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Explainer: the four judges rebel episode of 12 January 2018

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यह युग उद्यमियों का युग है, कृषकों का युग नहीं है यह

Enterprising skills हैं ही क्या ?
उद्यमी वही व्यक्ति हो सकता है जिसके चरित्र में ही हो -- नए , अपरिचित , अपरीक्षित वस्तुओं और विचारों का तुरंत उपयोग करे।
आम व्यक्ति जो कि श्रमिक प्रकृति के होते हैं, वह शारीरिक परिश्रम करके भोजन करके सो जाना पसंद करते हैं। वह खोज करने या नित नए प्रयोग करने में समय को व्यर्थ करना समझते हैं। वह दैनिक कार्यों में संघर्षशील रह जाते है और नए - अनुसंधान, आविष्कार, अन्वेषण - कभी भी नहीं कर पाते। सामाजिक इतिहास से देखें तो वह ' कृषक ' (agragarian) प्रकृति के लोग कहे जा सकते हैं।और जिनका चरित्र ऐसा नहीं होता, वही उद्यमी(entrepreneur) होता है। उद्यमी होना कोई बुरी बात नहीं है। उद्यमी  कहीं भी कुछ नए की तलाश में होता है। कृषक किस्म के लोग शारीरिक परिश्रमी होते हैं, और इसीलिए वह उद्यमी भी नहीं होते हैं; (दोनों बातों के जोड़ पर ध्यान दीजिए)। कृषक समय के बदलाव को न तो क्रियान्वित करते हैं और न ही खुद को समय के अनुसार बदल पाते हैं। तो वह पिछड़े भी बन जाते हैं।उद्यमी इसके विपरित हैं। सोलहवीं शताब्दी से जो औद्योगिक क्रांति में मशीन का इजाद हो गया, तब से दुन…

The process of how discrimination is carried out by teachers, professors and those pretending to be someone's mentor

There used to be student in my class who would indulge in theft activities right in full view of everyone's eyes ,but of course by a very clever way of shielding himself in case he would get caught. He would freely pick things from other's school bag and if caught, he would say that he was only giving the person a practise in keeping his stuff nicely secured, as if only being a good mentor in training him to keep his guard fast.
And ofcourse, the other times if the person failed to notice, the object stealing mission would get successful.
This method of theiving was not a sure shot, targeted mechanism, but it was surely a more successful, more guarded path to doing a wrong, that too in full view of everyone, and  thus this method worked on a statistically higher bet of success.Teachers, professors in college and the appraising officers in offices indulge in discrimination behaviour on the very similar lines. The easier method of indulging in discrimination is by pretending to …

श्रीमान न्यायालय जी, एकान्तता का अधिकार तो राज्य की असीम शक्ति को ही सीमित करने के लिए होता है !

(fb post dated 25 Aug 2017)

एकान्तता यानी privacy के विषय में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी नागरिक की एकान्तता को भेद सकने के संसाधन और क्षमता सिर्फ और सिर्फ राज्य कर पास ही होते हैं; नागरिक अपने पड़ोसी नागरिक की एकान्तता को भेद सकने की क्षमता नही रखता है।
कहने का अभिप्राय यह है कि एकान्तता का अधिकार को मौलिकता का स्थान देने का उद्देश्य ही यह है कि वास्तव में यह अधिकार राज्य बनाम नागरिक की ही आपसी खिंचा तनी का विषय है, और इस अधिकार का महत्व है राज्य और नागरिक के बीच मे शक्ति संतुलन को प्राप्त करने का।
गलतियां तो प्रतिपल हर कोई कर रहा होता है, राज्य या न्यायालय भी कोई दैविक आतरात्मा से निर्मित संस्थान नही है जो कि कभी कोई गलती करे ही ना। ऐसे में राज्य को असीम शक्तियों को नियंत्रित करने के लिए एकांकता का अधिकार का मौलिक बनाये जाना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पूर्ण करता है। और हम नागरिक वर्ग शायद इसी लिए ऐसा समझ सकते हैं कि एकान्तता का अधिकार भी उस श्रेणी में आता है जो कि किसी तथाकथित प्रजातंत्र को उसकी वह प्रकृति प्रदान करवाता हैं जिससे वह प्रजातंत्र कहलाने लायक बन सके। अ…

Why Indian form of "Republican Democracy" is a flawed system

(from Facebook post dated 20Nov2017)

भारत ने अपना प्रशासनिक तंत्र ब्रिटेन से हस्तांतरण में प्राप्त किया था।
और ब्रिटेन ने यह तंत्र स्वयं अपने विशिष्ट सामाजिक -ऐतिहासिक घटनयेओं से trial and error से रचा बुना था।
इसीलिये उनके तंत्र की खासियत आज भी यह है कि वह republican डेमोक्रेसी नही, बल्कि monarchical डेमोक्रेसी है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहां डेमोक्रेसी तब आयी जब जनता के आक्रोश ने राजा को आंतरिक युद्ध के बाद हरा दिया था।
मगर उनके विचारक चालक बुद्धिमान थे। उन्होंने यह मानवीय ज्ञान प्राप्त कर लिया की power corrupts, absolute power , absolutely corrupts। तो उन्हें पावर को नियंत्रित करने का तरीका ढूंढा power balance (या checks and balance) के सिद्धांत पर। इसके लिए राजशाही को खत्म नही किया बल्कि संसद बना कर राजशाही को लगाम में कर दिया।
इससे क्या मिला , जो कि भारत मे नकल करके लिए republican democracy तंत्र में नही है ?
भारतीय तंत्र में ब्रिटेन के मुकाबले Keeper of the conscience की भूमिका देने वाला पद कोई भी नही बचा। britain में चूंकि राजशाही dynasticism पर है, इसलिए वह आजीवन उस पद…

ग़ुलामी के लिये अभिशप्त है भारतीय संस्कृति

Via Mani Sकभी कभी यूँ लगता है कि big bang से लेकर आज तक के सामाजिक इतिहास को अपने सामने संक्षिप्त रूप में घटते देख रहा हूँ।
आआपा के अंदरूनी संघर्ष में वह सब मसालों के चुटकी भर मात्रा के अंश है जो कि आज तक के भारत के सामाजिक इतिहास की दास्तां को बयां करते हैं।
समझ मे आता है आखिर क्यों और कैसे इस देश की किस्मत में ही लिखा था कि इसे हज़ारो सालों की ग़ुलामी ही भुगतनि थी। और फिर सौ-एक सालो की आज़ादी के बाद में वापस ग़ुलामी में चला जायेगा।❌➖❌➖❌➖Via Mani Mये हमारी भारतीय मूल के डीएनए की तासीर है भाई । इसलिए ग़ुलामी तो अभिशप्त हैं हम❌➖❌➖👍🏼➖
Via Mani Mक्या करेंगे , क्या न करेंगे ये तो भविष्य के गर्त में हैं । यहाँ तो कुछ विश्लेषण और क़यास लगाए जा रहे हैं । भाजपा तो ऐसे मौक़े के तलाश में ही रहती है और कुमार इसमें किस रूप में बैठेंगे ये एक अनुमान है । और पार्टी की उपेक्षा कुमार को ऐसा करने पर विवश भी कर सकती है ।दूसरी बात ‘आप’ पर्सेप्शन की लड़ाई हार चुकी है ! अब ये सवार्थसिद्धि और चाटुकारों का एक समूह लगता है❌➖❌➖
Via Mani Sचलिए....यही सही।बहाने /कारण तो यूँ भी बनाये जा सकते है कि -
यहां good samari…

केशवानंद भारती फैसला : समीक्षकों की राय : भारत में प्रजातंत्र को दफन करने का ताबूत

Judicial review की power सिर्फ supreme court के पास होती है और इसका प्रयोग तब हुआ था जब मोदी सरकार ने National Judicial Accountability Bill लाया था। कोर्ट ने यह कह कर इस कानून को खारिज़ कर दिया कि इस बिल के मध्यस्थ आवश्यक separation of power नष्ट हो जाएगा।मगर judicial review की power का सर्वोच्च न्यायालय ने प्रयोग तब नही किया है जब मोदी सरकार सभी लोगो को अपने आधार कार्ड अनिवार्य करने को कहती है। सर्वोच्च न्यायालय ने आज नागरिक एकांकता और सरकार के अनिच्छित surveillance से नागरिकों को बचाने के लिए कार्यवाही नही करि है।तो कुल मिला कर सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ अपने स्वार्थी हक़ की खातिर अपनी एक विशिष्ट शक्ति का प्रयोग करता है, वरना प्रजातंत्र और जनता के हित और सरकार के भक्षण से बचाव जाए भाड़ में !यह सब हुआ कैसे ?न्यायविदों के बीच इस सवाल के जवाब की खोज में सर्वोच्च न्यायलय में लिए गए इस सब निर्णयों का अध्ययन जारी है।
कुछ न्यायविदों ने खोज निकाला है कि इन सब विषयों पर उठी तार्किक debate के पीछे में एक उल्टा पुल्टा न्यायपालिका का निर्णय पड़ा हुआ है जिसे की *केशवानंद भारती मुकद्दमा* नाम से जाना जाता…

EVM fraud के सामाजिक प्रभाव

ग़ुलामी की ओर तो बढ़ने लगे हैं, हालांकि यह होगी यूँ की अब फर्जी राष्ट्रवाद सफल होकर असली राष्ट्रीय एकता की भावना को ही समाप्त कर देगा।
Evm fraud वाली राजनीति की आवश्यकता होगी कि हर महत्वपूर्ण पद पर अपने गुर्गे बैठाए जाएं ताकि तैयारी बनी रहे यदि कोई जन विद्रोह सुलगना शुरू हो तो तुरंत बुझाया जा सके।तो अपने गुर्गे बैठाने की हुड़क में भेदभाव, पक्षपात वैगेरह जो कि पहले से ही चलते आ रहे थे, और अधिक तूल पकड़ लेंगे। फिर,भाजपा-समर्थक और भाजपा-विरोधी जो की पहले से ही आरक्षण नीति के व्यूह में जाति आधार पर विभाजित होते हैं, भाजपा के गुर्गे अधिकांश उच्च जाति और उच्च वर्ग के लोग ही होंगे जो कि भेदभाव और पक्षपात करके ऊपर के पद ग्रहण करेंगे।तो भेदभाव और पक्षपात एक व्यापक isolation की भावना फैलाएगा, जो कि राष्ट्र भाव को धीरे धीरे नष्ट कर देगा।सेनाओं में अधिकांश लोग व्यापारिक परिवारों से नही बल्कि किसानी वाले पिछड़े वर्गों के है। औपचारिक गिनती भले ही टाली जाए,वास्तविक सत्य से निकलते प्रभाव को रोका नही जा सकता है। सत्य के प्रभाव चमकते सूर्य की ऊष्मा जैसे ही होते हैं। जितना भी पर्दा करके सूर्य को छिपा लो, वह…

संविधान निर्माताओं की गलती के परिणामों को भुगत रहा वर्तमान भारत

*मानो न मानो इन सब अंधेर नगरी प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था के लिए अम्बेडकर का कानून ही जिम्मेदार है।*अम्बेडकर के संविधान की असली महिमा तो यूँ है कि अगर इसे राम राज्य में भी लगा दिया गया तो वह भी कुछ सत्तर-एक सालो में आज के भारत जैसे अंधेर नगरी में तब्दील हो जाएगा।*आखिर इस संविधान में गलती क्या है जिसकी वजह से यह सब हो रहा है ?*इस संविधान की गलती है कि इसमें अंतःकरण की ध्वनि की रक्षा करने वाली भूमिका के लिए कोई भी पद या संस्था है ही नही !इसलिए यहां अंतःकरण की ध्वनि पर काम करने वाले का हश्र अशोक खेमखा या संजीव चतुर्वेदी या सत्येंद्र दुबे हो जाएगा।असल मे भारत के राष्ट्रपति का पद भी एक नौकरी के रूप में है, अन्तःकरण की रक्षा की भूमिका के लिए बना ही नही है। कारण है राष्ट्रपति के चयन का तरीका उन्ही सांसदों के हाथ मे है जिनकी शक्ति को उसे संतुलित करने के किये check and balance देना था, और उसका कार्यकाल 5 पंचवर्षीय ही है।तो अब यहाँ संसदीय political class सर्वशक्तिशाली है जिसका चेक एंड बैलेंस के लिए कोई भी नही है। सर्वोच्च न्यायालय की judicial review की शक्ति को भी गुपचुप राष्ट्रपति पद के माध्यम…

Protestant Christianity, Secularism, और democracy में जोड़

पश्चिम में ज्यादातर डेमोक्रेसी आज भी राजपाठ वाली monarchical democracy हैं।  बड़ी बात यह भी है कि यह सब की सब protestant christianity का पालन करती हैं, catholic christianity का नही। secularism एक विशेष सामाजिक और धार्मिक आचरण है जो कि सिर्फ protestant christianity में ही मिलता है, catholic christianity में नही। और secularism को ही संरक्षित करने के लिए आज भी  यहां तक कि शासक और उसके परिवार को protestant समूह में ही शादी करना अनिवार्य है, catholic में शादी करने से राजपाठ गवां देने पड़ेगा। सिर्फ ब्रिटेन के संसद ने अभी सं2013 में कानून पारित करके करीब 500 सालों बाद राजशाही परिवार को catholic लोगो मे विवाह की अनुमति दी है। स्वीडन , नॉर्वे, denmark में तो अभी भी प्रतिबंध लागू है। राजशाही को तो राजशाही के भीतर ही शादी अनिवार्य भी थी। राजकुमार विलियम और शुश्री केट का विवाह विशेष अनुमति से हुआ है। राजनैतिक शास्त्र में दिलचस्पी रखने वालों को इन सब बातों का सामाजिक प्रशासनिक अभिप्राय समझना चाहिए। power balance theory में यह सब अनिवार्यता और प्रतिबंध कैसे पश्चिम की डेमोक्रेसी को शक्तिशाली और सफल बन…