Saturday, May 23, 2015

बिकाऊ मीडिया के तौर तरीके

बिकाऊ , वैश्या समान आचरण करने वाली समाचार सूचना की व्यापारिक कंपनियां, अर्थात मीडिया, के बिकाऊ खबरों के तौर तरीके समझना एक रुचिकार विषय हो सकता है। बिकाऊ खबरे दिखाना कोई आसान काम नहीं होता है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती होती है की एक विशाल दर्शक समाज के समक्ष झूठ बोलते हुआ हुए पकड़े नहीं जाना चाहिए। विशाल दर्शक समूह में तमाम तरह के व्यक्ति और नागरिक होते है जिनके खुद की जानकारी क्षेत्र विशाल और विस्तृत होते हैं। ऐसे में मीडिया का झूठ पकड़े जाने से बच सकना करीब करीब असंभव है। हाँ, मगर मीडिया को फायदा इस बात का मिलता है की अधिकांशतः किसी भी विषय वस्तु पर सच और सही सिद्धांत को जाने वाला बौद्धिजीवि समूह अक्सर करके छोटा पड़ जाता है, जिस सांख्यिकीक तथ्य के भरोसे मीडिया यह खेल खेलता है की जनता को कुछ पल के लिए भ्रमित करा जा सकता है।
   You can't fool some of the people any time, you cannot fool all the people all the time, but you CAN definitely fool MOST of the people, for a long time.

                      "अश्वस्थामा मरो, नरो वा कुंजरो"।
   बिकाऊ मीडिया के लिए सबसे आसान और सुविधाजनक तरीका है की झूठ मत बोलो, बस सच को जग जाहिर होने से रोक लो। यानी भ्रम फैला दो।

   कभी-कभी बिकाऊ मीडिया को ठेका मिलता है उन विषयों पर भी जनता को बुद्धू बनाने का जिन पर जन जाग्रति पहले से ही विक्सित है। तब यहाँ प्रश्नबोधक या संदेहवादी होने की विद्या प्रयोग करी जाती है। मिसाल के तौर पर आजकल दिल्ली में केजरीवाल सर्कार और उपराज्यपाल के मध्य की तकरार को देखिये। जब सबको पता है की अफसरों की तैनाती का अधिकार को सीधे, प्रत्यक्ष और प्राकृतिक तर्कों में चुनी हुई सरकार का अधिकार होना चाहिए, तब ऐसे में मीडिया सच दबाने के लिए प्रश्नवाचक या संदेहबोधक बन जाती है और ऐसे व्यवहार से विषय की सूचना प्रसारित करती है जैसे की "क्या वाकई में अफसरों की तैनाती का अधिकार मुख्यमंत्री का होना चाहिए"  !!!! बिकाऊ मीडिया जनता में पहले से जागृत स्पष्टता को कमज़ोर करने के लिए उसमे संदेह के बीज बोने का प्रयास करता है--
  -- मानो की प्रजातंत्र में अभी भी कोई विकल्प उपलब्ध है की मुख्यमंत्री जनता के लिए जवाबदेह तो हो, मगर अफसरों की तैनाती उसका अधिकार नहीं माना जाना चाहिए !!!
तो बिकाऊ मीडिया की सूचना प्रस्तुति में भ्रम फैलाने की इस पद्धति को हम नाम दे सकते है प्रश्नबोधक आचरण (Enquire-some delivery)।

    सच का सौदा करने के दूसरे तौर तरीके में विषय वस्तु के महत्त्व से छेड़खानी करके जनता को भ्रमित करने की पद्धति लगाई जाती है। तब बिकाऊ मीडिया जन रुचि की घटना को कम क्षणों में प्रसारित करते है, और किसी अन्य अल्प-महत्व घटना पर अधिक समय व्यतीत करते है। ऐसे में बॉलीवुड और क्रिकेट की चटपटी घटनाएं काम में लायी जाती है।
   Campaigning यानि मोर्चाबंदी करने वाले समाचार चैनल इस मोर्चाबंदी के माध्यम से जनता का विश्वास बटोरने का प्रयास करते है। बाद में उचित दाम मिलाने पर इसी विश्वास के साथ घात करके यह लोग मुद्रिक फायदा कमाते हैं। ख़ास तौर पर अंग्रेजी समाचार चेनलों में आपको यह तौर तरीका दिखने को मिलेगा। अक्सर कर के यह चैनल किसी सामाजिक, और किसी निजी नागरिक के साथ घटी अन्यायपूर्ण घटना पर कोई campaign करते दिखाई देंगे। क्योंकि यह अन्याय प्रत्यक्ष है इसलिए ऐसे विषयों में जल्द विजय प्राप्त हो जाती है। बस campaigning के दौरान इतना ख्याल रखा जाता है की किसी अच्छे ग्राहक से दुश्मनी न हो जाये। फिर क्या है, एक बार जनता का विश्वास मिल गया तब फिर यह अच्छे दाम मिलने पर किसी और वक़्त बड़ी बड़ी घटनाओं को भी साधारण सूचना दिखा कर जन आक्रोश को नियंत्रित करवा देते हैं। यह निर्भया प्रकरण को तो दिखाएंगे, मगर पंजाब में घटी वैसी ही दूसरी घटना में चुप्पी कर लेंगे। पंजाब की घटना में वहां के राजनैतिक घरानों को व्यक्तिगत तौर पर दोषी पकड़ा जा सकता था, जबकि दिल्ली के निर्भया प्रकरण से वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री और पार्टी को सिर्फ एक राजनैतिक हानि ही हुई है। कल को यही पार्टी फिर से इन्ही बिकाऊ चेनलों को अच्छे दाम दे कर वापस छवि सुधार कर लेगी और वापस सत्ता में आ जायेगी।
   तो संक्षेप में, बिकाऊ मीडिया ने पंजाब में अपने अच्छे संभावित ग्राहक को व्यक्तिगत दोष से बचा लिया, जबकि दिल्ली में अपने संभावित ग्राहक को अपनी क्षमता का प्रदर्शन करके अपने दाम बढ़ा लिए हैं।
     
   "सुपाड़ी पत्रकारिता" करके एक और तरीके से मीडिया अपना धंधा चलाने में अभयस्थ हो गयी है। इस तौर तरीके में मीडिया को उसका ग्राहक पैसा देता है अपने विरोधी की जन छवि को ख़राब कर देने का। आज कल दिल्ली की आम आदमी पार्टी और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को सुपारी पत्रकारिता का शिकार बनते आराम से देख सकते हैं। आगरा शहर में एक महिला ने एक नेता की मेरसडीज़ गाडी के ऊपर चढ़ कर तोड़ फोड़ कर के अपमान का बदला लिया तो मीडिया ने महिला शक्ति के नाम पर उस नेता और पार्टी को दिन भर प्रसारण करके बदनाम किया, वही पंजाब में महिला बस में अभद्रता का शिकार हो कर मर गयी तो भी मीडिया चुप्पी मार कर महिला शक्ति को भुला बैठा। वही , जब बिकाऊ मीडिया के किसी बड़े ग्राहक दिग्गज नेता को जनता से झाँपढ़ या हिंसा हो तब इस घटना के वीडियो प्रसारण को रोक दिया जाता है, जबकि किसी दूसरा नेता जो की असंभावित ग्राहक हो, उसके साथ ऐसी घटना घटे तो उसे दिन भर सुपारी पत्रकारिता का शिकार बना दिया जाता है।
    
   

Tuesday, May 19, 2015

BODMAS Rule सैद्धांतिक दृष्टि से क्या है?


      गणित विषय में बोडमास(BODMAS) नियम किसी भी बहु-संक्रिय(multiple operation) सवाल को हल करने का क्रम(Order of operation) निर्धारित करता है। इस नियम की अनुपस्थिति में दो अलग अलग व्यक्ति एक ही समीकरण (equation) के लिए दो भिन्न भिन्न समाधान ले आएंगे। ((और फिर जैसा की भारतियों की कुसंस्कृति में रोज़ाना होता है, साधारण बीज गणित के सवालों पर भी हमारे बीच राजनैतिक-कूटनीति आरम्भ हो जायेगी की कौन सही है !!!))
   बरहाल, उधाहरण के लिए एक समीकरण लीजिये:
     3×5 +7-9 =?
यदि हम इस सवाल को बोडमास नियम से समाधान करें तब इसका हल कुछ यूँ होगा
    15+7-9
-->  22- 9
--> 13
जबकि यदि बोडमास नियम नहीं हो तब एक अन्य व्यक्ति इसी सवाल को कुछ यूँ भी हल कर देगा
    3×12-9
-->3×3
-->6
  बल्कि एक तीसरा व्यक्ति इसी प्रश्न का तीसरा समाधान भी ले आएगा।
तो समझा जा सकता है की बोडमास नियम सामंजस्य बनाये रखने के लिए कितना आवश्यक है।

सवाल यह है की बोडमास नियम की उत्पत्ति कहाँ से हुयी है?  क्या यह नियम किसी विशिष्ट व्यक्ति की धारणा से अस्तित्व में आया है? या प्रकृति की कोई एक शक्ति ने दुनिया भर में अलग अलग भाषा और संस्कृति वाले मनुष्यों को एक समान प्रभावित और प्रेरित कर के इस एकाकी नियम की और खींच ले आई है?

    रोजमरा में बोडमास नियम का यूँ ही प्रयोग करते हुए हम लोगों ने इस प्रश्न के उत्तर को शायद कभी सोचा भी नहीं होगा। और ज्यों ही यह प्रश्न हमारे सामने आएगा हम इसका हल तुरंत यही समझेंगे की भई बोडमास नियम तो एक धारणा (Convention) के अंतर्गत अस्तित्व में आया है। मगर तब फिर एक सवाल हमारे सामने खड़ा हो जायेगा की ऐसा कैसे की दुनिया भर के सभी मनुष्यों ने एक समान ही किसी धारणा को विकसित किया और एक जैसा नियम ही बनाया ??!! इस दूसरे प्रश्न के उपरान्त ही शायद हम में से कुछ को यह आभास आएगा की बोडमास नियम यूँ तो एक धारणा ही है मगर इस धारणा को संचालित और प्रभावित करने के लिए कोई एक अप्रकट प्राकृतिक शक्ति भी है।
   
        प्रकृति की शक्ति हमें सत्य के प्रति नतमस्तक होने के लिए प्रेरित करती ही रहती है। सत्य का अन्वेषण और उसको स्वीकार करना शायद सबसे बड़ी भक्ति है। हमारे भीतर अंतर्मन, या अंतःकरण की ध्वनि एक ऐसा संसाधन है जो की अतार्किक, अथवा कला बोधक विषयों में हमें सत्य की स्थिति का अन्तर्ज्ञान दिलाता रहता है। यह अंतर्ज्ञान निरंतर प्रयोग और अभ्यास के द्वारा ही शक्तिवान बनता है और कार्य कौशल प्राप्त करता है। सत्य जो भी होगा वह स्वयं-भू हो जायेगा । और साथ ही साथ, यदि मनएछित सत्य को प्रकट होने में विलम्ब हो रहा हो तब यही अंतर्मन में सत्य प्रकट हो जाता है की कही कुछ असत्य, भ्रम अथवा माया क्रियाशील है। मगर सत्य प्रकट जरूर होता है।
    हमारा अंतर्मन ही हमारे अंदर परिमेयकरण और न्याय का मुख्य स्रोत होता है। तो वैसे तो हम बोडमास रूल को एक धारणा मानते हैं मगर मनुष्य प्रजाति में बोडमास रूल का समानरूप विकास इस नियम का मूल स्रोत हमारे अंतर्मन की ध्वनि के होने हो दर्शाता है।
    
    वैज्ञानिक शोध बताते है की वर्ग विभाजन करने की योग्यता के पीछे शायद कोई प्राकृतिक शक्ति क्रियांवित रहती है। दैनिक रूप से जोड़ और घाट के सवाल करने के बावज़ूद हम से शायद ही किसी ने ध्यान दिया होगा की जोड़ और घाट के भौतिक तर्क गुण में कुछ तो भिन्नता है। यह अंतर है की जोड़न और गुणन की प्रकृति commutative है जबकि भाग देना और घटाने की प्रकृति non-commutative है।
    Commutative Property अर्थात सम-निवारण प्रकृति उसे कहते हैं जब किसी विषय वर्णवस्तु के स्थान अदला-बदली के बावजूद उनके समाधान में कोई प्रभाव नहीं पड़ता दिखाई देता है। तो a×b और a+b का समाधान a और b के स्थान बदल देने से कोई फर्क नहीं दिखाई देता है, और फिर b×a तथा b+a के बराबर ही रहता है। मगर a÷b तथा a-b का समाधान b÷a तथा b-a के परस्पर नहीं होता है।
     मनुष्य के मस्तिष्क में उसके मनोविज्ञान ने स्थान और संस्कृति के अंतराल के बावजूद समान रूप से  हम सभी को commutative property वाले संक्रय को -commutative property पर प्राथमिकता देने के लिए तैयार किया है। आखिर सरल संक्रय को जटिल संक्रय से प्राथमिकता देना मानव स्वभाव है।
    इसके साथ ही मनुष्य के सह-भाग मनोविज्ञान ने हमें कुछ संक्रय को दूसरे से अधिक शक्तिशाली अथवा महत्वपूर्ण स्वीकार कर लेने के लिए तैयार किया है , तथा उन्हें प्राथमिकता से समाधान करने के लिए प्रेरित किया है। तो इस प्रकार हम exponent और बीज वर्ग(roots) को गुणा-भाग से अधिक महत्वपूर्ण समझने के लिए तैयार किया है। 

     जबकि मानव मनोविज्ञान गुणा-भाग को जोड़-घाट से अधिक महत्वपूर्ण स्वीकार करने के लिए विक्सित हुआ है। कोषटकों (brackets, parenthesis) को हमने तमाम संस्कृतियों के अन्तराल में सबसे अधिक प्राथमिकता पर रखना स्वीकार किया है।

       एक ध्यान देने की बात यह है की गुना और भाग करने के दो अलग अलग स्वरूप् होते है। गुणा करने का एक of फॉर्म है और एक direct × फॉर्म। इसी तरह भाग देने का एक फॉर्म है slash / , एक दूसरा है direct ÷ फॉर्म। इनमे आपसी वरीयता कुछ यूँ है की × फॉर्म का गुणा commutative होने की वजह से , ÷ फॉर्म के भाग से अधिक महत्वपूर्ण है, और फिर / फॉर्म का भाग, जबकि सबसे निम्म है of फॉर्म का गुणा।
     2× 3 ÷8 of 4 / 4 = ??

The STCW 2010 Manila (Scam) Convention

The case for STCW 2010 Manila Convention being a Government Policy promoted money-making racket is not so worthwhile. But it presently stands tightly protected within the covers of legitimacy.
    The Refresher courses are there aimed with a purpose; NOT out of need for upgrading of skills due to some new technological innovation, BUT by creating of legal need towards CONTINUED DEMONSTRATION of the basic seamanship survival skill ON-SHORE, WHICH *in the opinion of government authorities*, can NOT be refreshed and evidenced by on-board training. It should be noted that the assessors for what skills CAN be and what CANNOT be refreshed on-board is the Government authorities themselves. The in-service seafarers have hardly a recognized lobby to make case for them during the above assessments. Government authorities, therefore, acquire unchallenged authority to call the shots.
    It now becomes of less value when some random seafarer observes that there is no difference between what he already knew, and what NEW he has learnt after doing a Refresher Course. Because, even if it may sound suspicious to his mind, this lack of difference is very much in keeping with the intention of Continued Demonstration as envisaged in the 2010 Manila Convention.
  He may also suspect that the Manila Convention may have conspired to promote the pecuniary interests of various training institutions mushrooming in Philippines and in India, but that's how the policy now stands. The STCW policy turns seafarers into milking cows.
      He may also notice that in most of the training Institutes the cost of a refresher training is same as the cost for fresh(=new) training. He may be all the more pressed to suspect the objectives of the Manila Convention. But then this is how it stands.
    He may have a question as to how a refresher training in Advance level of some survival skill module will still not serve the skill sets of basic level training in the same module. But this is how the government authorities assess the case to be !!
   He may be wanting to reason why the Endorsements for Dangerous Cargoes can make do with a Refresher Training in the Advance module alone, whereas the revalidation of the Competency license requires Refresher training in both, the basic and the advance. But then the government authorities in their secret wisdoms have done it so and put the Circular or Order out there on the notice boards.
     He may want to protest that those ex-seafarers-cum-government authorities who do not hold valid license themselves, in keeping with all the convention which a regular seaferer has to undergo, must stop to represent their country during various Inter-Governmental Conferences and Conventions where such decision are made. Those people have no moral authorities remaining to be able to do so.
    But where is a lobby to make his case ?

Thursday, May 14, 2015

What's the difference between Refresher Course for AFF and Refresher Course for BFF ??

The MMD seems to be still reeling in confusion about this whole STCW 2010 thing. The frequency of amendment circular by the MMD causing the change of eligibility for various certificates and endorsement is a tell-tale of what brain the MMD is in about the STCW.
    Sample this:
Until April 2015, the senior management shipboard officers were not required to have the refresher course in BFF and PST. Since the STCW 2010 has been put into processing by the MMD from January of 2015, the effect of April 2015 circular will raise a natural question about the quantifiability of those applicant who have escaped the burnts of this change. Why should those candidates not be retro-declared as "disqualified" unless they too undergo training (in a true sense, those cost-incurring changes) as stipulated by the circular ?? All candidates who have obtained any certificate or endorsement between Jan and Apr 2015 should be held null and void. Isn't it ??!!!
      The April 2015 circular raises another query within us. How on earth should a person be required to do a "Refresher" training for the Advance level as well as the Basic level of the same module (e.g Fire Fighting, Survival Techniques, Medical first aid) ??  What gives more pain to our liberated mind is the reply by the surveyors justifying this distinction in terms of number of hours of the curriculum .  The ironical truth is that even those who have undertaken all these so called "refresher course" can not spot the difference between what they previously knew and what new learning they have been made to acquire through the refresher course. Thus, it duly becomes rather more 'undigestable' to understand the distinction of Refresher Course-A Versus Refresher Course-B, the advance and basic level for the same module . It even leaves us with another critical thought query -- What is the essence and legal purpose of a Refresher Course Advance Level when it is always going to leave you asking for complementing it with a Refresher Course of Basic level. Infact the weird effect of MMD's confusion is that it has rendered all the Advance level Refresher courses certificates as HALF BAKED. !! When ALL candidates will necessarily have to complement it, then what is its own value ?? Think.

     MMD is surely not being driven by its own conscience in regard to the STCW 2010 amendments. Infact we can hear the surveyors too giving the rationale of distinction with phrases such as "other countries they are doing it like this", "you read the requirements", "the course duration for the refresher of Advance is X hours, where as refresher of basic is Y hours".  Critically speaking, can the objectives of changes driven by the STCW 2010 amendments be described as Number of hours of course curriculum ?? Is the 'number of course hours spent' the sole wisdom for changes brought about the 2010 Amendment to the STCW?
Only god can know where the brains of our people are .
And now since the conscience is missing, perhaps not one of the some many million Indian seafarers knows the good rationale from the bottom of his heart. Therefore, the conspiracy theorists have ample space to fill the void of conscience with a word that this entire STCW 2010 thing is nothing but a 'government sponsored money making racket'.

Saturday, May 09, 2015

अच्छे दिन के वादे बकरे से भी और कसाई से भी ! - एक व्यंग्य

अच्छे दिन का वादा तो सभी से ही कर दिया था।बकरे से भी और कसाई से भी।
    बकरा झांसे में आ गया की अच्छे दिन आयेंगे तब उसको अच्छी हरी घांस खाने को मिलेगी और कसाइयों से सुरक्षा। बकरे समझ रहे थे की अच्छे दिन आने पर बकरे कम कटेंगे।
    फिर जब अच्छे दिनों का सौदागर परवान चढ़ गया तो सभी लोगों ने अपने अपने अच्छे दिन मांगे। कसाई के अच्छे दिन होते जब मोटे ताज़े बकरे बड़ी संख्या में रोज़ काटने को मिल जाए अपनी मर्ज़ी के मुताबिक।
   तो असल बात तो थी की बकरे और कसाई का एक साथ अच्छे दिन ले आना तो मुमकिन ही नहीं था। यही तो !! बकरा यूँ ही नहीं बकरा होता है। सौदागर जानता था की साले बकरे तो बने ही हैं बकरा बना बना कर काटे जाने के लिए ही।
   तो सौदागर ने कानून ले आया की बकरे के अच्छे दिन उसके कटने के बाद दे दिए जायेंगे।
  बकरे आवाक रह गए। इतनी उम्मीद से वोट दिया था सौदागर को।
   जब अच्छे दिनों को निभाने में देरी का आरोप लगता तब सौदागर के दोस्त बकरों पर ही गुस्सा झाड़ते थे की सालों जब बोला है की अगर तुम्हें अच्छे दिन चाहिए तो कटने के लिए तुम खुद-ब-खुद राज़ी हो जाओ, तो अब अच्छे दिनों की देरी होने में हमारी क्या गलती है।
    बकरे किसान और मज़दूर जैसे लोग हैं। और कसाई ..... आप खुद ही समझ लें।

सौदागर तो कस्साइयों का भेदीया था।

😈😈😧😧

Development ज़रूरी है , या की Democracy ?

छात्र जब प्रोफेसर आनंद कुमार से पूछते है की कौन अधिक आवश्यक है : development या की Democracy तब मैं सोच के जंजाल में फँस जाता हूँ की छात्रों को कैसे समझाया जाये की वह किस विचार की तुलना किस विचार से कर रहे हैं। क्या कार के पहिये की हवा और कार में ईंधन कितना डलवाना है के बीच किसी एक को चुनने को बोला जा सकता है ??

शायद development से अभिप्राय पदार्थवाद (materialism) का है, मानव जीवन(human development) का उत्थान नहीं। पदार्थवाद का  विकास होता है बिजली, विद्युत ऊर्जा के बे-रोक टोक इस्तेमाल से उत्पन्न चमचमाती रौशनी , सडकों पर चमकते हुए विज्ञापन बोर्ड जिनमे सेक्स और बाकी सब अभद्र वस्तुओं का विज्ञापन हो; ठन्डे वातानुकूलित माल सामानों से भरे हुए जबकि प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार दबाव बना हुआ है; चिकनी तीव्र गति कारें जबकि सड़कें हादसों से, परिवहन चालन नियम उलंघन से, नाबालिग चालाक और शराब पी कर गाडी चलाने वालों से भरी हुई हैं।
   यह है पदार्थवादी विकास, खपत-खोरों(consumerists) का समाज जो विकास के नाम पर धीरे धीरे सामूहिक विनाश की और बढ़ रहा होता है। खपतखोर समाज का उद्देश्य बस जीना, खाना, सेक्स और मौजमस्ती तक सिमित होता है। वह मौजमस्ती, हंसी और ठट्ठा को ही जीवन का असल आनंद मानने की कोशिश करता है, जबकि अंदर का खोखलापन उसे शान्ति नहीं प्राप्त करने देता है।
  
    डेमोक्रेसी में विकास खपतखोर और पदार्थवाद से नहीं होता है। डेमोक्रेसी स्वतंत्र अभिव्यक्ति के माध्यम से विचारों की प्रतियोगिता करवाती है और इस प्रकार योग्यता को प्रसारित करती है। जब योग्यता प्रफुल्लित होती है , नेतृत्व में आती है तब सामाजिक उत्थान होता है। सामाजिक उत्थान ही वह विकास है जो की मानव विकास कहलाता है। इसमें खपतखोर आचरण नहीं होता है, इसमें पदार्थवाद नहीं होता है। इसमें जीवन आनंद होता है, हंसी और ठट्ठा:गिरी नहीं। इसमें शान्ति मिलती है।

खान उपनाम और उसका मंगोलों से सम्बन्ध

खान' शब्द मंगोल भाषा से है। इसका अर्थ होता है 'राजा'। चंगेज़ एक मंगोल था। मंगोल का अर्थ है मंगोल देश का निवासी। मंगोल देश, यानि मंगोलिया , चीन के उत्तर में रूस और चीन के बीच एक शीत मरूभूमि वाला देश है।
  व्यापक मान्यताओं के विर्रुद्ध, चंगेज़ मुस्लमान पंथ का अनुयायी नहीं था। वह एक प्राकृतिक मंगोल पंथ, शमाम, था। शमाम पंथ कुछ कुछ प्राचीन वैदिक पंथ के समान है। इसमें भी प्रकृति की वस्तुओं, जैसे पर्वत, नदी, पशु, वृक्ष, सूर्य, वर्षा, बादल, धरती, आकाश, अग्नि इत्यादि की पूजा करी जाती है। वास्तव में आरम्भ में धरती के सभी मनुष्य , सभी पंथ प्राकृतिक पंथ ही थे। एक पैगम्बर वाला सबसे प्रथम और प्राचीन पंथ बुद्ध धर्म था। धीरे धीरे करके यहूदी, ईसाई, और इस्लाम , सिख, इत्यादि पैगम्बर-पंथ समय के साथ प्रकट होते चले गए।
     चंगेज़ खान के तीन और अनुज थे। चंगेज़ के मरने के बाद उसके दो भाइयों ने उसके राज्य को संभाला था। चंगेज़ का राज्य आज तक के इतिहास का सबसे विशाल राज्य है। पश्चिम में, जो की वर्तमान तुर्की, ईरान, इराक जैसे देश का क्षेत्र है, उसे हगलू खान ने संभाला। जबकि पूर्व में पहले मंगू खान ने, और उसके बाद चंगू खान ने संभाला था।
    हगलु खान के वंशज समय के साथ इस्लाम कबूल कर लिए, और वह मुस्लमान पंथ के अनुयायी हो गए।
   और चंगु खान ने अपनी एक नयी राजधनी बना कर उसमे बुद्ध धर्म अपना कर रहने लगा। उसने अपना नया नाम कुबलाई खान रखा और अपनी राजधानी का नाम खानबालिक रखा, जिसका कुछ कुछ अर्थ है राजनगर, यानी राजा के रहने का स्थान।
   खानबलिक ही आगे चल कर समय में पहले पीकिंग शहर बना, और फिर नाम बदल कर बीजिंग बन गया, जो की वर्तमान में चीन देश की राजधानी है। कुबलाई खान ने अपने देश, यानि वर्तमान काल का चीन, में अपने वंश की नीव डाली, जो की 'यिंग वंश' के नाम से इतिहासकारों में प्रसिद्द है।
   उधर हगलु खान के वंशजो में एक साधारण मंगोल सैनिक आगे जा कर मंगोल शासक बन गया। वह था तैमूर लंग(लंगड़ा)। उसके बाद उसके संतानों में एक बाबर का जन्म हुआ, जिसने आगे जा कर भारत पर भी कब्ज़ा किया।
    चंगेज़ खान ने अपने जीवन काल में भारत को बख्श दिया था, और हमला नहीं किया था। हालाँकि वर्तमान का कश्मीर क्षेत्र उसके राज्य का हिस्सा ज़रूर था।
    बाबर वह शख्स था जिसने अपने पूर्वज मंगोलों की कमी को पूरा कर दिया।
  हालाँकि तब तक समय के साथ "मंगोल" शब्द कुछ फारसी और अरबी उच्चारण को ग्रहण करके "मुग़ल" शब्द में तब्दील हो चूका था।
   आज अधिकांश भारतीय लोग "मंगोल" और "मुग़ल" शब्द के इस जोड़ को जानते तक नहीं है। और "खान" उपनाम से अर्थ निकलते है एक पठान (अफगानिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के कबीलाई) मुस्लमान पंथ का अनुयायी !! खान शब्द को पठान भाषा का बताते है, जबकि "खान" मंगोल भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है राजा या उसके वंश का सदस्य। उसका पंथ कुछ और भी हो सकता है, इस्लाम आवश्यक नहीं।
   
   यह सही है की चंगेज़ खुद एक सर्वधर्म अनुयायी ही था। अधिकांश करके प्राकृतिक धर्म के अनुयायी सर्वधर्म अनुयायी भी होते है। यह स्वाभाविक है क्योंकि जो सबको मानता है वह भेदभाव कैसे करेगा !!
   इसलिए मंगोलों का शासन सभी धर्मो को प्रसारित करता था, और बहोत पंथ-सहनशील माना जाता था। आगे चल कर अकबर बादशाह और अधिकांश "मुग़ल" सम्राटों में भी यही खूबी देखने को मिल।
   इतिहासकार मानते है की मंगोल और मुग़लों ने लंबे समय तक शासन इसलिये कायम कर सके क्योंकि वह पंथ सहनशील थे। बल्कि औरंगज़ेब के आते ही जैसे ही उनकी यह पंथ सहनशीलता नष्ट हुयी, मुग़ल साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया।
    इतिहासकारों की यह मान्यता हमारे देश में लोगों की व्यापक मान्यता के एकदम विपरीत है।
   बल्कि वर्तमान काल में भारत की चुनावी पार्टियां इससे सबक लेने की बजाये और अधिक कट्टरपंथी हुई जा रही है। क्योंकि शायद उन्होंने इतिहासकारों की राय को ठीक उल्टा पढ़ रखा है।

Why should the owner of the vehicle be held liable too for the mistakes of his driver? An ethical-legal explanation

जब कोई परिवहन संसाधन में कोई अपराधिक घटना घटती है तब उसके मालिकों को भी उत्तरदायी क्यों बनाया जाता है?
   अपराधिक घटना में मूल अभियुक्त तो वही लोग होते हैं जिन्होंने उस घटना को अंजाम दिया होता है। अगर कोई ड्राईवर अपने मालिक की कार लेकर कहीं जाता है और कोई घटना कर आता है , तब उस घटना का अभियुक्त वह ड्राईवर ही होता है। यह सोच कर अजीब लगता है की मालिक को क्यों पुलिस पकड़े जब की मालिक तो उस स्थान पर था भी नहीं। मगर एक कारण है की मालिक को उत्तरदायीं क्यों माना जाता है। वह यह की मालिक अपने वाहन को पुलिस से छुड़ाने आएगा की नहीं?
   अगर मालिक छुड़ाने नहीं आता है तब वह संदिग्ध बनता है की क्या उसने अपना वाहन इस घटना को करने के लिए ही नियुक्त किया था ?
   अन्यथा उस मालिक की जिम्मेदारी है की वह वाहन का प्रयोग उसी को करने दे जो मालिक के जैसे ही वाहन की जिम्मेदारी का निर्वाह करे। यानि, न्यायिक दृष्टि से कार का ड्राईवर को ही सभी कृत्यों के लिए कार का मालिक माना जाता है। साथ ही, यदि वह ड्राईवर पूर्ण मालिक नहीं है, तब उस कार के पूर्ण मालिक को ड्राईवर के कृत्यों का सह-भागी माना जाता है।
    दूसरे शब्दों में, किसी भी वाहन (कार, समुंद्री जहाज़, बस, ट्रक, लारी, इत्यादि) के ड्राईवर और मालिक के बीच न्यायिक दृष्टि से "मालिकाना सह-भागिता" (Bailee relationship) का सम्बन्ध होता है।
      न्यायलय में आगे वाद के दौरान जब यह स्थापित हो जाता है की मालिक और ड्राईवर के बीच कितनी भिन्नता है, तब दोनों के बीच जितना सम्बन्ध होता उसी के अनुपात में उस घटना की जिम्मेदारी सुनिश्चित करी जाती है।
  यानी की मालिक पर उस घटना की आर्थिक जिम्मेदारी सुनिश्चित कर दी जाती है, जबकि ड्राईवर पर व्यक्ति कृत्य की जिम्मेदारी आती है।। ड्राईवर को उस घटना के लिए शारीरिक परिणाम भुगतने होते है, जबकि सारा आर्थिक दंड मालिक को निर्वाह करना होता है।

My message to Justice Markandey Katju on his use of inappropriate terms for a historical analysis

Markandey Katju  sir, i wish to express my reservation on your using of the terms such as "British Agent" while making an analysis of a historical information. I am of the mind that a literature which contains analytical information should use the terms in their literal sense so to help the reader grasp in a precise sense the outcome of the analysis, instead of getting swayed away by the beliefs and opinions of the writer. Therefore, "british agent" should imply that there was a case of deep penetrated espionage, and not that someone whose actions in the beliefs and opinion of the writer appeared to favour some third party.
     Justice @Markandey Katju , indeed by a figurative use of the term "British Agent" in a presumably dissertation work , YOU become guilty of working out certain political mileage by manipulating the minds of the UNSUSPECTING readers. It can be ssuggested that perhaps you have certain secret affinity with any of those group who thrive on the Gandhi-bashing sentiments, such as the RSS.
     In writing any analysis dissertation, in my opinion, the writer must continuously and genuinely strive to convince his readers of the Neutral Point of View, the NPOV. To this, the writer should avoid provocative, figurative language which may cause emotions connected with the political affiliation to start to flow out.
     Your case is failing on those standards.

Regards,

हाई कोर्ट से सलमान खान को सजा निलंबन की राहत के विषय में

सलमान का केस लगता है की दूसरी बार सब कुछ गोल-मटोल होने की राह पर निकल पड़ा है। मेरी समझ से न्यायलय इतिहास की दृष्टि से कुछ चुनिंदा केसों में है जिसमे की दूसरी बार सत्य-परिक्षण करने के लिए विवश होना पड़ा है। किसी केस का दूसरी बार पुनः परिक्षण अपने में न्यायलय और जांच संस्था के ऊपर एक दाग और शर्मिंदगी लाने वाला मसला होना चाहिए। जो न्याय की इस बारीकी को समझते होंगे उन्हें एहसास हो गया होगा की हमारा देश कैसा मूर्खिस्तान बना बैठा है।
   बरहाल अब हालात यह है की इस दूसरे पुनः परिक्षण सत्र में भी फिर से वैसी ही गलतियां मिलना शुरू हो रही है जो की जाँच एजेंसी और न्यायलय में भ्रष्टाचार और बेहद मूर्खता भरे कृत्यों की और इशारा कर रही है।
   आज का उधाहरण लीजिये। अब यह हाई कोर्ट में पहुँच जाने पर एक नए गवाह और उससे प्राप्त होने वाला नया तथ्य पूरे केस को सत्र न्यायलय में फिर से कुछ लंबी अवधी के लिए लटकाने वाला है। बचाव पक्ष नए गवाह कमाल खान को key witness बुलाएगा जबकि अभियोजन पक्ष पूछेगा की कौन है यह, और अब तक कहाँ था ? और फिर एक बार पुनः इस नए गवाह New Evidence के दिए बयानों से मिले तथ्यों की जाँच होगी, और न्याय निष्कर्ष निकाला जायेगा। इन सब में समय जाने वाला है। तब तक जन ज्ञान में प्रश्न रहेगा की आखिर ऐसा कैसा की इतने बड़े और महत्वपूर्ण गवाह को जाँच एजेंसी ने अब तक अनदेखा कर दिया था। यह अपने आप में अंदर के व्याप्त भ्रष्टाचार को पोल खोल रहा है।
    कुल मिला कर यह तो साफ़ हो रहा है की सलमान इस समय न्यायलय, वकीलों , जाँच एजेंसी और कुछ बिकाऊ गवाहों के लिए दुधारू गाय बन गए है। न जाने वह कौन सा ऐहम और क्या आनंद है की कोई इस तरह के ऊर्जा और अर्थ को अत्यधिक व्यय करने वाले मार्ग पर चलना स्वीकार कर रहा है।
   अगर सलमान का यह दावा है की भारतीय न्यायालयों में उनके प्रति अन्याय हुआ है और वह इतने लंबे इसलिए संघर्ष कर रहे है तब तो उन्होंने अपनी फिल्मी जीवन में इससे और अधिक "कॉमेडी फ़िल्म" शायद नहीं बनायीं होगी। और शायद मीडिया और सट्टोरी इसी "फिल्म देखने वाले आनंद" ("पिक्चर चल रही है") से इस वास्तविक जीवन केस पर नज़र डाल रहे है।

सलमान को केस लंबा घसीट कर क्या लाभ हो सकता है??-- एक विवेचन

सोचे तो सलमान भाई को आखिर इतना लंबा केस घसीट कर फायदा क्या मिला??

अमेरिकी न्यायलयों में अकसर कर के जब नामी गिनामि हस्ती लोगों के खिलाफ कोई अपराधिक अभियोजन आता है तब वह हस्ती शुरू में ही सत्य को मानते हुए "दोष प्रार्थी"(pleading guilty) हो जाते हैं। इसका लाभ यह मिलता है की न्यायलय में अपराध साबित करने में जाया होने वाला समय बचत ही जाती है। कही किसी को 'खाने खिलाने' की जरूरत नहीं पड़ती है। और वह मशहूर हस्ती अपनी सजा में थोड़ी क्षमा की गुंजाइश भी बना लेता है।

अगर सलमान भी  शुरू में ही दोष प्रार्थी हो जाते तो भी उसी समय यही फैसला प्राप्त कर लेते जो आज मिला है। और तब सलमान को इतना खाना खिलाना भी नहीं पड़ता, न ही इतनी बदनामी होती, न इतने सालों का समय जाया होता, और अब तक तो अपनी जिंदगी वापस राह पर ला कर जी रहे होते। समाज और न्यायलयों में अपने मशहूर व्यक्तित्व के चलते वह एक अच्छा उधाहरण भी देते, जो शायद उनको और अधिक फायदा ही देता।
   उर्जा और अर्थ व्यय की दृष्टि से सलमान का यह सौदा घाटे का ही साबित हुआ है।

एक सबक:-- नियम कानून के पालन से अर्थ और ऊर्जा का लाभ होता है

अब भारतीय वंशियों को यह सबक ले लेना चाहिए की नियम कानून के पालन में ऊर्जा और धन का तमाम व्यय शायद कही कम पड़ता है बजाये किसी घटना या काण्ड के उपरान्त उसके बचाव में करी जाने वाली रिश्वतखोरी और मीडिया बदनामी से, जबकि तमाम बचाव के बाद भी नतीजे अभी भी वही मिलते हैं।

सजा औपचारिक पद्धति से ही क्यों होनी चाहिए??

सजा आधिकारिक और जन सूचित पद्धति से होनी चाहिए वरना फिर तो जस्टिस मार्कंडेय काटजू वाला हिसाब किताब हो जायेगा की संजय दत्त की फ्लॉप फिल्मों को ही संजय दत्त के अपराधिक कर्मों की सजा और हिट फिल्मो को देश सेवा मान कर उसे क्षमा कर देने की अपील हो जायेगी !!!