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राजनीति से ऊपर उठाने की ज़रूरत सिर्फ नेता नही, जनता की भी है

👆👆✍यह ऊपर लिखा मैसेज व्हाट्सएप्प पर कही से त्वरित हो रहा है।अगर बात सच भी है, तो भी एक बात हर एक भारतीय को सोचनी चाहिए। *वह यह कि हम लोग कब तक ऐसी नाकामियों को कभी भाजपा का और कभी कांग्रेस पार्टी की नाकामी सिद्ध करने में अपना दम लगते रहेंगे?*ऐसी नाकामियां किसी राजनैतिक पार्टी की नही, देश की होनी चाहिए जब देश में महंगाई ताबड़तोड़ बढ़ती जाए और एक दिन बैंकिंग प्रणाली का भी भट्टा बैठ जाये तो। अगर यह सब गुज़र जाए तो हमे राजनैतिक पार्टी की व्यवस्था से ऊपर उठ कर अपने तंत्र का मुआयना करने पर ध्यान देना होगा क्योंकि तंत्र तो दोनों ही पार्टियों को एक समान मिला था। तो फिर कैसे तंत्र खुद में विफल हो गया कि ऐसी चालबाजी करने में भाजपा अकेली, या कांग्रेस पार्टी अकेली, या की दोनों ही पार्टियां आपसी किसी मिलिभगति मे सफल हो गयी? आखिर खामियाजा तो भारत के नागरिक की जेब से जाएगा? आर्थिक स्वतंत्रता ही तो राजनैतिक स्वतंत्रता और जीवन मुक्ति का प्रथम गणतव्य स्थल होता है। जब इतनी बड़ी आर्थिक त्रासदी घटती है तब ही हम सब लोग आर्थिक ग़ुलाम बनते है , और तब हम और ज्यादा भाजपा-दोषी-कांग्रेस-दोषी के खेल में फँसते है। हमा…
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संविधान के ढांचे में ही गड़बड़ होने से नौकरशाही बन जाती है अल्लाद्दीन का चिराग

एक बार यदि हम इस सच को समझ लें की गड़बड़ी के बीज संविधान में ही बोये हुए हैं, और वह क्या हैं, तब इस सच के ग्रहण से अलग ही logic और विचारधारा प्रफुल्लित होने लगेगी, जिसके अलग ramifications होंगे। उदाहरण के लिए, आप केजरीवाल जी से लोकपाल की मांग को किनारे रखने की बात सहर्ष करने लगेंगे।।आप को समझ आ जायेगा कि अगर सिसोदिया जी को यूँ ही स्कूलों का निर्माण और जैन जी को मोहल्ला क्लीनिक खुलते देखना है तो एकमात्र तरीका यही हैं की इन लोगों को सत्ता में बनाये रखने के लिए वोट दो। आप यह भी समझ जाएंगे की मात्र निर्माण हो जाने से सिसोदिया जी के स्कूल और सत्येंद्र जैन जी के क्लीनिक देश निर्माण में योगदान देंगे यह आवश्यक नही है। क्योंकि जब भी सत्ता पलटेगी, वापस इनको ध्वस्त भी आसानी से किया जा सकता है।
 यह सब भारत के संविधान के चौखटे में हो रहा है। यहाँ निर्माण से ज्यादा आसान है ध्वस्त कर देना। यहां नौकरशाही एक लावारिस पड़े अल्लादिन्न का चिराग की तरह है, जिसकी मर्ज़ी ही अंतिम सच है जो कि कुछ भी काम को हो जाने का तिलिस्मी भ्रम प्रदान करता रहता है आदमियों की आँखों में। सच यह है कि चिराग के जिन्न की मर्ज़ी है व…

नौकरशाही अधीनस्थ समझौते में रहती है राजनेताओं के संग

यूपी पुलिस इत्मीनान से बोलती है कि वह गौहत्यारों को पकड़ने की प्राथमिकता रखती है।अब बात को समझने के लिए न ही कोई "UPSC की तैयारी"  वाला हदों का ज्ञान चाहिए, न ही कोई राकेट साइंस लगेगी की राजनेताओं और नौकरशाह के बाच में शक्ति-संतुलन किस ओर झुका हुआ है, और क्यों और कैसे ऐसा हुआ है।यह पहली बार नही है पुलिस या किसी नौकरशाह की खुद 'कर्तव्य परायणता" की इज़्ज़त खराब हुई है राजनेता के आगे। इससे पहले उन्नाव कांड में एक साल लग गए FIR ही दर्ज करने में। कठुआ में यही "कर्तव्य परायणता "की इज़्ज़त लगी थी पुलिस की। सुनन्दा केस में सब छुट्टी पर भागने के चक्कर मे लगे रहे। dk ravi कर्नाटका IAS कांड में यही दिखा। सोहराबुद्दीन कांड और गुजरात के हालात तो पूछिये ही नही।जब पुलिस या कहें तो पूरी नौकरशाही का मुखिया- भारत का राष्ट्रपति- खुद ही एक पांच वर्षीय नौकरी वाला कोई पुराना, मार्गदर्शक मंडल वाला राजनेता हो, और उसके पद का चुनाव भी संसदीय लोगो को हाथों में बागडोर हो-- तो नतीजे यही मिलना तयशुदा है।अब यह गड़बड़ खुद संविधान में ही बोई हुई है।

आखिर कौन सा नया व्यावसायिक कौशल खोज निकाला है सेवानिवृत नौकशाही ने?

सेवानिवृत्ति के बाद नौकरशाहों को आजकल भारतीय उद्योग घराने बहमुल्य वेतन पर contract सेवा में लेने लग गये हैं।
सोचने वाली बात है की ऐसा कौन सा professional skill set होता है इन सेवानिवृत नौकरशाहों में की उनकी इतनी कीमत आंकी जाती है?
शायद political manipulatuion , bribery और fool proof contractual scandal कर लेना भी अपने आप में एक professional skill माना जाने लगा है। वरना आखिर ऐसा कौन सा बाज़ार में चलने वाला कौशल इज़ाद कर लिए है service class लोगों ने ?
किसी समय दुनिया के इतिहास में रसायन शास्त्रियों के कौशल ने साबुन बनाने के अपने कौशल से दुनिया का प्रथम multi national corporation दिया था - lever brothers। वर्तमान काल में information technology वालों ने आधुनिक दुनिया को silicon valley दी, बंगलुरु दिया।  मगर अब हज़ारो सालों की ग़ुलामी से तथाकथित ताज़ा ताज़ा "आज़ाद " हुए भारतीयों ने अपने आप में एक नया ही professional skill सेट खोज निकाला है जो की शायद न तो किसी कॉलेज में पढ़ाया जा सकता, और न ही एक इस खास पेशेवर बिरादरी के बाहर कोई आसानी से सीख ही सकता है -- manipulation !
जी हाँ। आप गौर क…

A comparison of the Indian Politico Adminitrative system

कौन है भारत के leftist जिन पर इतिहास के पाठ्यक्रम को मरोड़ने का आरोप लगता है

भारत मे अक्सर हिंदुत्ववादी भक्त दल यह आरोप लगाते रहते हैं कि इतिहास को leftist मार्क्सवादी विचारधारा के लोगो ने लिखा है, इस तरह से मरोड़ कर की इतिहास की स्कूली पाठ्यक्रम में उनके पक्ष के साथ ज्यादती करते हुए सही से प्रस्तुत नहीं किया गया है।एक मनोरंजक बात यह भी है कि ठीक ऐसा एक आरोप खुद भक्त हिंदुत्ववादी लोगों पर भी लगता है, दलित-पिछड़ा अम्बेडकरवादी लोगों के हाथों की भारत के धर्म शास्त्र से लेकर जंग-ए-आज़ादी तक इतिहास के स्कूली पाठ्यक्रम मे उनके लोगो पर हुए शोषण और उनके योगदान की वीरगाथाओं को ठीक से प्रस्तुत नही किया गया है।इधर इतिहास के स्कूली पाठ्यक्रम विषय के बारे भक्तबुद्धि चेतन भगत ने तो एक टिप्पणी यह करि हुई है कि यह व्यर्थ का विषय है जिसका आधुनिक समाज की तुरंत आवश्यकताओं को पूरित करने में कोई महत्व और उपयोग नही होता है।  इस विषय का उपभोग बस राजनीति की रोटी सेकने के लिए ही होता है लोगो के दिमाग मे एकतरफा इतिहासिक दृष्टिकोण को भर कर उनको वोटबैंक में तब्दील करके।बरहाल एक सवाल यह है कि कौन हैं यह leftist मार्क्सवादी लोग जिनको क्ष्रेय भी दिया जाता हमारे देश का इतिहास पाठ्यक्रम लिखने का…

Why does history take side with the winners of the war ?

आजकल जो  लोग यह शिकायत करते घूम रहे हैं कि इतिहास को leftist ने मरोड़ कर लिखा है और स्कूल शिक्षा में भारत के इतिहास पाठ्यक्रम में सिर्फ एकतरफा पक्ष के नज़रिए को ऊंचा करके दर्ज किया हैयह वही लोग है जिनको बच्चों पर वैसे भी स्कूली पाठ्यक्रम के load का अतापता नही है। यह लोग खुद अनपढ़, philister लोग है और बेवजह मासूम पढ़ने वाले बच्चों पर फिजूल के छिट्टपुट्ट
जानकारियों को रटते रहने का load देना है।---_-----_------_------__------- *Question* : Why do we know more about the intruders than our own warriors or kings.Answer
Because those great warriors or kings or the architect kings  could not prove to be victorious as their architecture monuments could not give to the society people with enough powerful skills that could help the king win the wars.So eventually the academics of History , which is always under pressure to trim down the contents to the "necessary" short lines , automatically takes favour with those historical figures who ruled over the society , as it is their deeds and a…