Sunday, December 21, 2014

Fanaticism, political exploitation and Emotional distress

The problem of the fanatic cults is that whenever their eyes become forced to see into the mirror, they manage to switch off the minds by taking recall of some past incidents when they were the victims.
Perhaps the better way of identifying who should we call a Fanatic is by determining who is it who is striving to SWITCH OFF THE MINDS by taking any impertinent recall of his victimized status.

Brainwashing is the only means by which Fanaticism can work. Fanatics need to be bigots, and to become a Bigot ,you need to trained how to avoid Reflective thoughts and Self-criticism. SWITCHING OFF THE MINDS is a typical trick the Fanatics exploit.
The truth of life is that it is filled with up and downs meeting us alternately. Every person ,every group has been a winner , and loser at one time of their other. Every person gets his chance to be the authority wielder at some occasions and to be Victim at the other occasions. Fanaticism brews when the victimhood is brewed persistently in a person by a psychopathic training.
   Unfortunately ,India having undergone those 600+200 years of bondage , has developed a lots of social groups which is hereditary Fanatic. The entire social atmosphere cultivates Fanatics, Bigotism and other psychologically distresses in the children belonging to these social groups. Their emotional condition as an adult is of vengeful, violent, sadistic person.
   It is in these groups that the political manipulators can so successfully address the Vedic philosophy of "Vasudhev kutumbkam" and "Ford Foundation CIA Funding" both at the same time ,EVER working to convince themselves of righteousness in their hypocrite conducts.
   It is here that the pains of Humanity are subsided by "Don't forget what's they done to you".
   These are routes of the unending sorrows to each one who endorses such fanaticism. Although the fanatics are typically the one who thrive and feed themselves of such sorrows, yet they work their energy to cause more sorrows. They are sadistic afterall . The more the sorrows of humanity, the more they convince themselves of their righteousness in their humanity-chilling deeds.
   Self-conscience and Internal peace, the "Om Shanti", is they only way we can help our ownselves escape from the self-feeding serpent of Fanatic sadism.

(हिंदी अनुवाद)

हमेशा से ही उन्माद चरमपंथियों की सबसे बड़ी समस्या यह रही है की जब भी उनकी आखों को आईने में आत्म-विश्लेषण के लिए विवाश होना पड़ता है, वह अपनी आँखें तो मजबूरी के आगे खोल देते है, मगर अपने मस्तिष्क को बंद कर देते हैं। मस्तिष्क को बंद करने के लिए वह स्वयं को अतीत की किसी त्रासदीपूर्ण घटना का स्मरण करवाते है जिसमे वह भुग्त भोगी रहे थे ,जब उनके साथ अन्याय हुआ था।
   शायद हमे किसी के उन्मादी चरमपंथी होने का सबसे पुख्ता प्रमाण यही से प्राप्त होता है की वह व्यक्ति अपने उन्मादी व्यवहार के क्षेत्र-रक्षण में कितनी बार अतीत की घटना का स्मरण करने का आदी है।
   बर्गलाया मस्तिष्क किसी भी प्रकार के उन्माद को पनपने के लिए सबसे उपयुक्त भूमि प्रदान करता है। उन्मादी व्यक्ति को अड़ियल व्यवहार का होना परम आवश्यक है, और अड़ियलता वाला व्यवहार प्राप्त होता है एक नकार देने के निरंतर प्रयास से, जब व्यक्ति आत्म-चिंतन और स्व:आलोचना से बचना सीख जाता है।
   मस्तिष्क को इन्द्रियों से प्राप्त संवेदनाओं के लिए बंद कर लेना उन्मादी व्यवहार का सर्वाधिक प्रकट लक्षण माना जा सकता है। यानी की संवेदना हीनता
  जीवन का एक सत्य हमेशा से रहा है कि यह कभी-धुप-कभी-छाँव की रेखा पर  चलता है। प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समुदाय कभी विजेता बना और कभी परास्त हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति कभी तो शक्ति-संहारक बना है, और कभी तो पीड़ित,भुग्तभोगी। उन्मादी व्यवहार तब पनपना शुरू करता जब व्यक्ति निरंतर अपने अन्दर एक पीड़ित अथवा भुग्तभोगी होने वाली भावना को अपनी स्मृतियों में संरक्षित करके रखता है। उन्मादी व्यवहार का जन्म इसी एक मनोविकृत प्रशिक्षण में से होता है जब व्यक्ति निरंतर स्वयं को एक पीड़ित के रूप में देखता है।
  दुर्भाग्य से भारतवर्ष की ६००+२०० वर्षों की दास अवस्था ने यहाँ कई समुदायों को जन्मातरण उन्मादी मनोविकृत बना दिया है।इन समुदायों का सामाजिक माहौल ही उन्मादी विचार से परिष्कृत होता है। इनमे जन्म लेने वाले शिशु अपने बाल्यकाल से ही किसी न किसी प्रकार की उन्मादी भावना से ग्रस्त होना शुरू कर देते हैं। अतीत की किसी त्रासदी का पीड़ित अथवा भुग्तभोगी होना वह अपने बाल्यकाल से ही अपने वातावरण से सोख लेते है। अपनी वयस्क अवस्था में यह व्यक्ति  प्रतिशोध, प्रतिहिंसा और दुखात्मा भावुकता वाले होते हैं।
   ऐसे ही व्यक्ति और समुदाय वह लोग है जिनको वर्तमान के राजनैतिक-कूटनीतिज्ञों ने अपने उपभोग के लिए एक साथ दो विरोधी विचारधारा , "वसुद्धैव कुटुम्बकुम" तथा "फोर्ड फाउंडेशन और सी.आई.ए से पोषित हुयी" , के लिए तैयार किया है। इस विरोधी विचारधारा के उपभोग से ही यह कूटनीतिज्ञ एक साथ दो विरोधी उद्देश्यों को पूर्ण करके सफल हो रहे है, और आत्म-तुष्टि भी कर लेते है की वह पाखंडी नहीं हैं।
   यही वह लोग है जो वर्तमान काल में मानवता पर घटी त्रासदी में भी स्वयं को संवेदना हीन बना लेते है की यह कह कर की "याद रखो की अतीत काल में तुम्हारे साथ तो तुम्हारे विरोधियों ने  इससे भी भीषण घटना अंजाम दी थी"।
   यह सब आचरण अनंत दुःख वाले जीवन मार्ग हैं। यह वह वाले आचरण है जो की मानवता से युद्धभीषक दुखों का अंत कभी भी प्राप्त नहीं होने देंगे। उन्माद दुखी भावुकता में से जन्म लेता है। और फिर और अधिक दुःख को जन्म देता है, जो की वापस उन्माद को ही जन्म देतें हैं। इस प्रकार से उन्मादी आचरण एक ऐसा सर्प है जो की अपनी ही केंचुली का भक्षण कर के जीवित रह जाता है। जितना अधिक दुःख फैलता है, उन्माद उतना ही स्वयं को सशक्त करता है की उसने मानवता के संहार के जितने निकृष्ट कर्म किये थे वह सब उचित ही तो थे।
  आत्म-मंथन और आत्म-शान्ति , ॐ शांति ,ही शायद वह एकमात्र मार्ग है जिससे हम स्वयं को उन्मादी आचरण करने से रक्षा कर सकते हैं।

Thursday, December 18, 2014

If the Indians were to write the MARPOL, STCW, SOLAS ....

The culture of Indians is of a low intelligence group, where people hold more opinions than their population. Indians, being intellectually insufficient, are not able to derive justices on issues. Therefore, they invariably always fail to make decision by logic and reason.Eventually, they resort to Populism (decision making by a populist vote) as the only method of delivering the justice.

Resorting to populism: when logic and reason has failed.

This behavior is analogical to : Some people say A has committed crime. Others say that he has not. "So let's decide by voting whether A has committed crimes ir not."
!!!!!
Instead of calling for scientific investigation, forensics etc , we Indian have the method of, first, creating a confusion scenario around a point. And then looking to untangle the confusion by calling for Vote. Perhaps, to this we may even mis-apply another fundamental tenet of "innocent until proven guilty" to help the criminal escape from clutches of law enforcement.
This is Indians' IQ.

Sometimes I imagine how the MARPOL, STCW and SOLAS were written if Indians were at the helm of affair. Infact, more interesting would be to imagine how the MSC(maritime safety committee, a technical body setup by IMO for scientific solution-finding) would have functioned if Indians had made up its "expert panel".
1) Closing the scupper will retain oil from going out. But it will also Prevent rain water from draining out. Master of the vessel shall decide which all scuppers be opened or closed during loading discharging. He may call for voting if unable to decide .
2) Air conditioning in re-circulation mode makes life inhospitable inside the accommodation. Therefore, Air conditioning to be put on re-circulation on choices of the Master. If people disagree with the master, he may resort to voting. If there is no clear agreement between the crew too, the decision will return back on the master to proceed to do as he wishes.
3) If there is no clear vote, master must proceed to do as he feels like. "Crew has the habit of barking out on all the issues".
4) Master shall go by popular voting when to lower life boats , if everyone's personal convenience is not being meted out .
5) Master shall ensure that all crew are given due rest. He will decide when which crew will sleep and for how long.

Subjective approach to solution-finding for Technical problems. No room for Logic, and bye-bye the Reason.
If it were left to the Indians, the technical body MSC would have become synonymous with what we know as the Election Commission, and even the technical knowledge found have been subjected to Election and Voting to be able to find acceptance among the people.
Scientific journals and Research Papers too would have met the same fate. Perhaps Baba Ramdev would have hopped onto accord final approvals to the Medical research papers. His stereotype behaviour would have been to steal credit for someone else's research efforts while disapproving the actual scholar of his work. Ramdev until so far has only partaken to Indianise, force-ably harmonise thr neo-age scientific progress to some mythical Ancient Ayurvedic knowledge, "already known from olden times".
In the maritime field too, we the Indians would have done just whatever we so regularly do in the garb of Yoga and Ayurveda.

कच्चे तेल के गिरते हुए दाम और इसका रूस से सम्बन्ध

धीरे धीरे ऐसा लगने लगा है की कच्चे तेल के दामों में गिरावट एक व्यापक राजनैतिक साज़िश के तहत लायी गयी हैं।
मगर शायद वह राजनैतिक कारक भारत से नहीं जुड़ा है। बल्कि रूस से सम्बंधित है - जो की युक्रेन के कुछ पूर्वी हिस्सों पर कब्ज़ा करे हुए है। पश्चिमी देशों को इन राजनैतिक संकट का बड़ा सदमा मलेशिया के विमान mh17 के मिसाइल द्वारा गिराए जाने से लगा था। अमेरिका और पश्चिमी देशों का कहना है की यह विमान रूस-समर्थित युक्रेन अलगाववादियों ने मिसाइल मार कर गिराया था जबकि उनके यह मिसाइल रूस की फोजों ने मुहैया करवाई थी। विमान दुर्घटना में मारे गए यात्री अधिकाँश नीदरलैंड (एक पश्चिमी यूरोपीय देश) के थे।
  उड़ान संख्या mh17 की दुर्घटना एक बेहद त्रासदीपूर्ण और व्यक्तिगत हानि थी।
हाल में ऑस्ट्रेलिया में हुए G20 सम्मलेन में भी पश्चिमी देशों ने रूस के राष्ट्रपति व्लाद्मिर पुटिन से बेरूखी का व्यवहार रखा था जो की मीडिया रिपोर्ट में बराबर दर्ज हुआ है। पश्चिम देशों ने रूस के पेट्रो-डॉलर को सुखा देने की चेतावनी भी दी थी।
  रूस की आर्थिक हालत एक बिगड़े हुए, भ्रष्ट , मंत्री-परस्त व्यक्तिगत पूँजीवाद (state sponsored crony capitalism) वाली हो गई है। देश की ज्यादातर जनता गरीबी में है हालाँकि कुछ एक उद्योगपति जो की राष्ट्रपति पुटिन से नजदीकी रखते है वह देश के तेल स्रोतों को सरकार से खरीद चुके है और अब उन कुओं से तेल बेच बेच कर एकदम मालामाल हो गए हैं।
  फिर वह यही तेल बेच कर मिला पेट्रो-डॉलर से पुटिन को राष्ट्रपति पद कर काबिज़ रहने में मदद करते हैं। यह कुछ ऐसा ही है जैसे हमारे देश में नरेन्द्र मोदी और अम्बानी , अडानी की दोस्ती। यहाँ भी कुछ इसी रस्ते पर हमारा देश चल चूका है। विश्व व्यापक भ्रष्टाचार निवारक संस्था, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल, के मुताबिक रूस आज दुनिया के अधिक भ्रष्टाचार वाले देशों में शामिल हो चुका है। एक अन्य संस्था ने दावा किया है कि विश्व अर्थव्यवस्था में मौजूद अन-लेख्य मुद्रा (un-accounted money) ,यानी "ब्लैक मनी",  में रूस का प्रतिशत सबसे बड़ा है।
   रूस को एक अनियंत्रित, उन्मादी देश माना जाने लगा है। वहां पर सरकार ने प्रतिबन्ध बहोत किस्म के लागू कर दिए हैं। सबसे प्रथम तो स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर प्रतिबन्ध। इसमें सरकार को इस बात का भी लाभ मिलता है की वहां की जनसँख्या वैसे ही अंग्रेजी भाषा नहीं जानती है, ठीक विपरीत जैसा की भारत ,पकिस्तान ,श्रीलंका जैसे देशों में हैं।
फिर सरकारी न्यूज़ चेनल तथा प्राइवेट चेनल जो की उद्योगपतियों और सरकारी दबाव से नियंत्रित होते है, ने सही सूचना को दबा कर ,या अर्थों को पलट कर प्रस्तुतीकरण के द्वारा जनता के आक्रोश को ढीला कर रखा है और सरकारी पदों पर बैठे मंत्रियों को बचा रखा है।
    पश्चिमी देशों को तेल के कारण हो रही राजनीति का आभास पहले ही लगा हुआ है। कच्चा तेल आज विश्व कूटनीति का सबसे बड़ा प्रेरक है। मध्य पूर्वी "खाड़ी" देश ,उत्तरी अफ्रीका (तुनिशिया ,लीबिया, और अब रूस। उधर दक्षिणी अमेरिका में  वेनेज़ुएला । कुछ एक अंतर्राष्ट्रीय समाचार चेनलों के मुताबिक एक अन्य तकनिकी विकास ,शेल गैस (shale gas) ,की प्रयोग तकनीक में हुए विकास के कारण भी तेल के दामों में गिरावट हुई है। शेल गैस के प्राकृतिक भण्डार तो कई दूसरे देशो में उपलब्ध थे मगर इसके परिष्करण की तकनीक अज्ञान थी। आज वही तकनीक विक्सित कर ली गयी है। नतीजे में अमेरिका ने अपनी ज़रूरतों के लिए शेल गैस पर बदलाव कर लिया और तेल आयात कम कर दिया है। इससे बाज़ार में कच्चा तेल अधिक हो गया है और खरीदार कम। अब तेल के दाम गिर रहे हैं। हालाँकि तेल निर्यातक देशों के संघठन, ओपेक , जब चाहे तेल उत्पाद को घटा कर तेल के उच्चें दाम वापस बहाल कर सकता है,मगर वर्तमान में उसने हस्तक्षेप से मना कर दिया है।
    याद करे की अभी कुछ दिनों पहले रूसी राष्ट्रपति पुटिन ने कुछ घंटों के लिए भारत यात्रा करी थी और प्रधानमंत्री मोदी के साथ कुछ एक मसौदों पर हस्ताक्षर कर के तुरंत वापस चले गए थे। भारत से रूस के रक्षा सम्बन्ध बहोत पुराने और गहरे हैं। मगर आश्चर्यजनक तौर पर दो तीन घटनाएं आज भी भारत-रूस संबंधों को बार बार परखने के लिए प्रेरित करती रहती है।
एक, यह की गाँधी परिवार को व्यक्तिगत तौर पर डॉलर-धन देने की बात ,जो शायद एक प्रकार की रिश्वत हुई,को रूस की गुप्तचर संस्था ने पहले भी स्वीकारा है। सुब्रमनियम स्वामी न जाने क्यों सोनिया गांधी को भी एक रूसी-इतालियन घर-का-भेदी होने का इशारा करते रहे है। भारत ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जहाँ रूसी हित पर अनकुश लगने की सम्भावना थी, भारत ने कुछ अटपटा व्यवहार करके रूसी हितों की रक्षा करी है। आश्चर्यजनक तौर पर रूस सम्बंधित विदेश नीति ,कोंग्रेस पार्टी और भाजपा, दोनों ने ही पालन करी है।
   दूसरा  ,कि  पाकिस्तान से ताशकेंट में रूस द्वारा प्रायोजित समझौते के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु वास्तव में कैसे हुई थी।
  भारत बहोत बड़ी मात्रा में अपने रक्षा उपकरण आज भी रूस से ही खरीदता है। इधर हाल के वर्षों में रूस ने पकिस्तान से अपने रक्षा उपकरण के व्यवसायिक सम्बन्ध स्थापित किये हैं।
   क्या कहें की किस देश से किसके कैसे सम्बन्ध हैं। कभी कभी अन्तराष्ट्रीय मंच की कूटनीति वाकई बहोत पेंचीदा और सर घुमा देने वाली होती है।
 
  बरहाल, वर्तमान में बहोत गौर से नज़र रखने वाली घटना होगी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के भाव और इसका अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर प्रभाव। यह भी देखना होगा की हम भारतीय कब तक इस सस्ते होते पेट्रोल-डीजल के दामों से ख़ुशी मनाते रहेंगे। क्या हम इस क्षणिक हालात को सिर्फ व्यक्तिगत ख़ुशी मना कर के जाने देंगे या की कोई सामाजिक लाभ भी उठा पाएंगे ,अपने देश में महंगाई को अचानक कम करके।
  

भाजपा के कुतर्क

(स-आभार : इन्टरनेट)

यदि मोदी कह दे की २+२= ५ होता है ,तब भक्तजन ख़ुशी ख़ुशी इसे भी मान जायेंगे।
यदि कोई पूछे की "कैसे?" ....तब भाजपाई भक्तजन इसका क्षेत्र-रक्षण कैसे-कैसे कुतर्कों से करेंगे
एक दर्जन तरीके:
----------------------------------------------------------
"कैसे?" पूछने पर भक्तजन तुम पर गालियाँ बरसाएंगे । वह कुतर्क करेंगे की :
1) तुम केजरीवाल से नहीं पूछते हो की २+२=४ कैसे हुआ ? ( प्रत्यक्ष सही को नकार देना और उसके सही होने का सबूत माँगना)
2) तुम तब कहाँ गए थे जब मोदी जी ३+२=५ कहा था ?(एक सही काम को परोक्ष कर के सौ गलतियों को बचाव करना)
3) तुम तो बस केजरीवाल के 2+3=4 का समर्थन करोगे (केजरीवाल के खिलाफ झूठ फैलाना)
4) तुम लोग भी मुसलामनों के साथ हो,खान्ग्रेस्सी हो, sickular हो, क्योंकि मुसलमान भी 2+2=4 बोलते हैं।(चाहे सही बोले मगर यदि किसी से घृणा है तो उसकी सही बात भी गलत मानते हैं)
5) केजरीवाल सोनिया गांधी के 3+2=4 के विर्रुध क्यों नहीं बोलता है ,उसे क्या मोदी जी की 2+2=5 ही गलत नज़र आता है। केजरीवाल कांग्रेस का एजेंट है।
6) केजरीवाल भगोड़ा है , वह 2+2=4 बताने के बाद छोड़ कर भाग गया। उसने यह नहीं बताया की मोदी का 2+2=5 कैसे गतल हुआ। केजरीवाल भगोड़ा है, "हाँ हाँ केजरीवाल भगोड़ा है"।
7) केजरीवाल से पूछो की 2 बटा 0 कितना हुआ? (अनिश्चित उत्तर से केजरीवाल की अज्ञानता और अयोग्यता साबित करना)
8) केजरीवाल यह बताये की किसी प्रतियोगिता के परिणाम में 2nd आने वाला 1st आने वाले से पीछे क्यों माना जाता है,जबकि 2 संख्या 1की संख्या से बड़ी होती है।(विषय वस्तु के बाहर ,भटक जाना, भ्रम फैलाना)
9) जी नहीं,कभी-कभी 1और 1 ग्यारह होते है।(मुहावरों और लोकोक्तियों को तर्क के समान प्रयोग करना)
10)  अगर इंसान का होंसला हो ,अपने में विश्वास हो तो वह 2+2=5 क्या, कुछ भी कर सकता है।(भावुक बातों से भ्रम फैलाना)
11) मोदी जी गुजराती है। व्यापार उनके खून में है। तुम क्या जानो की व्यापार कैसे होता है। गुजरात में व्यापार में 2+2 को पांच ही बनाया जाता है।(धोखाधड़ी और बेईमानी को व्यापार का आधार बताना और "दुनिया की रीत" बताना। बेईमानी से मिली कामयाबी पर गर्व करना)
12) केजरीवाल तब कहाँ था जब सोनिया ने 2+2=5 बता कर परीक्षा में पास हो गई थी।(अतीत में हुई गलतियों के आधार पर आज के सुधार कार्य को झूठला देना)

Sunday, November 09, 2014

Sierra's predicament

Predicament of Sierra is happening from the lack of Intellectual viewpoint that Tipping and Bribery, though they very closely similar , but are still different.
      This refusal to accept this difference is creating the moral vacuum which is making Sierra to endorse the political groups which are indulging in the wrong. What remains shocking is that Sierra scathes the corruption of Party A , while he desires to give way to the Corruption of Party B. Therefore, he is someone who doesn't want a cure, he wants the diminishing.
   However, in ground, there is no way to distinguish between the choice of complete cure AND the choice of diminishing. There is no rational criteria to judge this. It is hypocrisy to even attempt to create a distinction. No ethics, no morality offers to us this distinction.
  But rational and moral thoughts do endorse the distinguishing between the tipping and Bribery. From top notch academia, to philosophers, ample evidences can be shown to prove that Tipping and Bribery are separate human interactions, although very closely inter-linkable.
    
    The debate of Sierra ,therefore, is rising from the lack of distinction , which is causing in him a moral vacuum, and that in turn, causing him to endorse the political group which is as much grossly wrong as the other political group. The personal outlook, lacking the nuances, is leading to the choice of political group, which is admittedly wrong too.
  I would rather Sierra should for the sake of purging his confusion of morality, avoid receiving and giving of the tips, than to confuse away himself as a morally wrong-doer, and therefore seek defense for himself by endorsing the wrong and anti-social political viewpoints.
   There is a large section of population in India which is having the predicament that Sierra has. Lack of nuances on Tipping and Bribery, is causing in them a feeling of Guilt, to alleviate which they make the choice of going "unHyprocritical ", thus choosing the corruption and Scams of Party B, against those of Party A.
  Overall, this Intellectual deficiency to observe the differences is paving way for Corruption to survive. 

Dynasticism is in itself not a problem, the problem is stagnant powers.

अगर आप परिवारवाद (वंशवाद) के ही विरुद्ध है तब आप कोई समझदारी नहीं कर रहे हैं। आखिरकार परिवारवाद नेत्रित्व हस्तांतरण की समस्या का सबसे प्रचुर और सरल पद्धति है जो दुनिया भर में प्रयोग करी जाती है।
   चाहे आप ब्रिटिश साम्राज्य को देखें जहाँ की आज भी शाही राजघराना परिवारवाद के द्वारा ही चल रहा है, या कि अमेरिका के अमीर बैंक उद्योगी। सब के सब परिवार पर ही चल रहे हैं।
   मूल समस्या जिससे जनता परेशान होती है वह है शासन शक्ति का स्थाईकरण। शासन शक्ति किसी एक व्यक्ति या परिवार में जा कर अहंकार लाती है। यह अभिशाप बन जाती है। भारत में हिन्दू धर्म में घटी जात वादी प्रथा परिवारवाद से उत्पन्न हुयी सबसे बड़ी ऐतिहासिक त्रासदी है। जातिवाद ने एक परिवार वंशियों का समाज में अधिक ऊपर का दर्ज़ा दे दिया और दूसरे को अछूत और मानव जन्म के अधिकारों से ही वंचित कर दिया था।
   परिवारवाद समाज में व्यक्तिगत प्रगति की प्रेरणा को नष्ट कर रहा होता है। यह सक्षमता पर अंकुश लगा देता है।
  बस यही वह समस्या है जिसका निवारण करना आवश्यक है। अन्यथा परिवार ही इंसान को प्रगति करने की प्रेरणा भी देता है।
आख़िरकार, आदमी कमाता किसके लिए है ?? परिवार के लिए ही तो ।
     परिवारवाद को शासन शक्ति पर हावी होने से रोकना ही परिवारवाद विरोधियाँ का उद्देश्य होना चाहिए,न की परिवारवाद का सम्पूर्ण समापन। परिवारवाद आखिर में नेतृत्व की समस्या का समाधान भी तो है। और इंसान को प्रगति करने की प्रेरणा भी।
   

A fixed-match is the one having lost its oomph factor, its interest level.

I no more watch Cricket ever since the match-fixing has come to settle in my beliefs.

The core challenge before a Conscience-driven political party, such as the Aam Aadmi Party ,is to demonstrate to the people that **you can be winner by BEING TACTFUL, ALBEIT WITHOUT being Corrupt**.
      This is what the AAP has to demonstrate and prove to everyone.
Generally, it settles out as a common belief that a person who is conscience-driven cannot afford to be Tactful ,to be able to adopt the winning strategies because of the risk of being labeled as Corrupt.
   Therefore, as a last measure, a conscience-driven man or party is lead into depending ,as a strategy,on the winner side themselves leaving the trails of mistake . The conscience-driven is left with the only means-- that of crying and whine on mistake committed by the corrupt winner, and thereof, to collect the support of the losers so to make his victory for tthemselves.
   This is the belief which needs to be cracked and shattered.
In my own understanding it is not an impossible challenge as such. But it requires a huge support of the Public Conscience itself to be able to overcome the challenge. The fundamental crack to this challenge is available from the very fact that the Entrusted Tasks of a Government in a democracy is to create a LEVEL PLAYING FIELD . This condition will force that even if a political party has risen to power by use of combination of "unfair and fair" tactics, it will still have to atleast pretend to be Conscience-driven, and act out the hypocrisy of being Fair and Just throughout.
  This is the catch.
   The Realpolitik inside the group of Political groups is largely about Hypocrisy. The hypocrisy on ground will surely create a vast section of the dissatisfied,"disillusioned", loser population, which should help the opponent political camp to rise to power. Infact,this is what we see as the "Anti-incumbency factor".
   Only catch thing at this point is that If the public conscience can be raised to the level of preventing the "anti-incumbency phenomenon" from making repeated dwindling of administrative powers between the eventual two political groups, then the level playing field for a Conscience-driven man/political group can be created.
    In my thinking, Many of the western democracies have a public conscience nearing this levels to be able to put more effective checks on such forms of anti-incumbency, and the power dwindling.
    Scandinavian countries are in the top order of such a list.
        War against corruption is a contest between Conscience and the Slavery of human mind. Where there is Conscience, there will be free-will and the freedom which the Conscience so regularly demands. Freedom leads to the political system of democracy.
    Therefore, Democracy will become a natural loser too ,if the conscience loses out.
     While the weakness of the Conscience-driven party is so apparent, its vulnerability areas so well known, the best service to the common good can only be by ensuring the victory of the Conscience-driven political group.
  The level playing field between each of us can only arrive when the umpires can be trusted to be the most neutral and objective as one can be. The Governments are the Avatars of the Umpire in this game whose business is to guarantee the level ness of the field.

   Therefore,if you want to enjoy the game, it is in your interest to ensure the neutrality of other factors. A fixed-match is the one having lost its oomph factor, its interest level.

Friday, November 07, 2014

प्रजातंत्र पर समालोचनात्मक चिंतन

आरम्भ में प्रजातंत्र का उत्थान राजशाही और जमीदारी जैसी प्रशासनिक व्यवस्था से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था।
    राजशाही व्यवस्था में सभी मनुष्य को बराबर का स्थान नहीं मिलता था। कुछ लोग उच्च कुलीन, बड़े और अधिक सम्मानित , न्यायालय में विशिष्ट पद-सम्मान के अधिकारी, और वह दूसरे व्यक्तियों पर शासन करने के लिए थे।
   और अधिकाँश लोग निम्म-कुलीन, छोटे, अशिक्षित अथवा आवश्यकता मात्र की शिक्षा और रोज़मर्रा के कामकाज करने के जन्म लिए माने जाते थे।
    प्रजातंत्र का निर्माण शासन व्यवस्था में सभी को समान अधिकार, और न्यायालयों के समक्ष समान स्थान, पद देने के हिसाब से हुआ था।
   मगर इस व्यवस्था की अपनी सीमाएं उन प्राकृतिक कारणों से स्वतः प्रस्तुत होती है जिन कारणों ने पुराने मनुष्यों के समाज में राजशाही व्यवस्था को उत्पन्न किया था।
                 वह प्राकृतिक कारण है की सभी मनुष्य समान योग्यतायों और कार्य दक्षता के होते ही नहीं है। यह तो भगवान् द्वारा स्वयं से निर्मित असमानता है जिसे मनुष्यों के द्वारा बनी कोई भी शासन प्रणाली निवारण कर ही नहीं सकती है। कुछ में नेतृत्व के गुण नैसर्गिक होते है, कुछ में पालन करने की प्रवृत्ति होती है। कुछ लोग मौलिक चिंतन कर सकने में सक्षम अपने जन्म और पालन पोषण के वातावरण की वजह से स्वतः हो जाते है। बाकी लोग चिंतन हीन होते है मगर अन्य दैनिक जीवन कार्यों में प्रवीण होते हैं।
   तो यह अभेद सत्य है की समानता तो प्रकृति की शक्तियों के विरुद्ध का विचार था। यही से प्रजातंत्र की प्रथम सीमा तय हो जाती है। प्रजातंत्र में समानता का अभिप्राय मात्र न्यायायिक और शासन प्रक्रिय में समान हिस्सेदारी से होता है, प्रत्येक रूप से समानता और परपरता से नहीं। प्राकृतिक न्याय में समानता बहुत विर्लय रूप में रची हुई है। किसी पशु के खुर शक्तिशाली हैं ,तो किसी पशु के पैर भागने और उछलने में कुशल हैं। प्राकृतिक न्याय में समानता का यही स्वरुप प्रजातंत्र में भी चलता है।  कुछ लोग अधिक धनवान है, कुछ श्रेष्ठ चिंतन वाले और कुछ बस यूँ ही जनसँख्या में अधिक। ऐसे में सर्वश्रेष्ठ न्याय के लिए सभी को समान भागीदारी दी जाती है। श्रेष्ठ चिंतन जो की जन्संख्या में कम उपलब्ध है ,को दीर्घ जनसँख्या के परस्पर संतुलित करने की प्रेरणा इसी विचार से उत्पन्न हुई है। इसी विचार से प्रजातंत्र में संसद भवनों में दोनो कसौटियों को प्रस्तुत करने के लिए दो सभा गृहों की रचना हुई थी- राज्य सभा और लोक सभा।

    प्रजातंत्र की दूसरी कमजोरी इसमें से निकलती है। क्या होगा जब श्रेष्ठ चिंतनशील विचार को दीर्घ लोकप्रियता का मोहताज़ बना दिया जाए? क्या ऐसा समाज मौलिक विचारों से प्रेरित मार्ग पर विक्सित हो पायेगा? या यह मात्र किसी दूसरे अधिक विक्सित समाज की नक़ल ही कर के रह जायेगा? यानी, जो कुछ किसी दूसरे समाज की नक़ल कर के इस समाज में लोकप्रियता प्राप्त करेगा वही इस स्वदेश के समाज में अपनाया जायेगा और लोग भ्रमित हो कर उस नक़ल करने में प्रथम होने की प्रवृत्ति को ही विकास का मार्ग मान लेंगे !!
   यहाँ इस भ्रमित और भटके हुए प्रजातंत्र में लोकप्रियता, दीर्घ जनसँख्या की पसंद, स्वतः ही श्रेष्ठ विवेक को नष्ट कर देगी। धीरे-धीरे दीर्घ जनसँख्या में प्रचलित निम्न, अपवित्र ,अस्वच्छ आचरण ही सामाजिक व्यवहार हो जायेगा। स्मरण रहे की प्राकृतिक न्याय की शक्तियां स्वयं ही इस परिणाम को प्रेरित करेंगी।
   इससे बचने के लिए किसी भी प्रजातान्त्रिक समाज को मानव संसाधन और उत्थान की प्रक्रियाएं विक्सित करनी ही पड़ेंगी। यह आवश्यक कदम है किसी प्रजातंत्र को संरक्षित करने के लिए, अन्यथा वह प्रजातंत्र स्वयं से ही निम्न-कुलीन मतदाताओं की शक्ति से चलने वाला उच्च कुलीन धनवानों की प्रसाशन व्यवस्था में तब्दील हो जायेगा।
               इसी को भ्रष्ट पूँजीवाद (crony capitalism) पुकारा जाता है।
       तो संक्षेप में समझे तो बात यह है कि प्रजातंत्र से भ्रष्ट पूँजीवाद में की दूरी ज्यादा नहीं होती है। किसी भी प्रजातंत्र को इस प्रकार की शासन व्यवस्था में बदल जाने में समय नहीं लगता। धन की शक्ति से लोकप्रियता और मानदंडो को प्रभावित कर देना, और इस लोकप्रियता से शासन शक्ति प्राप्त कर लेना - यदि सजगता न हो तब प्रजातंत्र में यह एक सरल मार्ग है।

प्रजातंत्र में अयोग्य लोगों को सत्ता में आने के उतने ही अवसर होते हैं जितने की योग्य गुणवान लोगों को धन की उपलब्धता अयोग्यता को भी परवान चढ़ा सकती है। यहाँ प्रजातंत्र मूर्खतंत्र में तब्दील हो जाते हैं। शिक्षा का अर्थ सिर्फ शैक्षिक उपाधियों में सिमट जाता है - यह भूमि पर कोई विशाल प्रभाव नहीं दिखा पाता है। यह प्रजातंत्र की कमज़ोर कड़ी है। उच्च शिक्षा उपाधियाँ किसी कार्यकुशलता का प्रमाण नहीं रह जाती हैं।

      पाखण्ड प्रजातंत्र में जन आचरण पर हावी हो सकता है। जनता को जानकारी के बोझ से ही भ्रमित करा जा सकता है। जानकारी के प्रबंधन में सबसे महतवपूर्ण कार्य होता है समस्त जानकारियों को संगृहीत करना एवं वर्गीकरण, मानचित्र निर्मित करना। इसमें विपरीतबोधक जानकारियों और संपूरक जानकारियों (Contradictory Information and Complementary Information) को स्पष्टता से चिन्हित करके मानचित्र में स्थान देना आवश्यक क्रिया है। इसके बाद की क्रिया है आवश्यकता के अनुसार जानकारी के बिन्दुओं को रख कर निष्कर्ष निकलना ।
प्रजातंत्र में इस विकट कार्य में जनता को भ्रमित कर देना आसान है। यदि किसी देश की शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त न हो तब यह कार्य अधिक आसानी से हो जाता है। जनता अन्यायपूर्ण , अनैतिक आचरण को भी अनुसरण करने लगती है। प्रजातंत्र में यह संभव है। प्रजातंत्र में भ्रम और मिथ्या का भरपूर प्रयोग होता है। यहाँ प्रचार और विज्ञापन से सच को पराजित किया जाना आसन है।

   प्रजातंत्र अभी तक के मनुष्य के प्राकृतिक व्यवहार से विरुद्ध की प्रसाशन व्यवस्था है। इसे चलाने में अधिक उर्जा लगेगी। यहाँ प्रजातंत्र में लोग गुणों को और अधिक निखारने के स्थान पर दुर्गुणों और सदगुणों में समझौता करवाने की चाल भी चल सकते हैं। प्रजातंत्र में उपलब्ध न्यायायिक समानता का दुरूपयोग अनैतिक और न्यायपूर्ण आचरण वाले लोग समय और अवसर खरीदने के लिए भी कर सकते है कि जब तक न्यायालयों में स्थापीय नहीं हो जाता है कि वह अनैतिक अथवा अन्यायपूर्ण हैं तब तक उन्हें भी नैतिक तथा न्यायसंगत ही माना जाये।
   इसी प्रकार, शक्ति के संतुलन के लिए उपलब्ध  संपूरक विचारों का आपसी संतुलन को विशिष्ट भोग अभिरुचि वाले लोग अच्छाई की बुराई से समझौता कराने के लिए दुरूपयोग करवा सकते हैं।
   
        कुल मिला कर यह समझ सकते है कि दूर से आकर्षक दिखने वाली यह प्रशासन व्यवस्था -प्रजातंत्र- इतनी सरल और स्पष्ट नहीं है जितना की हमें आभास देती है। अगर प्रजातंत्र में निरंतर नागरिक समीक्षा व्यवस्था कमज़ोर हो जाए तो प्रजातंत्र अपने घोषित उद्देश्यों के ठीक विपरीत कार्य करने लगता है। सबसे बड़ा खतरा यही है की जब यह व्यवस्था प्रदूषित हो कर विपरीत दिशा में बढने लगती है तब भी इसकी आह किसी को भी समय पर नहीं मिल पाती है जब की सामजिक हानि आरोग्य विहीन पहले ही हो चुकी होती है।