Tuesday, January 17, 2017

On the propagation of Bhakt mentality in India

How did so much illogical ness spread ?
I often ponder that even while Indian culture is knowledge oriented, --the great vedic culture,- and imbibes so much spirituality in it yet how come we have so significant population of the Bhakt mentality people living amongst us. Because, if we are to have the right knowledge and an awakened conscience truly, the arguments of the Bhakt would not have been so much perverse, the language so much unruly and filled with arrogance.
The unevenness of one's own logic - how could it escape the self-realised mind, i look at them with amazement. How is it that the marketing and advertising tactics work more than the real substance -- i seek to know. What has the spirituality done to our inner thoughts, or rather- what sort of spirituality it was , if at all there was any , that our political discourse is unable to follow up the Good Conscience .

It is as if that the norms of Constitutionality and the Legality can be so casually allowed to look different from the morality and the ethics. That is the the new normal of the Indian society, and i wonder to myself when did we come to this pass.
In the early days of the human civilization, the legality had to necessarily closely follow up the morality and the ethics. Indeed , the Good Conscience was the source of the law that the society followed. In accordance with this thought, i wonder as to how come this self-proclaimed spirituality leadership of the world has not given the Indian system the right legal practise, the ethical behavior and a morally awakened society .

the thousand years of enslavement that our country has suffered is the most plausible and easiest explanation that i come across each time i make such introspection.

Saturday, January 14, 2017

मुन्नार में मुद्रा बनाने की मशीन

केरल के मुन्नार जिले में पहाड़ी, ठण्ड क्षेत्र में चाय के बागान है। वहां आने वाले सैलानियों के लिए टाटा कंपनी ने एक चाय संग्रहालय (tea Museum) बनाया है। इस म्यूजियम के अंदर चाय की औद्योगिक स्तर पर पैदावार से सम्बंधित ऐतिहासिक विशिष्ट वस्तुओं को संरक्षित करके प्रदर्शित किया गया है।
इन्हीं वस्तुओं के बीच चाय उद्योग के आरंभिक दौर की एक आवश्यक उपकरण है मुद्रा सिक्का बनाने के उपकरण , Coinage Machine. निकट में प्रदर्शित अभिलेख में इस उपकरण की ऐतिहासिक विशिष्ट का ब्यौरा दर्ज़ है।
ब्यौरा बताता है की चाय के पौधों की उपयोगिता तो इंसान बहोत पहले से जानता था, मगर उद्योग स्तर पर पैदावार नहीं होती थी। चाय की फसल चीन और भारत में कम से कम तीन हज़ार सालों पूर्व से हो रही है।अंग्रेज़ सौदागर अपने नाविक जहाजों से भारत केरल के रस्ते ही पहुंचे थे और सबसे प्रथम इन्होंने यहाँ केरल में पाये जाने वाले मसालों का व्यापार शुरू किया था। चाय भी इन्हीं मसालों में आती है। और पश्चिम देशों में बहोत लोकप्रिय होने लगी थी। इसलिए इसकी बाजार मांग पूरी करने के लिए इसकी पैदावार बढ़ाने की आवश्यकता थी। तब औद्योगिक स्तर पर पैदावार के लिए अंग्रेजों ने आवश्यक संसाधनों की भी मुन्नार में नींव डाली। इन संसाधनों में रेल गाड़ी भी शामिल है, पतली narrow गेज पहाड़ी क्षेत्र वाली, जिससे चाय की माल ढुवाई करी जाती थी। म्यूजियम में उन रेलगाड़ी के पहिये भी नुमाईश पर रखे हैं।
चाय उद्योग में मुद्रा सिक्के छापने वाली मशीन का सामाजिक आर्थीक महत्त्व है। उस आरंभिक दौर में मुन्नार के लोगों और समाज में मुद्रा नामक वस्तु का उपयोग नहीं था। इसके चलते चाय कंपनी को मज़दूरों को स्थायी तौर पर मज़दूरी के लिए रोकने का कोई जरिया ही नहीं था। भई, श्रमिक आखिर किस लोभ में वहां निरंतर श्रम करेगा ? इसका उपाय निकला की चाय कंपनी ने अपने खुद के मुद्रा बना कर मज़दूरों को श्रमिकी में देना आरम्भ किया और साथ में यह वादा किया की इस मुद्रा के बदले वह कंपनी की कोई भी व्यावसायिक उत्पाद 'आपसी आदान-प्रदान' की जगह 'खरीद और बेच' सकेंगे।
तो इस प्रकार वहां के समाज में मुद्रा की नीव डली और आधुनिक आर्थिक व्यवस्था आरम्भ हुई।

उद्योग स्तर उत्पाद से होते हुए हमारा समाज आज खपतवाद तक आ गया है, और विशाल स्तर निर्माण से आगे बढ़ कर हम आज प्राकृति संसाधन विनाशक स्तर पर निर्माण करने लग गए है। यह सब आरम्भ हुई व्यावसायिकता के प्रसार से, और व्यावसायिकता का आरम्भ हुआ था मुद्रा के मानव समाज में प्रवेश से।

Sunday, January 08, 2017

Professionalism संस्कृति और पर्यटन पर इसके प्रभाव

(..continued from वर्तमान युग की संस्कृति का संक्षेप इतिहास)

Professionalism Culture और पर्यटन पर इसके प्रभाव

professionalism वाले इस दौर में पर्यटन के उद्देश्य भी अब दूसरे ही हो चले हैं।

professionalism जो की अपने अभिप्रायों में श्रम का large scale व्यापार लिए हुई है, इस सभ्यता की एक और महत्वपूर्ण निशानदेही है। यहाँ इंसानो की एक बहोत बड़ी आबादी व्यापारिक वस्तु के उत्पाद दैनिक श्रम पर आश्रित है और इसके वास्ते  "professional" के रूप में तब्दील हो चुकी है। professional का एक दूसरा अभिप्राय है , ऐसे व्यक्ति जो की स्वतंत्र चिंतन ,यानि liberal thoughts , के लिए समय नहीं रखते हैं।

आरंभिक दौर में इंसान के भ्रमण पर जाने के उद्देश्य दूसरे हुआ करते थे। भ्रमण के सार को उस युग में बौद्धिक विस्तार की प्रक्रिया से जोड़ कर समझा जाता था। क्योंकि उस युग में चलन यानि यात्रा के संसाधन इतने विक्सित और सहज उपलब्ध नहीं होते थे, इसलिए इंसान यात्राएं बहोत कम करते थे। ऐसे व्यक्तियों के सोच के दायरे संक्षित और स्थानीय (parochial) होते थे ।स्थानीय से अर्थ है वह जो की लघु दर्शन लिए हुए है, व्यापक और समग्र (global) दर्शन का नहीं है। स्थानीय दर्शन में क्योंकि सूर्य को हम प्रतिदिन पूर्व दिशा से उदय या निकलते देखते हैं, और पश्चिम दिशा में अस्त यानि डूबते देखते है, इसलिए हमारा "सत्य" स्थानीय हो चलता है की " सूर्य ही धरती की परिक्रमा करता है"। यह apparent truth है। मगर किसी विस्तृत, व्यापक भ्रमण किये हुए व्यक्ति के नज़रिये में जब वह धरती के ध्रुवों पर प्रकृति के गूल रूप के कारण बसी दूसरी प्राकृतिक घटनाओं के दर्शन और कारको को देख लेता है, तब उसका "सत्य" परिवर्तित हो जाता है कि , "असल में धरती गोल है, गुरत्वकर्षण  शक्ति हमें धरती के केंद्र की और खींचती है, और धरती सूर्य की परिक्रमा कर रही है"। अब वह भ्रमण किया हुआ व्यक्ति universal truth की ओर अग्रसर हो जाता है। universal truth वह है की हर जगह लागू होता है, और इससे दोनों ही कारकों का संज्ञान किया जा सकता है -- जो हुआ उसका कारक, और जो होना तो चाहिए था मगर नहीं हो रहा है, उसका संज्ञान भी।

बरहाल, वर्तमान युग में भ्रमण के उद्देश्य अब उस व्यापक "सत्य" के शोध वाले नहीं रह गए हैं। professionals अब एक प्रकार का विश्व व्यापक समान रुपी जीवन जीते हैं। चूँकि professional बनने के लिए समान रुपी शिक्षा दीक्षा चाहिए, इसके लिए इंसानी सभ्यता ने बाकायदा एक education industry भी बनायी है। education industry से गुज़र कर सभी इंसानी बच्चे एक professional बन कर उभरते हैं, और वापस अपने बच्चों को professional बनाने के लिए दैनिक श्रम करते रहते हैं। सभी professionals की दैनिक चर्या करीब करीब समान ही होती है। वह सब के सब प्रातः office जाते हैं, यानि वह स्थान जहाँ वह "मानसिक या शारीरिक सेवा"  का श्रम का विक्रय करते हैं। और दोपहर को भोजन किसी lunchbox से या resturant में करके शाम को वापस घर लौट आते हैं। हफ्ते में उन्हें पांच दिन ऐसे ही जीवन गुज़र करनी होती है। एक बाद उनका weekend आ जाता है। और weekend को वह भ्रमण पर निकल जाते है।
यहाँ भ्रमण के उद्देश्य यह है की चूंकि पञ्च दिन एक समान जीवन यापन हुआ था, इसलिए थोडा अलग करके अपनी इच्छाओं की पूर्ती करी जाती है। अपनी इन्द्रियों को दूसरे भोज दिए जाते है।
भ्रमण का यह उद्देश्य अपनी मनोवैज्ञानिक संरचना में उत्थान वाला नहीं है, बल्कि इन्द्रियों की तुष्टिकरण का है। ध्यान रहे की 'संतुष्टि' (satisfaction' और 'तुष्टि'(satiation) में अंतर होता है। तुष्टि से अभिप्राय भोजन दे कर अस्थाई शांति देने से है, क्योंकि जैसे एक भोजन के बाद पुनः कुछ काल बाद भूख लगती है वैसे ही सभी इन्द्रियों के साथ भी होता है। यानि, professionals को अपनी इन्द्रियों को हर weekend पर तुष्टिकरण का भोजन देना पड़ता है। तो भ्रमण का उद्देश्य तुष्टिकरण है, दार्शनिक और बौद्धिक विस्तार नहीं है।professionals को भ्रमण से प्राप्त दर्शन से आधुनिक चलन वाले "फ़ोटो खीचों" ,"selfie लो" नेत्र तुष्टिकरण के कृत्य और चक्षु भोग करने होते हैं।

लोग अक्सर भ्रमण और पर्यटन में भी थोडा भेद करते है। भ्रमण के अभिप्राय लघु दूरी की यात्रा से है जबकि पर्यटन के अभिप्राय लम्बी दूरी की यात्रा से है। professionals भी weekend के अलावा long holiday trips पर जाते हैं।  weekend trips छोटे होते हैं जबकि long holiday trips लम्बी दूरी के होते हैं।
मगर उद्देश्य दोनों ही प्रकार की यात्राओं के वही हैं। इन्द्रियों का तुष्टिकरण।

यानि, पर्यटन भी उपभोग हो गया है, और स्थल भी इस मरुस्थल संस्कृति में उपभोग स्थान हो गए हैं। वर्तमान काल की उपभोगवादी संस्कृति है ही ऐसी। उपभोगवाद (Consumerism) का अभिप्राय है संरक्षणवाद (ConservationIsm) के विपरीत । उपभोगकतावाद में वस्तुओं को खपत किया जाता है, संरक्षित नहीं।

अब चूंकि सभी professionals एक समान की दिनचर्या और विस्तृत जीवन जीते है, तो उन सब के weekend trips और long holiday trips भी एक संग ही आते हैं। इसके नतीजे में पर्यटन स्थल

वर्तमान युग की संस्कृति का संक्षेप इतिहास

cultural scientists बताते है की वर्तमान की मानव सभ्यता अतीत की प्रोगऐतिहासिक दौर वाली सभ्यता की भांति किसी नदी की तलहटी पर बसी सभ्यता नहीं हैं। और न ही यह मध्यकालीन दौर वाली किसी समुन्दर किनारे बसने वाली, समुद्रीय जहाज़ों से व्यापार पर टिकी सभ्यता है। बल्कि यह 21वीं शताब्दी की सूचना युग वाली मरुभूमि सभ्यता है, जहाँ के महानगर किसी जलस्रोत- नदी या समुन्दर- से दूर बसने का जोखम ले सकते हैं  क्योंकि इस सभ्यता के मानव अपने अस्तितव के लिए मरुभूमि के एक उत्पाद खनिज तेल पर निर्भर रहते है।

सांस्कृतिक इतिहास के शोधकर्ता हमारी वर्तमान कालीन सभ्यता का आरम्भ अक्सर करके 16वि शताब्दी के इंग्लैंड और फ्रांस में घटी औद्योगिक क्रांति (industrial revolution) से मानते हैं। industry शब्द के अभिप्राय को large scale production से जोड़ कर देखते है, जब इंसान ने अपने गुज़र बसर के तरीके को व्यापार और व्यापरिकता से अधिक जोड़ लिया, तथा पुराने युग के तरीके -- किसानी , खेतीहरि और hunting (या शिकार) पर आश्रय करीब करीब समाप्त कर लिया।

industrial युग से सांस्कृतिक इतिहास के शोधकर्ताओं के और भी अभिप्राय होते हैं। industry शब्द का एक अभिप्राय यह भी है की इसमें उपभोक्तावाद(consumerism) है। यानि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन आश्रय प्राप्त होता है दैनिक श्रम से किसी एक उत्पाद की रचना में जो की किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन आश्रय के लिए आवश्यक है।
इसका एक अर्थ यह भी है की वर्तमान सभ्यता पूर्ण स्वतंत्रता वाली सभ्यता बची ही नहीं है, क्योंकि इसमें आश्रित स्रोत की जीवन यापन पद्धति ही चलती है --व्यापार (यानि Trade) । इसमें पूर्ण स्वतंत्रता की जीवन यापन पद्धति -- किसानी और शिकार-- ही समाप्त हो चली है।
trade यानि वयापार की सबसे आवश्यक वस्तु है पैसा यानि मुद्रा। हम कुछ भी दैनिक श्रम करते है तो उसका उद्देश्य मुद्रा को अर्जित करने का होता है। हम, यानि हम सभी व्यक्ति ---प्रत्येक व्यक्ति। कुछ लोग सीधे तौर पर किसी पदार्थ का व्यापार करते है। दूसरे अन्य अपने श्रम के व्यापार पर निर्भर करते है। पदार्थ के व्यापारी merchants कहलाते हैं, और श्रम के व्यापारी labourers या professionals कहलाते है।

व्यापरिकता ही वर्तमान कालीन मानव सभ्यता का सार है।

व्यापरिकता के दूसरा अभिप्राय है खपतखोर वाद , यानि खानाबदोशी या consumerism । अब क्योंकि इस बड़ी आबादी को जीवन आश्रय के लिए तेज़ी से उत्पाद निर्मित करने पड़ते हैं,  इसके लिए वह तेज़ी से प्राकृतिक संसाधनों की खपत करता है।

Professionalism Culture और पर्यटन पर इसके प्रभाव

professionalism वाले इस दौर में पर्यटन के उद्देश्य भी अब दूसरे ही हो चले हैं।

professionalism जो की अपने अभिप्रायों में श्रम का large scale व्यापार लिए हुई है, इस सभ्यता की एक और महत्वपूर्ण निशानदेही है। यहाँ इंसानो की एक बहोत बड़ी आबादी व्यापारिक वस्तु के उत्पाद-- दैनिक श्रम-- पर आश्रित है और इसके वास्ते  "professional" के रूप में तब्दील हो चुकी है। professional का एक दूसरा अभिप्राय है , ऐसे व्यक्ति जो की स्वतंत्र चिंतन ,यानि liberal thoughts , के लिए समय नहीं रखते हैं।

(....contd)

Wednesday, December 28, 2016

Subjectivity is the root of the evil of Discrimination

Subjectivity is the root of troubles. Subjective standards provide the inroads to ARBITRARINESS and DISCRETION to play havoc on RATIONALISM.
Subjectivity leads to loss of Reasonability. People are unable to make out the why's and how's behind the action. The Rule is lost.

Do we realize how all the Discrimination, the Color apartheid, the religion discrimination,  Caste discrimination, the Nepotism, the Favoritism walked into administration and governance ?
The answer is Subjectivity. Coupled with Power of Discretion.
It gives freedom to act whimsical and arbitrary , protected under the  guise of law.

Yet the Human Resource Managers of modern times are not equipped to eliminate or even reduce the Subjectivity in evaluation of Ability. Mechanism as Interviews, use of immeasurable parameters for performance evaluation keep bringing the unexplained, irrational results. We want to end the Reservation Policy; we want the Able and Worthy people , yet we have no agreeable, impartial mechanism to judge the Worthiness.

English jurist A.V Dicey propounded his theory of RULE OF LAW back in 20th Century keeping in mind the damages to the Reason caused by excessive Arbitrariness and Discretion.
Back in those times, the Feudal lords applied the Discretion everywhere to award justice. The JURISPRUDENCE of the Feudal Lords was full of self-centeredness. The Right was whatever suited, comforted or profited the Feudal and the Wrong was whatever was not Right. The revolt of the masses was essentially a revolt against the Jurisprudence of those times. Subsequently, as the era of REPUBLICANISM dawned upon humanity, the corrective actions in the Jurisprudence which ensued bore certain salient features. They were,
1) The law must be pre-notified and in the public space. That is, retro-effecting of laws was forbidden.
2) The law must be written. Oral laws had the problem of changing interpretation and words several times only to suit the federal lords.
3) The law must be held supreme. In those times , the feudals themselves were treated under different laws.
4) Conflicting sets of law must be avoided. The hypocrisy found ways to sustain itself due to excessive conflicting laws. Indeed , it was purely the discretion of the feudal lord to decide which one law would apply from a given pair of conflicting laws.  Thus, the feudals were always in a position to act whimsical and arbitrary despite all the sets of law.

Why 'Whatsapp forwards' by the BJP IT cell

the BJP IT Cell has a good reason why it prefers WHATSAPP over FACEBOOK .

It is because the Whatsapp is not intelligently designed for any debate or discussions.  As the experienced users of the two social media platform can compare and detect, in FB one can make a response to what he does not agree with. Infact each *Post* has a chain of *comments* following and  each comment can have a chain on *Reply*. This way a lively discussion can happen leading to unraveling of the *sophistication, entanglements and the lies*.

_Free flowing_ *_Debates and Discussions_* have a natural property of disclosing the truth about any matter. More, if it is *crowd-sourced* .However the Truth is the greatest enemy of the liar *propagandist*.

*Whatsapp* platform does not have these features. Over here, the unintended recipients will feel troubled by any debate or discussion they may not be interested in. The platform does not have features to show disagreements and cross-examine and scrutinise a post. Thus, the recipients are expected to accept whatever is received on their mobile device, *without* any *critical thinking* on the matter.

The BJP IT Cell is noticeably designing the post for *whatsapp forwards*, that is why.

Further, the Whatsapp does not allow for anonymous posts. Whereas on Facebook one can assume a *Facebook Page* pseudo-identity and make post without any *fear or blame*.
Twitter and Google +(Google Plus) platform also allow even assumed, pseudo-identity registration. All these platform , although susceptible to rumour mongering post as there may not be any known human to vouch for the content, are yet a better platform because they allow a *crowd sourced* *_debate and discussions_*

any one interested on political discussions therefore if really has the *courage of conviction* , should come on the *publicly open*, and *debates and discussions* based platform .

any one interested on political discussions therefore if really has the *courage of conviction* , should come on the *publicly open*, and *debates and discussions* based platform .

Although the Whatsapp is not designed for it, if someone still wants to use it, I have sent the link, please feel obliged to your fellow persons who may not be interested in the " _shit_ " other people talk, and therefore one should spare them the same.

Saturday, December 24, 2016

तैमूर की कहानी

चंगेज़ तो शमम धर्म का अनुयायी था। काफी सारे लोग उसे मुस्लमान समझते है। एक हिंदी फ़िल्म में भी यही जताया है। मगर ऐसा नहीं है।
हाँ, आगे की कहानी किसी मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी है...मानो "अमर , अकबर, एंथोनी"   ।
क्योंकि चंगेज़ खान के मरने के बाद उसका साम्राज्य उसके चारों बेटों ने संभाला था। इसमें चंगु खान और मंगू खान से पूर्वी साम्राज्य संभाला, और चीन में राजधानी बनाई --- खान बालिक नाम से। यही शहर आगे बन कर आधुनिक बीजिंग बना। वहां इन्होंने चीन की प्रसिद्ध मिंग वंशावली की नीव डाली थी। और बड़ी बात, एक मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी, यह थी की यह भाई बुद्ध धर्म के अनुयायी तब्दील हो गए।

और चंगेज़ खान के दूसरे दो लड़के, हगलु खान के साथ पश्चिमी छोर से अपने पिता चंगेज़ खान का साम्राज्य संभाला। और यह लोग मुस्लमान धर्म के अनुयायी बन गए।

है न मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी वास्तविक कहानी !! एक ही पिता के चार बेटे -- दो हिन्दू, और दो मुस्लमान ।

तैमूर लंग एक मंगोल सिपाही था जो चंगेज़ खान की फ़ौज़ के साथ पश्चिमी राज्य समरकंद में आया था। वह मंगोल था इसलिए खुद को चंगेज़ का ही वंशज बताता था । उसे भविष्य में इस गप्प का फायदा मिला । हगलु खान के बाद उसे ही उसका उत्तराधिकारी बनाया गया था।
आगे जा कर तैमूर की वंश में बाबर का जन्म हुआ, जिसने भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना करी।

चंगेज़ खान मंगोल के शुष्क और शीत इलाके से था। वहां घुड़सवारी से चारागाहों की देख रेख होती थी। इसलिए वह लोग अच्छे घुड़ सवार थे। और क्योंकि इलाका शुष्क है, इसलिए व्यापार और आपसी हिंसा या लूटपाट से जीवन की आवश्यक वस्तुओं को पाने का तौर तरीका रखते थे। इसलिए वह लोग बहोत क्रूर और हिंसक थे। हाँ , मगर धर्म के कट्टर नहीं थे, क्योंकि असल में शमम धर्म भी हिन्दू धर्म की तरह बहु आस्था वाला , प्रकृतिक वस्तुओं और घटनाओं की पूजा अर्चना करने वाला धर्म हैं। ऐसे धर्मों में जहाँ हज़ार ईष्ट देव पहले ही हैं , वहां एक और का जुड़ जाना मुश्किल नहीं होता। दिक्कत तो एक ईष्ट पंथ की होती है, की बाकी नौ सौ निन्यानबे इष्टों को अस्वीकार करना पड़ता है।
बरहाल, इसके चलते मंगोल और मुग़ल शासक लोग किसी धर्म के कट्टरपंथी कतई नहीं थे। और इसके चलते ही उन्होंने बहोत बड़े भूभाग पर शासन किया और उनकी पीढ़ियों ने उसे चलाया। जब तक की पहला कट्टरपंथी , औरंगज़ेब नहीं आया। औरंगजेब के आते है साम्राज्य ख़त्म भी होने लग गया। कट्टरपंथियों के लिए यह साम्राज्य चलाने का एक सबक है।


जहाँ इलाके शुष्क और कम वर्षा के होते हैं वहां का मानव जीवन यापन के लिए कृषि जाहिर तौर पर नहीं करता है। बदले में वहां व्यापार या लूटपाट जैसे चलन उभर आये हैं। अब भारत में ही माड़वार के इलाके देखिये। मोदी जी की गुजरात भूमि या राजस्थान के रेतीले इलाके।
बात यह हो गयी की ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद से कृषि की प्रधानता जीवन यापन में वैसे ही कम हो गयी। लोग खेती की जमीन तक बेच कर नौकरी पेशे वाले हो चले। अब यह युग व्यापारिक युग है, कृषि तो नाम मात्र है। यहाँ औद्यागिक उत्पाद (factory scale production) और खपतवाद (consumerism) या खानाबदोशी ही चलता है।

अब आप भूल जाये की कोई व्यापारी झुकाव वाला नेता कृषिमके लिए कुछ भी करेगा। वह आपको झांसा ही दे रहा है। कृषि बस वही ही रहेगी जहाँ उद्योगिक स्तर पर उत्पाद होकर लाभ कमाया जा सके।। यानि छोटे किसान और नष्ट होंगे और सिर्फ बड़े किसान बचेंगे जो की और समृद्ध होंगे किसी बड़ी बिक्रय कंपनी से गठजोड़ करके।

Friday, December 23, 2016

Dilip Chandra Mandal जी के नाम खुला पत्र

"जाति तू क्यों नहीं जाती"

@Dilip C Mandal जी,
मुझे लगता है कि इस देश में आरक्षणवादी भी उतने ही बड़े ढकोसले वाले हैं जितना की आरक्षण-विरोधी। अगर किसी आरक्षण-विरोधी बॉस के जमीदारी के व्यवहार से आप परेशान हैं और फिर उसके स्थान पर कोई आरक्षण समर्थक आ जाये तो आप कतई यह अपेक्षा मत रखियेगा की अब आप को जमीदारी और सामंतीय व्यवहार से मुक्ति मिल जायेगी ।
बॉस आपका जैसा भी हो -- चाहे आरक्षण-विरोधी हो, चाहे आरक्षण-समर्थक हो, रहता वह जमीदारी दिमाग वाला ही है ।
कारण यह है कि आरक्षण समर्थकों को भी खुद असल में आरक्षण चाहिए "बॉस" के पद तक पहुँचाने के लिए। ताकि फिर वह लोग अपनी तरह का जमीदारी का डंडा चला सके। मगर चलेगा जमीदारी पना ही। इस देश में जमीदारी पने यानि सामंतवाद का असल में विरोधी तो कोई है ही नहीं। अतीत काल में सवर्ण लोगों ने जिस तरह के तर्क और व्यवहार करके समाज में भेदभाव , ऊँच-नीच फैलाया, तब उससे त्रस्त होकर उससे मुक्ति माँगने वालों ने आरक्षण का दामन पकड़ा। मगर अब खुद आरक्षण के भरोसे "बॉस" बनने पर वापस वही जमीदारी वाला तर्क और व्यवहार ही करते हैं।

और फिर जब आरक्षण-विरोधी आरक्षण से हुए नए युग के भेदभावों से परेशान हो कर आरक्षण व्यवस्था की शिकायत करते हैं तब आरक्षवादि टिपण्णी करते हैं कि, "जाति तू क्यों नहीं जाती"।
आखिर जाति जायेगी कहाँ से ? सामंतवाद वाला तर्क और व्यवहार किसी की जाति से चिपका हुआ नहीं है। और तुमने विरोध जातिवाद का किया है, सामंतवाद का नहीं !! जातवाद तो कोई समस्या न थी, और न हैं। दुनिया भर में feudalism यानि सामंतवाद को समस्या के रूप में चिन्हित किया गया, मगर इसके चरित्र को पहचान करके इसका निवारण किया गया। भारत में आरक्षणवादि, जो की सामंतवाद के सबसे प्रथम पीड़ित रहे हैं, वह सामंतवाद को उसके चरित्रों से न पहचान कर, उसके कुलनाम यानि surname से पहचानते हैं।
अब खुद ही बोलें, आखिर जाति जायेगी कहाँ ?? जब आरक्षणवादि खुद शक्ति आसीन होते हैं तब वह खुद भी सामंतवादी तर्क और व्यवहार ही करते फिरते हैं !! तब फिर सवर्ण नए किस्मम के पीड़ित बन जाते हैं और वह इस सामन्तवादी व्यवहार को वापस इनके surname से पहचानने लगते हैं। बात एक गोल चक्र में घुमने लगती हैं। आप खुद बताये,   कहाँ मुक्ति मिलेगी जाति से ??!!

सामंतवादी तर्क और व्यवहार क्या है, इसके बारे में भारत में कोई चर्चा नहीं होती है।

Monday, December 19, 2016

व्यक्तिनिष्ठता और आत्ममुग्धता के बीच का जोड़

व्यक्तिनिष्ठता और आत्ममुग्धता में भी एक जोड़ है।
सामंत लोग अक्सर करके आत्ममुग्धता मनोरोग (Narcissism Personality) से पीड़ित होते थे। आत्ममुग्ध मनोविकार से पीड़ित लोग अच्छा सामाजिक संपर्क नहीं रख सकते है। क्योंकि वह बात बात में खुद को केंद्र रख कर ही विचारों का मुआयना करते है। उनके लिए वह सही है जो उनको लाभ दे, और वह गलत है जो उनको हानि करे। वह दूसरों की दृष्टि से किसी कृत्य का मुआयना नहीं कर सकते हैं।

आत्ममुग्धता एक प्रकार का austism disorder है, जब बाल्य अवस्था की मैं- मेरा-मुझे ( I-me-myself) से इंसान बाहर नहीं निकल पाता है। ऐसा व्यक्ति empathy नाम की मानव गुण को विक्सित नहीं कर पता क्योंकि वह दूसरों की दृष्टि से मुआयना नहीं करना जनता। और न्याय की दुविधा यह है की न्याय का जन्म होता है "don't do unto others, what you would not do unto yourself" के सिद्धांत से ("दूसरे पर वह मत करिये जो आप अपने साथ होना नहीं देखना चाहते")। autism शब्द का मूल अर्थ भी "आत्म केंद्रित" है। आत्म-मुग्धता यानि narcissism का अभिप्राय भी "आत्म केंद्रित" से जुड़ा हुआ है। आत्ममुग्ध व्यक्ति सिर्फ स्वयं के लाभ और हानि को ही समझ पाता है। इसे बोलचाल की भाषा में स्वार्थी आचरण (selfish behavior) बोलते है। वह दूसरों का फायदा उठना स्वयं सीख लेता है।
    असल में शिशु अवस्था में आत्म केन्द्रीयता जीवन उपयोगी आचरण होता है। इसलिए क्रमिक विकास और प्रकृति ने सभी जीव जंतुओं के शिशुकाल में उन्हें आत्मकेंद्रियता से सुसज्जित किया है। दिक्कत यह है की क्रमिक विकास के बड़े जीव, जैसे की मनुष्य, अपने जीवन के लिए सामाजिकता पर निर्भर भी करते है। इसलिये बाल्य विकास के दौरान साधारण मनुष्य बालक शिशु अवस्था के आत्मकेंद्रियता को त्याग करके सामाजिक में तब्दील हो जाता है। और यदि कही पारिवारिक , राजनैतिक या सामाजिक माहौल में कही कोई गड़बड़ उत्पन्न हो जाये (जैसे अत्यंत गरीबी, हिंसा, पारिवारिक क्लेष, इत्यादि) तब शिशु आत्मकेंद्रियता को त्याग नहीं कर पाता और वयस्क हो कर आत्ममुग्ध आचरण का व्यक्ति बन जाता है।

आत्ममुग्धता ऐसे व्यक्ति को सफलता खूब दिलाती है। वह एहसान लेकर भी एहसान फरामोशी कर सकता है। वह धोखा दे सकता, पीठ पीछे खजर चला सकता है। इसलिए वह कामयाब नज़र आता है। बस सामाजिक संबंधों में बाधा रहती है। उसके दोस्त तो बहोत होते हैं, मगर अपने सगे कम होते है।

सामंतो की सफलता भी आत्मकेंद्रियता से ही आती है। इसलिये आत्ममुग्धता अक्सर सामंतवादी चरित्र "गुण" है, जो की वैसे एक शिशु विकास का दोष होता है।

सामंत या वैसी मानसिकता के लोग आसपास ऐसे ही लोग रखते है जो की उनकी हाँ-में-हाँ भरे। न्याय वही करते है जो उन्हें लाभ दे। उनके मस्तिष्क को एक यौन आनंद का अनुभव होता है अपने शत्रु को परास्त करके, उपहास या अपमान करके। वह इस प्रकार के आनंद के आदि होते है।  इसे मनोविज्ञान में narcissistic pleasure supply बुलाया जाता है। आसपास खुदामद और चापलूसों का हुजूम बनाये रहते हैं। ऐसे लोगों को निष्पक्ष होना मुश्किल होता है। वह वस्तुनिष्ठ(objective) व्यवहार नहीं कर सकते हैं। वह व्यक्ति की अपने प्रति निष्ठा को  बढ़ावा देने के लिए उन्हें इनाम में पदोन्नति देते है । और शत्रु और तीखे आलोचकों को सजा के तौर पर प्रताड़ना।
बस, यही से व्यक्तिनिष्ठता सरकारी या कार्यालय का मान्य आचरण बन जाता है।

कलयुग में झूठ की marketing

Marketing क्या है ??

Marketing  एक बेहद अलंकृत शब्द है कलयुग में जनता को बुद्धू बना कर झूठ, फरेब, नुक्सानदेहक , नशीली वस्तु को बेचने का, एक "अवैध" वस्तु के व्यापार करने का।

वास्तव में marketing का अर्थ अपने मूल भाव में था किसी  दुर्लभ, अपर्याप्त, मगर वैध व्यापारिक वस्तु की सहज बिक्री और व्यापार हेतु उस वस्तु को जनता के बीच पहुचाने का logistical क्रम बनाना, जिससे उस वस्तु की आसान उपलब्धता से उसकी सहज बिक्री को प्राप्त किया जा सके।
जाहिर है की marketing के प्रासंगिक अर्थो में promotion और advertising भी आता है, क्योंकि जब कोई वस्तु दुर्लभ और अपर्याप्त होती है तब उसकी जन सूचना और जनता के बीच उसकी जानकारी भी कम होती है। इस बाधा को पार लगाने के लिए जिस पद्धति को उपयोग में लाया जाता है उसे promotion और advertising कहते है।

मगर वर्तमान में marketing के मायनो में वह "दुर्लभ और अपर्याप्त" व्यापार की वस्तु एक "अवैध पदार्थ" है, जिसके व्यापार पर आरंभिक दिनों में प्रतिबन्ध माना गया था।

आधुनिक जानकारी युग की  वह अवैध व्यापारिक वस्तु क्या है ?
--
"एक बेबुनियाद, स्वयं अपने पैरों पर टिका न रह सकने वाला झूठ" ।
DISINFOMATION.

जी हाँ। आधुनिक काल information age वाला कलयुग है। यहाँ जानकारी बिकती है तो साथ साथ झूठ भी बिकता है। जरूरतों की बात है, कुछ व्यापार अज्ञानता, अबोद्धता , असमंजस जैसी जन चेतना पर ही टिके हुए है। प्रजातान्त्रिक राजनीति भी ऐसा ही एक उपक्रम है। जानकारी में मिलावट करके झूठ को लोगों को निरंतर बेचा जाता है और अरबो रूपए का मुनाफा कमाया जाता है।

झूठ को निरंतर बिकते रहने के लिए जिस logistical क्रम की आवश्यकता होती है वह है propaganda और Disinfomation। जैसे किसी सामान्य वस्तु की बिक्री के लिए जनता में जानकारी लाने हेतु promotion और advertising की जरूरत होती है, उसी तरह झूठ के लिए propaganda चाहिए होता है।
झूठ के propaganda की पद्धति होती है जन सूचना माध्यम। यानि समाचार सूचना तंत्र, जिसे मीडिया केह कर भी बुलाया जाता है।

झूठ की Marketing, यानि झूठ को आसानी से लोगों के बीच स्वीकृत करवाने के लिए जिस logistical (लॉजिस्टिकल) क्रम की आवश्यकता है वह इस प्रकार है
झूठ बोलो,
ज़ोर से बोलो,
बार बार बोलो,
लगातार बोलो,
जब तक की,
लोग उसे ही सच न मान ले।