Tuesday, July 26, 2016

चाय वाला और भारत का संविधान

एक क्ष्रेष्ठ संविधान की खासियत यह नहीं  है की एक चाय वाले को प्रधामंत्री बना देता है ; क्ष्रेष्ठ संविधान की खासियत यह होती है कि वह चाय बेचने या किसी भी छोटे कामगार के व्यक्ति को भी जीवनयापन आवश्यक उसके शिक्षा , भोजन  के वह अधिकार दिलवा सके कि प्रत्येक व्यक्ति मानसिक,नैतिक, बौद्धिक सक्षम हो जाये की बड़ी आबादी और क्षेत्रफल देश का सम्मानित प्रधानमंत्री बन सके ।

मात्र चायवाले का प्रधानमंत्री बन जाना वह भी बिना क़ाबलियत के ,  यह तो संविधान की विफलता का प्रमाण है  की असामाजिक मानसिकता वाले गुंडे,  या फिर शिक्षा विहीन वाले अशिक्षित , असक्षम लोग देश के ऊँचे पदों पर सवार हो जा रहे हैं ।

Saturday, July 16, 2016

Commentary on the case of Mumbai University students, 1 of 3 student seeking a revaluation



1 in 3 univ students applies for revaluation


Unfairness and Wrong are not one and the same thing.


On Internet (google), Fairness is defined as :
not fair; not conforming to approved standards, as of justice, honesty, or ethics: an unfair law; an unfair wage policy. 2. disproportionate; undue; beyond what is proper or fitting: an unfair share.
As we can see from the definition, the meaning of unfairness cannot be easily assumed to be Wrong.
Unfairness is about something being not proportionate. This implies that it does not necessarily means something which is disproportionate is purposefully wrong. Human life is filled with instances, belief , judgements, which cannot be accurately measured. They are called Subjective evaluations. Every person can hold different proportion of his evaluation on these matter.  That means, merely because one’s evaluation does not meet the other’s standards , it should not be called out as Wrong.
  There, we stumble upon a limitation of all the theories of justice that we practice. Because, the theories of justice deal with controlling the Wrong, not the one’s which have been disproportionately evaluated. The English language simple term for a proportionate evaluation is Fairness. It is possible within the modern laws that someone conduct himself unfair with another person, and may yet not be culpable for having caused any apparent damage to him. That is, without having done any wrong apparently. 
   Unfairness is fundamentally the dishonest, unethical conduct during the process. Unfair process will surely yield wrongful loss or a wrongful gain. Where there is objective evaluation process involved, i.e., the use of Logic, the detection of Unfairness may be possible. But wherever there is subjective process involved, the unfairness remains merely emotionally palpable, but never culpable. That is, one can feel the occurrence of wrong, but he is in no good position to blame the wrong doing on someone.
 All Discriminations (whether gender based, caste based, religion based, region based, or professional lobbies based) are supposed to be seated in acts of Unfairness. Individual acts of Unfairness are not possible to be proved. Individual can only feel the unfairness happening with him. He has seldom scope of accusing or blaming the unfairness, because evidencing is not easy. More so, if the evaluation process involves Subjective evaluation. The only way to detect a suspected case of unfairness is when the disproportionate results become too large scale or heavy to reveal out by themselves, and the human conscience is left with no choice but to admit it the existence of act of unfairness.
 This is how the revelations of the RTIs help in detecting the unfairness.
In the law courts, Unfairness is seen more commonly during malpractices in labour handling, and during competitive laws aimed at preventing wrongful loss or wrongful gains.  Unfair Labour Practices, or the ULP, is a term we all have heard during our lectures of Labour Laws. Similarly, there are issues in Competitive laws which come under the ambit of unfair competition rules.

Were it not for the revelations of the RTI, imagine how the act of unfairness would have slipped of as.
The teachers lobby would have been accusing the modern students as undeserving, inept, incapable of passing the exam upon a strict evaluation and marking. The teacher lobby would put the students in the light of being beggar, unable to accomplish things without seeking grace, by his own merit.
   We all should be thankful to the RTI maker and its revelation which have shown to the world the fault may perhaps not be in the quality of learner, but in the quality of examiner, not in the answer script, but in the evaluation.


Tuesday, June 28, 2016

विश्वास : ज्ञान ::: सागर : भूभाग

विश्वास और ज्ञान के बीच का सम्बन्ध ऐसा ही हैं जैसा की सागर और भूभाग का। विश्वास सागर के जैसा विशाल और अथाह है। जबकि ज्ञान भूभाग के समान संक्षित, सीमित और बिखरा है। जैसे प्रत्येक भूखंड भी किसी तरल सागर के ऊपर तारित है, वैसे ही जो कुछ ज्ञान उपलब्ध है, उसके भी गर्भ में कुछ विश्वास और मान्यताएं ही हैं। इस प्रकार विश्वास परम आवश्यक और सर्वव्यापी है।
    मगर मानव जीवन का सत्य यह है की भगवान ने मानव को भूखंड पर जीवन यापन करने के लिए ही बनाया है, सागर में नहीं। बस, यही सम्बन्ध मनुष्य का विश्वास और ज्ञान के साथ भी है। चिंतन और निर्णय हमें ज्ञान के आधार पर ही लेने होते हैं, विश्वास के आधार पर नहीं। भले ही ज्ञान सीमित है। संक्षित है। और भले ही उस ज्ञान के केंद्र में भी कुछ विश्वास और मान्यताएं होती हों।
    जैसे आदि काल के नाविक सागर की यात्राएं बिना आगे का मार्ग को जाने, किसी नयी भूमि की तलाश में खतरों से झूझते हुए किया करते थे, और जैसा की आज भी अंतरिक्ष अनुसंधान में हो रहा है, ...-
    ...- मानव जीवन का एक उद्देश्य निरंतर ज्ञान की तलाश करते रेहाना है....
   क्योंकि केवल विश्वास के आधार पर जीवन बसर करने के लिए इंसान बना ही नहीं है।

Tuesday, June 21, 2016

तुलना: सामान्य परीक्षा पद्धति बनाम जहाज़रानी महानिदेशालय की व्यवस्था

(हिंदी अनुवाद :)

सामान्य परीक्षा पद्धति जो की किसी भी शिक्षा बोर्ड तथा विश्वविद्यालय में प्रयोग करी जाती हैं, उसमें कुछ निम्नलिखित विशेषतायें रहती है जो की सुनिश्चित करती है की निष्पक्षता कायम रहे और  कही किसी प्रकार के द्वेष/ वैमनस्य भाव अथवा मोह को सक्रिय होने का स्थान न मिले।
   वह विशेष विधियां जो की परीक्षक के अंदर विद्यमान संभावित द्वेष/ वैमनस्य भाव अथवा पक्षपात को सक्रिय होने पर भी विशेष परीक्षार्थी अथवा उनके समूह को चिन्हित करने में बाधा करते हैं :-
   1) परीक्षा के नियम प्रत्येक परीक्षार्थी को एक विशेष संख्या, हॉल टिकट नंबर , की नई पहचान देती है।ऐसा करने से यह निश्चित हो जाता है की उसकी पहचान को गोपनीय बना दिया गया है।
2) उत्तर पुस्तिका नियमों में यह कहा गया है की कोई भी परीक्षार्थी अपनी उत्तर पुस्तिका में किसी भी रूप में अपनी पहचान सदृश्य नहीं कर सकता है। ऐसा करने से पहचान सम्बंधित गोपनीयता को बल मिलता है।
3) इसके उपरांत उत्तर पुस्तिकाओं को दूसरे स्तर पर गोपनीय संख्या दे दिए जाते हैं, जो की अक्सर omr पहचान संख्या किसी कंप्यूटर इत्यादि से दिए जाते हैं। अब उत्तर पुस्तिकाओं को चिन्हित कर सकना अत्यंत मुश्किल हो जाता है।

वह विशेष विधियां जो की सुनिश्चित करती है की परीक्षक कोई शिथिल जांच कार्य न करे, या फिर छात्रों को फेल करने की लय न बना लें इस मोह में आकर कि चूंकि उत्तर पुस्तिकाओं की जांच की उन्हें कीमत दी जाती है, तो वह जितनी अधिक पुस्तिकाओं को फेल करेंगे उतने अधिक छात्र अपनी पुस्तिकाएं वापस जांच के लिए याचना करेंगे और फिर परीक्षक को उतना अधिक धन लाभ मिलेगा :-
4)  अ) काफी सरे बोर्ड अथवा विश्वविद्यालय कुछ नियमों द्वारा यह नियंत्रित करते हैं की परीक्षक किसी भी उत्तर पुस्तिका में कितने अंक काट सकता है असामान्य कारणों से ,जैसे की अस्पष्ट हस्तलेखन , मात्रा त्रुटि, ग्रामर सम्बंधित त्रुटि, गन्दा कार्य, इत्यादि।
  ब) कुछ दूसरे बोर्ड और विश्वविद्यालय में जांचकर्ताओं को कुछ एक नमूना जांच पुस्तिकाओं के समान्तर जांच करने की हिदायत दी जाती है। नमूना उत्तर पुस्तिका में एक उचित उत्तर के सभी कीमती बिन्दूओं को सपष्ट कर दिया जाता है। और इसके उपरांत बाकी सभी अवर परीक्षकों को हिदायत दे दी जाती है की वह कितने सारे कीमती बिन्दूओं पर कितने अंक नामांकित कर सकते हैं।
   स) कुछ एक बोर्ड और विश्वविद्यालयों में परीक्षक जांचकर्ताओं के ऊपर कुछ वरिष्ठ  निरीक्षक बैठा दिए जाते हैं जो की जांच की हुई पुस्तिकाओं की अनर्गल नमूना जांच करके देखते है की अवर जांचकर्ताओं ने उचित कार्य किया है या नहीं।

5) द्वितीय याचना का विकल्प :- इन सब के अलावा, परिणाम घोषणा के उपरांत प्रत्येक परीक्षार्थी को उसकी संतुष्टि के लिए विकल्प दिया जाता है की वह जांच करी हुई उत्तर पुस्तिका की फोटोकॉपी प्राप्त कर सके और फिर पुनः अंक गणना अथवा पुनःमूल्यांकन के लिए याचना कर सके। यह वह कदम है जो की भेदभाव की शंकाओं को दूर करते हुए प्रत्येक परीक्षार्थी को परिणाम के प्रति पूर्ण संतुष्टि दिलाता है।

छात्र वर्ग अक्सर करके बहोत संवेदनशील व्यक्ति गण होते हैं। परीक्षा के परिणामों में छोटी सी गलती अक्सर बेहद दुखद परिणाम देते हैं, जैसे की आत्महत्या । कॉलेज और शिक्षा से विमुख हो जाना एक अक्सर देखा गया असर है जो किसी कल्याणकारी राज्य के लिए चिंता का विषय होता है।

मगर लगता है कि जहाज़रानी प्रशासन में अधिकारी लोग अपने जनकल्याणकारी उत्तरदायित्वों का संज्ञान लेने और निभा सकने में असक्षम लोग हैं। बल्कि वह लोग जनकल्याण निर्णयों को उस पक्ष की और अधिक देखते हैं जिनको की साधारणतः जनकल्याण का विरोधी माना जाता है। उन्होंने परीक्षार्थी मूल्यांकन प्रणाली के भीतर एक ऐसी व्यवस्था रच डाली है (नौकायान कंपनी द्वारा जारी समुंद्रिय कार्यानुभव प्रमाणपत्र) जो की उपर्लिखित निष्पक्षता और द्वेष/वैमनस्य से विमुक्तता के कोई भी गुण नहीं रखती है। यानि, जहाजरानी विभाग में यह आसानी से संभव हो गया है कि किसी भी परीक्षार्थी का कैरियर विनाशक मूल्यांकन कर दिया जाये कुछ हलके-फुल्के शिक्षण कारणों को बिनाह बता करके; और जिसमे किसी विशेष चिन्हित किये हुए परीक्षार्थी से भेदभाव, द्वेष, वैमनस्य को बिना रोकटोक सक्रीय होने का स्थान हो, जहाँ किसी भी प्रकार की मूल्यांकन कि द्वितीय याचना के लिए कोई व्यवस्था न हो।
     दुखद यह है की जहाजरानी विभाग के अधिकारी अपनी इस त्रुटि को बारबार हो रही शिकायतों के बावजूद इस प्रकार की कुव्यवस्था का जहाज़श्रमिकों के शोषण से सम्बन्ध को पहचान भी नहीं कर सक रहे हैं।
   
       संयोग से एक अन्य विधि जो की पहले से ही प्रयोग में है वह परीक्षार्थी गुणवत्ता व्यवस्था के उस प्रश्न का उत्तर देती है, जिस प्रश्न को प्रेरक बता करके उपर्युक्त समुंद्रिय कार्यानुभव प्रमाणपत्र जहाजरानी प्रशासन अधिकारीयों ने अनिवार्य बनाया है। इसलिए कभी कभी अचरज होता है कि विकल्प होने के बावज़ूद एक ऐसी त्रुटिपूर्ण व्यवस्था को किस अन्य वजह से खारिज नहीं किया जा रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से इस त्रुटिपूर्ण व्यवस्था का आरम्भ ऐसे नहीं हुआ था जैसे हम इसे आज देख रहे हैं। आरम्भ में इस व्यवस्था का उद्देश्य सीमित होते हुए मात्र यह था कि परीक्षार्थियों द्वारा जहाज़रानी महानिदेशालय में दावा में प्रस्तुत  समुंद्रिय कार्यानुभव प्रमाणपत्र जो की जहाज कैप्टन द्वारा जारी होता है, उसकी वास्तविकता पुनःप्रमाण की कंपनी से बंधी कड़ी निर्मित कर सकें। उस समय कंपनी द्वारा जारी प्रमाणपत्र का उद्देश्य मात्र इतना ही था। परीक्षार्थी गुणवत्ता प्रबंधन नाम पर इसका योगदान स्वीकृत था ही नहीं। मेरे विचारों से यह दूसरा गुणवत्ता वाला उद्देश्य समयकाल में किसी नासमझी वश चलन में निकल पड़ा है। अधिकारी लोग अधिकांशत निजी शिपिंग कंपनी के पूर्व नुमाइंदे रहे हैं जहाँ "sacking" की श्रमिक अनुशासन संस्कृति के चलते इन्हें जनकल्याणकारी निर्णयों और नियमों से परिचय कम रहा है। अब क्योंकि महानिदेशालय में अधिकारीयों का आभाव रहा है, इसलिए ऐसे व्यक्तियों को उनके वैधानिक ज्ञान की समस्त जांच किये बिना ही नियुक्त कर लिया गया था। बाद में जब शिपिंग कंपनियों ने कुछ परीक्षार्थियों को यह कार्यानुभव प्रमाणपत्र कुछ वैमनस्य कारणों से जारी नहीं किया तब शिकायत होने पर इन अधिकारीयों को यह संज्ञान ही समझ में नहीं आया की इसका श्रमिक शोषण कानूनों से क्या उलंघन हो रहा है। अतः उन्होंने शिकायत पर कार्यवाही करने के बजाये उस उलंघन को पारित कर दिया और फिर बाद में उसे परीक्षार्थी गुणवत्ता प्रबंधन से जोड़ कर के न्यायोचित करना आरम्भ कर दिया।
     
     वह दूसरी मूल व्यवस्था जो की परीक्षार्थी गुणवत्ता के उस प्रश्न का उत्तर उचित और वैधानिक विधि से करती है, वह कुछ इस प्रकार है :-- शिपिंग कंपनियों द्वारा अक्सर कर जहाज़ कर्मी अधिकारीयों की गुणवत्ता पर शिकायतें महानिदेशालय में प्राप्त होती रही है। गुणवत्ता के इस प्रश्न के समाधान में महानिदेशालय अधिकारीयों ने एक व्यवस्था डाली जिसमे वह परिक्षार्थी के मौखिक परिक्षण में इन शिपिंग कंपनियो के नुमाइंदों को आमंत्रित करना आरम्भ किया। मौखिक परिक्षण सम्पूर्ण व्यवस्था में एक बाद का कदम है , जिसमे किसी भेदभाव/पक्षपात की आशंका तो है मगर बहोत कम और आम स्वीकृति की मात्रा में। ऐसा इसलिए क्योंकि मौखिक परीक्षा में परीक्षार्थी और महानिदेशालय दोनों की ओर से तमाम सयोंग सम्भावनाओं पर नियंत्रण कम है। इसलिए परीक्षार्थियों में मौखिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर भी भेदभाव या पक्षपात की आशंकाओं का आरोप करीबन शून्य है। इस परीक्षा में अनुतीर्ण होने पर परीक्षार्थी के कैरियर पर अधिक प्रभाव नहीं पढता है। और यदि किसी परीक्षार्थी के भावुक दृष्टि से उसके साथ एक बार कुछ भेदभाव या पक्षपात हो भी जाए तो स्थिति पर प्रत्येक पक्ष का नियंत्रण कम होते यह उम्मीद बंधी रहती है की अगली बार किस्मत शायद उसका साथ दे देगी।
    तो इस प्रकार परीक्षार्थी गुणवत्ता का वह प्रश्न उत्तरित हो जाता है, जिसको अधिकारी गण प्रेरक बता करके कंपनी से जारी समुंद्रिय कार्यानुभव प्रमाणपत्र को अनिवार्य करते रहे हैं।

        पुराने युग में किसी भी व्यवसायिक सेवा क्षेत्र में नए लोग वही आते थे जो शायद अपने पारिवारिक जुड़ाव के चलते उस व्यवसाय के गुण और कौशल सीख लेते थे। अन्यथा वह किसी पुराने सगे संबंधी अथवा दुनियादारी के पितामह के चलते यह कौशल सीख पाते थे। तत्कालीन व्यवस्था के दोषों के समझने के बाद ही इंसान ने क्रमबद्ध अध्ययन पद्धति का समाज में शिलान्यास किया। वर्तमान की परीक्षा व्यवस्था उसी क्रमबद्ध अध्ययन पद्धति का अंश है। क्रमबद्ध अध्ययन पद्धति में भेदभाव, पक्षपात, वैमनस्य इत्यादि से निपटे के लिए कड़े कदम रखे गए जिससे की व्यवसायिक कौशल पारिवारिक धरोहर न बनी रह जाये। इसमें परीक्षार्थी का मूल्यांकन ताथयिक आधार पर होता है , जैसे की "क्या उसने उस कार्य को सीखने हेतु उस कार्य पर अपने हाथ आज़मा लिये है : हाँ अथवा ना ? ",  बजाये किसी व्यक्तिनिष्ठ आधार के , जैसे की " क्या उसने आपकी संतुष्टि के मुताबिक कार्य सीख लिया है  -- आप संतुष्ट है या नहीं ?"।  क्रमबद्ध अध्ययन पद्धति में परीक्षार्थियों का व्यक्तिनिष्ठ मूल्यांकन लिखित परीक्षा विधि से किया जाता हैं, जिस विधि के चारित्रिक गुण लेख के आरम्भ में दर्ज़ है जो की भेदभाव, पक्षपात, वैमनस्य का निवारण प्रदान करते हैं।
        जहाज़रानी प्रशासन अधिकारीयों को न जाने क्यों इन सब बिन्दूओं पर सामान्य ज्ञान क्यों  कम पड़ गया है जो कि उन्होंने श्रमिक शोषण वाली एक विधि को तमाम शिकायतों के बाद भी ज़ारी कर रखा है।    

Saturday, June 18, 2016

Comparison : standard examination procedure of any university versus the DG Shipping

In a general system as practised in any university at random, the following features ensure that fairplay is not dismissed while a student is being evaluated, by any reason of prejudice or favoritism

Processes which ensure that prejudices and favoritism of the Examiner towards any candidate do not have a room to become active :--
1) The rules of the examination provide for a specially coded hall-ticket number to every candidate. This ensures that each candidate's identity is concealed so to prevent prejudices of the Examiner to become active.

2) Candidate are told not to reveal their identity in any form on the answer sheet. It enhances the above process.

3) The answer-sheets are given secondary coding, preferably by OMR computer. This puts a double-lock on the identity information, such that the Examiner has no means to detect the identity or even the hall ticket information.

Processes which ensure that the Examiners are not inclined to fail the candidates for monetary gains of incentive income through answer sheet evaluation

4) Different universities and different school boards follow different system to achieve this. It remains imperative on every institution that their teachers themselves do not suffer from lethargy of answer sheet evaluation, or that they do not turn their sincere duty into a source of income.
   a) Some boards/university provide guidelines on how many marks should be deductible for reason such as poor handwriting, spelling errors, grammatical mistakes, untidy work, et al.
   b) A sample evaluation is done for some answer sheets by group of senior teachers who are later to be made incharge Examiner. They mark the Value points for the subjective answers, and the junior Examiners mark or evaluate the answers based on the presence of these value points.
    c) An auditor Examiner does audit of the random samples from the lot so to ensure that lethargy of the Examiners body does not impact the fate of the students.

5) As a double safeguard, many boards and university provide for system of re-evaluation and re-verification, so that the candidate is satisfied to his heart regarding not being given a fair treatment. Towards this, candidates have scope to seek a photocopy of his evaluated answer sheet. This is one very critical measure, which rules out almost all the claims of an unfair treatment.

Students are often times very sensitive people. A slight mistake , no matter on whose account, often leads to morbid outcome as suicide. Dropping out from the college is another such outcome of concern for any welfare state.

However, the authorities within Shipping Administration seem terribly incompetent in regard to their decision-making vis-a-vis burdens of a welfare state. Indeed , they seem to judge the weight of welfare activities higher on the sides which are otherwise seen as antagonist to public welfare policies. Within the candidate evaluation and exam quality management, they have created system (ISSUANCE OF SEA TIME LETTER BY SHIPPING COMPANY) which are completely deprived of the above mentioned features of a fair evaluation system. That is, it is possible to do a career damaging evaluation based on a few loose elements of learning, and with full scope of prejudices/favoritism to work, and without giving any room for second appeal such as re-evaluation or re-verification.
  More importantly, the authorities are repeatedly failing to see the exploitative nature of this system within the seaboard labour environment, despite recurring complains and appeals.
      Incidentally, there is already another method in place and in practice as well which sufficiently fills up for whatever objective the shipping administration calls as the reason for adopting the exploitative exam quality management system. It is therefore intriguing as to what is causing this system to be in place despite so many wrongs in it. Historical insight of the advent of seatime letter issuance system reveals that it has emerged due to flaws in the judicially sound decision making. The original purpose was restricted to securing the Evidencing chain-link. The so-called secondary purpose of exam quality management is an ex-post-facto explanation of a mistaken decision where no one within the administration had sound knowledge as to what is wrong if a shipping company is refusing seatime letter as a revengeful action to a bona fide seaboard employee.
     The authentic system which fills up for the exam quality management is as follows--- The shipping companies have regularly raised objections on the quality of seafarers coming out from the shipping competency exams. To answer to their sorrows, the shipping administration has adopted a system wherein they regularly invite the representative of shipping companies to oral examination process. Oral Examination is later step in the examination system, which has safeguards against unfair evaluation albeit slightly loose. Almost no candidate is known to have lost career or even to suffer long term or short term exploitative work conditions on board ships due to the participation of their company representative. More over, the panel allocation is done at random, and many more uncontrolled ,unregulated factors work which keep all the parties convinced about there being no unfair play .
    In the light of this measure, the 'seatime letter issuance' mechanism for exam quality management remains a burden and perhaps an evidence of judicial incompetence of the people in authority. Many of the people within the shipping administration are arriving from work background of private shipping companies wherein "sacking" is a culture. In a "sacking" episode, the labour laws are regularly and without slightest consciousness, violated; hence there is a culture of lacking awareness on the labour laws front.
    In the days of yore, the recruitment to any profession was either through a familial transmission of the skill and knowledge, or through patronage (power to appoint someone directly, likely by nepotism and favoritism). Shortcoming realized in that system lead to the evolution of the STRUCTURED LEARNING system. In Structured Learning system, candidate is evaluated on factual grounds as "whether he has acquired the learning of the task by doing it hands-on : Yes/no" , instead of being evaluated on subjective ground as " peer is satisfied or unsatisfied as to his learning?". In a structured learning system, the subjective evaluation of candidate is filled up by the written examination process which has abovementioned features of safeguarding against prejudices and favoritism.

   All types of skill learning should always be proven on whether someone can do the task or not, and not whether someone else is satisfied or dissatisfied by him doing the task in a certain way .

       Indeed, the shipping authorities should have realized that their actions have an effect of undoing the structured learning system as well, which they themselves keep commending all the while.