Sunday, April 17, 2016

लॉजिक, लॉजिकल फॉलसि, और चुनावी पार्टियां

लॉजिक को कंप्यूटर, लॉ,  विज्ञानं और गणित के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। लॉजिक में यह लोग वाकई में जीरो है।
लॉजिक प्रयोग करने का फायदा यह होता है कि यह किसी भी धर्म,जात , वर्ण के व्यक्ति को लॉजिक से निकली बात, निष्कर्ष, कारक आसानी से समझ आ जाती है। तो लॉजिक के प्रयोग से आपसी वैमनस्य , भेद भाव जैसे दुर्गुणों को पार लगाया जा सकता है।
  दूसरे शब्दों में, लॉजिक को सेकुलरिज्म का सूत्रधार मान सकते हैं।
मगर यह क्या !! भाजपा वाले तो वैसे ही एंटी-सेकुलरिज्म है !! शायद वह खुद भी मानते है की वह सेकुलरिज्म के साथ साथ लॉजिक को त्याग कर चुके है।

लॉजिक की कमी यह होती है कि लॉजिक में गलती होना आसान होता है। और जब कभी लॉजिकल मिस्टेक होती है तब पूरा का पूरा समुदाय वह मिस्टेक कर देता है। लॉजिक की मिस्टेक को लॉजिकल फॉलसि (logical fallacy) कहते हैं। कांग्रेस के लोग लॉजिकल फॉलसि से ग्रस्त थे। इसलिए वह उटपटांग , उल्लूल जुलूल लॉजिक लगा देते थे। सेकुलरिज्म के नाम पर तुष्टिकरण कर रहे थे।

Saturday, April 16, 2016

denialism -- प्रमाण नियमावली की logical fallacy

denialism को गहरायी से समझने के लिए हमें निर्मल आत्मा (good conscience), तर्क (logic) और प्रमाण के नियम (laws of evidence) के पेंचीदा गठजोड़ को समझना होगा। सबसे पहले हमें तर्क और प्रमाण के नियमों की एक प्राकृतिक असक्षमता को चिन्हित करना होगा जिसके लिए हमें अपने निर्मल निश्चल आत्मा का अवलोकन करना होगा।
   साधारण तर्कक्रिया और प्रमाणनियम के प्रवाह में कुछ घटनाओं को प्रमाणित किया जा सकना करीब करीब असंभव है। भेदभाव और बलात्कार ऐसे अपराधों का उधाहरण है जो की साधारण तर्कक्रिया और प्रमाणनियम के द्वारा सत्यापित किये ही नहीं जा सकते है। इसलिए यहाँ दूसरी विधि प्रयोग करी जाती है।  इसमें सर्वप्रथम निश्छल अंतरात्मा को आवाह्न करके घटना अथवा अपराध के अस्तित्व के सत्य को स्वीकृत करके फिर तर्कक्रिया और प्रमाणनियम को निर्मित किया जाता है। यह विधि अन्य अवसर और अपराधों की विधि के विपरीत,एक विशेष विधि है क्योंकि उनमे पहले तर्कक्रिया और प्रमाणनियम को क्रियान्वित करने के उपरान्त निश्छल अंतरात्मा को आवाहन होता है।
  खाप पंचायत, आरक्षण विरोधी और ऐसे कई सारे समूह आज भी इस गहरी बात को समझ सकने में असफल हो रहे हैं। इसलिए वह बलात्कार अथवा सामाजिक भेदभाव के शिकायतकर्ता की शिकायत का उपचार करने की बजाये उलटे भुगतभोगी को ही दण्डित कर दे रहे हैं। जैसे , बलात्कार के समय पीड़ित नारी को ही दोष देना, या सामाजिक भेदभाव के पीड़ित को ठुकरा देना की "ऐसा कुछ नहीं है,यह सब तुम्हारे मन का वहम है।"। यह logical fallacy के शिकार समूह है।

पौराणिक ऋषि मुनि और दलित वर्गों का उनके प्रति दृष्टिकोण

मनु स्मृति के रचियता , भगवान् मनु की जो भी वास्तविक मंशा रही हो जब उन्होंने समाज में व्यवस्था वर्गों का निर्माण किया हो, मगर आने वाली मानव पीढ़ी ने उनके काव्य को ही तर्क के रूप में प्रस्तुत करके सामाजिक भेदभाव की नीव डाली, जात पात भेदभाव किया, और मानवता के एक विशाल वर्ग को भौतिक मानव सम्मान से वंचित करके पशुओं से भी निम्म जीवन यापन के लिए बाध्य कर दिया था, और जो की सहस्त्र युग तक कायम रहा।
   सवाल यह है की यदि इसमें भगवान मनु और उनके काव्य की कोई गलती नहीं थी, तब फिर उन लोगों को पहचान करके दण्डित करने की आवश्यकता है जिन्होंने उनकी रचनाओं का कु उच्चारण किया। तुलसी दास के युग तक तो सीधे सीधे तुलसी रामायण में लिए वाक्यांशों से तर्क विक्सित किये गए की "पशु शुद्र और नारी सब ताड़न के अधिकारी", महाभारत में गुरु द्रोण और एकलव्य प्रसंग में से तर्क विक्सित किये गए कि यह लोग चोरी करते है, plagiarism और इसलिए इनके अंगूठे काट देने चाहिए।
   स्वाभाविक है की अमानवीयता के भुगतभोगी आज इन सभी से घृणा करेंगे-- मनु, मनुस्मृति, तुलसीदास , तुलसी रामायण और गुरु दृणाचार्य ।

मगर आज भी जो देखने को मिल रहा है भुगतभोगी वर्ग की शिकायतों पर कार्यवाही के विपरीत जाते हुए,  उन कु उच्चारण करने वाले समूह की पहचान करने के बजाए भगवान मनु, द्रोणाचार्य और तुलसीदास के बचाव और सम्मान में कार्य किया जा रहा है। यह सब तो शोषित वर्ग को denialism के समान प्रभावित करेगा !! आरक्षण विरोध के अधिकांश,99%, तर्क भी denialism से ही निर्मित हो रहे हैं। denialism यानि वह जो भेदभाव के तथयिक सत्य को स्वीकार करके उसमे सुधार करने की बजाए 'भेदभाव हुआ ही नहीं,सब मनगढ़ंत है' को प्रमाणित करने में बल देता है ।

Wednesday, March 09, 2016

आरएसएस के भारतिय संस्कृतिक मूल्यों के सुधार के उपाय और स्वर्ग की सीधी सीढ़ियां

एक बार रावण ने स्वर्ग तक जाने वाली सीढ़ियों के निर्माण का प्रोजेक्ट शुरू किया था। मगर वह सफल नहीं हो सका।
सबक यह है कि जिन तकनीकी कारणों से रावण स्वर्ग तक की  सीधी सीढ़ियों का प्रोजेक्ट सफल नहीं बना पाया, उसी के जैसे तकनीकी कारणों से भाजपा और आरएसएस को जनता के नैतिक, सामाजिक  मूल्यों में सुधार करने के लिए प्रासंगिक स्वर्ग की सीढ़ी के जैसे सीधे दिखने वाले तरीकों का प्रयोग बंद करना चाहिए। जैसे कि - प्रतिबन्ध और प्रताड़ना, सजा , moral policing, दंगे करवाना, भय व्याप्त करना , ईत्यादि।
    मानवता और समाज का सुधार इन तरीकों से कभी भी नहीं हो पाया है। एंथ्रोपोलॉजी विज्ञान में इंसान को उसके आज के सभ्य और सामाजिक जीवन से लेकर उसके आरंभिक काल के जंगली वनमानव पशु जीवन के बीते चरण की तलाश शायद यह भी एक सबक देती है। व्यापक सामाजिक सुधार सही नेतृत्व के चुनाव से आरम्भ होते है। भगवान ने इंसान को साफ़ और सुधरा हुआ बनाया ही नहीं क्योंकि शायद यह उसके लिए भी संभव न था। भगवान खुद भी सामाजिक सुधार के लिए सिर्फ एक-आध अवतार से काम नहीं चला पाया और उसे भी कई बार अवतार लेना पड़ता है । और वह भी इंसान के रूप में, किसी दिव्य विभूति के रूप में नहीं। मानस रुपी राम चंद्र जी को समाज ने भगवान इसी लिए माना था की इस हद तक मर्यादाओं को कोई भी नहीं निभा सकता था। मंशा थी कि ऐसे सर्वोच्च मर्यादा पुरुष को सामाजिक नायक स्थापित करने से ही तत्कालीन समाज में सुधार संभव हो सकता था। शायद वाल्मीकि ने राम की कहानी इस मकसद को सिद्ध करने के लिए लिखी थी। संस्कृति का उसके महाग्रंथों और उसके चुने नायकों से सम्बन्ध घना होता है। रामायण तब के काल में लिखी थी।
बरहाल,  भाजपा और आरएसएस की जो भी भारतीय संस्कृति के लिए मंशाएं हैं उनको स्मरण करना पड़ेगा कि न हमारे आज के युग के नायक ऐसे है, न ही हमारे पास आज के काल में ऐसे ग्रन्थ, साहित्य और कला के उत्पाद है। और शायद न ही रामायण काल जैसे आचरण आज की आवश्यकताएं हैं। इसलिए यह जेएनयू के तीन हज़ार कंडोम वाले कथन और उसे प्रवाहित होनी वाली मंशाओं को त्याग कर देना चाहिए। भाजपा के भक्त , खुद चेतन भगत अपने उपन्यासों में कॉलेज में विवाह पूर्व संबंधों का नायकीय चित्रण करते हैं।
   सामाजिक सुधार को प्रतिबन्ध,यातनाओं और भय योग से कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सका है। और वर्तमान प्रजातंत्र व्यवस्था में तो इस सब पद्धतियों के लिए कोई स्थान ही नहीं है। स्त्री-पुरुष संबंधों से सम्बंधित  कुछ सामाजिक सुधार तो आज तक प्राप्त नहीं हो सके है। रावण को सीता हरण के लिए राम चंद्र ने वध किया , जिस वध को समाज ने न्यायपूर्ण माना। मगर राधा और कृष्ण जो मधुबन में रास लीला करते है, समाज ने उसे भी न्यायपूर्ण माना  था। अर्थात, सारे  स्त्री पुरुष सम्बन्ध को मात्र उनके होने पर अनैतिक नहीं माना जा सकता है।

Saturday, March 05, 2016

Ishrat Jehan Killing Disclosures...a test for Indian Judiciary

Dear Mr Justice,
    With due respect, I wish to raise a few questions to the entire judiciary of India about the Ishrat Jahan killing case.
   As i hear the revelation and disclosure made by the retire bureaucrat, I am reminded of an old play i had read during school years, Saint Joan, written by playwright George Bernard Shaw. Ishrat's fate in the public eye is seeing same kind of swing as did that of Joan of Arc from France, both the women suffering it post their killing. Joan was at first burnt alive at stake at the behest of the Inquisition who had declared her a Witch. But soon after they realized the political necessity of it, a second Inquisition secures her redemption directly into Sainthood. Such was the judicial process which the school board wanted us to know of and to think over. Judicial process'es greatest fault, my school board made me realise through GB Shaw's play, was that it was closed door, closely guarded, and therefore fully susceptible to the influences of the politity and the church.
  Over here, in Isharat Jahan's killing i see a striking similarity, except that her fate in public eye is swing from 'Bihar ki Beti' to a Terrorist Operative. The trial continue to imbibe those same characteristics,-- closely guarded due an apparent needs of national security, trial being worked post the killing and through some legal modalities of sworn affidavit. The political and the religious necessity which are motivating the changes are same in our times as were there back in Joan's era of 16th Century.
    France, today we know is a great and a develoled nation. As i could understand from my own thinking, their achievement as a nation is a result of the lesson learnts from their own mistakes, which their artists and literatti brought to their conscience by holding the mirror to it. Justice, liberty, equality and fraternity are few of the shining principles which our Constitution is said to have borrowed from the French's.
    How long more do you think the people of India should be made to bear the self-serving deeds of the judiciary and the legislatures before we may truly see the change that we want to.

Regards,

Thursday, March 03, 2016

मानवाधिकार और कुछ सामाजिक समस्याएं -- श्री चमन लाल जी की अभिभाषण

श्री चमन लाल जी, IPS, सेवानिवृत पुलिस महानिदेशक (नागालैंड राज्य) एवं भूतपूर्व सदस्य राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग,ने government law college, मुम्बई  में श्री julio rebiero जो, सेवानिवृत पुलिस आयुक्त मुम्बई, की अगुवाई में विमोचन कार्यक्रम (conference) की सभा को संबोधित किया। श्री रेबीएरो जी के शब्दों में श्री चमन लाल जी को मानवाधिकार विषय में श्रेष्ट ज्ञानी (an authority) माना जा सकता है, और श्री चमन लाल जी राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग से सम्बद्ध जांच विभाग में director general की भूमिका में सेवा दे चुके हैं।
  सभा में घोषणा करी गयी की संघोषटी के उपरांत उसका सार लिखने की एक प्रतियोगिता रखी गई है जिसको सर्वश्रेस्ठ लिखने वाले को ₹5000/- का आयोजक संघटन, People's Concern for Good Governance की तरफ से पुरस्कार दिया जायेगा। शर्त थी कि यह सार किसी निश्चित शब्द सीमा में लिखना था।
   श्री लाल जी ने जन रूचि के किन्ही तीन विषयों पर मानवधिकार की दृष्टि से अपने विचारों को प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखा। सभा में शांति बनी रही इसलिए उन्होंने यह तीन विषय खुद ही चुनाव करते हुए भ्रष्टाचार, आरक्षण तथा आतंकवाद निरोधक सख्त कानून जैसे कि TADA अथवा POTA को पकड़ा तथा इन विषयों के प्रति मानवाधिकार कानून के अपने पक्ष को सबके सम्मुख प्रस्तुत किये।
     भ्रष्टाचार के प्रति मानवधिकार कानूनो का अपना पक्ष रखते हुए श्री लाल ने कहा की भ्रष्टाचार को अखिल समाज के प्रति श्रंखलाबद्ध वित्तीय अपराध समझा जा सकता है जिसके चलते समाज को निरंतर अथवा हमेशा के लिए उसके सभी अधिकारो से वंचित कर दिया जाता है। समाज को संविधान की ओर से जो कोई भी अधिकार प्राप्त है, जैसे की मौलिक अधिकार (fundamental rights), वैधानिक अधिकार (legal or statutory rights), इत्यादि ,यह सब के सब तब ही प्राप्त हो सकते है जब नागरिक स्वयं ही सक्षम हो इनको मांग सकने के लिए। मगर भ्रष्टाचार के कारण सरकारों के पास आर्थिक और वित्तीय आभाव आने लगते है जिसके बाद वह जन उत्थान की योजनाओं में उनकी पहुँच या गुणवत्ता में आर्थिक कटौतियां करने लगती है, तथा फिर नागरिक को हमेशा के लिए इतना निम्म कुटी शिक्षित अथवा वित्तीय संकटों(महंगाई के रूप में) से ग्रस्त करके छोड़ देती है की या तो उसके पास अपने अधिकारों का ज्ञान ही नहीं रह जाता अथवा वह दैनिक चर्या में जीवन यापन के लिए इतना संघर्षशील रह जाता है कि उसके पास समय और वित्तीय संसाधन ही नहीं बचते की वह अपने अधिकारों के लिए एक और अन्यथा संघर्ष कर सके।
    आरक्षण विषय पर अपने विचारों को रखते हुए श्री लाल जी ने बताया की संविधान के अनुच्छेद 16 में right to equality (परस्परता का अधिकार) की बात रखी गयी है। मगर किसी भी ऐसे समाज में जो की पहले से ही परस्पर नहीं है, उनमे किसी भी परस्परता के अधिकार को अंधाधुंध प्रोत्साहित करने से उस समाज में पहले से ही जमी उसकी विषमता और अधिक तीव्र हो जायेगी घटने की बजाये। (Promoting the Right to Equality in a society which is already unequal will only be perpetuating the inequality within it.)
    आतंकवाद निरोधक कानून जैसे कि TADA और POTA के प्रति मानवधिकार कानून का अपना पक्ष रखते हुए श्री लाल ने कहा की आज मानव समाज इतना जटिल हो चुका है जिसमे तमाम विचारधारा के लोगो को संतुष्ट कर सकना एक साथ संभव नहीं है। ऐसे में कानून पलान को सुनिश्चित करने के लिए दुनिया के तमाम देश यदा कदा सख्त कानूनों को अपनाते हैं। सख्त कानून वह हैं जो की प्रमाण और साक्ष्य के कानूनो के विरुद्ध जाते हुए पुलिस या सेनाओं को कार्यवाही का अवसर देते हैं। मगर सभी उन्नत देशों में जब कभी ऐसे कानूनों को लगाया जाता है तब उनका दुरूपयोग रोकने की संघठनों को भी सशक्त , सुदृढ़ करा जाता है जिससे उनका दुरूपयोग कम होता बराबर होता है। मगर भारत में दुरूपयोग रोक सकने के प्रबंध पुख्ता नहीं हैं। जब tada लाया गया था तब राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग ने tada कानून की अवैधानिक, गैर लाइसेंसी हथियारों वाली धारा के तहत सर्वाधिक मामले गुजरात राज्य से पाये थे जबकि उस समय गुजरात में आतंकवाद था ही नहीं। tada कानून आने के पूर्व ऐसे मामले आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज़ होते थे जिनकी दर्ज़ मुक़द्दमो की संख्या इतनी नहीं थी। tada आने से यकायक संख्या वृद्धि सूचक बन गया की पुलिस इस कानून का दुरूपयोग कर रही थी। आर्म्स एक्ट जिसमे पुलिस को प्रमाण और साक्ष्य के अन्य कानून के तहत आरोपी को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना होता था, अब पुलिस tada कानून का अवैधानिक लाभ लेते हुए आरोपी को बिना वारंट अरेस्ट करती थी और तीन दिन तक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के प्रावधान से मुक्त थी।
    श्री लाल ने मानवाधिकारों के दुरूपयोग पर भी अपने विचार रखते हुए कहा की अधिकांशतः इन कानून का उपयोग किसी न्यायलय बद्ध दोषी या आतंकवादी को बचाव करने के लिए देखा गया है। जिसके चलते समाज में मानवाधिकार के प्रति अवस्वाद आये है। अब समाज ऐसे कर्मों को स्वीकृति या फिर मांग रखने लग गया है जो की आपराधिक हैं। कही कोई आतंकवादी या विशिष्ट आरोपी यदि जीवित पकड़ा जा सकता है तब समाज राज्य से मांग रखने लग गया है कि उसको वहीँ (फर्ज़ी) मुठभेड़ में मृत दिखा दो अन्यथा बाद में तमाम मानवाधिकार संघठन उसकी पैरवी करने आ जायेंगे। पुलिस में सख्त कानून के दुरपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है और समाज में राज्य नियोजित अपराधिक क्रियाओं की स्वीकृति, तथा मानवधिकारों के लिए अवस्वाद। इस खिंचा तानी का शिकार वह स्थान और पुलिस अथवा सैन्य बल हुए है जिनको किसी सख्त कानून की वास्तव में ज़रुरत है। यह सब किसी भी नवकाल प्रजातंत्र समाज के लिए विनाशकारी हो सकता है।
     श्री लाल ने बताया की कैसे राष्ट्रिय मानवधिकार आयोग आज भी देश का सबसे स्वतंत्र और सशक्त आयोग है। सशक्त होने के लिए यह एकमात्र ऐसा आयोग है जिसके पास अपना खुद का जांच विभाग है। और स्वतंत्र होने के लिए इसकी वित्तीय स्वतंत्रता ऐसे संचालित है कि कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार अकेले अपने दम पर इसके धन कोष को बंधित नहीं कर सकती है। साथ ही, इस आयोग का अध्यक्ष हमेशा ही कोई सेवानिवृत न्यायधीश ही होता है जो की इसकी निष्पक्षता को सुनिश्चित करता है। कई पार्टियों की सरकारों ने अध्यक्ष पद में फेर बदल करके किसी नौकरशाह अथवा अन्य नागरिक को लाने का प्रयास किया है मगर अभी तक सफल नहीं हुए हैं।

कश्मीर अलगाववाद का राष्ट्रद्रोह-- भाषा जनित कूटनीति का पहलू

शब्दों की हेरा फेरी का मसाला है यह तो...कुछ कहते हैं की कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानना असंवैधानिक है, जबकि कुछ कहते है की संविधान में ही कश्मीर को इस प्रकार की विशिष्टता प्रदान करी गयी है की मानो वह भारत का हिस्सा है ही नहीं।
   और सवाल यह बनाया जा रहा है कि संविधान का सम्मान कौन सा गुट नहीं करता है।
बरहाल, कुछ तथ्यों का ज्ञान नागरिकों को होना आवश्यक है
1) संविधान में कश्मीर को विशेष दर्ज़ बहोत उच्चे हद तक प्राप्त है। याद रहे की संविधान के आधीन ही कश्मीर को स्वतंत्र क्षेत्रीय संविधान रखने की स्वतंत्रता है। उनका अपना ध्वज भी है। उनकी विधान सभा 6 साल की कार्यकारणी वाली होती है।
2) समस्त भारत में लागू होने वाले बहोत सारे कानून के लिए जम्मू कश्मीर विशेष भूमि है जहाँ वह लागू नहीं होते है। उत्तराधिकारी कानून, भूमि अधिनियम,....सूची बहोत ही लंबी है।

    तथ्यों की विकृति(distortion) से ही कभी कभी शब्दों और विचारों में भी विकृति आ जाती है। प्रसिद्ध नाटककार शकेस्पीयर के नाटक twelfth night के एक चरित्र क्लाउन (हँसोड़ जोकर) का कथन तथ्यों और शब्दों की आपसी विकृति में से एक हास्य को संबोधित करता है, और सोचने पर विवश करता है कि कभी कभी हमारे शब्द जमीनी पर साफ़ दिखती हमारे विरुद्ध की सच्चाई को बिना जुठलाये अस्वीकार कर देने की क्षमता रखते है। शब्दों का मकड़ जाल ऐसा भी रचा जा सकता है।
   गुलामी की बेड़ियों से जकड़ा clown, जिसको कर्तव्य दिया गया है कि duke को प्रतिदिन मनोरंजन करे, एक दिन इसी मनोरंजन के दौरान duke के सामने अपनी गुलामी को अस्वीकार करने वाले कथन मकड़जाल को रच कर के मानो की अपने को आज़ाद भी घोषित करता है, पर संभवतः वह duke का मनोरंजन भी कर रहा होता है, जो की बदस्तूर एक गुलाम clown के रूप में उसका कर्तव्य ही था। पाठकों को उसके शब्दों में छिपे द्विअर्थ में सत्य को समझने में अन्य बहोत ही बातो को सोचने के लिए विवश होना पड़ता है।
   गुलाम clown बोलता है कि " मैं तो हमेशा से आज़ाद हूँ जी। यही मेरी आज़ादी है की में खुद से तय करता हूँ की मुझे कब तक यह गुलामी करनी है। वरना जिस दिन में चाहू तो उस दिन में गुलामी की जंज़ीरों से अपनी साँसों को रोक करके उन्हें आज़ादी दिला सकता हूँ। मेरी साँसों को रोक कर आज़ाद करने की क्षमता भगवान् ने मुझे दी है।"

अब बताईये कि क्या ऐसी आज़ादी को भी आज़ादी माना जा सकता है जिसे निभाने के लिए अपनी साँसों को गवाना पड़े। मगर clown तो फिर भी अपनी आज़ादी की उदघोषणा कर देता है। clown की अपनी आज़ादी की घोषणा duke के प्रति उसका विद्रोह मानी जानी चाहिए, मगर उसका बताया तरीका बेहद मूर्खता पूर्ण है, जो की संभवतः clown का हास्य माना जा सकता है duke के मनोरंजन के लिए।

The Central humanist group and the Ishrat Jehan killing case

The G.K Pillai interview at TimesNow speaks one big point prominently. That is, CBI and the IB are "politically" pliable agencies. Therefore we know now what interest the present government is keen to defend so not to absolve it's own leader's name from the fake encounter issue.
   No Political entity wants the issue of independence of the CBI to come over as a judicial necessity.
   The question raised by the central-humanist group on this disclosure by Mr Pillai would be ,'how do we know that the disclosure is not politically motivated today ?' . "How do we know which all affidavits were politically motivated and which all were not ".
   These are the questions which all aam-aadmi-oppressive political groups want to circumvent because these will cause judicial enquiry into the functioning of the investigation and intelligence agencies.

कानून के अध्ययनकर्ता की दृष्टि से क्या इशरत जहान को उसकी मृत्यु उपरांत गुन्हेगार घोषित करना उचित होगा?
   सवाल 1)  बचाव पक्ष में कोई जीवित व्यक्ति है ही नहीं जिसका बचाव किया जाये ?  दूसरे शब्दों में, अभियोग पक्ष तो है मगर कोई बचाव पक्ष है ही नहीं।
   सवाल 2) जिस दिन वह मरी क्या उस पर किसी भी किस्म का आपराधिक या आतंकवादी घटना का मुक़द्दमा था ? क्या किसी भी कोर्ट से उसे वारंट था ? 'special 26' फ़िल्म के एक डायलाग में कहा गया है कि "सजा ज़ुर्म करने की दी जाती है, जुर्म सोचने की नहीं"। एक legal maxim भी इस सत्य को व्यक्त करती है : cogitationis poenam nemo patitur.   कही हम इशरत को जुर्म सोचने मात्र पर तो अपराधी घोषित नहीं कर रहे ? उससे भी बड़ा सवाल,कही हम खुद अपने मन ही सोच कर के उसे अपराधी तो नहीं मान रहे ? अगर किसी आतंकवादी संघटन की वेबसाइट पर किसी का नाम आने से उसे आतंकवादी माना लिया जायेगा तो फिर क्या यदि कल को आप का भी नाम उसकी वेबसाइट पर आ गया तो क्या आपको भी रातोंरात आतंकवादी मान लिया जाना चाहिए ?
   सवाल 3) क्या किसी पुलिस विभाग के व्यक्ति के ब्यान मात्र को पर्याप्त प्रमाण माना जा सकता है किसी को अपराधी न्याय घोषणा करने के लिए ? आपके जो भी तर्कसंगत उत्तर हो, तो क्या पुलिस विभाग के अलावा गुप्तचर विभाग पर भी वही तर्क लागू होंगे?
   दूसरे शब्दों में,  क्या evidencing laws में गुप्तचर विभाग के बयानों के लिए परख की कसौटी अलग होती है ? शक्ति कपूर के casting couch वीडियो को कोर्ट ने जिन तर्कों के आधार पर प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया, उन्ही तर्कों के आधार पर गुप्तचर विभाग के सबूतों को अस्वीकार क्यों नहीं किया जाना चाहिए ? फ़िल्म "दीवानगी"(अजय देवगन, अक्षय खन्ना) में एक कोर्ट सीन में सुरेश ओबेरॉय वकील के रूप में एक डायलाग बोलते हैं कि, "वह सब तो छोड़िये, बंद कमरे में अदाकारी तो हम भी कर सकते है, इस तरह के sting video तो हम हज़ारो तैयार कर सकते है, आप कोर्ट में कैसे प्रूव करंगे की ऐसा वास्तव में होता है"। निष्पक्ष न्याय व्यवस्था में यदि पुलिस हिरासत के बयानों को under duress (दबाव में किया गया) माना गया है, तो क्यों न गुप्तचर विभाग के प्रमाणों को नाटकीय प्रमाण माना जाए।

Wednesday, March 02, 2016

इशरत जहाँ और अर्क की जोआन

इशरत जहान तो मर चुकी है। अब तो बस यह राजनैतिक सुविधा का सवाल रह गया है की उसे साबित क्या करवाया जाये -- बेगुन्हा, या फिर गुन्हेगार ? वह तो पहले ही मर चुकी है अपना बचाव कर सकने में असमर्थ।
    अंग्रेजी नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के साहित्य सेंट जोएन की स्मृति दिलाता रहेगा आज़ाद भारत में घटा यह इशरत वाला हादसा। बर्नार्ड शॉ का साहित्य इंसान का नजरिया इसी समझ पर खोलता है की एक उचित और निष्पक्ष न्यायायिक प्रक्रिय में क्या क्या चारित्रिक विशेषतायें होनी चाहिए। बर्नार्ड शॉ फ्रांस अर्क शहर की रहने वाली की युवती जोआन की जीवन त्रासदी के माध्यम से यही बताना चाहते थे की किस किस्म की मूर्खतापूर्ण न्यायिक प्रक्रिय होती थी उस युग में जिसमे पहले इंसान को जिन्दा जला दिया जाता था और फिर राजनैतिक सुविधाओं के हिसाब से यह तय होता रहता था की वह एक चुड़ैल थी या की एक संत थी । न्याय का एक प्रथम सूत्र दुनिया भर में माना गया है की एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए भले ही हज़ारो गुन्हेगार आज़ाद और बिना सजा के बच निकले। मगर कैसी मूर्खो वाली न्यायायिक प्रक्रिय का पालन हुआ था वहां, कि पहले इंसान को सजा दी गयी, वह भी मौत की और उसके बाद साबित और फिर पुनः साबित हुआ की वह चुड़ैल थी और फिर बाद में संत।
   बर्नार्ड शॉ के उपन्यास से शायद छात्रों को यानि समझने की कोशिश थी की गलत न्यायिक प्रक्रिया में क्या क्या चरित्र दोष होते है। गोपनीयता और अप्रत्यक्ष, गैर सार्वजनिकता किसी भी गलत न्यायिक प्रक्रिया के लिए खुल्ला न्यौता होता है। आज वही देखने को मिल रहा है आज़ाद भारत में इशरत प्रकरण में, बर्नार्ड शॉ के इंसानियत की आँख खोल देने वाले इतिहास के रचे जाने के सौ सालों बाद फिर से। राष्ट्रिय सुरक्षा के नाम पर कई सारे गुप्त संस्थाओं के ऑफिस लोगों का cross examination स्वीकृत नहीं होगा। वह बस एक लिखित हलफनामे से अपनी बात कह कर सस्ते में कोर्ट से फुर्सत ले लेते है। और बाद में उनमे से कुछ रिटायरमेंट के बाद, इस घटना के दसियों साल बीत जाने के बाद खुलासा करते फिरेंगे की कुछ गलत हलफनामे जमा कर दिए थे जी, राजनैतिक दबाव के चलते।

आरएसएस और भाजपा : Master mentality और pervert justice से अभिशप्त

(यह अंश britanica encyclopedia के कुछ लेखों पर आधारति है)
हर विषय के दो पहलू होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हर सिक्के के दो मुख होते हैं।
  इंसानी क़ाबलियत यह मानी गयी है की वह सही पहलू और गलत पहलू में भेद कर लेता है। इंसान सामाजिक जीव है। गलत और सही के बीच भेद करने के लिए उसमे अंतरात्मा होती है जो की अक्सर सामाजिक सर्वहित को मानदंड रख कर यह फैसला करती है। दूसरे को वह न करो जो तुम खुद पर होते देखना नहीं पसंद करोगे ।
  इंसान एक सर्वोपरि शक्ति में आस्था रखता है और मन में यह यकीं करता है कि कही कोई है जो उसकी अंतरात्मा के फैसलों को देख रहा है , उसकी सही और गलत की परख करने वाली उसकी अंतरात्मा से हिसाब मांगेगा।
  इतिहास में करीब करीब हमेशा ही समूची मानव जाती ने किसी न किसी रूप में, चाहे किसी भी नाम से, मगर इस सर्वोपरि शक्ति में आस्था जरूर रखी है।
  और करीब करीब सभी धर्मों में मृत्यु के उपरांत उस सर्वोपरि शक्ति के समक्ष हिसाब देने की बात है, चाहे जहन्नम और जन्नत के नाम पर, या फिर स्वर्ग और नर्क के नाम पर।

(नीचे का अंश स्वतंत्र मत है)
भाजपा और आरएसएस के भक्त वह है जो की हर विषय के दूसरे पहलू को तो तुरंत प्रस्तुत करते है मगर अंतरात्मा से न्याय नहीं करते है की सामाजिक न्याय में किसी मत को स्वीकार किया जाना चाहिए। न्याय वह है जो समान रूप में प्रवाहित होता है, समय और स्थान से बदलता नहीं है। यह लोग दूसरे पहलू को प्रकट करके अपेक्षा करते है कि न्याय बदल जाना चाहिए। इसी व्यव्हार को में pervert यानि विकृत आचरण कहता हूँ जो की मेरे विचार में किसी प्रकार की मनोविकृति है अधिक समय तक पारिवारिक माहौल में स्वामी भाव में जीवन यापन करने से।
  मनोवैज्ञानिक और समाज शास्त्रियों  ने एक slave mentality का जिक्र अक्सर किया है। इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी में slave mentality के चिन्हक आचरण की सूची उपलब्ध है जिसमे अधिकांशतः सदाचरण , समानता, न्याय जैसे विषयों पर अधिक बल देकर जीवन यापन करने वाले गुण आते है। समाजशास्त्री अक्सर slave mentality के आचरण को यहूदी लोगो के तर्कों और व्यवहार में देखते है क्योंकि यह लोग बहोत लंबे समय तक मिस्र के तानाशाह फ़रो के आधीन थे जब तक की उनके मसीहा मोसेस (मूसा) ने उनका उत्थान नहीं किया। एक पुरानी सिनेमा the ten commandments इस प्रोगतिहासिक घटना का अच्छा विवरण देखाती है।
  भाजपा और आरएसएस के भक्तो में slave mentality के ठीक विपरीत में master mentality को देखता हूँ, जिसको मैं pervert (course of) justice पुकारता हूं और जो की मुझे करीब करीब narcissism (आत्ममोह) का ही प्रतिरूप लगता है।
भारत जात पात के भेद भाव से ग्रस्त देश रहा है। भाजपा के 31% अटल मतदाताओं में अधिकांशतः वह वर्ग है जो की अतीत में जात पात का लाभार्थी रहा है। यह लोग आज भी आरक्षण नीति के विरोधी है और किसी अजीब वस्तु हिंदुत्व की बात करते है, जिसको सटीक शब्दों में समझना मुश्किल है। यह वर्तमान संविधान का आदर करने की बात करते हैं मगर साथ ही सामान आचार संहिता की बात भी करते है जिसमे शायद यह भिन्न भिन्न सामूदायिक कानून को नष्ट करना चाहते हैं।  ऐसे ही, यह न जाने क्यों भारत की विरासत में बसी पूरी मिली जुली सभ्यता को 'हिन्दुस्तानी' शब्द के स्थान पर 'हिंदुत्व' से संबोधित करवाना चाहते है, जिसका कोई विशिष्ट सदभाव कारण समझना मुश्किल है।
    यह आरएसएस यहूदियों से बहोत प्रभावित रहता है। जबकि यहूदी समूदाय slave mentality का गंभीर शिकार रहा है और इसलिए सामाजिक न्याय के लिए अधिक प्रतिबद्ध रहता है। उन्होंने अपने हज़ारो सालो के इतिहास में अधिक उत्पीड़न देखा है, पहले मिस्र शासकों से, फिर अरबी मुस्लमान और अभी द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन Nazi आर्य समूदाय के हाथों। आज भी जबकि वह फिलीस्तीनियों से आतंकवाद का शिकार है तब भी उनकी ज़मीन जीतने के बावजूद उन्हें उनके इलाकों में अपने autonomous प्रशासन चलाने के लिए स्वतंत्र कर रखा है। यह शायद slave mentality के लक्षण है। वह घातक सेना और जासूसी संघटन इसलिए रखते है क्योंकि शायद उन्हें अपनी slave mentality की कमज़ोरी का एहसास है। वह आक्रामक कतई नहीं है, बल्कि घातक सैन्य शक्ति के बावज़ूद रक्षात्मक व्यवहार के लोग है।
    भाजपाई हर विषय में pervert आचरण दिखा रहे है। वह सिक्के का दूसरा रुख मोदी के लिए रखते है और केजरीवाल के लिए ठीक उसी परिस्थिति में दूसरा रूख। यह न्याय नहीं करते की अंतरात्मा से किस रूख से समाज का सञ्चालन होना चाहिए। शायद हिंदुत्व का अर्थ किसी पुरानी परिपाटी को वापस लाना है जिसमे वही पुराने वैदिक वर्ण लाभार्थी वर्ग समाज का सञ्चालन और नेतृत्व करेगा जो कि आज आरक्षण नीति से दुखी घूम रहा है।