Friday, March 27, 2015

वर्चस्व की जंग में सत्यधर्म से समझौता

कभी कभी वर्चस्व की लड़ाई ऐसे भी करी जाती है की मनुष्य सत्यधर्म का पालन तो करने की इच्छा रखता है, मगर एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत सत्यधर्म को तब तक अस्वीकृत करता रहता है जब तक की वह सत्यधर्म उसके लोगों के मुख वाणी से बोला नहीं जाता है।
   (भई, अगर दुश्मन के मुख से निकले सत्यधर्म को भी यदि आप स्वीकार कर लेंगे, उसका अनुसरण करने लगेंगे तो यह भी अपने आप में आपकी पराजय ही देखी जायेगी ।)
    वर्चस्व की लड़ाई में सत्यधर्म से यह समझौता भी आपने आप में असत्य और दुष्कृता को विजय बना देता हैं।

Thursday, March 26, 2015

तर्कों आधारित न्याय एक खुल्ला न्यौता है मूर्खता को सर्वव्यापक बनाने का

किसी भी राष्ट्र के लिए दुखद स्थिति तब आती है जब उसका पढ़ा लिखा बुद्धि जीवी वर्ग ही इतना अयोग्य हो जाता है की उचित और अनुचित के मध्य भेद करने लायक नहीं रह जाता है।
  राजनीति के प्रभाव में अधिक काल तक जीवन यापन करने से ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती है। जब कभी मतभदों के कारण न्याय लंबे समय तक सर्वज्ञात और सर्वमान्य होना बंद हो जाता है, तब न्याय नष्ट ही होने लग जाता है। नैतिकता भ्रमित होने लगती है, और वह भी कमज़ोर हो जाती है।  तब अंतःकरण कमज़ोर हो जाता है , क्योंकि मनुष्य आपसी प्रतिस्पर्धा, कूटनीति में एक दूसरे पर विजय पाने के लिए कुछ भी कर्म को विजय के धेय्य से उचित अथवा अनुचित ठहराने लगता है। कूटनीति के कर्म हमारे भीतर के ईश्वर के अंश को, हमारे अंतःकरण को ही नष्ट कर देते हैं। हमारा  मस्तिष्क तब सिर्फ तर्कों के आधार पर निर्णय करने लग जाता है। तर्क (logic) के आधार पर न्याय का लाभ यह है की तर्क (तकनीकी ज्ञान, टेक्नोलॉजी, इत्यादि) व्यक्तिगत से मान्यताओं और विश्वासों से मुक्त होते है, और इसलिए आसानी सर्वमान्य हो जाते है। मगर तर्कों के आधार पर न्याय करने का नुक्सान भी है। वह यह की तर्क में कुतर्क(sophistry), भ्रम और भ्रांतियों (logical fallacies) के लिए खूब अवसर होता है, जिसमे आसानी से एक समूची आबादी को ही धोखा दिया जा सकता है, मूर्ख बनाया जा सकता।
  तर्कों के अधिक प्रयोग से उत्पन्न हानि से बचने का समाधान यह है की अंतःकरण का भी प्रयोग किया जाये।
   अंतःकरण को अधिक विक्सित और कुशल बनाने में मानववादी विषय ज्ञान (humanities) बहोत सहायक होते है। इतिहास, भाषा ज्ञान, समाजशास्त्र, न्याय -कानून, साहित्य , कला (liberal arts), नागरिक शास्त्र, राजनीति विज्ञानं, प्रशासन विज्ञानं, दर्शन शास्त्र में प्रवीण व्यक्ति से अधिक अपेक्षा होती है की उसका अंतःकरण अधिक समग्र और विक्सित होगा। शायद वह मन-मस्तिष्क को संकीर्ण बना देने वाली कूटनीति से मुक्त होगा और अधिक विक्सित अंतःकरण की ध्वनि के कारण न्याय, सत्य करण कर सकने में अधिक् सक्षम होगा।

  Jagdish Prakash जी अब क्योंकि आप भी साहित्य और लेखन के  विषयों में प्रवीण है , इसलिए मेरी भी आपसे अपेक्षा है की शायद आप सत्य और न्याय का समर्थन करेंगे।

Friday, January 30, 2015

भाजपा और उनके दोमुंहे तर्क

भाजपाइयों ने एक साथ दोस्ती और दुश्मनी का ऐसा ताना बाना बुन है की आम आदमी अगर इनके तर्कों को बिना अपनी अंतरात्मा के प्रयोग से सुलझाये पकड़ेगा तब वह व्यक्तिगत जीवन में एक बुद्धिहीन मनुष्य बन कर विकसित होगा।
  अधिकांश भारतीयों को भी यही समस्या है। हमारी वर्तमान संस्कृति में तर्कों का एक विचित्र ताना बाना बंधा हुआ है जिसमे जन्म ले रहे नवजात बड़े होते होते अपने अन्दर की सृजन क्षमता को खो देते हैं, अंतर्मन को नष्ट कर देते हैं, माया और भ्रम के जाल में पल-बड़ कर उनके बौद्धिक गुण ख़त्म हो चुके होते हैं।
   इस विरोधाभासी ताने बाने के अस्तित्व को हम सभी पहचानते भी हैं। इस ताने बाने को कभी तो हम लोग अपनी गंगा जमुनी सभ्यता बुलाते हैं, कभी करोड़ों देवी दवताओं वाला प्राचीन धर्म, कभी हमारी धार्मिक, संस्कृति और राष्ट्रिय विविधता , और कभी हमारा विश्व का सबसे विशाल संविधान।
   जहाँ यह विरोधाभासी ताना बाना हमारी अस्तित्व बनाये रखने का सबसे बड़ा गुण हैं, वही यही ताना-बाना हमारी बुद्धि पर पड़ा सबसे बड़ा पर्दा है जो हमे दार्शनिक रूप में विकास करने में बाँधा बन रहा है।
   भाजपा के कुछ एक विरोधाभासी हथकंडों पर धयान दें।
रामदेव के पितांजलि पीठ के उत्पादों को प्रसारित करने के लिए कितनों ही विदेशी सामानों को यह लोग विरोध करते हैं। जैसे चीप्स,  टमाटर "सौस", बर्गर, 'चिकन', कोल्ड ड्रिंक्स ,वगैरह।
मगर सत्ता में आ कर यह लोग बाकायदा U Turn मार कर 100% FDI तक जाने में नहीं चूकते हैं।
   सत्ता के बाहर रह कर इन्होने परमाणु संधि का विरोध किया , जो की संसद भवन के अन्दर इसलिए था की कुछ तकनीकी विचार अस्पष्ट थे, मगर संसद भवन के बाहर इसलिए था की राष्ट्रिय सुरक्षा अमेरिका के हाथों भेंट चढ़ जाएगी !!!! यानि नियम "अ" और नियम "नहीं-अ" का खेल एक साथ खेला था। अमेरिका से अन्दर अन्दर दुश्मनी नहीं करने की मंशा थी, मगर बाहर से देश की जनता को अमेरिका को दुश्मन क्रिस्चियन और पश्चिमी देश दिखाना था जो की हमारी राष्ट्रिय सुरक्षा और संस्कृति का शत्रु है !!!
  यह नियम"अ" -संग- नियम "नहीं-अ" वाली कार्य व्यवस्था ने हमारे देश का बेडा गर्क किया है, मगर हम इसके इलाज के लिए अभी तक तैयार नहीं है, क्योंकि भावनात्मक तौर पर हमे अपनी इस बिमारी पर फक्र करना सिखाया गया है। तमाम विविधातों के मध्य में हमने अपने न्यायायिक मापदंड भी विविध बना दिए है, जो की नहीं होना चाहिए था।
  भाजपा के दूसरे कर्मकांडों को देखें। यह मुस्लिम विरोधी गुण रखती है। मगर साथ ही इसके शीर्ष नेताओं का मुस्लिम नताओं से वैवाहिक सम्बन्ध भी है। अब कर लीजिये इनसे तर्क-वितर्क। जनाब अब चित भी इनकी है, पट्ट भी इनकी है। आप तो सिर्फ पराजित ही होने वाले है की आखिर में भाजपाइयों की मंशा है क्या ?
   भाजपाई गोडसे को भी पूजते हैं और यदा-कदा अंतर्राष्ट्रीय सभ्य समाज के संस्कारों के दबाव में गाँधी पर भी फूल चढ़ा आते है। इस तरह वह कह लेते है की भई वह गाँधी जी को भी मानते हैं।
  भाजपाई मानते हैं की पैथोगोरस थ्योरम, वायुयान, शल्य चिकत्सा ,अंतरिक्ष अनुसन्धान,और नाभिकीय ऊर्जा का अन्वेषण प्राचीन  भारतियों ने किया था। मगर वह यह स्वीकारते हैं की आधुनिक काल में यह सब ज्ञान पश्चिमी अन्वेषणकर्ताओं से ही प्राप्त हुआ है। तो इस तरह यहाँ भी भाजपाई दोमुंह हैं।
  आवश्यकता के अनुसार यह भाजपाई स्त्री को दुर्गा और शक्ति बुला देते है,और फिर रामदेव जी अपने आश्रम से पुत्रजीवक दुग्ध भी बेच लेते हैं।
  गौर करें तो आधुनिककाल के भारत की समस्या भी यही है। जब चाहा तब हाथी गणेश भगवान् बन जाता है, और अन्य समय वह एक निहत्था,बेदम जानवर है जो बंधुआ जीवन जीता है और भोजन भी नहीं खा पाता है। शेर सिंह की भी यही व्यथा है। भारत पाखण्ड का देश इन्ही दो मुंहे विचारों के चलते बना है। यही वह विचार धारा है जिसने गंगा को सब के पापों से मुक्ति दिलाने वाली धारा से तब्दील करके एक नाला में बना दिया है। विडम्बना यह है की यही भाजपा गंगा की सफाई के नाम पर हमारे वोट बटोर रही है जो शायद वास्तव में गंगा विचारधारा के मैली होने का सूत्रधार है।
   भाजपा पाकिस्तान और चीन से दुश्मनी की बातें अपने अंधभक्तों के बीच में प्रसारित करते हैं, मगर सत्ता में आने पर वही पुराना तरीका- बात-चीत और दोस्ती में ही समस्याओं का समाधान तलाशते हैं।
   इसलिए भाजपाइयों के पास तर्क नहीं, कुतर्क(sophistry) होते हैं। कुछ लोग इसे ambiguity बुलाते है, जबकि वास्तविकता में इस तर्क विद्या को sophistry बुलाया जाता है। यह कैसे भी, किसी भी वाद विवाद में आपसे तो विजयी होने ही वाले है, क्योंकि यह दोनों ही नियम, नियम "अ" और नियम "नहीं-अ" का एक साथ पालन करते हैं। मौखिक तर्क वाद में यह कब तर्क रेखा को बदल देंगे ,आपको पता भी नहीं चलेगा और आप स्वयं ही पराजित हो जायेंगे। इनके तर्कों की रेखा सीधी नहीं है। हाँ लिखित या फिर ऑडियो-विडियो रिकॉर्ड हुए रूप में जब इनकी तर्क रेखा पृष्ट पर इन्ही के हाथों दर्ज रहती है तब इनके u-turn पकड़ना आसन हो जाता है।
  भाजपाइयों की जो कमी है, वही वर्तमान काल के भारतीयों के चिंतन की कमी है। हम लोग स्पष्ट और सीधे रेखा के तर्क चिंतन वाले लोग नहीं हैं। इसलिए मौकापरस्ती के आचरण यहाँ बार बार दिखने को मिलते है।

Monday, January 26, 2015

भाजपा की 'सकारात्मकता' है क्या?

भाजपाई जिसको सकारात्मकता बुलाते हैं, और जिसे भंग कर के नकारात्मकता फैलाने का आरोप वह आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल पर लगा रहे हैं, मैं उसे Reality Distortion Field (RDF) बुलाता हूँ।
  RDF को हिंदी रूपांतरित करके मैं उसे वास्तविकता वक्रता क्षेत्र बुलाता हूँ। RDF से सम्बंधित विकिपीडिया पेज का लिंक यहाँ सलंग्न है। इस प्रत्यय को लोकप्रिय कंप्यूटर कंपनी ऐप्पल कंप्यूटर के  कर्मचारी बड ट्रिब्ब्ल ने अपने ceo स्टीव जॉब के लिए प्रयोग किया था। बड ट्रिब्ब्ल का कहना था की उन्होंने यह शब्द टीवी के प्रचलित धारावाहिक स्टार वार्स में से लिया था। बड ट्रिब्ब्ल की व्याख्या में स्टीव जॉब अपने मोहित व्यवहार, व्यक्तित्व, बड़ बोली, झूठ और गुप्प, और बाज़ार विक्रय के माध्यम से अपने इर्द गिर्द एक वास्तविकता वक्रता क्षेत्र RDF बना लेते थे, और इस क्षेत्र के प्रभाव में आने वाले लोगों को लगता था की स्टीव के लिए कुछ भी असंभव नहीं है ,इसलिए वह स्टीव पर आँख मूँद कर, एक अंधभक्त की तरह भरोसा करते थे।
    मेरे ख़याल से RDF का विवरण वैदिक युग के वरणित "माया जाल" के विचार के समतुल्य है, जिसमे साधारण, चैतन्य हीन मानव झूठ और फरेब को पहचान सकने में असफल होने लगता है और फिर वह झूठ को सच, सच को झूठ मानने लगता है। RDF के उपयोग का उदहारण: व्यापारी वर्ग अपनी दूकान की शोभा और माहौल के द्वारा दूकान में आने वाले संभावित उपभोक्ता को प्रभावित करके समान का सौदा सुनिश्चित करते हैं(Marketing)। बड ट्रिब्ब्ल का कहना था की स्टीव जॉब का RDF बहोत ही प्रबल था जिसकी वजह से वह अपने कंप्यूटर उत्पादों को बाज़ार में सफल बना लेते थे।
  एक परोक्ष नज़र में समझें तो RDF हमारे मनस्थल पर एक झूठी सकारात्मकता का पर्दा बिछाती है जिसमे की वास्तविकता हमारी मस्तिष्क की दृष्टि से ओझल हो जाती है; आशाओं का एक विश्वास मन में आता है जिसमे इंसान मृग तृष्णा को भी आशा समझने की गलती कर देता है, और अपने जीवन की/देश की समस्याओं को सुलझाने की बजाये, किसी अंधभक्ति में आ कर उन समस्याओं को भुला देने को ही उचित समाधान समझने लगता है।
   मेरी समझ से मोदी और उनके प्रचार कंपनियों ने भी अशिक्षित, चैतन्यहीन भारतियों पर इसी प्रत्यय RDF का प्रयोग करके राजनैतिक सत्ता प्राप्त करी है। RDF के द्वारा निर्मित जन आस्था के माहौल को यह लोग सकारात्मकता बुला रहे हैं । और अरविन्द केजरीवाल के असलियत को मायाजाल के पर्दों में से नग्न कर सबके सामने बार बार ले आने के प्रयासों को यह लोग नकारात्मकता बुला रहे हैं। केजरीवाल के प्रयास इनके RDF को बार बार भेद दे रहे हैं जिससे जनमानस चैतन्यवान हो कर असलियत का संज्ञान कर ले रहे हैं। इससे मोदी का RDF असफल हो जा रहा है।
  इसलिए भाजपाई केजरीवाल से दुखी है और केजरीवाल पर झूठा होने का आरोप न लगा कर नकारात्मकता फैलाने का आरोप लगा रहे हैं।

Wednesday, January 21, 2015

भाजपा समर्थक और आप पार्टी समर्थकों के चरित्र में क्या क्या अंतर हैं ?

भाजपा समर्थकों और आम आदमी पार्टी के समर्थकों के मध्य का बौद्धिक और भावनात्मक अंतर किसी औपचारिक अध्ययन के लिए रुचिकर विषय बन सकता है।
   मानव संसाधन के क्षेत्र में इन दोनों राजनैतिक पक्षों का दृष्टिकोण भिन्न भिन्न व्यवहार के प्रवहत करेगा, और दोनों पक्षों के समर्थक अपने व्यक्तिगत जीवन में अलग अलग किस्म के नेत्रित्व और कर्मचारी व्यवहार का प्रदर्शन करेंगे।
    इस लेख का उद्देश्य इसी मानव संसाधन और प्रबंधन के क्षेत्र में एक चर्चा को आरम्भ करने का हैं।
   भाजपा के समर्थक अधिकाँश तौर पर परम्परागत सामंतवादी मानसिकता वाले लोग हैं जिनका मानना है की समाज पर सही और गलत दिशा निर्देशित सिर्फ डंडे के बल पर ही किया जा सकता है। हालाँकि यह प्रजातंत्र की प्रसिद्धि से अवगत हैं ,और इस कारण यह स्वयं को प्रजन्तान्त्रिक घोषित करने में कोई कौतुही नहीं बरतते, मगर अपने व्यवहार में यह सामंतवादी, "अनुशासन कारी", "सम्मान-संवेदित" लोग हैं जो की प्रजातंत्र के गुणों का पालन कतई नहीं करते हैं। वाद विवाद, बहस ,शास्त्रार्थ से तो यह कन्नी काटने वाले लीग हैं।
  मोदी और बेदी के व्यवहारों में इस विचार के प्रमाण खूब साक्षात होते हैं। मोदी जी ने विदेशी दौरों में अधिक समय व्यतीत किया है और संसद भवन में उपस्थिति बहोत न्यूनतम हैं। ठीक यही हाल उनके गृह राज्य गुजरात की विधान सभा का है, जो की वार्षिक उपस्थिति में समूचे देश में सबसे खस्ताहाल है। मोदी का खुद का किसी भी संसदीय विचार विमर्श अथवा डिबेट में प्रतिभाग सबसे खराब हैं।
   प्रजातंत्र तो बना ही है शास्त्रार्थ और डिबेट के माध्यम से चलने के लिए। संसद भवन जो की किसी भी प्रजातंत्र का मंदिर माना जाता है, उसका उद्देश्य ही है की वह स्थान बने जहाँ पर निति निर्माण से सम्बंधित विचार विमर्श और डिबेट्स करी जा सकें। अब अगर यह लोग डिबेट्स और चिंतन वार्ता से ही भागते है तब यह प्रजन्तंत्र के कैसे संचालित करेंगे ??
  इस पहेली का उत्तर यही है की भाजपा समर्थक लोग प्रजन्तंत्र को मात्र एक ढोंग करके ही चला रहे है जो की वास्तव में तानाशाही और मनमौजी गिरी है।
   संसद को न चलने देने का आपसी दोषारोपण दोनों में से किसी को दोषमुक्त नहीं कर सकता है। भाजपा ने अपने विपक्ष के कार्यकाल के दौरान कोई अच्छा व्यवहार नहीं किया था। और अभी आज कल तो नेता विपक्ष कोई है ही नहीं। अल्पमत पक्षों के हल्ले शोरगुल से दीर्घमत पक्ष के हितों की अवहेलना कतई भी संसदीय बहस को नज़रअंदाज़ कर देने का कारण मानी जा सकती है। आर्डिनेंस (राष्ट्रपति अध्यादेश) के रास्ता हमारे प्रजातंत्र के पतन और नष्ट होने का प्रमाण है। यह वस्तुतः एक आपातकालीन परिस्थिति के समान हैं।
   गौर करने की बात है की भाजपा की सरकार के कार्यकाल में यही सब हो रहा है। इससे हमें भाजपा और उसके समर्थकों के मानव संसाधन कौशल का पता चलता है।

दूसरा विषय होगा - न्याय और प्रमाण परिक्षण की योग्यता। भाजपा में वकीलों की कोई कमी नहीं है, मगर इसमें से एक भी जनहित कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता है। अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद तो खुद कॉर्पोरेट वकील रहे है जो की आजीवन बड़े औद्योगिक घरानों के हितों की रक्षा के लिए जाने गए हैं। वही से इन वकीलों ने अपनी व्यक्तिगत पूँजी बनाई है, और यदि आम आदमी पार्टी के खुलासों का विश्वास करें तो रविशंकर प्रसाद तो संसद सदस्य बनने के बाद भी रिलायंस घराने के हितों के लिए काम कर रहे थे, जिसके लिए उनकों भुगतान भी प्राप्त था।
  भाजपा समर्थकों ने कंप्यूटर तकनीक के माध्यम से सोशल मीडिया में मिथ्या और भ्रम की जानकारी को भर दिया है। ऐसा करने का उद्देश्य संभवतः साधारण नागरिक, जो की वैधानिक विषयों में इतने प्रवीण नहीं होते हैं, वह सही और प्रमाणित जानकारी से गुमराह रहे और मतदान सम्बंधित उचित निर्णय न ले सकें।
  इसके मुकाबले आम आदमी पार्टी तो निर्भर ही rti कार्यकताओं पर है और जनहित प्रवक्ता इस पार्टी की रीढ़ हैं। आप पार्टी के समर्थकों में प्रमाण परीक्षण की योग्यता भाजपा समर्थकों से बेहतर है। वह निष्कर्ष, निर्णय और न्याय में अधिक प्रवीण है। वह अधिक चिंतनशील है। उनके न्याय अधिक स्थिर है, uniform तथा दीर्घकाल में समान बने रहते हैं। आप समर्थक दार्शनिक गुणों के द्वारा प्रत्ययों में समानता और भिन्नता कर सकने में अधिक कुशल हैं। संक्षेप में कहे तब आप समर्थकों में बौद्धिकता, मानवता और इन सब का केन्द्रीय गुण -अंतरध्वनि - अधिक विक्सित है।
   भाजपा समर्थक लोग अपने द्विअर्थी न्याय को अपनी चपलता के माध्यम से छिपाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। इसलिए वह मनोरंजन, हास्य, उपहास परिहास का अधिक प्रयोग करते दिखेंगे। अधिकाँश भाजपा समर्थक वह लोग है जो की भारत के अविकसित सामाजिक न्याय के वातावरण में जन्मे ,इसके दोषों से परिपूर्ण लोग हैं। उनको पता ही नहीं है की उनके अपने व्यवहारों में अपने वातावरण में से संक्रमित क्या क्या दोष हैं।
   अधिकाँश भाजपा समर्थकों को यदि हम कोई प्रमाणिक कार्यपत्र(दस्तावेज़) दें तब वह इस प्रमाण की सत्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते नज़र आएंगे। यानि 'प्रमाण की प्रमाणिकत' को सुलझा न सकना इनकी सबसे प्रथम न्यायायिक असक्षमता ,अयोग्यता है। भाजपा समर्थक लोग सामाजिक विश्वास के संग्रहकर्ता (respository of public trust) जैसे विचारों को समझने में अयोग्य हैं। इसलिए यह न्यायायिक क्रिया को "प्रमाण की प्रमाणिकता" की दिशा में ले जाकर अंत में अन्याय को विजयी करा देते हैं। यह एक सुव्यवस्थित समाज का निर्माण अथवा प्रयास कभी भी नहीं करने वाले लोग हैं। बदले में यह सिर्फ मृगतृष्णा या द्विःस्वप्न के माध्यम से ही समाज को दिशा नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। वास्तविकता वक्रता क्षेत्र (reality distortion field) के उपयोग से यह जनमानस के अंतरमन को भ्रमित रखने में विश्वास करते हैं।

  

Tuesday, January 20, 2015

How Kiran Bedi is acting to exploit the lack of logical thinking among Indians

Kiran Bedi has called for a public debate with Arvind Kejriwal.

Kiran does not have anything new , any other point which the BJP Supporters have constantly been cross-accusing Kejriwal, in order to save their economic interests which are fulfilled through the culture of corruption prevailing in the administration. The political saving can only be brought about when Kejriwal is defeated , hence they need to engage him such without looking to be corrupt themselves.
   Thankfully the train of human reason provides enough shunting points where the clarity can be obscured, obfuscation of information achieved.
  Arguments between the right and the wrong can be confused out if the mental abilities are suppressed and degraded. If people can be confused on how much similar is the colour Pink from the Red, and how much different are they othwrwise, where which colour can be suited-- the Corruption has found its heaven just over there.
   It is the same situation which now prevails between Kiran and Arvind.
Kiran is accusing Arvind of those standard charges which the BJP supporters have been leveling against him:
1) Arvind "colluded" with the Congress to form his 49day Government.
2) Arvind went political by founding the AAP, which Anna did not want.
3) Arvind retracted on his no-bunglow promise and too up the Government accommodation.
4) Arvind did not do anything against Shiela Dixit.

It is in these charged that a Pakistan-like "state of denial" has been adopted by Kiran and alike, with the sure motive of preserving the economic interest served by the Corruption.

The answers to the above issues have been standard and quite well understood , and yet these questions have been repeatedly harnessed by the  BJP team in order to defeat the mission of the crusaders.
   Yes, the vocabulary, Hindi or English,whatever, have also been slightly guilty for not having provided the accurate words for differentiating between various concepts that Kiran and Arvind's team wanted to train against each other.
  One such case has been that of the "U -Turn" , where appar
ently everybody, Kiran and Arvind both can be factually accuses of having taken a U-Turn, of walking back on their own words. Often, the debates have then drifted away into quarrelling "you did it first", in order to justify and resolve the tangle of "U-Turns".
    Methodically speaking, U-Turns are not always something sinister that the species of humanity should seek to avoid. U-Turns are important for correcting up oneself, but must not be over exploited so as to lose away the homogeneity and uniformity essential to the establishment of the Justice.
   The "wrong-side-driving" is one type of U-Turn which should be avoided for the reasons so obvious.
  This fundamental, philosophical nuances is essential to be present in the mases in order that they make the right and appropriate choice.
  Or else, we shall never see a  solution of differentiating 4BHK apartment from a posh Lutyen Buglow which the politicians convert into personal property from the public money.
  An intellectually dumb public is the most essential need for the corrupt to thrive, and all that the corrupt need to do is to pamper the idiot masses and assure them of their "smartness and intelligence" , past or present, in order to both, win away their sympathy, as well as keeping them off from investing their brains to realize how exactly are they being exploited.

Sunday, January 11, 2015

Prohibition on tipping is not meant to say that tipping is illegal.

Dear A###,
I don't know whether you will take it in kind sense or not, but i really wish to enlighten you and the world about Tipping and the Bribery , and that it is Bribery which is fundamentally hurting to the society, not the tipping.
  The laws pertaining to 'prohibition' on tipping are basically the bye-laws ( e.g. 'circular", departmental orders) but nothing of a statutory laws passed by any Parliamentary body, which are the law of the land.
   Bye-laws or even the Parliamentary laws can be contested, as the need arrive, if somebody is being wronged because of such a law. As an employee of a any organization, our submission to such a law is NOT the ultimate proof of legitimacy of the bye- laws. People accept the submission for economic compulsions as well. Therefore if a bye-law to which we have otherwise given ascent troubles us,we can challenge it.
  This  above theory is meant to say that Tipping cannot be reasoned to be unlawful merely by citation of a Bye-law imposing a prohibition order on the activity. The ultimate test of the legitimacy of a bye-law , as logically apparent now, cannot be the one-way circulation of the statement ! The people who are being subjected to it must give a free-will consent .
   The reason why Prohibition of Tipping could never become a statutory law is that People never gave consent to it ! And this happened plainly because ,in my thinking, tipping is a part of Human Expressions -and therefore liable for protection under the constitutional guarantee of freedom of speech and expression.
How?
We will examine this hereunder -
In your own life experiences consider the situations:
1) A peak cap or a key ring along with printed paper bags being given by many of Naval vessels to visiting Pilots.
2) Passenger ships honking the whistle to celebrate the arrival or departure of pilots and also complimenting them.
3) Vessels on maiden voyages, calling the port complimenting the pilots.
From the experience of master and mate of ships, recall the times
4) Relief on masters face when approaching a port ,when the Pilot boards the vessel
5) Relief when Master Pilot relationship is executed well and ship is berthed without hiccups or any objection being raised from the Pilots.
6) Expression when Pilot calls to inform to change draft, trim or immersion conditions, or the state of readiness.
7) Expression when the vessel suffers dents or damages during berthing ,due to pilot error or when inadequate fenders.
Other life experience about why humans like to reward a good work and punish a bad job - effectively reward or punishment a part of human expression.
Do you think reward be held back on the argument that "it was pilot's duty, we have paid the pilotage charges".
As a master standing a pilotage ,have we never felt the necessity of personalization of duty, of how pilot error can STILL damage the job and the livelihood of the master from his company ??
  We have experience that even if by pilot error of navigation, a master's own job continues to be a personal risk from his company.
   Vigilance department is a non-revenue making burden on an organization, born from social necessity to curb corruption. Corruption is typically bribery, but not tipping. This difference is same a that between Rape and Consensual sex.
   Thus,            Bribery: Tipping    :   Rape :Consensual Sex
Free-will makes all the difference.
Bribery is what is to be prevented, not the Tipping as a whole.
The reason why any form of exchange is sought to be stopped by the Vigilance Department is that Tipping has the potential to provide that obfuscation cover of legitimacy to shield the Bribery.
    Note that this theory says that Tipping per se is not illegal, but it is stopped only because is can give assistance to let the other illegal thing to happen- the bribery.
People all over the world use tipping as a part of human expression. A taxi driver dropping us with care in the dead of night, a waiter in a hotel serving us with humility and promptness- they all deserve personal rewards - not the expression of "its your duty,your service charged is paid".
Indeed this behavior is that typical Communist or Socialist conduct where business are all owned by the state , and people are trained to work lifelessly,with no motivation, towards no personal goal !!
Therefore, I insist that to NOT TO GIVE TIP ON BEING SERVED WELL is that Despicable Communist behaviour which so badly characterizes Communism.
  You need to kill your free-will for both -- to not to give a tip,and to do a job without an expectation of motivation in the form of personalized reward.
  The challenge of the vigilance department is that there is no objective means of ascertaining whether a given exchange is a tip or a bribe. It assumes that "therefore, as a blanket ban policy, lets us make all the exchanges to be illegal- including tipping".
  Further, the accounts department can make a claim that even the personal receipts by person of free-lance working, can be shown to come through the grace of service with the company. Hence,he must deposit it to the company.
  Recall the case of how PM Mr Modi's receipt of shawl for his mother by the Pakistani PM still made way into the news, (not treated a private exchange), and also recall how ex President Mrs Pratibha Patil was told by the Rashtrapati Bhavan to return back all the souvenir and mementos she had received during her term of presidency. Yet, both, the shawl of Modi's mother AND some of the gifts received by Mrs Patil, were allowed to be personally kept.
 
Therefore the above claims of the accounts or the vigilance department cannot become ground for the state to detain all the private exchanges. Indeed there MUST exist a legitimate path, say for example, that people make a declaration of the receipts and pay the taxes,as stipulated or so before personally acquiring the gifts.
   In theory,if something can Still be proven to come by free-will ,not by any forceful extortion then it MUST be treated as a tip,not a bribe. Thus, A blanket-ban policy of Vigilance Department canbe and must be challenged whenever the need arrives.
         Pilot services is one example of service which can avail of this argument. Since the historical times, a ship master's personalized dependence on the service of a harbour pilot when making a port call is well known and documented. The naval vessels therefore officially still carry the tradition, as do all the other merchant ships.
  We being the ex ship masters ,and now a pilot must stand up to the tradition and also the logical and the professional judgement which are involved to justify this exchange.
Surely, the Vigilance or the Finance department will not understand it ,unless we stand up to make them know. The delicacy of Master-Pilot relationship even to this day is same critical as it was the days of yore.
Legally, a master is always the commander of the ship, while he  is also bound to work on the advise of a Pilot. This aspect of laws of the sea even to this day makes the position of Master stuck in the  doldrums.
  
     Like Sierra was saying, Tipping cannot be proven to be a forceful extortion of bribe merely by the fact that tugs are tied to the vessel. If that really were so, then even the shawl received by Prime Minister Mr Modi can be accused of being a bribe on the pretext that India is Nuclear Armed and probably threatened Pakistani PM Mr Shariff into giving away that Shawl !!!
!!!
You will notice that there has to be a sense of proportion between what is being given as a tip,and what is a bribe. Can somebody use the power of cannons only to extort an Icecream ?
Such accusation of use of force are too random and weird to settle the case. It may be true that one pilot may attempt to "extort" from a master, but in general it is less frequent to see a pilot resorting to sabotage the hull and machinery of ship . If such actions are happening, then non-seafaring mentality have taken over the piloting works which is a problem and failure of the personnel department. Such accusation will need hard evidence, and even tougher punishment if proven to be true.
  To delay a ship is much different than putting to physical risk the whole business as well as the life of ship's crew. It is virtually a case of attempt to murder.
 
Nevertheless, between tipping and bribery, the two closely overlapping activities, one is protected human behavior while the other is socially regressive. While we need to check one, the other must be safeguarded as it works in line with the freewill and other forces of nature.