Thursday, August 17, 2017

अंतरिक्ष अनुसंधान और कंप्यूटर कृत तस्वीरें

 अंतरिक्ष अनुसंधान की अधिकांश तस्वीरें काल्पनिक शक्ति के प्रयोग करके कंप्यूटर कृत ही दिखाई जाती हैं। 

बल्कि एक अश्कार्यजनक तथ्य यह भी है कि किसी भी मनाव निर्मित उपग्रह तथा यान ने आज तक खरबों खरबो धरती की तस्वीरें निकाली है, *मगर एक भी तस्वीर में धरती को पूर्ण गोल रूप में देखा नही गया है।
इसका मतलब है की इस बात का एकदम अभेद प्रमाण किसी तस्वीर के रूप में तो आज भी नही है कि धरती गोल ही है ! जो भी तस्वीर हम इंसानों ने आज तक देखी हैं जिसमे धरती गोलाकार दिखती है, *वह कल्पना कृत है।

दूसरा, कि धरती की एक भी तस्वीर बादल रहित कभी भी नही मिली है। मतलब , देशो और समुन्द्रों की सीमाओं को स्पष्ट दिखाने वाली google maps और google earth की जो कोई भी तस्वीर हम देखते है वह सब कंप्यूटर द्वारा कई तस्वीरों में संपादन करके बदलो इत्यादि को हटा करके, रंगों को निखार करके निर्मित करि जाती है। 
इसका अर्थ यह है कि दूसरे शब्दों में वह सब "छेड़छाड़" से प्राप्त तस्वीरें ही है।


 इसका यह अर्थ भी नही की हम वापस संदेह करने लगे कि क्या हमे झूठ पढ़ाया जाता है कि धरती गोलाकार है। 
मगर तब भी आज भी कई सारे ऐसे क्षणिक पंथ है जिनका आज भी मानना है कि धरती गोल नही, बल्कि सपाट है। और वह उसका प्रमाण भी बखूबी देते हैं, करीब करीब विश्वनीय सा की कैसे जो कुछ भी गोलाकार धरती के प्रमाण है , वह सब कैसे असल मे एक झूठ हैं !😃😀😀


उन्ही पंथ वालों के प्रमाणों को सुन कर यह समझ मे आया कि नासा की तस्वीरें तो असल मे संपादित तस्वीरे ही होती है। और नासा इस सच को बिल्कुल स्वीकार भी करता है !

😃😀😀

EVM मामला और सरकार का रवैया

सरकार ने बहोत ही बचकाना सा कारण बताया है न्यायलय में कई evm के साथ vvpat को क्यों नही अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

सरकारी वकील ने तर्क दिया है कि चूंकि evm कभी भी छेड़छाड़ कारी साबित नही करि जा सकी है, इसलिए वह छेड़छाड़ मुक्त ही मानी जानी चाहिए। और 2013 के जिस फैसले में vvpat की बात हुई थी, उसमे भी यही बात रखी गयी थी कि evm छेड़छाड़ विमुक्त है, और vvpat मात्र एक अतिरिक्त उपाय ही है। तो इस तर्क पर vvpat की अनिवार्यता को निरस्त करना चाहिए, ताकि इसके उपयोग से आने वाला खर्च कम किया जा सके।

Evm छेड़छाड़ विमुक्त है, यह अपने आप मे एक असिद्ध वाक्य है। evm की छेड़छाड़ विमुक्ति सिद्ध करने वाला परीक्षण तो इस देश मे कभी हुआ ही नही है। evm hacking नाम से जो कुछ भी कार्यक्रम किये गए है वह तो डेमोंस्ट्रेशन करके करे गए हैं। जब जब evm हैकिंग के लिए नागरिक संघटनों और कुछ एक चुनावी पार्टी (जैसे कि आम आदमी पार्टी) ने चैलेंज दिया है, निर्वाचन आयोग ने चैलेंज की शर्तों के चक्रव्यूह के बीच मे evm को रख कर उनके परीक्षण को रोक दिया है।

जिन शर्तो के चक्रव्यूह में निर्वाचन आयोग अपनी evm को बचा रहा है, उन शर्तों के तहत किसी भी मशीन को छेड़छाड़ विमुक्त साबित आसानी से किया जा सकता है। बल्कि दिल्ली विधान सभा मे प्रदर्शित करि गयी demo evm को भी आसानी से छेड़छाड़ विमुक्त घोषित करा जा सकता है जबकि यह सर्वव्यापी है जी वह मशीन तो छेड़छाड़ साबित करने के लिए बनाई गई है।

तो फिर न्यायलय में भ्रमकारी तर्क को प्रस्तुत किया गया है कि evm कभी भी छेड़छाड़ कारी साबित नही हुई है। असल मे तो इसका व्यापक और सार्वजनिक परीक्षण कभी भी हुआ ही नही है। बल्कि चुनावों की पवित्रता बनाये रखने के लिए एक और प्रमाण निर्वाचन आयोग को देना होगा, की उसकी सभी हर-एक मशीन भी छेड़छाड़ विमुक्त है प्रतिपल। क्योंकि औसतो के सिद्धांत से अगर कुछ प्रतिशत मशीन भी छेड़छाड़ करि गयी है तो उतना भी काफी हो सकता है चुनावी नतीज़ों को अवैधानिक तरीको से किसी एक पार्टी के पक्ष में करने के लिए।

सरकारी वकील ने यह भी बोला है कि नागरिकों को कोई अधिकार नही है यह तय करने का की वोट डालने की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए।
यह अर्धसत्य वाक्य है। हो सकता है कि तमान तरीको में किसी एक विशेष तरीके का चुनाव नागरिकों के अधिकार के लिए अभी तक आवश्यक न हो, मगर यह हमेशा से नागरिकों का हक़ है की जो भी व्यवस्था हो वोटिंग की, उनको प्रमाण मिलना चाहिए कि उनका वोट उसी के खातों में पहुचा है जिसको देने की मंशा उनकी थी।।नागरिकों का यह भी हक़ है जी निर्वाचन प्रक्रिया, वोटिंग की गिनती इत्यदि में कोई भी अवैधानिक तरीके के उपयोग की संभावना मात्र पर उनकी शंकाओं का तुरंत निवारण किया जाए और कदम लिए जाए। evm की छेड़छाड़ की एक संभावना तो आम आदमी पार्टी की demo machine ने दिल्ली विधानसभा में सभी के सामने प्रस्तुत पहले ही करि है , जिस एक संभावना का निर्वाचन आयोग का आज तक कोई समाधान दिया ही नही है। बल्कि इस कार्यवाही से बचने के लिए गोल गोल घूम रहे हैं। नागरिक संघटनों और कुछ पार्टीयों ने पहले ही कहा है कि असल प्रमाण तो evm की चिप के सार्वजनिक परीक्षण से ही किया जा सकता है। यह वह काम है जो कि निर्वाचन आयोग करने को तैयार नही है।

जातिवाद विरोध से श्रमिक शोषण विरोध की दिशा

 *जातिवाद विरोध से श्रमिक शोषण विरोध की दिशा - भाग 1* 

जातिवाद के विरोधियों की विचार शक्ति आज भी संकुचित हैं। यह लोग जातिवाद के अन्याय को झेलने के बाद अब जातिवादी अन्याय की पीड़ा के सदमे वाली मनोविकृति से ग्रस्त हो गए हैं। 
इसलिए इस समूह ने जातिवाद की समस्या को उसके व्यापक दुर्गुणों के माध्यम से न ही पहचान पाया और न ही अपने आंदोलन को विस्तृत बना पाया है। और देश और समाज आज वापस उन्ही दुर्गुणों से ग्रस्त है जिनसे जातिवाद निकला था।

श्रमिक शोषण वह मूल दुर्गुण है जिसको चिन्हित करने में आज भी जातिवाद विरोधी विफल है, और जिसके चलते यह अपना आंदोलन विस्तृत नही कर पाए हैं। शुद्र जाति समूह अपने प्रति हुए अन्याय को आज तक सिर्फ ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लड़ाई के रूप में ही देखता और समझता आया है, जिसके चलते न तो वह अपने आंदोलन को व्यापक, अंतर्जातीय बना सके हैं, और न ही भारतीय समाज को श्रमिक शोषण से मुक्त कर पाए हैं।

   सामंतवाद समस्या ने किसी काल में समूची दुनिया को त्रस्त किया था। मगर पश्चिम देशो में सामंतवाद के विरोध में न्याययिक सुधार हुआ, श्रमिक कानून और आंदोलन तीव्र हुए, न कि कोई पीड़ित जाति समूह किसी राजनैतिक उठ्ठापटक का लाभ लेने के लिए खड़ा हुआ।
   आज आवश्यकता यह है कि जातिवाद विरोधी समूह को अपनी पहचान श्रमिक जाति समूह के रूप में करनी होगी। और जातिवाद विरोध के आंदोलन को परिवर्तित करके श्रमिक शोषण विरोधी आंदोलन के रूप में करने के आवश्यकता है। इसके साथ ही इस आंदोलन को विस्तृत करके सर्व-जातिय श्रमिक आंदोलन में नवजीवित करने की आवश्यकता है।
     जातिवाद पीड़ित समूह की वास्तविक चारित्रिक पहचान श्रमिक वर्ग वाली है। वैदिक काल में शुद्र वही था जो कि निम्म और मध्य स्तरीय कार्यकौशल रखता था, जैसे मोची, बड़ई, राजमज़ूर, इत्यादि। दूसरे , समकालीन अर्थो में समझें तो शुद्र का अभिप्राय वर्तमान काल मे नौकरी पेशे वाले और प्रोफ़ेशनल (Professional and service class) लोगो से है। 
     पीड़ित जातीय समूह की दूसरी पहचान यह है कि यह वह लोगों या समुदायों के समूह है जिनको अतीत काल में किसी उद्योग में अभिरुचि नही है। इसलिए जातिवाद पीड़ितों के श्रम का भोग करने वाला वर्ग , उनका स्वामी वर्ग, शूद्रों को नौकरी पेशा दे कर उसमें इनका शोषण करके ही लाभार्थी बन पाया। आश्चर्य जनक तौर पर निम्न जातियों का यह समूह आज भी अपनी उद्योगिक असक्षमता की कमी को ही अपनी शक्ति इसी रूप में देखा करता है कि 'वह कमा कर खाने वाला वर्ग है' (और इसलिए वह कभी भी व्यर्थ नही होगा, कभी भी अप्रासंगिक नही बनेगा) , 'कार्यकौशल वाला समूह है' ; वह अपनी कमियों को अभी तक पहचान नही कर पाया है कि असल मे वह श्रमिक शोषण झेलने वाला समूह है, और ऐसा इसलिए क्योंकि इस वर्ग ने आज तक कोई भी उद्योगिक अभिरुचि नही विकसित करि है।
     तो शूद्र जाति समूह के आंदोलन की विफलता के दो मूल कारक है कि इन्होंने आज तक श्रमिक शोषण के विरुद्ध आवाज नही उठाई है, सिर्फ ब्राह्मणवाद के विरुद्ध ही खड़े हुए हैं ; और दूसरा की इन्होंने अपनी जातिगत मुक्ति के लिए अभी तक कोई भी उद्योगिक अभिरुचि नही विकसित करि है। यह वर्ग हमेशा से वही रहा है जिसे की कोई दूसरा वर्ग नौकरी देता है, श्रमिक कार्यों में लगन करने का अवसर देता है, और फिर जहां इसका शोषण करता है। निम्म जाती समूह खुद वह वर्ग है जिसने न कभी दूसरे से श्रम करवाया था, और न ही आज तक ऐसा बन पाया है जो कि किसी और को नौकरी देता है, उसको श्रमिक लगन का अवसर देता है।
     यह दूसरी वाली कमी का ही प्रकोप है कि शूद्र जाति समूह ने आज तक न्याय और कानून को ठीक से समझ ही नही पाया है, और इस लिए शोषण के तमाम हथकंडों से मुक्ति नही प्राप्त कर पाया है। न्याय और कानून की गुत्थी यह है कि न्याय के तराजू में श्रमिक और उसके उद्योग स्वामी दोनों को ही बराबर समझना पड़ता है। और चूंकि उद्योग करना भी न्याय सिद्धांतों पर एक विशिष्ट तर्क है, जिसको निम्म जाती वर्ग कभी समझ ही नही सका है, इसलिये निम्म जाती वर्ग अपने शोषण के विरोध में न्याय प्राप्त करने में असफल होता आया है। अंततः उसने अपनी पहचान के उस दुर्गुण , यानी श्रमिक शोषित वर्ग, को ही अनदेखा करना आरम्भ कर दिया है जो कि उसके आंदोलन को विस्तृत बना सकता था।

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*जातिवाद विरोध से श्रमिक शोषण विरोध की दिशा -- भाग 2*

पश्चिमी देश आज अभी श्रमिक शोषण कानून के प्रति उतने ही संजीदा है जितना कि पहले हुआ करते थे। निम्म जाति वाले वर्ग , यानी श्रमिक वर्ग, को अभी हाल फिलहाल में घटी कुछ घटनाओं को गौर से देखना-समझना चाहिए और सबक लेना चाहिए कि भारत मे उनका बदहश्र आज भी क्यों बना हुआ है।
   चाइना के उत्पादों के विरोध का मुद्दा देखिये। ऐसा नही है कि चाइना की सस्ती सामग्रियों से पश्चिमी देशों में बेचैनी नही है , मगर वहाँ और यहाँ भारत में हो रहे विरोधों की प्रवृत्ति के अंतर को समझने की आवश्यकता है, विरोध के पद्धति के गुणों को पहचानने के ज़रूरत है। 
   पश्चिमी देशों में चाइना के उत्पादों का विरोध श्रमिक कानूनों के उलंधन द्वारा निर्माण किये जाने के मार्ग से किया जा रहा है, न कि राष्ट्रवाद और देशप्रेम की भावनाओं को कुरेज़ कर के।
   ऐसा करने का अभिप्राय यह है कि पश्चिमी देशों में चाइना के सस्ते सामग्रियों का विरधी वर्ग वहां का श्रमिक वर्ग है, न कि उद्योगिक वर्ग। बल्कि वहाँ भी उद्योगिक वर्ग असल मे चाइना की निम्म कीमत उत्पादन क्षमता का लाभकर्ता ही है, जैसा कि यहां भारत मे भी है। आप खुद ही देखे की भारत मे अगर किसी कंपनी को सिम कार्ड बनवाने थे तब उसने चाइना से आर्डर देकर सस्ते में प्राप्त कर लिया। अगर किसी शहर में मेट्रो ट्रैन चलनी थी तो इसके निर्माण का अरबों रुपये का ठेका चाइना की कंपनी को ही मिल गया।
    यानी भारत का उद्योगिक वर्ग वास्तव में तो चाइना के सस्ते उत्पादों का लाभार्थी है। और वह चाइना के उतपादो पर किसी भी प्रशासनिक प्रतिबंध के पक्ष में कभी भी खड़ा नही होगा। तो फिर देशभक्ति और देशप्रेम के नाम पर चाइना के सस्ते समानों का विरोध करने का संदेश सोशल मीडिया द्वारा कौन फैलवा रहा है। ? असल मे यही उद्योगिक वर्ग है जो कि यह कार्य भी कर रहा है पीछे के रास्ते। इसका वास्तविक मकसद भारतीय उपभोक्ता को स्वयं सीधे सीधे चाइना के सस्ते सामानों को खरीद कर उपभोग से प्रभावित करने का है।
     इसके मुकाबले पश्चिमी देशों में चाइना के सस्ते सामानों का विरोधी वहां का श्रमिक वर्ग है। उसने अनुसार चाइना में यह समान वहां श्रमिक शोषण के चलते इतने सस्ते में निर्मित हो पाता है। तो इस तरह पश्चिम देशो के उद्योग किसी उत्पाद को चाइना से सस्ते में निर्मित करवा कर असल मे उसके देश के अपने श्रमिक कानूनों से छलावा कर लेते हैं। जो श्रमिक शोषण वहां का उद्योगपति अपने देश मे, अपने नागरिकों के संग वहां की न्यायपालिका के तीव्र श्रमिक शोषण विरोधी तेवरों के चलते नही कर पाता है, उसे वह चाइना में प्राप्त कर लेता है। 
     पश्चिमी देशों की न्यायपालिका और श्रमिक संघटनों ने इस बात की पहचान कर ली है। असल मे प्रवास की समस्या में भी श्रमिक शोषण की प्रवृत्ति को पहचान कर लिया गया है, जिसके चलते वह दक्षिण एशिया (यानी भारत और चाइना) के श्रमिकों का विरोध करते हैं। इस देशो के श्रमिक सदियों से शोषण झेलते आये हैं, इसलिए यह लोग अक्सर करके पश्चिमी देशों के अपने शोषण विरोधी कानून के ऊंचे मानदंडों का पालन करने में रियायत करके कार्य के ठेके को सस्ते में कर लेते है, जो कि स्थानीय नागरिक-श्रमिक शायद अस्वीकार कर दे।
     अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पुत्री इवांका के फैशन वस्त्र परिधान उद्योग का जो अंश चाइना में निर्मित होता था, चाइना की उस फैक्ट्री में होने वाला श्रमिक शोषण कुछ दिनों पहले ही अखबारों की सुर्खियां बना था। उद्देश्य था कि अमेरिकी नागरिकों को संज्ञान दिया की कही राष्ट्रपति ट्रम्प श्रमिक शोषण को बढ़ावा तो नही देते हैं।
      इसी तरह विश्वविख्यात मोबाइल फ़ोन निर्माता ऐप्पल कंपनी के जो कलपुर्जे चाइना में निर्मित किये जाते थे, उस फैक्ट्री में होने वाला श्रमिक शोषण का संज्ञान अमेरिका के न्यायालयों ने तुरंत लिया और ऐप्पल कंपनी बाध्य हुई कि वह चाइना में भी वैसे ही स्तर के श्रमिक कानूनो का पालन करेगी जो कि अमेरिका में लागू होते हैं। ऐसा निर्णय और न्याय किये जाने से दुनिया भर के श्रमिको का लाभ तो हुआ ही, साथ ही अमेरिका के अपने श्रमिकों के लिए भी अच्छे अवसर पैदा होने का माहौल बना की ऐप्पल कंपनी प्रेरित हो सके कि यदि उसे उतने ही धन व्यय करने की बाध्यता है तो फिर शायद वह अमेरिका में ही कलपुर्जे निर्माण करवा लें, बजाए चाइना भेजने के।
    यह पश्चिमी देशों के श्रमिक शोषण विरोधी कानूनों का ही प्रतिफल है जिसके चलते भारत मे कुछ एक उच्च वेतन वाली नौकरियां उपलब्ध है। गौर करें कि यह वही नौकरियां हैं जिसमे अंतर्देशीय श्रमिको का प्रयोग चलन में है। अब क्योंकि उद्योग स्वामी जो कि पश्चिमी राष्ट्र का है, उसे अपने देश के श्रमिक कानून के मानदंडों को मनाना पड़ता है, इसलिए वह उच्च वेतन देने के लिए बाध्य हो जाता है। अन्यथा शायद भारतीय उद्योगस्वामी अपनी किसी प्रेरणा से उसी श्रमिक क्षेत्र में उच्च वेतन कदाचित नही दे।
     श्रमिको और कामगारों के पक्ष में आये वयापक और प्रभावकारी फैसले पश्चिमी देशों से ही हैं। हाल में एक और न्यायिक फैसला नव कालीन टैक्सी कंपनी उद्योग ,( जैसा ola या uber) के क्षेत्र का गौर करने लायक है। इन कंपनियों के स्वामियों ने अपने श्रमिकों , यानी टैक्सी चालकों को free lance घोषित करके यह लाभ प्रकट किया कि यह श्रमिक अपनी स्वेच्छा से कंपनी से कभी भी जुड़ और अलग हो सकते हैं। ऐसा करने से यह उद्योगस्वामी खुद को छुट्टी वेतन, स्वाथ्य बीमा इत्यादि की श्रमिक कानून आवश्यकता से बच निकले थे। ब्रिटेन के एक कोर्ट ने फैसला दिया कि - नही , टैक्सी चालकों को उद्योगस्वामी द्वारा यह सब सुविधाएं भी उपलब्ध करवानी पड़ेंगी। 
      इस फैसला के तर्क ऐसे समझा जा सकता है कि उद्योगस्वामी की खुद की कमाई और लाभ तो सदैव ही संरक्षित है, भले ही एक-दो टैक्सी चालक किसी दिन कार्य के अनुपलब्ध रहे, मगर उस अनुपस्थित श्रमिक के उस दिन का जीवनावश्यक कमाई किन्ही जीवनावश्यक कारणों से क्रिया करके नष्ट हो जाती है, यानी संरक्षित नही रह पाती है। तो, उद्योगस्वामी के कमाई का संरक्षण निरंतर बना रखता है, जबकि श्रमिक का नही। और न्यायपालिका ने स्वीकार किया कि यह भी अपने मे एक अन्याय ही है।

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जातिवाद विरोधियों को श्रम के वर्तमान स्वरूप , यानी नौकरी पेशों में लागू श्रमिक कानूनों के उलंघ के प्रति संजीदा होने की आवश्यकता है। वर्तमान काल मे श्रमिक वर्ग की कोई विशिष्ट पहचान किसी जाति विशेष से नही रह गयी है। श्रमिकों की पहचान में न कोई ब्राह्मण है , और न कोई शूद्र। ऐसे में केवल ब्राह्मणवाद के विरुद्ध ही खड़ा रह जाना अपने मे मध्यकाल जातिवाद को पुनरस्मृति करके बढ़ावा देने के जैसा ही है। निरंतर घटते बैंक ब्याज दर, पेंशन संबंधित अनियमितताएं , प्रशिक्षण संबंधित अनियमतायें, पदुन्नति में भेदभाव और पक्षपात, इत्यादि को नए युग मे श्रमिक शोषण का स्वरूप मानने की आवश्यकता है, और कोर्ट और सरकार से इनका विरोध करने की ज़रूरत है। केवल जातिगत आरक्षण  के लिये संघर्षरत रहना आंदोलन को संकुचित कर देता है, और समाज मे विभाजन उत्पन्न करता है।
    जातिवाद विरोधियों को अपने कुएं से बाहर निकल कर श्रमिक शोषण से भरी बड़ी दुनिया देखने की ज़रूरत है।

चाइना के उत्पादों का बहिष्कार और श्रमिक कानूनों का उलंघन

चाइना डोकलं में हुंकार भर रहा है।

और इधर भारत सरकार सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दे रही है कि evm में vvpat जोड़ना अनावश्यक और पैसा व्यर्थ करने की कार्यवाही होगी , दो-तीन कारणों से। पहला,  क्योंकि evm अपने आप मे कभी भी सिद्ध नही करि गयी है कि इसमें छेड़छाड़ करि जा सकती है। इसलिए evm अपने आप मे ही पर्याप्त मानी जानी चाहिए। दूसरा, की vvpat की भी जीवनअवधि 15 वर्ष तक कि है, evm मशीनों की भांति। यानी हर वर्ष करोड़ो रूपयों का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा निर्वाचन कार्यों में।

शायद चीन को भनक है कि evm मुद्दे के चलते आज भारतीय में वापस वह राष्ट्रीय एकता नष्ट होने लगी है जो कि किसी भी बाहरी शक्ति से लड़ने के लिए आवश्यक होती है। भारत की यह सरकार evm भरोसे चाहे जितना बड़ा बहुमत सिद्ध करके सत्ता में आ जाये, मगर अब यह बाहरी शत्रुओं से बहोत कमज़ोरी से लड़ सकेगी। क्योंकि भारतीय नागरिकों से लेकर सैनिकों में असंतोष व्याप्त होने लगेगा कि अब वह जिन मूल्यों की रक्षा करने के लिए खड़े हैं वह सरकार स्वयं उनके हितों का प्रतिनिधित्व और रक्षा करने में माहर्थ नही रह गयी है। सरकार तो खुद चोरो और माफियाओं की रक्षक बन चुकी है ।

Evm मुद्दा आज इस राष्ट के अस्तित्व पर वापस खतरे की घंटी बजाने लगा है। भारत कोई तुर्की जैसे भौगौलिक स्थिति में बसा देश नही है। यह परमाणु शक्ति से सुसज्जित देश है, और इसके दोनों पड़ोसी भी परमाणु शक्ति सुसजित है, जिनसे दोनों से ही भारत के कुछ अपवाद चलते हैं।

साथ ही भारत विविधताओं का देश है। इसलिए यहां निरंतर प्रशासनिक निष्पक्षता और न्याय को अपने वज़ूद का प्रमाण जनता के मन मे बसाना पड़ता है। पता नही की evm के ठगों को यह बात समझ आ रही है कि नही। देश मे लोगों को अपने हितों के प्रति चेतना आये अभी मात्र 70 वर्ष ही हुए थे। और इस दौरान भी वह भ्रष्टाचार जैसे सर्पो से ही लड़ता रहा था। मगर अब evm की ठगी ने वापस लोगो मे आशंकाए और  निराशा भरना शुरू कर दिया है। भय यह लगता है कि कही 800 साल मुग़लो की गुलामी और 200 साल अंग्रेज़ो की ग़ुलामी झेलने वाला यह देश वापस 70 साल की नई उम्मीद लिए वापस किसी ग़ुलामी में न चला जाये। 

इस निराशा के कारण इतने भूमिविहीन नही है। सरकार का evm मुद्दे पर व्यवहार निरंतर लोगो मे असंतुष्टि भर रहा है।।भले ही यह सरकार इन असंतुष्ट वर्गों को evm के भरोसे अल्पमत साबित कर दे, मगर युद्ध वाले दिन दूध का दूध और पानी का पानी हो ही जायेगा।  अभी जाते जाते उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भी आशंकाओं के उसी तार को छेद दिया है जो कि कईयों के मन मे घर कर गया है।

Evm में छेड़छाड़ देश के तमाम समुदायों की हमारी उम्मीदों और हमारी आशाओं पर हमला करने जैसा है। इससे समुदायों में अपने प्रतिनिधित्व के प्रति वह आशंकाएं आ गयी है जिसको सरकार किसी भी सूक्ष्म प्रतिकात्मता यानी tokenism से कभी भी भर नही सकती है। चाहे जितना भी किसी दलित को राष्ट्रपति बना दे, मगर आरक्षण का खात्मा और हमला देश के आरक्षित वर्गी को वैसी आशंकाओं से भर रहा है जिससे उनकी चेतना को पता चल जाता है कि वास्तविकता और सूक्ष्म प्रतीकात्मकता में क्या अंतर होता है।

सरकार शायद वही पुरानी micheavilli रणनीति के भरोसे evm ठगी के युग मे आगे बढ़ते रहना चाहती है। नागरिकों को ग़ुलामों की भांति अर्धमार करके रखो। न इतनी आज़ादी दो को वह सपने देख सकें, और न ही इतना कुचल दो की वह विद्रोह पर उतर आएं। अभी हाल फिलहाल के शासक भी ऐसी ही रणनीति लिये अपने अपने देशो में evm ठगी करके जी रहे हैं।
मगर भारत वैसे ही सीमा विवादों से घिरा देश है। साथ ही इसकी इतिहासिक , सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्टभूमि भी एकदम अलग है। यहां शायद यह मीचेअविल्ली रणनीति  काम न आने पाए। भारत मे लोगो का ग़ुलामी का इतिहास है और वह शायद अंतर न कर सकें देश के साहूकारों की ग़ुलामी और किसी विदेशी की ग़ुलामी कर बीच का। यहां सामाजिक भेदभाव और पक्षपात का इतिहास है और विदेशी हमलवारों को यहां स्थापित हो कर स्थानीय जनसंख्या के नायक बनने के अवसर बहुत आसानी से मिलते आये हैं। यहां तमाम संस्कृतियां बस गयी है जिनके सोचने के तरीकों में अंतर है और वह सब यहां के प्रशासन में अपना अपना प्रतिनिधित्व को खोजती है।

पता नही evm के ठगों ने यह सब पाठ कभी पढ़े है या नही।


समाज मे अपने सत्यापित प्रतिनिधित्व का अभाव नागरिकों में घर करने लगा है। साहूकारों और उद्योगपतियों के पैसे से evm ठगी करके बनी सरकार में लोग सिर्फ अपने जीवन यापन को सुरक्षित रखने के मकसद से ही सहयोग करते रहेंगे। उनमे वह जोश , जस्बा खत्म होने लगेगा जिसमे कुछ प्राप्त करने के लिए कुछ अंतर प्रेरणा का प्रसार होता है। उन्हें यह एहसास की आगे के अवसर तो उनके लिए इतने संरक्षित नही है, बस इतने ही प्रेरित करेगा कि कैसे भी करके अपने आप और अपने परिवार का जीवनयापन संरक्षित रखो। इंसान और सैनिक अपनो का मोह छोड़ कर आगे कूद जाने के लिए तत्पर नही रह जायेगा क्योंकि अब उसका मन आशंकाओं से घिरा रहेगा कि पता नही उसके बाद उसके पीछे छूट गयी उसके परिवार और हितों की देखरेख कौन करेगा।

Thursday, August 03, 2017

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से प्राप्त नकली बहुमत वाली प्रजातंत्र व्यवस्था का उत्थान और संयुक्त राष्ट्र का पतन

Hackers यानी चोरी से किसी मशीन तंत्र में घुसपैठ करने वाले गिरोह ने मात्र 90 सेकंड के भीतर अमेरिका में प्रयोग होने वाली चुनावी मशीनों को भेद कर दिखाया है। 

संयुक्त राष्ट्र को इस खबर पर ध्यान देने का समय आ गया है। सयुंक्त राष्ट्र का अपना प्रशासन सदस्य देशों के प्रतिनिधियों से ही निर्मित होता है। और ज्यों ज्यो सदस्य देशों की तथाकथित प्रजातांत्रिक सरकारें ऐसी ही fixed मशीनों से प्राप्त नकली बहुमत के माध्यम से शासनस्त होंगी, वह संयुक्त राष्ट्र में भी अपने नुमाइंदगी के लिए अपने सुविधा वाले अधिकारियों को नियुक्त करने लगेगी। ऐसे में हम अपेक्षा कर सकते है कि कुछ वर्षों में संयुक्त राष्ट जैसी संस्था भी दूषित और भ्रष्ट विचारो वाले लोगों के नियंत्रण में चली जायेगी, जिनका वास्तविक उद्देश्य विश्व कल्याण, विश्व शांति नही रह जायेगा।

नकली बहुमत वाले प्रजानतंत्रिक देशो के नागरिकों के पास अपने इन हालात से मुक्ति पाने का कोई भी जरिया नही रह जाता है। नागरिक वर्ग में वास्तविक बहुमत अगर अपनी सरकार से नाखुश भी हो, तो भी वह सरकार के वास्तविक नियंत्रकों को बदल सकने लायक ही नहीं रह जाता है। इसका अर्थ है कि अब प्रजातंत्रों में अंतरात्मा की ध्वनि सुनने के लिए निश्छल व्यक्ति और उसकी सरकार तत्पर नही रह जाएगी।

नकली बहुमत वाले तथाकथित प्रजातंत्रों की संख्या में वृद्धि आने लगी है। 

नकली बहुमत वाले प्रजातंत्रों की सरकारों की कार्यव्यवस्था मे कुछ गुण तो विश्वव्यापक स्थायी रूप से देखे जा सकते हैं। जैसे कि नागरिको में राष्ट्रवाद और देशप्रेम की भावनाओ को कुरेदते रहने की निरंतर कोशिशें। नकली बहुमति सरकारों के लिए ऐसा करना इस लिए आवश्यक है क्योंकि इसमें उनके लिए बहोत जीवन-उपयोगी लाभ हैं -- पहला, की सरकार के विरोधियों और विपक्षयों को नियंत्रण करने का अवसर मिलता है; दूसरा, की ऐसी सरकारों से संभावित मुक्ति केवल अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के फेरबदल से ही मिल सकता है ,जैसे आर्थिक प्रतिबंध, या शत्रु देश का आक्रमण। तो नागरिकों को ऐसी सहायता पहुचने से रोकने के लिए भी राष्ट्रवादऔर देशप्रेम के उत्तेजित प्रशासनिक माहौल बहोत सहायक सिद्ध होते हैं।

राष्ट्रवाद और देशप्रेम का माहौल बनाये रखने के लिए किसी देश से शत्रुता पाले रखना आवश्यक बन जाता है।

वैश्वीकरण के युग मे अंतरराष्ट्रीय व्यापार जिन व्यापारिक नियमों पर रचा बुना है , उन क़ानूनों के पैर जमाये रखने के लिए आवश्यक भूमि मानवाधिकारों से बनती है। नकली बहुमत वाले राष्ट्र अक्सर करके मानवाधिकारों का पालन करने में सक्षम नही रह जाते हैं। नागरिकों के विरोध का दमन करने के लिए वह मौलिक अधिकारों का उलंघन करते करते वह मानवधिकारों को भी तोड़ते रहते हैं। ऐसी सरकारें का खुद का जीवनउद्देश्य किसी निजी व्यापारिक अथवा उद्योगिक हित को साधना होता है, जिन आर्थिक व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ही शासन शक्ति का प्रयोग करती रहती हैं। नागरिकों को अर्धमरा करके रखने से ही ऐसी सरकारें खुद का जीवन संरक्षि कर सकती है। इसका अर्थ है कि यह सरकारें देश के वास्तविक बहुमत जनसंख्या को संतुष्ट नही कर सकती हैं, बस एक ऊपरी भ्रम रखती है जिससे कि जनता में नाउम्मीदी न फैलने पाए अन्यथा कोई बड़ा जन विद्रोह हो जाएगा। तमाम आर्थिक और सामाजिक असफलताओं के बावज़ूद नाउम्मीदी को फैलाने से रोकना इसके खुद के अस्तित्व के लिए परम आवश्यक बन जाता है।
      नकली बहुमत वाली सरकारों का भंडाफोड़ विदेशनीति की असफलताओं से ही हो सकता है, अन्यथा अंदरूनी संवैधानिक प्रबंधों से इनका भंडाफोड़ बिल्कुल भी संभव नही है। विदेशनीति के बिंदु है -- जैसे, शत्रु देश का आक्रमण जिसमे संभावित है कि वास्तविक बहुमत नागरिक उस नकली बहुमत सरकार का सहयोग नही करें; या फिर शत्रु देश का और अधिक समृद्ध और शक्तिशाली होना, जिससे यहां के नागरिकों में असंतोष फैले। इस परिस्थित से बचने के लिएयह सरकारें संयुक्त राष्ट्र की कल्याणकारी नीतियोँ में खुरपेंची कर सकती है। जैसे कि, सैन्य शक्ति देशो का ध्रुवीकरण। नागरिकों के स्वतंत्त्र आवाजाही पर प्रतिबंध, और मानवाधिकारवादियों पर शिकंजा कसना।
      नकली बहुमत सरकारों में महंगाई बढ़ते रहना एक भयंकर रोग की तरह आर्थिक नीतियों से चिपक जाता है। आर्थिक असफलताओं को छिपाने के लिए यह देश आवश्यक डाटा को गलत उपलब्ध करवाते हैं, या फिर अनावश्यक कह कर उपलब्धता को बंद ही कर देते हैं। किसी भी सूरत में, यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नकली बहुमत वाले देश सहयोगकारी नही रह जाते हैं, खास तौर पर उन देशों के साथ जिनकी सरकारें वास्तव में जनकल्याण उद्देश्यों से कार्य प्रेरित हैं। 

नकली बहुमत की सरकारे अपनी राष्ट्रनीतियों को doublespeakयानी "थूक के चाट' तरीको से ही चला पाती है। झट आवश्यकता के अनुसार किसी नीति को जनता के बीच कल्याणकारी प्रक्षेपित करना, और दूसरे ही पल राष्ट्रविरोधी घोषित कर देना। यानी सरकार के हर निर्णय और उस की छवि को प्रतिपल जनता में सकारात्मक बनाये  रखना इसके खुद के जीवन के लिये आवश्यक हो जाता है। "थूक के चाट" इस नीति का अर्थ है की नकली बहुमत सरकारें मीडिया औसूचना तंत्र को निरंतर अपने अधी रखती है।इसका यह भी अर्थ है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति मात्र एक छलावा बन कर रह जाती है। और इसका अर्थ है कि नकली बहुमत सरकारों का आए दिन मनावधिकरवादियों से मुठभेड़ होते रहना, जिनके दमन और प्रताड़ना के लिये यह कुख्यात होने लगती हैं।
    तो अपनी अर्धमरी जनता को अपने नियंत्रण में रखने के लिए यह सरकारें किसी भी बाहरी दृष्टिकोण और निष्कर्षों को जनता तक पहुचने से रोकना चाहती है ताकि सरकार की असफलता का भंडाफोड़ होने से कोई व्यापक जनविद्रोह  हो जाये। इसके लिए यह सयुंक्त राष्ट्र जैसी उच्च छवि, सम्मानित संस्था में छेड़छाड़ के लिए अवश्य तत्पर रहेंगी और इसके प्रशासनिक कार्यालयों में अपने प्रतिनिधि के रूप में ऐसे ही नुमाइंदे भेजेंगी जो इनके यह गलत मंसूबो को पूरा कर सकें।

इसका अर्थ है कि अब जब कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग यंत्रों के चलते नकली बहुमत वाले प्रजातंत्रों का युग आ गया है तब संयुक्त राष्ट्र के भी विफल हो जाने का समय आरम्भ हो गया हैं। 
संयुक्त राष्ट्र को अभी से ही इस विषय पर चर्चा आरम्भ कर देना चाहिए।

Tuesday, August 01, 2017

Why I don't agree with the social media appeal campaign to boycott Chinese goods

I strictly don't believe in the *Boycott Chinese Goods* theory. 
   I think  that Indian corporates need to learn to compete with the Chinese manufacturer instead of passing on the burdens created from their failures onto the customers , by illegitimately invoking the patriotic feeling of the people in order to make them  boycott the Chinese made goods.

Boycotting the goods, in my views, is but a game of hypocrisy designed by the corporates and meant to harvest profits to them. 
   The game begins from a honest and sincere intention of well-being of the world, that oft-spoken vasudhev kutumbkam phrase, in the light of severe devastation suffered by the humanity in the two world wars. The idea of Globalization  was mooted in order to help the countries fulfill  their needs of development.  This is the line that the government officially holds even to this date.

But in the back offices, the corporates send out misleading social media messages to boycott the goods of certain countries, particularly in the pretext of patriotism.

Incidently, the corporates almost control the government these days. 

Then, Did you ever think why are the corporates interested in this kind of double game. Officially they follow the Globalization theory, and informally they want you to remain nationalistic and patriotic ?

*चाइनीज़ सामान के राष्ट्रवादी और देशप्रेम के आवेश में बहिष्कार करवाने के पीछे क्या प्रेरणा हो सकती है ?* 

द्वितीय विश्वयुध्द के बाद इतना सारा जान और माल का नुकसान देख कर इंसानियत के सभी सच्चे नेताओं का दिल दहल गया था। वह मंथन करने लग गए थे कि आखिर इतनी तबाही के पीछे इंसानों की क्या ललक थी , वह कौन सी तीव्र इच्छा थी जिसकी पूर्ति के लिए इतना लहू बहाया गया, और क्रूरता और बर्बरता को अंजाम दिया गया।

वह ललक थी समृद्धि होने की। धरती पर भगवान् ने सभी देशों को उसके विकास के लिए आवश्यक प्रत्येक संसाधन उपलब्ध नही करवाया है। भगवान् का न्याय अक्सर ऐसा ही होता है, जिसमे आवंटन और वितरण के समय भगवान् सभी को परस्परता के सूत्र से बांधता भी है, और जौविक संतुलन बनाये रखने के लिए आवश्यक शत्रुता के बीज भी बो देता है। 
इतने विशाल युद्धिक तबाही का कारण था एक देश का दूसरे देश के प्राकृतिक संसाधनों को अधिग्रहित करने की लालसा। जिससे कि वह विकास कर सके, समृद्ध हो पाए।
तो ऐसे में इंसानियत के सच्चे नेताओँ को लगा कि भविष्य में ऐसे विश्व युद्ध न हो इसके लिए ऐसी युद्ध विहीन, शांतिप्रिय आर्थिंक व्यवस्था की संरचना करी जाए जिससे सभी देश अपने अपने अतिरिक्त संसाधन को निर्यात भी कर सके और अपने खुद के आवश्यक संसाधनो का आयात भी कर ले। व्यापार के इस वैश्विक स्तर को वैश्वीकरण यानी ग्लोबलाइजेशन (Globalization) कह कर पुकारा गया।

याद रहे कि ग्लोबलाइजेशन की मंशा बहुत नेकनीयत वाली है। इसमें कही कोई छल-कपट नही है। इसका उद्देश्य युद्धों को रोकना है, विश्व शांति को कायम करना है।

मगर ग्लोबलाइजेशन के तहत देशों के बीच आदान प्रदान के रास्ते खुल जाने से उद्योगों के बीच एक नई किस्म की आफत आ गयी है।  जैसे, जब उपभोक्ताओं को आयात किये हुए सस्ते सामान मिलने लगते है तो स्थानीय उद्योग को उस आयात किये हुए समान से आर्थिक मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है। तब वह सिमटने लगता है। 

स्थानीय उद्योग के आगे बाज़रिय बाधा होती है सस्ते में उसी वस्तु को निर्माण करना। 

 *सवाल है कि इस बाधा से निपटने के नैतिक मार्ग क्या क्या हो सकते है, और पीछे के अनैतिक मार्ग क्या क्या हैं ?*

स्थानीय उद्योग को नैतिक तरीको से बाधा को पार करने के संभावित मार्ग शायद ऐसे हो, जैसे 1) श्रमिको को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण देना, जिससे कि वह उच्च स्तर संयंत्रो को चला सकें।
2) उच्च तकनीक संयत्रों का प्रयोग करने अधिक मात्रा में उत्पाद, उच्च गुणवत्ता तथा कम लागत के साथ;
3) नए अनुसंधानों और नित नए सुधारों से बाजार में धाक ज़माना

इत्यादि।

और पीछे वाले अनैतिक मार्ग है कि ग्लोबलाइजेशन के तहत राष्ट्र की आयत नीति को ऊपर से तो वही वसुधेव कुटुम्बकम पर चलने दो, मगर पीछे के रास्ते आयात किये सामान की विक्री में बाधा पहुचाओ ताकि आयात किया हुआ सामान कम बिक्री हो। इसका एक तरीका है राष्ट्रवाद और देशप्रेम की भावना के तहत उस देश के सीधे सामना के प्रति नागरिकों में घृणा फैलवाओ, मगर खुद के उद्योग ग्लोबलाइज़ेशन के तहत उसी देश से सस्ते में सामान को आयात करके मात्र अपना लेबल चिपका कर बेच कर मुनाफा कमाएं ।

तो ऐसे दो-मुहे राष्ट्रवादी और देशप्रेमी तरीको से सिर्फ उद्योगिक लाभ को साधने के उद्देध्य होता है। 
अन्यथा अगर वाकई में किसी देश से कोई कष्ट हो, तब फिर राष्ट्रीय आयात नीति के तहत ही उस देश के सामानों के आयात पर प्रतिबंध लग जाना चाहिए।

है, की नही ?

Saturday, July 29, 2017

The long rope theory of discriminating

The long rope theory of discriminating

भेदभाव और असमानता इंसानी समाज मे हमेशा से चलते चले आये हैं। इंसानी समाज आपस मे प्रतिस्पर्धा करते हैं और हर समाज खुद को दूसरे से बेहतर साबित करवाना चाहता हैं । इसी इंसानी प्रवृति ने दुनिया भर में सामंतवाद को जन्म दिया, रंगभेद करवाये, अन्तरसमुदायिक कलह करवाई, जातिवाद करवाया।

हालांकि प्रजातंत्र के क्रमिक विकास में भेदभाव का विरोध और समानता की लालसा भी एक अंश रहा हैं, मगर फिर भी प्रजातंत्र पूरी तरह सफल नही हो पाए हैं। असमानता और भेदभाव आज भी किया जाता है।
प्रजातांत्रिक न्याय व्यवस्था में प्रशासन को जहां rule of law से चलना होता है, फिर भी भेदभाव की नवयुग पद्धति का भी क्रमिक विकास हो गया है। 

प्रजातांत्रिक प्रशासन प्रणाली में भेदभाव करने की नई पद्धति कुछ इस तरह से है :--
The long rope theory of discriminating

प्रशासन और न्यायव्यवस्था में जिसका वर्चस्व है, वह अपने पसंदीदा लोगों को उनकी गलतियों , अपराधों और नियम उलंघनों को अनदेखा करता रहता हैं। गलत तौर तरीकों से लाभ कमाने का मौका दिया जाता है, प्रशासन को ढील दे कर।

मगर वही पर अपने नापसंद लोगो  को ठीक वैसे ही अपराधों, नियम उलंघनों पर प्रशासन तुरन्त कार्यवाही करके सज़ा देता है। 

गौर करने की बात यह है कि आर्थिक या मानवीय अपराध  तथा नियम उलंघन तो दोनों ही पक्षों ने किया था, मगर सज़ा सिर्फ उस पक्ष को मिली जिसकी राजनैतिक और प्रशासनिक पकड़ कमज़ोर है।

यह भी भेदभाव करने करने का एक जटिल तरीका है। जटिल इसलिए क्योंकि अब कमज़ोर प्रशासनिक पकड़ वाला पक्ष आसानी से अपने व्यक्ति का बचाव भी नही कर सकता है क्योंकि बचाव में बोले जाने वाले शब्दो और अर्थो का जंजाल बहोत जटिल हो जाने वाला है। बचाव में बोले जाने वाली भावनाओं का उद्देश्य भले ही यह हो कि गलती तो हमारे पक्ष ने करि मगर दूसरे ताकतवर पक्ष ने भी तो वही ही किया था, फिर सज़ा अलग अलग क्यो ; सज़ा में भेदभाव क्यों। 
मगर शब्दो का जाल ऐसा बन जाता है कि मानो कहना यह चाहते हों कि वह अपने पक्ष की गलतियों को अस्वीकार कर रहे हो, न्यायपालिका को तिरस्कार करते हो।

यही नवयुगी भेदभाव पद्धति की जटिलता है। इसमें भेदभाव को किये जाने का मार्ग कुछ पीछे(उल्टे) के रास्ते से गुज़रता है। ऐसा करने से कमज़ोर पक्ष के लिए भेदभाव की व्यथा को उजागर करने के शब्द कमज़ोर पड़ जाते है और वह अपनी व्यथा को आसानी से व्यक्त ही नही कर पाता है।

अपराध की अनदेखी, प्रशासनिक अन्वेषण अथवा पुनर्निरक्षण के दौरान शिथिलता, न्यायपालिका में प्रमाणों का असमान मूल्यांकन, या घटनाओं की समानता को जानबूझ कर कृत्रिम अंतरों के माध्यम से भिन्नता दिखाना , नित नए फैसलों के माया जंजाल निर्मित करना, इत्यादि नवयुग प्रजानतंत्रिक प्रशासन में भेदभाव करने का तरीका है।

इसी को हम संक्षेप में कह सकते हैं the long rope theory of discriminating.

इंग्लिश कहावत Give someone a long rope के अर्थों पर इस सिद्धांत का नामकरण है, इसे आसानी से समझने और स्मरण रखने के लिए।

Saturday, June 10, 2017

जॉर्ज ओरवेल का विकृत कलयुगी उपन्यास "1984"

4 अप्रैल 2017 को अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के विरोध में देश के करीब 200 सिनेमा घरों में एक 1956 में रिलीज़ हुई श्याम/श्वेत फिल्म को फ्री में जनता के लिए नुमाइश करवाया गया। फ़िल्म का नाम था "1984"।

 क्या है यह फ़िल्म "1984" , और क्या सम्बद्ध है इस फ़िल्म का राष्ट्रपति ट्रम्प से ? 

 "1984" नाम की यह फ़िल्म अंग्रेजी उपन्यासकार जॉर्ज ओरवेल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। इस उपन्यास को ऑरवेल ने 1949 में लिखा था, और काल्पनिक श्रेणी का उपन्यास है जो कुछ राजनैतिक-प्रशासनिक व्यवस्था पर रचा बुना है।  मगर इतने पूर्वकाल में भी लिखे हुए होने के बावजूद इस उपन्यास में ऑरवेल की काल्पनिक शक्ति इतनी सटीक है कि वह जिस कलयुगी-विपरीत(dystopic) भविष्य की कल्पना करके सं 1984 को अपने ख्यालों में गढ़ते है, काफी सारे लोगों का मानना है कि वह आज राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के काल में सत्य होता साबित हो रहा है। 

सिनेमाघरों के मालिकों का मानना है कि जन जागृति के लिए इस उपन्यास और उस पर आधारित फिल्म का मंचन मुफ्त में करना राष्ट्र और सामाजिक हित में आवश्यक हो गया है।

 Orwell का यह उपन्यास अपने प्रकाशन के बाद कई सारे देशों में प्रतिबंधित हुआ । क्योंकि इसमें एक विकृत समाज की कल्पना रची हुई थी। मगर काफी सारे देशों में इसे भविष्य की चेतावनी के रूप में भी देखा गया। आखिरकार यह उपन्यास 200 से भी अधिक भाषाओँ में लिखा गया, और कई सारे प्रकाशनों ने इसे इतिहास के सबसे बेहतरीन उपन्यासों की सूची में शामिल किया। आज यह उपन्यास और इस पर आधारित फिल्म, दोनों ही इन्टरनेट पर सहज उपलब्ध है, इस मंशा के साथ की समाज और देशों के नागरिकों और सरकारों के भले के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

 "1984" उपन्यास में क्या पदार्थ है ?

1984 में बताया गया है कि 'आज' दुनिया में सिर्फ तीन ही महादेश बस्ते है। विश्वयुद्ध और परमाणु बमबारी के बाद दुनिया और जटिल हो गयी थी। कहानी एयरस्ट्रिप वन की है, जो की ओशिनिया नाम के महादेश की उपराज्य है। कुछ ठीक से याद नहीं है , मगर शायद अतीत में इसी उपराज्य को ब्रिटेन या इंग्लैंड , ऐसे ही किसी नाम से बुलाया जाता था। 
   बाकि के दो महादेश है *यूरेशिया* और *ईस्टासिया* । ओशिनिया महादेश असल में अमेरिका द्वारा ब्रिटैन और दक्षिणी अमेरिका देशों पर कब्ज़ा कर लेने से बसा है। 

यूरेशिया बसा है रूस द्वारा अधिकांश यूरोप पर कब्ज़ा कर लेने से। 

और ईस्टासिया बसा है चीन, जापान, दक्षिणी एशिया, भारत, और गरीब अफ़्रीकी देशी के एक हो जाने से। यह देश पहले तो एक confused लड़ाई लड़ते रहे थे, मगर फिर बाद में एक महादेश बनाने को राजी हो गए।

आज, यानि 1984 में, यह तीनों महादेश आपस में न ख़त्म होने वाली लड़ाई लड़ रहे है। सभी की समझ में आता है कि इस लड़ाई में कोई भी विजेता कभी भी नहीं आने वाला है, मगर वह फिर भी लड़ते रहते हैं।
असल में इनकी लड़ाई के पीछे एक षड्यंत्र है। वह आरम्भ होती है इनकी राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था से। 
ओशिनिया में उपन्यास का मुख्य पात्र ,विंस्टन स्मिथ, एक मंत्रालय में काम करता सरकारी कर्मचारी है। ओशिनिया में जो सरकार है, उसे "पार्टी" कह कर पुकारा जाता है। और यहाँ अब सिर्फ चार ही मंत्रालय हैं, ministry of truth, ministry of love, ministry of plenty, और ministry of peace। आज यहाँ की सरकार, यानि "पार्टी" ने अपनी खुद की एक नयी भाषा भी ईज़ाद कर लिया है और जिसे ओशिनिया का आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया है। इस भाषा को न्यूस्पीक यानी newspeak , बुलाते है। न्यूस्पीक में चारों मंत्रालयों का नाम उनके संक्षिप्त रूप में बोला जाता है, minitrue, miniplenty , miniluv , और minipec। इन चारों मंत्रालयों का काम अपने नाम का ठीक उल्टा है। 

विंस्टन स्मिथ जो की minitrue में काम करता है, उसका काम झूठ फैलाने का, ऐसे की "पार्टी" हमेशा सकारात्मक छवि में ही रहे। इन लोगों के सोचने का तरीका को doublethink करके बुलाया गया है, जिसने एक साथ दी विरोधास्पद विचारों को एक साथ सच माना जाता है। कब कौन सा विचार लागू करना है, यह पार्टी ही तय करती है। नियम यही है कि विरोधियों और विपक्ष पर नकारात्मक विचार को लागू करो और पार्टी पर सकारात्मक विचार को। 
1984 के आज के युग में सच कुक भी नहीं होता है। पार्टी जो भी बोलती या करती है, mini true मंत्रायल में स्मिथ का काम है की वह तुरंत सभी report, तस्वीर, दस्तावेज़, ब्यूरे, तथ्य में फेरबदल करके पार्टी की छवि के प्रति अनुकूल बना दे। आज इतिहास नाम की कोई वस्तु रह ही नहीं गयी है, क्योंकि न जाने कितनों ही बार हर जगह दस्तावेजों और तस्वीरों में फेरबदल या छेड़छाड़ हो चुकी है। मगर "पार्टी" इस छेड़छाड़ या फेरबदल की कार्यवाही को "आवश्यक सुधार" कह कर बुलाती है।

1984 के युग में कोई कानून नहीं होता है। यहाँ वह काम गलत है जो की पार्टी को नापसंद है। यहाँ की पुलिस नहीं होती है, कोई टैक्स, कुछ भी नहीं है। बस एक ही पुलिस है, thought police, जो की मिडिल क्लास लोगों के ऊपर हर समय निगाह बनाये रहती है। मिडिल क्लास इसलिए क्योंकि इतिहास में सभी क्रांतियां मिडिल क्लास लोगो ने ही  शुरू करी  है। इसके लिए सभी मिडिल क्लास लोगों के घरों में हर जगह tele screen लगी है, जो की हर समय देखती और सुनती रहती है। आज व्यक्तिगत एकंकता (privacy) "पार्टी" को बिलकुल नामंज़ूर है। टेलेस्क्रीन को कभी भी बंद नहीं किया जा सकता है, और उसकी निगरानी क्षेत्र के बाहर जाना बहोत गंभीर अपराध है। 

 कोई अगर गलत काम के लिए सजा झेलता था, तब उसे unperson करा जा सकता था। unperson में न सिर्फ उस आदमी को नष्ट किया जा सकता था, उसके इतिहास और सभी किस्म के अस्तित्व के प्रमाण की भी ऐसे नष्ट कर दिया जाता था कि मानो उसने कभी जन्म ही नहीं लिया था।

"पार्टी" का सञ्चालन एक big brother नाम का अनदेखा, अंजान पदनाम से होता था। शायद यह कोई व्यक्ति नहीं था, बल्कि एक समूह का codename था। समूचे देश भर में बैनर लगा था big brother is watching you. और पार्टी की आइडियोलॉजी। 

Minipec का काम लोगों में "पार्टी" के विरोधियों और विपक्ष के प्रति नफरत फैलाने का था। इसके लिए अक्सर करके hate week यानि घृणा उत्सव का भी आयोजन करवाया जाता था, जिसमे लोग जम कर "पार्टी" के विरोधीयों को कोस सकें। घृणा और नफ़रत फैलाने का एक लाभ यह भी मिलता था कि इससे लोगों में विश्वास कायम रहता था कि देश का हर पल कोई दुश्मन है, जिसका सामना करने में देश एक युद्ध लड़ रहा है। 

मगर युद्ध लगातार लड़ने का असल मकसद था फैक्टरियों के व्यर्थकारी, अतिरिक्त उत्पाद का खपत होता रहे। फैक्ट्री और उद्योग के मालिक लोग अरबपति पैसे वाले लोग थे। और यही लोग "पार्टी" के सञ्चालन में भी बैठे हुए थे। असल में तेरहवी शताब्दी से ही उद्योगिक क्रांति के बाद से फैक्टिरी उत्पादन की एक भीतरी समस्या थी। वह यह की फैक्टरियों के मालिक को फैक्टिरी चलाने से लाभ दीर्घ संख्या में उत्पाद करने से ही मिलता था। ऐसे में वह समाज की वास्तविक जरूरत से अधिक उत्पाद बना देते थे। ऐसे में आने वाले अतिरिक्त उत्पाद को खपत करते रहने का तरीका चाहिए था। अतिरिक्त उत्पाद में पर्यावरण का अंधाधुंध उपभोग तो होता ही था, समाज से बुनियादी समस्याएं, भूखमरी, गरीबी, बिमारियां या तो और बढ़ रही थी या समाप्त नहीं ही रही थी। मगर उद्योगपति वर्ग समझता था कि किसी भी तरीके से पूरे समाज की पूर्ण समस्या मुक्त कर सकना असंभव था। तो ऐसे में समाज के अधिकांश लोगों का भला करते हुए अपनी प्रभुसत्ता कायम रखने का तरीका यही था कि फैक्ट्री उत्पादन वाली आर्थिक व्यवस्था कायम रखी jaye

और अतिरिक्त फैक्ट्री उत्पाद को कृत्रिम तरीके से नष्ट करवा कर नए की मांग रचने की विधि थी देश और समाज को किसी दुश्मन से युद्ध में ग्रस्त रखना। तो यहाँ से घृणा और नफरत का काम शुरू होता था।

Wednesday, June 07, 2017

आरएसएस और उनकी भेदभाव को प्रसारित करती कानून व्यवस्था

आरएसएस का कहना है कि वह जातपात में विश्वास नही करता है। और फिर अपने खुद के गढ़े हुए *तथ्य* के मद्देनजर वह आरक्षण नीति का भीतर ही भीतर विरोध करता है यह तर्क देते हुए की *आरक्षण नीति से तो जातपात और अधिक फैलेगा* ।

खुद से मुआयना करने की ज़रूरत है कि क्या वाकई में आरएसएस जातपात में विश्वास नही करता, या सिर्फ एक lip service यानी मुंहजबानी बोल्बचन कर रहा है ।

जो संस्था *थूक कर चाटने* वाली नीतियों के लिए बदनाम है, कांग्रेस पार्टी की *gst, आधार* से *मनरेगा* तक जिन नीतियों का विरोध किया और फिर *थूक कर चाटते हुए* खुद वही ले आयी, यानी जो कि सामान न्याय व्यवस्था में विश्वास ही नही करती, क्या वह वाकई में भेदभाव नही करने वाली संस्था हो सकती है ?

जातपात आखिर है ही क्या ?
भेदभाव ।
और भेदभाव कैसे किया जाता है ?
असमान न्याय , अप्रकट न्याय, अघोषित कानून ही तो भेदभाव है।
अभी ndtv पर हुए cbi रेड की कहानी को ही देख लीजिए। या फिर भ्रष्टाचार निरोध के नाम पर आम आदमी पार्टी के लोगों पर आए दिन हो रहे कार्यवाही को देख लीजिए। मोदी पर सहारा और बिरला से करोड़ों रुपये लेने का सबूत तक है, मगर रेड केजरीवाल के दफ्तर पर होती है, या ndtv के लोगो पर। और फिर ऐसे भेदभाव वाली कानून व्यवस्था करने वाले लोग कितनी निर्लज्जता से कहते फिरते हैं कि वह लोग जातपात में विश्वास नही करते ।

आश्चर्य ..घोर आश्चर्य।

जातपात के अंधकार युग की दास्तान वही है जो कि आरएसएस और भाजपा आज  भी प्रशासनिक शक्तियों के माध्यम से कर रहे हैं।यानी,  किसी निम्म जाति के लिए वही कार्य गलत , पाप या फिर अवैधानिक होते थे, जो किसी उच्च जाति के लिए स्वीकृति और मान्य या वैधनिक, या फिर छोटी भूलचूक करके पारित हो जाते थे। यही तो थी वह ब्राह्मणपंती जिसका इतना विरोध हुआ इस समाज मे ।
और आज फिर हम आजादी के इतने सालों बाद उसी व्यवस्था से ग्रस्त हो गए है।
असमान न्याय।
यानी सोनिया, मुलायम, मायावती, लालू, ममता के लिए वह कार्य अवैध, अमान्य, पाप माना जायेगा जो कि मोदी, जेटली , मोहन, नितिन या सुरेश के लिए वैध माना जायेगा ।

और फिर कहो कि हम जातपात नही मानते, यानी कोई भेदभाव नही करते ।!
पूरा प्रशासन शक्ति खुल्लम खुला भेदभाव नीति पर चलवा रहे है और फिर सफेद झूठ बोलते है।

आरएसएस की समस्या ही यह है कि वह उन शब्दों के मूल विचार और अभिप्रायों को नही समझता है जिन्हें वह यूँ ही रट्टू तोते की तरह दिन भर बोलता फिरता है।

किसी भी किस्म के भेदभाव का दूसरा बड़ा स्रोत होता है व्यक्तिनिष्ठ पैमानों का उपयोग। और तीसरा बड़ा स्रोत है तार्किक प्रमाण के बजाए अंधविश्वास करने पर जोर देना।
भाजपा के शासन में यही हो रहा है । कही देशभक्ति के नाम पर, कही सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर, कही सेना के नाम पर, और कही गाय और गौमांस के नाम पर--- जनता को *तार्किक प्रमाण* नही, *अंधविश्वास* करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। जबकि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया को बुला कर अपनी सीमा क्षेत्र का निरक्षण कैमरे पर करवा कर प्रमाण देता है, तब भी मोदी जी की सरकार चाहती है कि देश की सशत्र सेना पर विश्वास करते हुए हम मान ले कि *सर्जिकल स्ट्राइक* हुई थी ! यह जनता पर अंधविश्वास करने का प्रशासन का दबाब नही तो और क्या है ? और फिर भेदभाव यहाँ से ही तो आरम्भ होता है। जब तर्कशक्ति नष्ट हो जाती है और सही-गलत का पैमाना किसी दूसरे की मनमर्ज़ी बन जाती है, जिस पर की अंधविश्वास करना जनता की मजबूरी होता है। तब आरम्भ हो जाता है भेदभाव, यानी जातपात, क्षेत्रवाद, वर्णवाद, भाषावाद, लिंगभेद। भेदभाव ही तो इंसान की गुलामी का स्वरूप है। आज़ादी का एक अर्थ यही है -- भेदभाव वाले कानून से मुक्ति। याद है न गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में ट्रैन से उतारे जाने वाली घटना।

आरएसएस मूर्खियात का गढ़ है। वह सिर्फ मुंहजबानी ही शब्दों का भोग करता है। उनके अर्थ और अभिप्रायों को नही समझता है। भाषण देने सीखना उनका दैनिक कार्य है। शब्दों और तर्क पर चिंतन करना नही। खोखले शब्दों को बोलता है।

आख़िर राष्ट्र भाव का भी क्या अर्थ और अभिप्राय रह जाता है यदि प्रशासन भेदभाव वाली नीतियों पर चलता रहे। क्या जनता का एक बड़ा हिस्सा मात्र किसी देशभक्ति नाम की अनजानी भावना को किसी दूसरे के दुख और भोग की खातिर अपनाने के लिए बाध्य होना चाहिए, जबकि प्रशासन उसके साथ भेदभावपूर्ण तरीके से पेश आता है ?

Monday, May 29, 2017

राजा भोज तथा भोजपुरी भाषा का संबंध

भोजपुरी भाषा पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में बोली जाने वाली बोली का नाम है। यह नाम इस क्षेत्र में प्रसिद्ध राजा भोज के नाम से आया है।

कौन थे राजा भोज , और क्यों प्रसिद्ध थे यह ?

राजा भोज का शासन करीब 12 शताब्दी में उज्जैन के राजसिंहासन से हुआ करता था। वह परमार राजवंश से आये शासक थे। उनकी प्रसिद्धि उनकी न्यायप्रियता और बुद्धिमता के चलते थी। टीवी पर 1980 के दशक में दिखाए जाने वाले दो धारावाहिक राजा भोज के इर्द गिर्द निर्मित थे। एक था सिंहासन बतीसी और एक था विक्रम और बेताल । इनके ही शासन के दौरान उज्जैन ने कला, विज्ञान, ज्यातिषी के माध्यम से नक्षत्रविज्ञान (astronomy) में श्रेष्टतम प्रदर्शन किया था।
     राजा भोज का शासन मध्य भारत मे एक विस्तृत क्षेत्र में स्थापित था। एक अन्य प्रसिद्ध कहावत कहाँ राजा भोज, और कहां गंगू तेली भी इन्ही से संबंधित है। कहते है कि कोल्हापुर (जो कि वर्तमान में महाराष्ट्र राज्य में स्थित है) ,तक उज्जैन के राजा भोज का शासन था। वहां एक बार एक किले के निर्माण के दौरान निर्माण का कुछ अंश बार बार गिर जाया करता था। कारीगरों और तत्कालीन विश्वकर्मा अभियंताओं का तत्कालीन श्रद्धाओं के अनुरूप मानना था कि ऐसे स्थानीय ईष्ट को प्रसन्न नही करने के कारण उनका अभिशाप की वजह से हो रहा है। निर्माण से पूर्व कोई नरबलि दी जाती थी कि ईष्ट उनको आगे निर्माण के दौरान कोई जानलेवा बांधा न पहुचाये। यहां पर आ रही बाधा से निपटने के लिए किसी नवजात की आहुति की बात उठने लगी। ऐसे में सवाल था कि कौन देगा अपना नवजात शिशु आहुति के लिए।
तब वहां के एक अमुक स्थानीय व्यक्ति गंगू तेली ने अपने शासक की मुश्किलों को समझते हुए अपने नवजात शिशु को प्रस्तुत किया। आहुति के बाद ही यह निर्माण सिद्ध हो सका, मगर राजा भोज ने इस परम त्याग के सम्मान में उस किले में गंगू तेली के पत्नी और शिशु की स्मृति में एक मूति स्मारक भी निर्माण करवाया। आज भी कोल्हापुर किले में इस स्मारक को देखा जा सकता है। कहावत का संदर्भ यूँ है कि लोगों में चर्चा यह बन गयी थी कि अपने इस परम बलिदान के उपरांत गंगू तेली खुद को राजा भोज का बहोत नज़दीकी परम मित्र मानने लग गया था, क्योंकि उसे लगता था कि राजा के दोने वक्त में वही उनके कार्य मे सहायक साबित हो सका। वही से यह कहावत निकल पड़ी, कहाँ राजा भोज और कहां गंगू तेली
यानी 
कभी-कभी किसी बड़े व्यक्ति की किसी छोटी , सहायता नही दिए जाने वाले कार्य को कोई मूर्ख व्यक्ति आगे बढ़ कर अपने बलिदान से पूर्ण करवा है और फिर गर्वान्वित महसूस करता है, और खुद को भी राजा का मित्र समझने लगता है कि आज वही राजा का सच्चा मित्र साबित हुआ है।

राजा भोज से संबंधित अनेको दंतकथाएं लोगो मे प्रचलित थी। कई सारे इतिहासकार मानते हैं अपने न्याय और प्रजापालन के लिए प्रसिद्ध काल्पनिक नाम,  राजा विक्रमादित्य , शायद राजा भोज का ही एक उपनाम था।
समूचे विश्व में प्रजापालन के लिए प्रसिद्ध शासक, जैसे इंग्लैंड के किंग ऑर्थर, और भारत मे राजा विक्रमादित्य इत्यादि का प्रमाणित इतिहासिक अस्तित्व आज भी पुरतत्वकर्ताओं के लिए एक अबूझ पहेली है। वर्तमान पुरातत्व विज्ञान के अनुसार अधिकांशतः ऐसे सम्राट दंतकथाओं की उपज ही पाए गए है।
   राजा विक्रमादित्य भी अपने न्याय सूत्रों के लिए बहोत प्रसिद्ध थे। टीवी पर बना धारावाहिक *विक्रम और बेताल* उन्ही के न्यायसूत्रों से प्ररित कहानियों का समूह है, जिसमे एक पेड़ पर उल्टा लटका भूत, बेताल, बार बार राजा विक्रमादित्य को कहानी के रूप में एक परिस्थिति वाला प्रश्न देता है और पूछता है कि इस परिस्थिति में क्या उचित न्याय होना चाहिए। *विक्रम* यानी राजा विक्रमादित्य न्याय परिस्थिति पहेली का सही उत्तर देते हैं, जिसका कि भूत बेताल प्रशंसा तो करता है, मगर अपनी एक शर्त के अनुसार, विक्रम द्वारा मूक टूटने की वजह से वह विक्रम के कंधों से बीच मार्ग से बार-बार उड़ कर वापस अपने वृक्ष पर लौट कर उल्टा लटक जाता है।
      बरहाल, राजा भोज ने आपने शासन के दौरान अपनी राजधानी उज्जैन से हट कर झीलों और तालाबो के समीप निर्मित एक नए शहर में स्थापित करी, जिसे की *भोजताल* कहा जाता था। ।समयकाल में यह नया शहर *भोपाल* नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो कि वर्तमान भारत के केंद्रीय राज्य क्षेत्र , मध्यप्रदेश की राजधानी है।
         राजा भोज के उपरांत परमार राजवंश समयकाल में बाकी सभी शासकों की ही तरह कही न कही अस्त हो गया। उनके वंशजो दो समूहों में विभाजित हो गए, जिनमे से एक समूह उत्तर पूर्वी भारत मे स्थापित हो कर वापस भोज साम्राज्य को स्थापित करने का प्रयास करता है। इसी समूह को समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों ने *पूर्बिया* या *पुरवईया* नाम से पुकारा। *पूर्बिया* लोग ने क्षत्रों में निवास किया, उसे यह लोग अपने प्रसिद्ध पूर्वज, राजा भोज , के नाम से भोजपुर कह कर पुकारते थे। बस वही से इन क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा को *भोजपुरी* नाम दे दिया गया।
मुगलों के शासन के दौरान यह समूह , *पूर्बिया परमार वंश*, कभी कभार बीच-बीच मे अपना एक राज्य स्थापित करते रहे हैं। आज़ादी के उपरांत भोजपुर क्षेत्र का छोटा अंश बिहार राज्य में एक जिला के रूप स्थापित किया गया।

भोजपुर क्षेत्र में राजा विक्रमादित्य के प्रजापालक और न्यायप्रिय होने की गवाही देती दंत कहानियों पर बना एक और टीवी धारावाहिक था *सिंहासन बत्तीसी*। प्रचलित दंतकथा के अनुसार भोजपुर में कहीं किसी मिट्टी के टीले में एक अजब शासन शक्ति का निवास था। एक चरवाहा घटनावश उस टीले तक पहुंच गया, और जब भी वह उस टीले पर बैठ कर कोई भी स्थानीय ग्राम समस्या का न्याय निवारण करता था, वह न्याय बहोत ही प्रशंसनीय हो जाता था। फिर एक मान्यता बंध गयी कि उस टीले के नीचे ही प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य का राज सिंहासन दफन है, और जो भी टीले पर चढ़ाता है, वह असल मे राज सिंहासन पर विराजमान हो रहा होता है। सिंहासन के गोल में बत्तीस, यानी 32, कठपुतलियां लगी हुई है, जो कि तिलिस्मी कठपुतली है, और विक्रमादित्य के सभी न्याय सूत्र इन्ही में संरक्षित है। यह कठपुतलियां चरवाहे को दिखाई देने लगती है और नाटक के द्वारा उसे उपयुक्त न्याय सूत्र समझा दिया करती है। बस, इसी के चलते वह चरवाहा भी किसी श्रेष्ठ शासक की भांति जन प्रशंसनीय न्याय वाचन कर देता है।