Friday, September 19, 2014

#अंधभक्ति की समस्या है क्या.... ???

गहराई से विचार करें तो #अंधभक्ति की समस्या का मूल अर्थ है वह परिस्थिति जब मनुष्य सत्यापन की विधि में श्रद्दा के मनोभाव का अत्यधिक प्रयोग करता है, शरीर की इन्द्रियों का नहीं।
यानि #अंधभक्ति में मनुष्य सत्य उसी को "मानता है" जिसमे उसकी श्रद्धा है,अथवा जो उसकी वर्तमान श्रद्धा मनोभाव से तालमेल रखे,वह नहीं जो कि उसकी इन्द्रियों और तार्किक मस्तिष्क के गुणात्मक प्रयोग से निष्कर्ष निकले तथा वर्तमान श्रद्धा को विचलित करे।
  चरवाक् नामक के प्राचीन विचारक ने भारत में नास्तिक विचारधारा की नीव डाली थी। चरवाक् के अनुसार सत्य वह था जो इन्द्रियों द्वारा गृहीत किया गया हो।
   इससे पूर्व आर्यों की संस्कृति मूलतः विद्या ज्ञान पर आधारित थी । अगर मानव विकास की प्रक्रिया को अन्थ्रोपोलोगिकल दृष्टिकोण से देखें तो ज्यादा आसन हो जायेगा समझना कि आर्यों ने वनचर्य जीवन शैली से आ रहे क्रमिक विकास मानव को विद्या की ओर क्यों प्रेरित किया होगा और संस्कृति क्यों विद्या पर ही आधारित हुई होगी।
   बरहाल, विद्या गृहण करने के उपरान्त एक समस्या अक्सर उत्पन्न होती होगी की सही ज्ञान किसे माना जाये। ऐसा अक्सर होता है की एक से अधिक ,विरोधास्पद विचार दोनों ही सत्य ज्ञान होने का आभास देते हैं।
   अधिक work करने से इंसान की जिंदगी छोटी हो सकती है ,जबकि अधिक workout करने से शरीर स्वथ्य रहता है और इंसान अधिक लम्बा जीता है !!
   तो स्वाभाविक प्रशन उठता होगा की किस ज्ञान को सत्य ज्ञान माना जाये, और किसी परिस्थिति में किस ज्ञान का प्रयोग करा जाए इसका न्याय कैसे किया जाए ?
  आर्यों की संस्कृति में सभी प्रकार के विचारों का एक साथ सह-अस्तित्व करना स्वाभाविक ही था क्योंकि उस काल में एक-आस्था के विचार और सम्प्रदायों का जन्म होने की कारक-भूमि अभी तैयार नहीं हुयी थी।
   उस काल में बहु-विचारक आर्य संस्कृति ने न्याय करने की विधि के माध्यम से ही नैतिकता को खोज होगा जिसके आधार पर मनुष्य दूसरे मनुष्य से सम्बन्ध रख सके और एक समाज का निर्माण हो सके। निरंतर न्याय करते रहने की इस क्रिया को ही संभवतः "धर्म" कह कर पुकारा गया है, जो की आर्य संस्कृति का आधारभूत बनी। आर्य संस्कृति इस प्रकार से "धार्मिक संकृति" थी। धर्म से अभिप्राय वर्तमान काल में समझे जाने वाले 'हिंदुत्व' अथवा किसी भी कर्मकांडी मान्यता से नहीं था। धर्म का अभिप्राय न्याय,कर्तव्यपरायणता,उत्तरदायित्वों का निर्वाह इत्यादि से था जिससे एक मनुष्य दूसरे मनुष्य पर विश्वास कर सके और एक समाज बना कर सह-निवास कर सके।
   विद्या पर आधारित होने के वजह से आर्यों की संस्कृति को वैदिक संस्कृति कह कर पुकारा जाता है। और आपसी समाज के निर्माण का आधारभूत "धर्म" है, जो की बुनियादी नैतिकता का स्रोत है ।
   'धर्म' अपने आप में एक खुला हुआ स्रोत है जिसमे कोई भी योगदान दे सकता है। आधुनिक विचारधारा में समझे तो "धर्म" कोई Open Source Code program है ,जबकि नैतिकता के दूसरे स्रोत जो मनुष्यों ने भविष्य में विक्सित किये वह Closed Source Software थे जिसमे हर किसी को योगदान देने की अनुमति नहीं है।
     धर्म पर टिकने वाली बहु-विचारी आर्य संस्कृति को आगे के काल में प्रमाण के नियमों की आवश्यकता भी स्वाभाविक रूप से पड़ी होगी। न्याय को प्रमाणों के सत्यापन के बिना नहीं किया जा सकता है।
    तब यहाँ से दो विचारधाराओं का जन्म हुआ-जिसमे भिन्नता प्रमाण के नियमों के लेकर हुयी। आस्तिकता एवं नास्तिकता। आस्तिकता विचारधारा में सत्य को अंततः श्रद्धा का गुणक मान गया - सत्य वही है जिसमे तुम्हारी श्रद्धा है,बाकी सब असत्य है। इन्द्रियों से गृहित तथ्य भी सत्य नहीं हो सकता क्योंकि इन्द्रियां धोखा दे सकती है। Optical Illusion जैसे कितनों ही प्रयोग आधुनिक इन्टरनेट पर छाये हुए हैं जिनसे बार-बार यह निष्कर्ष आता है की कैसे आखों देखा भी सत्य होने का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं "माना जा" सकता है। यानि इन्द्रियां भी धोखा दे सकती हैं।
   तो आस्तिकता विचारधारा में इस समस्या का आसान समाधान यही समझा गया कि "मान लेना" ही सत्य का अंतिम स्वरुप है, और इसलिए श्रद्धा मनोभाव को ही सत्य ज्ञान का केंद्र समझना चाहिए। जो "मान लिया" वह सच है,जो नहीं "माना" वह सच नहीं है।
    यहाँ से #अंधभक्ति की समस्या का उद्गम होता है। आस्तिकता। आस्तिकता का एक-बिंदु अर्थ यह नहीं है कि "वह जो ईश्वर में आस्था रखता है"। आस्तिकता से अर्थ है वह जो श्रद्धा मनोभाव को सत्य ज्ञान का केंद्र मानता है ।
    अब चुकी श्रद्धा का पात्र अक्सर ईश्वर ही होता है इसलिए शायद भूल से आस्तिकता का अर्थ "ईश्वर में आस्था रखने वाला" निकल पड़ा है।
   आस्तिकता वादियों के साथ मुठभेड़ (तर्क वाद) में नास्तिकों को तथ्यों की सूची (Inventory of Facts) तैयार करने में भी बहोत दिक्कत आती है। इसलिए क्योंकि आस्तिक लोग तथ्य तो उसी इन्द्रिय ज्ञान को मानते है जो उनकी श्रद्धा भाव को विचलित न करे। हर वह इन्द्रिय ज्ञान जो उन्हें कष्ट दे सकता है वह स्वीकार नहीं करते है ,जब तक कि उस इन्द्रिय ज्ञान उनके विश्लेषण से ऐसे निष्कर्ष न निकले जा सके जो उनके श्रद्धा मनोभाव को कष्ट न दे।
     आस्तिक और नास्तिक विचारों में मेल होना करीब-करीब असंभव है। यह नदी के दो किनारे हैं जो शायद कभी भी नहीं निलेंगे। बहु-विचारी आर्य संस्कृति ऐसी है जो दोनों को ही साथ लेकर गंगा की धारा के समान बहती ही रहती है।
    आस्तिकता का परिणाम आधुनिक भारत में पंथनिरपेक्षता यानि Secularism के विचार पर पड़ता ही रहेगा। Secularism जिस प्रकार से पश्चिम संस्कृति और इतिहास में जन्म ली , वह मूल विचार आस्तिकतावादियों की श्रद्धा पर गहरी चोट दे सकती है। इसलिए वह इसे स्वीकार करेंगे ही नहीं।
   समस्या यह है कि प्रजातंत्र भी पश्चिमी उपज है और प्रजातंत्र में भिन्न विचारधाराओं के मध्य न्याय करने के लिए वैज्ञानिक विचारों एवं विधियों को ही स्वीकार किया जा सकता है। वैज्ञानिकता फिर से नास्तिकों से अधिक मेल रखती है, आस्तिकों से नहीं। अर्थ यह हुआ कि Secularism के बिना Democracy का सफल होना संभव नहीं है। और Secularism आस्तिकों को भाता नहीं। यानि आस्तिकों को बाहुल्य देश सफल Democracy नहीं बनाया जा सकता है !!!!!

Wednesday, September 17, 2014

गुरुत्व के नियम, इस्साक न्यूटन और भाजपा के अंधभक्त समर्थक

गुरुत्व के नियम, इस्साक न्यूटन और भाजपा के अंधभक्त समर्थक
(व्यंग रचना)

सोलहवी शताब्दी की बात है। इस्साक न्यूटन नामक एक युवक ने पेड़ से एक सेब को गिरते देख कर कुछ नया सोचा और उन्हें गुरुत्व के सिद्धांत कह कर प्रकाशित करवा दिया।
  न्यूटन के सिद्धांत के अनुसार सेब वृक्ष से धरती की ओर इस लिए गिर था क्योंकि एक अदृश्य ताकत 'गुरुत्व' उसे धरती की और खीच रही थी। और ऐसी ही एक ताकत धरती को सेब की और भी खींचती थी।
  भारतीय जनता पार्टी के रामदेव तथा मोदी के उपासक भक्तजनों को यह विचार कतई पसंद नहीं आया की कोई अनियंत्रित ताकत वस्तुओं का व्यवहार समान रूप से नियंत्रित करती थी। वह सब भगवान् कृष्ण तथा भगवत गीता में अथाह विश्वास रखते थे और उनका मानना था की सब कुछ इश्वर की इच्छा से नियंत्रित होता है ,तथा ईश्वर मनुष्य के द्वारा कर्मो के अनुसार उसको फल देता है।
  अंधभक्तो के इस श्रद्धा के अनुसार वृक्ष से गिरा सेब किसी गुरुत्व-फुरुतव की वजह से नहीं धरती पर आया था, बल्कि यह इश्वर की इच्छा थी। और सेब द्वारा धरती को अपनी ओर खींचने की सोच तो पूरी तरह बकवास ही थी।
  तो अंधभक्तों ने न्यूटन का विरोध करने की ठान ली। पता नहीं इस आदमी न्यूटन और इसके सिद्धांत समाज को कैसे अव्यवस्थित और भ्रष्ट कर दें। क्या पता कल को लोग ईश्वर में विश्वास करना ही छोड़ दें।
  न्यूटन को जब लोगों के विरोध का पता चला तब उसने अपनी प्रयोगशाला में तमाम प्रयोग विक्सित करे की लोग स्वयं से अपनी इन्द्रियों से आकर सत्यापन कर लें कि उसके द्वारा रचे सिद्धांत सत्य है या कि नहीं।
  अंधभक्तों और न्यूटन के मध्य तर्कों का वाद आरम्भ हो चूका था।
न्यूटन ने अपने द्वारा रचे सिद्धांतों के आधार पर कुछ घटनाओं के संभावित नतीजों की घोषणा करी जिसे यह पता चले की उसके सिद्धांत ठीक ठाक हैं कि नहीं।
   अंधभक्तों ने तुरंत कटाक्ष करते हुए बताया की उनके साथ भी कितनों ही पीर फकीर और सिद्ध योगी भविष्य वाणी करने वाले लोग है जो की न सिर्फ अजीवित पदार्थ बल्कि जीवित मनुष्यों के जीवन की भी भविष्य घोषणा कर लेते हैं।
  अंधभक्तों में से कुछ ने न्यूटन के साथ थोडा सयंम से वाक् युद्ध करने की ठान ली। उन्होंने न्यूटन से सर्वप्रथम यह पुछा कि उसे यह किस ने,किस मुर्ख ने बताया है की संसार में कोई भी दो वस्तु, दोनों एक दूसरे को अपनी और आकर्षित करते हैं।
   उन्होंने प्रयोग के तौर पर दो गेंदों को एक मेज पर आमने सामने रख दिया और न्यूटन से पुछा कि क्या यह दोनों एक दूसरे की और स्वयं से ही चलना आरम्भ करेंगी ?
  न्यूटन परेशान हो रहा था। उसने इस प्रयोग के औचित्य पर प्रशन उठाते हुए बताया की घर्षण की वजह से ऐसा नहीं होगा यद्यपि गुरुत्व शक्ति यहाँ भी विद्यमान होगी ।
  अंधभक्तों ने व्यंग करते हुए न्यूटन को अपनी बात से पलटने का आरोप लगाया। फिर पुछा की अब यह घर्षण क्या ताकत है। यह सब बातें न्यूटन को किसने सिखाया है? कौन उसे बेहका रहा है?
   न्यूटन ने पहले तो यह स्पष्ट करने की सोची की उसके विचार उसे किसी ने भी नहीं बताये है बल्कि उसके मूल रचना हैं।
  कुछ अंधभक्तों ने तो ठहाका ही लगाया की यह मुर्ख तो कुछ भी अपने मन ही उलूल-जुलूल बोल्ता रहता है। यह तो पागल है। किस शास्त्र में , किस उपनिषद में ऐसी किसी ताकत का ज़िक्र है। किसी भी प्राचीन और वैदिक ऋषि-मुनि ने इसका कही भी ज़िक्र नहीं किया है।
   कुछ अंधभक्तों ने न्यूटन की मूल रचना के प्रेरणा-स्रोत को जानना चाहा। तब न्यूटन ने उन्हें पेड़ से सेब के गिरने के वाकये का ज़िक्र किया।
   इसपर अंधभक्तों ने न्यूटन पर अपने बौद्धिक मैथुन करने के व्यंग्य वाण चलाये। कि सेब को पेड़ से गिरता देख कर इस मूर्ख न्यूटन ने देखों न जाने क्या क्या उलटी कर दी है। क्या मूर्ख को यह नहीं दिखा की आकाश में कितने पक्षी विचरण कर रहे हैं। इसको यह समझने में कितना समय लगेगा की इन पक्षियों के पर है जबकि सेब के पर नहीं होते ।इसलिए सेब नीचे गिर गया जबकि वही कोई चिड़िया का बच्चा होता तब वह पेड़ से गिर कर भी आकाश में उड़ जाता। कुछ अंधभक्त जिनकी सहन शीलता का बाँध टूट रहा था वह बोले कि जब तक इस मुर्ख को इसी पेड़ से नीचे नहीं गिरा देते इसको समझ में नहीं आने वाला है।
   अंधभक्तों ने तुरंत न्यूटन को अपने प्रतिद्वंदी आपियों का भी बाप करार दे दिया।
  कुछ अंधभक्तों ने फिर भी न्यूटन को और जलील करने के उद्देश्य से उससे वाक् युद्ध आरम्भ रखने की ठान ली।
  उन्होंने न्यूटन से प्रशन किया की भई यह गुरुत्व है क्या,जो दिखती भी नहीं है और कुछ ऐसा भी नहीं करती कि हम उसमें "अपनी श्रद्धा ईश्वर में से स्थानांतरित कर के पुन:स्थापित कर दे",यानी कि "मान ले"। इन्द्रियों से सत्यापन का हश्र तो तुमको हमने समझा दिया है। अब बोलो...? यदि हम गुरुत्व को माने तब तो कर्मो का कोई अंतर रह ही नहीं जायेगा। कोई जितना भी पर फड़-फड़ा ले,गुरुत्व तो सब ही को नीचे उतार देगी? यह कौन सी चीज़ है जो ईश्वर के कथन के विरुद्ध चलती है। भई कर्मों का फल नहीं मिलेगा क्या..? कहाँ देखा है तुमने गुरुत्व को?
   न्यूटन अब पागल हो रहा था। उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इन मुर्ख, समालोचनात्मक चिंतन से अस्त लोगों को कैसे समाझाऊँ। न्यूटन ने फिर भी हार नहीं मानी और एक प्रयास किया। उसने बताया की यदि आप किसी ऐसे आदर्श स्थान की कल्पना करें जहाँ घर्षण भी न हो,और गुरुत्व को कोई और स्रोत न हो, दोनों गेंदों का वजन आपस में तुलनात्मक हो तब मेरे यह सिद्धांत अवश्य सिद्ध हो जायेंगे।
   अब तो अंधभक्तों की हंसी का ठीकाना ही नहीं रहा। उन्होंने सीधे उपहास उड़ने वाली हंसी में न्यूटन से पुछा की अमां यार ऐसा स्थान है कहा?ज़रा हमें भी बताओ। ज़रा हम भी तो जाने कि वहां क्या क्या होता है?और तुम्हे क्या ख़्वाबों में ही यह सब दिख गया कि ऐसी किसी जगह में क्या-क्या होता है?
   न्यूटन बावरा हुआ जा रहा था। वह थक रहा था। उसने सोचा कि इससे बेहतर है की वह विदेश चला जाए जहाँ की संस्कृति में विरोधात्मकता उपज चुकी है और पंथनिरपेक्षता जन्म ले रही है। शायद वहां का प्रजातान्त्रिक प्रशासन उसकी बातों को सुन ले।
   इधर अंधभक्तों ने न्यूटन को तर्कों में परास्त कर के भगोड़ा घोषित कर दिया।
  अंधभक्तों के एक गुप्त समूह ने न्यूटन पर अपमानजनक ,कामुत्तेजित व्यंग्यों अथवा शत्रु राष्ट्र का शुभचिन्तक होने मिथक ताना बाना कस दिया कि उसकी बात कोई व्यक्ति सुने ना।और यदि सुन भी ले तब भी उसे अपनी श्रद्धा न दे। जनता विश्वास को श्रद्धा का पर्याय समझती है। विश्वास सत्यापन से होता है,प्रमाणों की परख से होता है, न्याय करने से होता है। श्रद्धा मन का एक भाव है, जो अंतःकरण का ही एक स्वरुप है।
   खैर, विदेश के प्रशासन को अपनी कॉपरनिकस वाली ऐतिहासिक और सामाजिक भूल याद थी,इसलिए उन्होंने न्यूटन का अपमान नहीं किया और उसके विचार और प्रयोगों पर अमल किया और आगे शोध कार्य आरम्भ कर दिया। नतीजों में उन्होंने गुरुत्व को नियंत्रित करने की क्षमता भी विक्सित कर ली-और राकेट और उपग्रह जैसे उच्च तकनीक वैज्ञानिक संसाधन विक्सित कर के न्यूटन के दिए गुरुत्व के सिद्धांतों को प्रकृति का अटूट नियम के रूप में स्वीकार कर लिया। वहां की पंथनिरपेक्ष संस्कृति में गुरुत्व तथा अन्य ऐसे ही कई वैज्ञानिक  नियम 'ईश्वर की शक्ति' का स्वरुप तथा 'उचित ईश्वरीय ज्ञान' समझ कर पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकार कर लिए गए।
   इधर अंधभक्तों ने पीड़ी बदलने के साथ ही न्यूटन को विदेश में मिली इस कामयाबी पर तुरंत सुधार करते हुए अपने वैदिक ज्ञान कोष ,वेदों तथा उपनिषदों में गुरुत्व के प्राचीन ज्ञान का सुधार कार्य किया ताकि यहाँ की श्रद्धा सुमन अंधभक्त अब आगे से न्यूटन के सिद्धांतों को स्वीकार करना आरम्भ कर दें।
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उपसंहार:
   न्यूटन को अपने देश में कुछ एक समर्थन फिर भी प्राप्त हुआ था।क्योंकि कुछ लोग ज्ञान और श्रद्धा में अंतर करना जानते थे। श्रद्धा जब अत्यधिक विकराल हो जाती है तब वह ज्ञान की बाधक हो जाती है। वह अंतःकरण को ही निगल जाती है और सही और गलत का आत्मज्ञान नष्ट होने लगता है। अत्यधिक श्रद्धालु लोग ज्ञान(अथवा तथ्य) का भी श्रद्धा के दृष्टिकोण से मूल्यांकन करते हैं, इन्द्रियों से नहीं। उनके अनुसार सही ज्ञान वही है जो उनकी श्रद्धा से तालमेल रखे। यह अत्यधिक आस्तिकता का अनवांछित परिणाम होता है।
   कम श्रद्धालु लोग अथवा नास्तिक लोग ज्ञान और श्रद्धा में अंतर रखते हैं तथा ज्ञान को इन्द्रियों के प्रयोग से मूल्यांकित करते हैं। इसलिए वह तर्कों के आधार से प्रमाण करने के कुछ नियमों को विक्सित कर लेते हैं। इसके प्रयोग से वह ज्ञान के सही अथवा गलत होने का न्याय करतें हैं।
   श्रद्धालु कहते है कि वह कोई वकील या जज नहीं है कि कचहरी के जैसी कार्यवाही जीवन में हर चीज़ में करें। इसलिए श्रद्धालुओं को नास्तिकों का "वकील गिरी" वाला आचरण बिलकुल भी नहीं भाता है।
   श्रद्धालु अंधभक्तों के अनुसार दुनिया ईश्वर की इच्छा से चलती है। नास्तिकों के अनुसार दुनियां कुछ सिद्धांतों पर चलती है। यह अटूट नियम ही वैज्ञानिक सिद्धांत है,और यही प्रकृति की शक्ति है। यह सब स्थानों और काल में समान रूप से चलते हैं।
  अंधभक्त स्वाभाविक तौर से किसी व्यक्ति में श्रद्धा और समर्पण का ही रास्ता चुनते है। उनके अनुसार समस्या का समाधान वह परम श्रद्देय व्यक्ति ही दिला सकता है,और वह स्वयं सभी इच्छाओं से ,भ्रष्ट होने के कारणों से विमुक्त है।
  नास्तिक लोग सिद्धांतों को तलाशते है। वह प्रकृति में और प्रशासनिक प्रावधानों में सिद्धांत की सटीकता को ढूँढते हैं। इसलिए वह सिद्धांतों की तलाश में किसी आदर्श आचरण परिस्थिति की कल्पना करने में हिचकते नहीं है, फिर भले ही वास्तविक दुनिया में वह आदर्श परिस्थिति का अस्तित्व न हो।
   अंधभक्तों को "हिन्दुत्व" किसी देवी देवता की उपासना और कर्मकांड में दिखता है।
  नास्तिकों को "धर्म" सत्य की तलाश में दिखता है। भग्वद गीता में चर्चित "कर्म का फल" से तात्पर्य प्रकृति के नियमों से है, किसी घटना का  अन्य किसी अतार्किक प्रतिक्रिय से नहीं।

Sunday, September 07, 2014

Hinduism---Confusion---Chaos ...The India special

It is sad, but it emerges out that modern Hinduism has used Bhagvad Geeta and Ramayan more to confuse out the morality than to explore morality !!
  People are regularly seen raprimanding each other for doing evaluation and Judgement of actions and deeds-"Who are you to judge his/my actions" , INSTEAD OF searching the locus of Morality and Justice using their ancient Scriptures.
     This is likely to lead Hinduism into a religion of eternally confused and immoral people who are never in harmony with each other .Hinduism will be a religion of TRAITORS for the simple reason that people are not in agreement with each other ! and for the reason that there is no common agreement about What is Dharm .
  Morality is the eternal binding force between humans which causes the formation of society. If the morality stands Confused and ambiguous, it will surely cause a confused, chaotic society.
   Despite a repeated use of words such a 'srishti ka kalyaan" , "prakrit ki shakti", a Hindu is unclear about the ultimate aim of Dharm, the purpose of Public Administration, and what should Social Welfare include and exclude.
Amartya Sen has ardently argued about why Democracy is so natural a Political System for the Hindu Majority- for the reason that both Hinduism and the Democracy both allow diverse and diametrically opposite  views to exist at the same time. But the weakness of Indian Democracy and of Hinduism is their inability to Deliver Justice, which in  parallel terms is same as Inability to Decide the Dharma.
   Public welfare is such a vast concept that it will virtually count every deed and the misdeed to be serving the public welfare. Therefore it becomes severely dependent on the Justice to be able to prevent a chaos.
  Modern government, controlled by Corrupt Politicians, are thus exploiting the concept of Public Welfare to their personal gains and the people live eternally confused to decide and Design methods provably objective enough to prevent their exploitations.
  The objectivity is not possible to be explored because the conversation run into accusations and counter-accusation INSTEAD OF exploring those common grounds of agreement where Solutions may come from.
Every political discourse in open space is about a blood boiling riot of accusations and counter accusations.
   There is no end...and  no solution in sight .
Because The confusion begins from the religion !
 

Thursday, September 04, 2014

व्यंग्योक्तियों का जन चेतना पर प्रभाव

ऐसा नहीं है की चुनाव प्रचार अभियान के दौरान जन संवाद में प्रकट हुयी व्यंगोक्तियों (Sarcasm) की शिकायत मैं प्रथम व्यक्ति हूँ जो यह कर रहा हूँ। आम चुनाव के दौर में कुछ एक नेताओं ने भी अपने अपमान का क्रोध व्यक्त किया था। मगर टीवी के समाचार चेनलों ने इस क्रोध को यह कह कर खारिज करवा दिया की हमारे देश के नेता लोग अपने को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेते है और तनिक भी, हल्का फुल्का व्यंग्य जो उनके विरुद्ध हो उसे पसंद नहीं करते हैं। यानी,यह राजनेता कुछ ज्यादा ही "बड़ा ज़मींदार साहब" वाला व्यवहार रखते हैं।
   निर्वाचन आयोग ने अपनी आचार संहिता में विरोधियों का उपहास करने वाले प्रचार पर प्रतिबन्ध पहले ही घोषित किया हुआ है। मगर स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार से इस नियम के टकराव के चलते यह भेद करना मुश्किल रहा है कि इस नियम का उलंघन कब हुआ।
इन सब से भी बड़ी बात यह है कि जन जागृति में यह ज्ञान लगभग विलुप्त ही है कि किस तार्किक कारणों से विरोधियों का उपहास प्रतिबंधित किया गया है !! सिर्फ यह कि इससे किसी का अपमान होता है या कि किसी नेता के मन की भावना को चोट पहुचती हैं --यह अपने आप में कोई तर्क है ही नहीं क्योंकि फिर इस तर्क पर तो सभी प्रकार के व्यंग्य को प्रतिबंधित ही करना पड़ेगा । स्पष्ट है कि ऐसी कार्यवाही स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर प्रतिकूल असर डाल सकती है।
  मेरी व्यक्तिगत खोज में व्यंग्योक्ति का भाषा विज्ञानं तथा जन-चेतना की दृष्टि से एक अन्य कार्य भी साधने का उद्देश्य नज़र में आया है। वह है कि गंभीर जन-संवाद जब प्रतिकूल निष्कर्ष दे रहा हो तब व्यंग्योक्ति , अपमानजनक शब्द, अथवा व्यंग्यात्मक लघु कल्प(जोक्स) के प्रयोग से विरोधियों को जन चेतना में सत्य छवि से गिराया जा सकता है। देश के नागरिकों में चल रहे राजनैतिक मंथन और गंभीर संवाद को व्यंग्योक्ति भंगित कर देती है और कूटनैतिक उद्देश्य पूर्ण करते हुए किसी विशेष दल अथवा व्यक्ति के हित में जन-भावना को मोड़ देती है।
    इस वजह से निर्वाचन आयोग को व्यंग्योक्ति पर नियंत्रण लगाने की आवश्यकता हो सकती।नियंत्रण से मेरा अर्थ प्रतिबन्ध कतई नहीं है। मात्र वैधानिक चेतावनी भी पर्याप्त कार्यवाही हो सकती है।

  स्मरण हो की चुनाव के दौरान कई सारे समाचार चेनलों ने "गुस्ताखी माफ़" और "आदाब अर्ज़ है" जैसे कुछ "हलके फुल्के" व्यंगात्मक पेशकश आरम्भ करे थे। यह 'हलकी फुल्की' पेशकश संभवतः जन चेतना में पल रहे असल और क्षतिग्रस्त  करने वाले व्यंग्यों की सफलता से प्रेरित थी।
   व्यंग्योक्ति जन समुदाय में गंभीर राजनैतिक विचार विमर्श और मंत्रणा को भंगित कर देती है। सोची समझे षड्यंत्र में व्यंग्योक्ति को जन-चेतना को दिशा नियंत्रित करने के कूटनैतिक उद्देश्य से प्रयोग किया जा सकता है। व्यंग्योक्तियाँ निर्वाचन आयोग की आखों में धुल झोंक कर ऐसा कर देती हैं। निर्वाचन आयोग का उत्तरदायित्व है कि चुनावों के दौरान नागरिकों में चल रहे मंथन पर कोई व्यक्ति अथवा दल बाहरी प्रभाव न डाले।

   कुछ एक अदृश्य व्यक्ति समूह द्वारा हाल के दिनों में विरोधी दलों के व्यक्तियों के लिए बहुतायात क्षतिग्रस्त करने वाली व्यंग्योक्तियाँ इन्टरनेट और सोशल नेटवर्क द्वारा प्रक्षेपित करी गयी है। कुछ अपमानजनक शब्द की सूची इस प्रकार है--
1)राहुल गांधी के लिए पप्पू शब्द का प्रयोग ,और संभवतः मंद बुद्धि होने का आरोप
2) सोनिया गाँधी के लिय राहुल की माता होने का व्यंग्योक्ति प्रभाव वाली छवि जिससे की पाठकों को आभास हो कि सोनिया देश की सभी प्रकार के समस्याओं की भी माता हैं।
3) दिग्विजय सिंह के नाम को विकृत करना और सीधे सीधे एक समुदाय विशेष का शत्रु और दूसरे समुदाय का हितेषी दर्शाना
4) अरविन्द केजरीवाल को व्यंग्योक्ति में "दूध का धुला" , "ईमानदारी का पुतला" इत्यादि कहना।
5) लालू प्रसाद पर अत्यधिक हसौड़ और बेअकल जन-छवि बनाने वाले जोक्स(व्यंग्योक्ति कल्प)
6) मनमोहन सिंह को रोबोट और कठ पुतला इत्यादि दर्शाना।
     व्यंग्योक्ति काल्पनिक तथा वास्तविक घटनाओं के मिश्रण से आभासीय सत्य होने का प्रभाव देती हैं। जैसे कि, किसी व्यक्ति विशेष द्वारा करी गयी कोई गलती- व्यंग्योक्ति इसके प्रभाव को वास्तविक अनुपात से कही अधिक विस्तृत कर देती है। और कभी-कभी वास्तविक अनुपात से लघु कर देना। आवश्यकता के अनुसार व्यंग्योक्ति का प्रयोग किसी वाद-विवाद में जब प्रतिकूल निष्कर्ष आने वाले हों तब विषय को विरोधी पर पलट देती है । यानि बचाव का उत्तरदायित्व विरोधी का हो जाता है, उसका नहीं जो की सहज रूप से दोषी है। अरविन्द केजरीवाल को "दूध का धुला" इसका अच्छा उदाहरण है। जिसपर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है उसी को स्वयं को सत्यवान और ईमानदार प्रमाणित करने का उत्तरदायित्व दे दिया जाता है !!!

    व्यंग्योक्ति कल्प (jokes) के जन चेतना पर प्रभाव भी इसी प्रकार के है। उदाहरण के लिए--
स्मरण करे हाल में प्रधानमन्त्री मोदी जी द्वारा जापान से बुलेट ट्रेन तकनीक के आयत से सम्बंधित समाचार सूचना। जन समुदाय में प्रचलन में आये एक joke में लालू प्रसाद को यह कहते दर्शाया गया की बुलेट ट्रेन देश के नागरिकों की जान के लिए खतरा है क्योंकि लालू प्रसाद की समझ से देश के नागरिकों का ट्रेन पटरियों पर निवृत होना एक अधिकार है !!
   एक गंभीर मंथन में देखे तो प्रशन उठेगा की क्या वाकई में लालू प्रसाद के कथन यह थे या उनका आशय यही था? यानी कही यह अपमानजनक असत्य-कल्प तो नहीं है (और असत्य कल्प ने क्या उद्देश्य प्राप्त किया) ??
दूसरा की, गंभीरता से सोचें तो आज भी देश की आवश्यकता अत्यंत गरीबी में रह रहे मानव जीवन की अमानवीय जीवन शैली का निवारण है, बुलेट ट्रेन से कही अधिक महत्वपूर्ण ।
  मगर मोदी जी का देश के उच्च और मध्यम वर्ग को संतुष्ट करने वाले महत्वकांक्षी परियोजना को लालू के विचारों से परास्त होने से बचाने में व्यंग्योक्ति का उपयोग किया गया। मोदी जी ने लालू के विचारों से उत्पन्न उत्तरदायित्व को 'स्वच्छता अभियान' आरम्भ करके निभा दिया और साथ ही साथ उनके समर्थकों ने लालू प्रसाद की जन छवि क्षतिग्रस्त करने के लिए व्यंग्योक्ति को आरम्भ कर दिया।
     राहुल गाँधी से सम्बंधित व्यंग्योक्ति में जापानी कार्टून डोरेमोन और सिनचैन से न मिलाने का विरोध दर्शाया गया। यह व्यंग्य उनकी  क्षतिपूर्ण "पप्पू" वाली जन छवि का पोषण करता है।
    इन्टरनेट इस दिनों व्यंग्योक्तियों से लबा-लब है। यह गंभीरता से सोचने का विषय है कि क्या इसका जन-चेतना पर कुछ भी विशिष्ट प्रभाव नहीं है ??।