Tuesday, August 19, 2014

"भक्तजन" कौन हैं ?

भक्त जन हैं कौन??
यही तो है वह भ्रष्टाचारी जो भ्रम फैला कर खुद को बचा रहे हैं।

स्वच्छ नागरिक को स्पष्ट पता होता है की आदर्श रूप में एक न्याय पूर्ण समाज चलाने के लिए क्या क्या कदम उठाने चाहिए। यह भक्तजन हैं की उन कदमों को विफल करने में लगे हैं , ताने कस कर की "अरविन्द को लगता है कि वही दूध का धुला हैं", " हमे अरविन्द से अपनी ईमानदारी का कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए" ।
यही सब वचन भक्तजनों की पहचान है।

यदि शंकराचार्य ने इन्हें टोका नहीं होता तो इन्होने "हर हर xxxx" का चुनावी नारा ऐसा बुलंद किया था की महादेव को भी इन्होंने अपने आराध्य xxxx के पीछे कर दिया था।

अब आजकल भक्तजन आप पार्टी के समर्थकों पर अंधभक्त होने का ताना कस रहे हैं।
ऐसे में यह न्याय कैसे होगा की असल अंधभक्त कौन है और कौन नहीं?

इस समस्या का हल है "सिद्धान्तवाद"। जी हाँ,  असल-नक़ल में इस भेद को करने के लिए ही आदर्श सिद्धांतों की उचित समझ इंसान में होना ज़रूरी है। जो बुनियादी सिद्धांतों को (रसायन शास्त्र में पढ़ाई जाने वाली वह परिकाल्पनिक आदर्श गैस जिसका खुद का कोई अस्तित्व प्रकृति में नहीं है, मगर जिसकी व्यवहार की समझ से प्राप्त सिद्धांत - चार्ल्स लॉ, बॉयल लॉ, गैस लॉ - हमे प्रकृति की वास्तविक गैसों का व्यवहार इक तुलनात्मक अधय्यन द्वारा समझने में सहायक होती है) -- जो इन बुनियादी सिद्धांतों को समझ जायेगा -वह असली-नकली में भेद कर लेगा।
  यह भेद न कर सकने वाले लोग ही वास्तविक अंधभक्त "भक्तजन" हैं।
अरविन्द IIT पास है। उन्हें बुनियादी समझ है। इसलिए उन्हें पता है की असली क्या है और नकली क्या।

भक्तजनों के अन्य व्यवहारिक प्रवृतियाँ क्या क्या हैं?
भक्तजन हास्य रस और व्यंग्य कसने में खूब आनंद लेते हैं। यूँही बड़े-बड़े मंच से छोटे मोटे झूठ बोल देने में इन्हें कोई परहेज और बुराई नहीं लगती हैं।
भक्तजन गहरे मंथन से घबराते हैं।
यदि किसी वाद-विवाद में इनके तर्कों की परख करने के लिए उसके नतीजों की कल्पना करें तो यही उत्तर मिलेगा कि भ्रष्टाचार नाम की कोई सांस्कृतिक अथवा प्रशासनिक समस्या है ही नहीं। यह सब काल्पनिक बातें हैं ! इसी को यह भष्टाचार का निदान मानते हैं।
इनके सत्ता रूड होते ही काला धन नाम की कोई विचार रह ही नहीं जाता। इसलिए भ्रष्टाचारियों को कोई सजा, कोई पेनल्टी इत्यादि को यह आपसी राजनैतिक द्वेष का कर्म मानते हैं। अब राबर्ट, गडकरी और येदुरप्पा - यह सब भ्रष्टाचार से मुक्त है - अर्थात भ्रष्टाचार के आरोपों से ।
भक्तजन अब facebook जैसे सार्वजनिक स्थल पर दिखाई नहीं देते हैं। facebook पर यह सिर्फ प्रचार के लिए आते हैं। विचार मंथन के लिए नहीं। चुनाव उपरान्त यह whatsapp पर सरक चुके हैं।
भक्तजन चुटकुले और memes का खूब आनंद लेते हैं। हल्की, छिछलि बातें इन्हें खूब भाती है क्योकि यही इन्हें आसानी से समझ में आती हैं।
व्यंग के एक प्रकार -समालोचनात्मक चिंतन से परिपूर्ण उपहास- को तज कर यह एक निकृष्ट प्रकार वाले व्यंग- परिहास - में तल्लीन हैं। अपने दल-गत प्रतिद्वंदी का परिहास करने में यह आनंद महसूस करते है। इनका मकसद जगद-कल्याण एवं सुधार नहीं है।

अयोग्यता को सफलता के मार्ग पर प्रशस्त करने वाला सबसे मजबूत साधन भ्रष्टाचार है,  आरक्षण व्यवस्था नहीं।

अयोग्यता को सफलता के मार्ग पर प्रशस्त करने वाला सबसे मजबूत साधन भ्रष्टाचार है,  आरक्षण व्यवस्था नहीं।

    आम आदमी पार्टी के उदय से आरम्भ हुई वाद-विवाद और चिंतन से यह निष्कर्ष मैं स्पष्टता से कह सकता हूँ।
यदि कोई भी दल-गत कूटनैतिक चुनावी दल नागरिकों से यह विश्वास प्राप्त कर लेगा की प्रशासन व्यवस्था में अब कभी भी कहीं भी भ्रष्टाचार नहीं चलेगा, तब उसको जनता का समर्थन मिल जाएगा की वह देश में लागू वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को निरस्त कर के संयुक्त राज्य अमेरिका के "सुनिश्चितीकरण प्रक्रिया"(affirmative action) की भांति एक 'सामाजिक न्याय आयोग' बनाकर देश के पिछड़े तथा दलित समुदायों को सामान्य योग्यता मापदंडों से रोज़गार और उचित आर्थिक न्याय दे सके।
  वर्तमान में हमारे देश ने  'सुनिश्चितीकरण प्रक्रिया' के लिए आयोग न बना कर सीधे आरक्षण प्रणाली स्वीकार करी है। हमारी यह व्यवस्था अमेरिका में लागू व्यवस्था से भिन्न है क्योंकि वहाँ रंग भेद से पिछड़े लोगों के लिए योग्यता के मापदंड नीचे करने के स्थान पर यह आयोग है जो सुनिश्चित करता है की किसी भी प्रकार के भेदभाव की वजह से व्यक्ति का अधिकार शोषित न हो। अमेरिका में यह हो सका क्योंकि वहां भ्रष्टाचार कोई सांकृतिक समस्या नहीं हैं।
  इसके विपरीत भ्रष्टाचार भारत की मात्र प्रशासनिक समस्या ही नहीं , सांस्कृतिक समस्या भी है। हमारे यहाँ हर समुदाय, हर एक सम्प्रदाये, हर एक सरकारी विभाग , सभी न्यायलय, जन संचार और जन जागृति स्तंभ -हमारा मीडिया , सब कुछ भ्रष्टाचार से ग्रस्त हैं।
  वास्तव में सोचे तो यह क्षेत्रवादी , और जातवादी राजनीति इत्यादि सभी प्रकार के छिछली कूटनीति के स्रोतों  का उदय भ्रष्टाचार के कारण उत्पन्न अन्याय , अथवा शक्तियों का असंतुलन , का ही परिणाम है। यहाँ सामाजित हित की बात करने वाले सभी लोग चुपके से अपने अपने व्यक्तिगत हितों को ही साधने में लगे है। नतीजे में , प्रकृति के चक्र ने शक्तियों के संतुलन के लिए ही जाती गत , सम्प्रदाय समर्थित, और क्षेत्रवादी दलगत कूटनीति को जन्म दे दिया है।
संक्षेप में कहू तो - गलती मुलायम, लालू, मायावती , आज़म खान, ओवैसी अथवा बाल ठाकरे, राज ठाकरे, शरद पवार की नहीं है। यह प्रकृति का चक्र है जिसने व्यवस्था को शांति और सौहर्दय पूर्ण बनाने के लिए प्रशासनिक शक्तियों को इन व्यक्तियों के हक में कर रखा है।
  शायद कुछ लोग सही कहते हैं कि अगर भ्रष्टाचार नहीं होगा तो भारतवर्ष टूट कर बिखर जायेगा। भ्रष्टाचार एक आदर्श चुस्त दुरुस्त व्यवस्था में वह छिद्र प्रदान करवाता है जिसमे से समाज के कई तनाव निकल सके बिना सम्पूर्ण व्यवस्था को तोड़े।
Corruption is like the lightening holes in a highly stressed  junction point in a steel plate fitted in a big installation.
 
   

Sunday, August 17, 2014

मानव संसाधन, नेतृत्व विकास के छिछले पाठ्यक्रम

ऐसा क्यों होता है की मानव संसाधन के पाठयक्रमों में जब संसाधन को विक्सित करने की शिक्षा की बात आती है तब हमारे देसी शिक्षकों को आत्म-नियंत्रण ही एकमात्र विधि समझ में आती है? क्या कोई दूसरा व्यक्ति कभी भी किसी आशाहीन, परास्त, अकुशल व्यक्ति के गुणों को परिवर्तित नहीं कर सकता है?
यदि नहीं, तब फिर प्रश्न है की उत्कृष्ट नेतृत्व किस व्यवहार को कहा जाता है? वह कौन से पाठ्यक्रम है जिसमे शिक्षार्थियों को टीम बनाने के गुण सिखाये जाते है, आवाहन अथवा भाषण नहीं दिया जाता है? क्योंकि मेरे देखने भर में अधिकाँश पाठय क्रम तो महज़ भाषण देते हैं , विद्या नहीं।
  नेत्रित्व के पाठ्यक्रमों की बात आती है तो अधिकाँशतः महज़ इतना 'सिखा'(=भाषण देकर) कर छोड़ दिया जाता है की तीन किस्म के नेतृत्व है -जिसमे की डेमोक्रेटिक नेत्रित्व सबसे बेहतर माना जाता है । कोई भी पाठ्यक्रम डेमोक्रेटिक लीडरशिप के बारीक गुणों में नहीं जाता है। सभी शिक्षक निर्णय लेने की काबलियत (decision making) पर जोर देते हैं, मगर निर्णय की काबलियत से ऊपर उठ कर विवेकशीलता(rationalization) के गुणों पर कोई भी बात नहीं करता। और फिर विवेकशीलता से  भी ऊपर न्यायपूर्ण होना(Justice) -मेरे देखने भर में यह विचार तो शिक्षकों की खुद की समझ के परे होता है।
  "आत्म-विश्वास" और "attitude" पर इनकी परख करने की बजाये , मात्र इनकों स्वयं में विक्सित करने पर ही बल दिया जाता है। मेरा मानना है की बिना सत्य-परख के प्रदर्शित किया गया "आत्म-विश्वास" और "जीतने का attitude" वास्तव में "मूर्खों की हठ धर्मी"(egoism of the idiots) ही होती है। दुःख इस बात का है की हमारे देश में हर सत्य विचार का नकली , भ्रमकारी 'स्यूडो'(pseudo) तैयार हो जाता है , और हमारे शिक्षक अनजाने में छात्रो को इसी स्यूडो की शिक्षा देते हैं जिससे की हमारे नागरिकों में नेत्रित्व का आभाव गहरा ही हो रहा है, सुधरने की अपेक्षा। पीड़ी दर पीड़ी हालत बदत्तर हो रहे है , सुधर नहीं रहे है।
  बिना न्याय और धर्म की उचित समझ के (Theories related to Justice) हमारे नागरिकों में आपसी लामबंदी और कूटनीति (lobbying, realpolitik) का व्यवहार और गहरा होता जा रहा है। हम आपसी विवादों और समस्याओँ को सुलझाने की विधा भूल चुके हैं। हम प्रमाण(evidencing, verification) और न्याय(justice) करने के ज्ञान को खो चुके हैं। इसलिए हम अधिक खेमों(camps) में विभाजित होते जा रहे हैं। हमारे मानव संसाधन के शिक्षक हमें छिछला ज्ञान बांट रहे हैं। हम अनजाने में अड़ियल और पाखंडी बनना सीख रहे हैं। यही हमारी वर्तमान सन्स्कृति है।

Friday, August 15, 2014

On photographs of small children bearing a political affiliation

I have a huge DISLIKING for those photographs of small kids which are showing them supporting any political groups (e.g. AAP, BJP,RSS) in all of their innocence.
   Aren't the grownups, the adults suppose to teach the small children HOW TO KNOW the right from the wrong, INSTEAD OF teaching what is right and what is wrong. From this school of thought, a small kid supporting a political outfit is reminiscent of brainwashing carried out on him instead of the awakening of a conscience within him.
  Small kids are expected to be pure, unbiased and innocent(not having Full-awakened conscience). Politics is a large activity which requires immense sense of justice and an application of conscience. How on earth should small children be expected to have cultivated these at their tender age. Isn't the photograph, then, suggestive of a child exploitation, or a brainwashing.
Can such move be defended on the argument of giving a role model to the small kids? Aren't the role models above all party-political clamour and supposedly a person who is recognized for his social contributions by people rising above the political affiliation ?

हिंदी अनुवाद:
मुझे छोटे-छोटे बच्चों की वह तस्वीरें सख्त नापसंद हैं जिसमे उन्हें बड़ी मासूमियत वाली भावना से किसी न किसी राजनैतिक दल से सम्बद्ध और समर्थन करते हुए दर्शाया जाता हैं।
   मुझे लगता है की वयस्क,बड़े व्यक्तियों की जिम्मेदारी होती है कि वह छोटे और मासूम बच्चों को यह सिखाएं की बच्चे स्वयं से सही और गलत के बीच में अंतर कैसा करें, न की यह सिखाएं की क्या सही है और क्या गलत। सही और गलत में अंतर करने का अंतिम अधिकार प्रत्येक व्यक्ति (वयस्क अथवा बालक) का ही होना चाहिए। छोटे छोटे अबोद्ध बालक किसी राजनैतिक दल का समर्थन करते हुए दिखते हैं तब ऐसा आभास होता है की मानों कोई वयस्क इनके श्वेत अंतर्मन पर जबरन अपनी इच्छा के रंग डाल रहा है। उन्हें विचार शून्यता में धकेल रहा है।
दल-गत राजनीत एक जटिल क्रिया है जिसमे शमलित होने वाले व्यक्तियों का स्वयं का अंतःकरण तथा न्याय करने की समझ दल-गत राजनैतिक विचारधाराओं में पक्ष लेने से पूर्व प्रबुद्ध हो चूकी होनी चाहिए। क्या हम नन्हें, अबोद्ध बालकों से इतने विक्सित अंतःकरण की अपेक्षा कर सकते हैं? यदि नहीं, तब फिर यह अबोद्ध बालक का राजनैतिक दल का समर्थन कैसा?
  नन्हे, अबोद्ध बालकों का अंतरमन स्पष्ट, पवित्र, भेद-भाव हीन तथा किसी भी व्यक्ति अथवा दल का पक्ष लेने में असमर्थ होता है।
  और फिर क्या छोटे बालकों द्वारा किसी राजनैतिक दल का समर्थन को इस तर्क पर स्वीकृत किया जा सकता है कि यह समर्थन मात्र इन बच्चों को एक आदर्श, अनुसरणीय उद्धहरण देने के अर्थ में था? क्या हमे अपने बच्चों को दिए जाने वाले आदर्श, अनुसरणीय उद्धहरण ऐसे व्यक्ति निर्वाचित नहीं करने चाहिए जो दल-गत राजनीत से ऊपर उठे हों, और जिन्हें हमारा समाज सर्व-स्वीकृति से जनहितैषी कार्यकर्ता मानता है।

Thursday, August 14, 2014

महिलाओं को मृत्यु दंड --यह सभ्यता के अंत के लक्षण है

देश में घटित होने वाले अपराधों की विभीत्सता इस बात के स्पष्ट लक्षण हैं की भारत में सिन्धु घाटी के गर्भ से जन्मी प्राचीन सभ्यता का या तो नाश हो गया या वह समय के साथ ताल नहीं रख सकी और वर्त्तमान में वापस पाषाण युगी वहशी व्यवहार में लौट रही हैं।
सभ्यता अंतरात्मा के जागरण से बनती है। जब बहोत सारे इंसानों में ब्रह्मज्ञान अंतरात्मा में से जागृत हुआ था तब उन्होंने सभ्यता बनायी और फिर ग्राम, पुर नगर का निर्माण किया। जिनमे ब्रह्म नहीं जागृत हुआ वह जंगली ही रह गए थे।
  वर्तमान में हमने पश्चिम की नक़ल वाले महानगर और मेट्रोपोलिटन बनाने की दौड़ तो लगा दी है मगर अंतरात्मा और ब्रह्म ज्ञान को न सिर्फ त्याग दिया है, इसके विरोध करने वाला आचरण विक्सित कर लिए है। 'धर्म' को 'हिंदुत्व' ने विस्थापित कर दिया है। ऐसे अमानवीय, मनोविकृत अपराध इन बड़े महानगरों में साधारण घटना हो गए हैं।
  अंतरात्मा के दमन का कारन है हमारी वर्तमान की राजनैतिक व्यवस्था। हमने अतरात्मा की ध्वनि सुनने वालों की विजय के लिए रिक्त स्थान नहीं छोड़ा है। अधर्म अब धर्म पर हावी है। भ्रष्टाचार और पाखण्ड का बोलबाला है। इन दो महिलाओं को मृत्यु दंड दे कर भी यह पिशाचिक समाज सुधरने वाला नहीं है। हमे मंथन करना पड़ेगा की यह हालात कैसे आये कि महिलाओं को भी मृत्यु दंड देने की आवश्यकता आन पड़ी। हमें अंतरात्मा की ध्वनि को अपने महानगरों, न्यायालयों और राजनैतिक व्यवस्था में संरक्षण देना होगा।

Democracy and populism

populism has a definite purpose to serve the gains of Realpolitik in a Democracy . Government after governments are becoming narrow minded in selection of populist people to give rewards and tribute so to make impressions among the citizens that these populist people belong to their camp .
The ignorant, conscience-less man follows the populist name, and thus he is drawn to vote in the political outfit which mere succeeds in Making the impressions of being the victor.

There is nothing more needed than a huge lot of conscience less citizens to sabotage a democracy. India is abundant in such class of citizens.

लोक-लुभावनता घटित हो रही अंतर-दलीय कूटनीति के दौरान एक विशिष्ट उद्देश्य को प्रभावित करती है, किसी भी प्रजातंत्र में। सत्ता-रूड़ राजनैतिक दल की सरकारें एक-के-बाद प्रत्येक लोक-लुभावन व्यक्ति को कोई सम्मान या पुरस्कार दे कर नागरिकों में यह प्रभाव,भ्रम, देने का प्रयत्न करती हैं की यह लोक-लुभावन व्यक्ति उनके राजनैतिक दल के खेमे में हैं, और उनके कूटनैतिक विचारों से सहमत तथा सम्बद्ध है।
  अबोद्ध, आत्म-जागृति से वंचित नागरिक ऐसे लोक लुभावन नामों के पीछे-पीछे चलते हुए स्वयं ही उन राजनैतिक दल को अपना मत दे आते हैं। इस प्रकार से हम ऐसा समझ सकते हैं की प्रजातंत्र-बहरूपिए-मूर्खतंत्र में सत्ता सुख प्राप्त करने हेतु किसी भी राजनैतिक दल को मात्र इतना ही पूरित करना होता है कि अपनी जन छवि ऐसी रखे की मानो वही विजई हो रहा है।

  एक सफल प्रजातंत्र को भेद सकने के लिए मात्र कुछ अबोद्ध, अंतरात्मा-हीन नागरिकों की ही आवश्यकता होती है। और भारत तो भरा हुआ है ऐसे व्यक्तियों से।

Tuesday, August 12, 2014

हिंदुत्व और धर्म्तव में अंतर हो गया है

पाखंडियों ने 'हिंदुत्व' और 'धर्म' के मध्य अंतर प्रकट कर दिए हैं। अब हिन्दू होना और धर्म का पालनकर्ता होना एक समान विचार नहीं है। पाखंडी खुद को हिन्दू बताते हैं मगर धर्म संगत जीवन आचरण नहीं करते हैं। पाखंडी माला जपने, तथा आवश्यकता से कहीं अधिक , अपने विशाल दर्भ, अहंकार के अनुपात के मंदिर और मूर्ती निर्माण को 'हिंदुत्व' मानते हैं। वह अहंकार को भ्रमित करते हैं एक थोड़ी सी निम्न , कोमल मानवीय प्रतिक्रिय 'गर्व' से।
   गर्व सत्य से निष्ठावान होता है, जब की सत्य स्वयं श्रद्धा, विश्वास और सुन्दरता से अधिक क्ष्रेष्ट होता हैं।
  अहंकार पाखण्ड और माया से निष्ठावान होता है और इसलिए श्रद्धा, विश्वास (जिसमे अंध-विश्वास भी समाया हैं) और सुन्दरता से सम्बद्ध होता है। यह दोनों आचरण पाखण्ड तथा माया को पोषित करते हैं। इसलिए हिंदुत्व पाखंडियों का आचरण बनता जा रहा है, सत्यवान व्यक्तियों का आचरण तो धर्म कहलाता है।

महाभारत का युद्ध, निष्पक्षता और निर्मोह

निष्पक्षता(neutral, and/or undecided) और निर्मोह(dispassionate and objective) में उतना ही अंतर है जितना की दाऊ और श्रीकृष्ण में था।
दाऊ महाभारत के युद्ध में निष्पक्ष ही रह गए क्योंकि वह दोनों पक्षों (पांडवों और कौरवों) के व्यक्तिगत सत्कर्म और दुष्कर्म का हिसाब ही देखते रह गए। वह देख रहे थे की यह दोनों पक्ष अंततः आपसी सम्बन्धी ही तो थे, और दाऊ स्वयं से दोनो पक्षों के ही सम्बन्ध समान निकटता के थे।
शायद इसलिए दाऊ धर्म और मर्यादाओं को तय नहीं कर पाए।
श्रीकृष्ण निर्मोह से दोनों पक्षों का आँकलन कर रहे थे। उनके अनुसार युद्ध में प्रत्येक मरनेवाला और मारनेवाला कोई न कोई सगा-सम्बन्धी ही होने वाला था। इसलिए व्यक्तिगत सत्कर्म और दुष्कर्म का हिसाब तो सब ही समान ही आने वाला था। वह दोनों पक्षों द्वारा किये कर्मों का आँकलन एक दीर्घ अन्तराल से देख रहे थे।
  हस्तिनापुर के स्वयं के नियमों से कभी भी स्पष्ट नहीं होने वाला था की राज्य का असली उत्तराधिकारी कौन था। मगर पाडवों और कौरवों के मध्य घटित कूट(छल, अनैतिक, अमर्यादित) क्रियाओं ने श्रीकृष्ण के लिए धर्म का पक्ष तय कर दिया था। कौरवों द्वारा लाक्षागृह का कूट, हस्तिनापुर राज्य का बटवारे के बावजूद कौरवों में असंतोष, पांडवों को छल से द्रुत में हराना, और इससे भी भीषण- नारी का अपमान-द्रौपदी का चीर हरण -- यह सभी धर्म का पक्ष स्थापित करने में सहायक थे।
   इसलिए कृष्ण निर्मोह से पांडवों के पक्ष में धर्म को देखते थे।
निष्पक्षता में व्यक्ति निर्णय नहीं कर पाता है। अनिर्णायक स्तिथि में न्याय नहीं होता है। न्याय जीवन चक्र को आगे बढ़ने की आतंरिक आवश्यकता है। बस यह समझें की न्याय डार्विन के क्रमिक विकास सिद्धांत की वह प्राकृतिक शक्ति का सामाजिक स्वरुप हैं जिससे की क्रमिक विकास का सामाजिक समतुल्य घटित होता है। इसलिए न्याय का होना आवश्यक था। तब निर्णायक होना एक बाध्यता थी। निष्पक्षता से न्याय नहीं किया जा सकता था। इसलिए निर्मोह की आवश्यकता हुई।

Sunday, August 10, 2014

Criticism of the shipping industry's way of looking at Complacency

By Complacency, I understand :- a state of comfort which is a positive side of human growth and by various schools of thought such as Buddhism, and a general understanding of psychology, it is desirous of every person to reach the stage of Complacency. Complacency is another term for maturity.
   Thus, Complacency is a human nature and every person is expected to arrive into it.
  Complacency should not be seen as a chronic, negative human nature. Indeed, from the human resource management point of view, no aspect of human nature -such as Getting Tired, Monotony, Drudgery, or Complacency should be seen as a negative behavior - although all of these surely put some limitations on human performance.
  The task of HR Manager in an organisation is to overcome the challenges posed by Complacency (for that matter Boredom, Wearability, Monotony) BUT NOT TO beat the Complacency out from Human Nature by issuing threats, warnings of consequences, alarming the individual of his natual limitations and of his very being.
   Therefore, to diagnose the core of an accident by the Investigators, as Complacency may not be fairly justified act, more so if the corrective action becomes limited to persecuting, or to lecturing ONCE MORE the perceived errant operator of the limitations he has "suffered" from. It should become clear to the one and all that all limitations occuring from Human nature are not some chorinc incompetence one private individual has suffered from, because if not him, the other fellow human will be showing these human limitations in the next occasion leading to a repeat of accident due to same cause.
  The objective of HR Management should be to introduce procedures which may *eliminate the challenges* created by Complacency, not the Complacency itself. (It is natural that such a burden on the HR Management will give opportunity to the employees to accuse the HR of doing insufficient, thus hiding away their actual incompetences. But this aspect of tussle between employees and employer is a different topic to study.)
    As an example, in car driving exercise - the limitations of a complacent driver (regular, accustomed and mature) is overcome by introduction of procedures such as: No music while driving, no phone calls,
Compliance with Traffic Signal,
Design and Construction of such roads on which smooth traffic may run with Complacent drivers on the wheels of each vehicle,
  Pedestrian Overbridges, zebra crossing, flyover, traffic partition, road lamps, rumbles, spead breakers, well marked signboard, etc.
What are some inappropriate methods of overcoming complacency:
1) To force the driver of a car to keep the back of seat upright all the time (fallacy--"comfortable seating induces complacency")
2) To force the driver to stop talking, smiling, singing or listening to music (fallacy--"relaxation introduces Complacency")
3) To prohibit carriage of mobiles while driving. A mere control on taking the phone call should serve, not prohibition. Similarly, prohibition of mobiles in Wheelhouses or Cockpits is going over the side.(fallacy- "luxuries introduce complacency")
4) To prohibit setting alarms which contribute to safe working, on grounds of fear that people play truant from work leaving their work on the alarm alone(fallacy-"Electronic Gadgetry introduces complacency").
5) Over emphasis procedure of record-keeping to the discomfort of ship's crew. ( fallacy--"Released from reporting control, uncontrolled crew is complacent")
6) Senior, aged not being attentive, or agreeing to younger or junior staff is NOT necessarily Complacency. It is often a hierarchical arrogance very commonly occurring from socio-cultural learnt behaviours. Many cultures see a Senior asking, enquiring or taking advice from a Junior as "lacking confidence". Complacency is confused away for what is more often a culturally learnt arrongant behavior.

  On ship, we overcome the Challenges of Complacency by putting in practice the operation methods and the checklists prescribed in the ISM-SMS manuals of the ship.
   Therefore the accident investigators and the auditors should focus harder on ensuring the ground compliance of the ISM-SMS procedure, which should suffice to eliminate the challenges of Complacency. And new observations diagnosed to have occured out of Human Nature limitations would require procedural amends in the ISM-SMS which will ensure a fleet-wide and a longtime cure.
In short, COMPLAISANT Behaviour should be ths cause of concern, not COMPLACENT.
If at all the Complacency shows up, the preventive measures should show-up in the SMS manual procedures, INSTEAD of confining the Complacency cause to accusations and blame-fixing on the errant ship master.
  I respect Complacency as an Organizational challenge, not as a chronic individual limitation. Complacency is a human nature and often it is desirous that all normal, healthy humans reach a stage of complacency after due experience gain.
  Shipping Industry should take constraints in portraying complacency as a negative virtue of human beings.

Thursday, August 07, 2014

Hypothesis on the Nature of Democratic Politics under Cultural Corruption

What sort of politics should we expect in a country which is marred by Corruption?

Let's try to theorise this :

There are two most irrefutable points about Corruption:
1) Corruption cannot create a win-win situation. There MUST necessarily be atleast one loser somewhere.
2) The losses of the losing side, the winning side will survive by hiding, comouflaging, those behind some kind of stated inter-personal prejudice. This, it will do to keep the society convinced that the losses are not due to Corruption BUT the consequence of prejudiced being played out. Corruption is a societal evil, which if exposed, will cause an overall turmoil. Hence, it is in the interest of the parties indulgent in corruption to keep certain inter-personal prejudices to live on, and give  shadow cover to hide corruption deeds.

The other aspects of Corruption in A Democracy are as follows:
3) A Democratically elected party will enjoy the powers and avail of ill-gotten waelth until the political number of the losing side will progressively increase till the latter reach the count of forming a political majority. Thus, now the latter will come to power. Then, the losses of the hitherto winning side will set rolling. Until the second cycle completes.

4) The society will stand a loser overall. This will happen by occurance of national wealth getting coverted into private wealth of the public elected officials. Price Inflation will come around. The government exchequer will keep losing money which it requires to give social benefits to the apolitical poor, downtrodden groups.

5) Of the two or more political groups, who each are making the ill-gotten wealth while playing out against each other, there will be a competition to acquire monopoly by someone. The businessmen lobbying behind each of the political group will try to monopolize the businesses. This will cause the choices before the consumer to erode and the quality of goods to deteriorate--again, a societal loss overall.

6) Pressure of resources in a society will run high, causing a loss of economic liberty available to the common man. It should eventually lead to a total collapse and destruction of peace and harmony.