filled with arrogance.
The unevenness of one's own logic - how could it escape the self-realised mind, i look at them with amazement. How is it that the marketing and advertising tactics work more than the real substance -- i seek to know. What has the spirituality done to our inner thoughts, or rather- what sort of spirituality it was , if at all there was any , that our political discourse is unable to follow up the Good Conscience .

It is as if that the norms of Constitutionality and the Legality can be so casually allowed to look different from the morality and the ethics. That is the the new normal of the Indian society, and i wonder to myself when did we come to this pass.
In the early days of the human civilization, the legality had to necessarily closely follow up the morality and the ethics. Indeed , the Good Conscience was the source of the law that the society followed. In accordance with this thought, i wonder as to how come this self-proclaimed spirituality leadership of the world has not given the Indian system the right legal practise, the ethical behavior and a morally awakened society .

the thousand years of enslavement that our country has suffered is the most plausible and easiest explanation that i come across each time i make such introspection.