Monday, October 20, 2014

अंतःकरण, आदर्शवाद और बुद्धिमता गुणांक(IQ)

बिना सिद्धांतों के करी जा रही राजनीति के लिए सही शब्द कूटनीति है।
कूट का अर्थ है छल, भ्रम, धोखा

आखिर कूटनीति का मानव मनोविज्ञान पर क्या असर पड़ता है?
   दीर्घ अवधि में कूटनीति के प्रभाव में रहने से शायद मानव समाज की नैतिकता की व्यापक बुद्धि ही नष्ट हो जाने लगती है। गहराई में समझें तो नैतिकता की बुद्धिमत्ता का नाश कूटनीति का परिणाम नहीं बल्कि मानव स्वभाव का तरल और वातावरण के मुताबिक ढल जाने वाली क्षमता का परिणाम होता है।
   जब मनुष्य बहोत लंबे काल तक अन्याय  और अनैतिकता को विजयी होते, शासन सम्बद्ध होते देखता है, तब वह उस अनैतिकता को ही उचित धर्म, नैतिकता का स्थान दे देता है। इसके लिए वह "व्यवहारिकता", "practical", जैसे न्यायोचित करने वाले शब्द विचार विकसित कर लेता है।
   यह वह हालात है जब असामाजिकता का व्यवहार समाज की मर्यादा बन जाती है। रामचंद्र जी बस पूजा अर्चना का बहाना बन जाते है, जबकि वास्तविक आचरण में इनको प्रेरणा का स्रोत नहीं माना जाता है। अब पाखण्ड सफलता का मार्ग होता है।
   लम्बे युगों में गुलामी और विपरीत बोधक परिस्थितियों से गुज़री भारतीय संस्कृति ऐसे ही विकृतियों का शिकार हो चुकी है जहाँ कई सारे असामाजिक ,और अमर्यादित आचरण अब "व्यवहारिकता" का नाम से प्रचलन में हैं। आज यही व्यवहार "संस्कृति" के निर्धारण के पैमाने बने हुए हैं।
   इस प्रकार के अमर्यादित आचरण में मनुष्य के अंतःकरण भ्रम से नष्ट हो चुका होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उचित आदर्श नाम के आचरण रखने वाले लोग समाज में न के बराबर होते है, और यदि होते भी है तो वह व्यंगोक्ति , तिरस्कार, काल्पनिक लघु हास्य के माध्यम से जग-हँसाई के पात्र बना दिए जाते हैं।
  "व्यवहारिक" मानसिकता वाले लोगों का अंतःकरण श्याम-श्वेत वर्ण (either-black-or-white)में ही निर्णय और न्याय करता है।" Secularism में भी या तो आप बहुसंख्यकों के साथ है, अन्यथा आप अल्प-संख्यकों के साथ है"। Secularism का स्पष्ट संतुलित अर्थ समझ सकने में विकृत अंतःकरण ने बुद्धि का नाश कर दिया है।

  'व्यवहारिकता' का यह आचरण कुछ ऐसे है जैसे की मानो रसायनशास्त्र में हम भिन्न-भिन्न गैसों की तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास कर रहे है मगर अभी तक हमने आदर्श गैस के आचरण को ही नहीं विकसित किया है। मस्तिष्क श्याम और श्वेत वर्ण प्रवृत्ति में गैसों की आपसी तुलना कर रहा हो, मगर किसी स्पष्ट निष्कर्ष में नहीं पहुँच पा रहा है। अब मस्तिष्क और अत्यधिक क्रोधित होता है, और तीव्र मत-विभाजन से गुज़र रहा हो।

बौद्धिक गुणांक(IQ) किसी दो विचार,प्रत्यय(Concepts) के बीच तुलनात्मक अध्ययन की क्रिया है। इसी को विश्लेषण बुद्धि (discerning behaviour) भी बोलते हैं। मगर IQ मात्र किन्ही दो प्रत्यय के मध्य समानताएं(similarities) और विषमताएं(differences) खोज निकलने तक सीमित नहीं हैं। IQ वह क्षमता है जिसमे यह न्याय भी करा जा सके की किन्हें समानता मानना है और किन्हें अंतर। दूसरे शब्दों में, IQ को विशाल बनाने के लिए rule और exception का न्याय करने के पैमाने विक्सित करने की आवश्यकता होती है। यहाँ हमें आवश्यकता होगी किसी सैद्धांतिक आदर्श पैमाने की-- जिससे तुलना कर के हम rule और exception के पैमाने बना पाएं। और फिर similarities और differences के सही न्याय कर सकें।
   
     अत्यधिक कूटनीति हमारे समाज में व्याप्त अन्याय का परिणाम है, और इस कूटनीति ने नैतिकता को विस्थापित कर दिया है। इसके नतीजे में आज हम लोग और अधिक कूटनीति ही कर रहे है ,अंतःकरण की ध्वनि को अनसुना कर दे रहे हैं। अंतःकरण को अनसुना करने से आदर्श और सिद्धांतों का अन्वेषण नहीं हो रहा है। हम आपसी समानताओं को नहीं दूंढ़ पा रहे हैं, क्योंकि हम आदर्श तथा सिद्धांत का अन्वेषण नहीं कर रहे हैं। समाज और अधिक मत-विभाजन की क्रिया से गुज़र रहा है। इसका परिणाम है कि हम एक टूटते, पतन की और जाते देश बन गए है , और धर्म को किसी और पंथ से घृणा करने में दूंढ़ने लग गए है। 'राष्ट्र' को हम किसी बहारी आक्रमण से रक्षा करने वाला इलाका समझते हैं; राष्ट्र से हमारा अभिप्राय आपसी विचारे से , एक नैतिकता और एक न्याय सूत्र से बंधा समाज नहीं है।
  अंतःकरण को अनसुना करने का दूसरा परिणाम यह है की हम आदर्श पैमाना की खोज भी नहीं कर सक रहे हैं। तब हम मूर्खों का समाज बन गए है जो की श्याम-अथवा-श्वेत वर्ण की मानसिक क्षमता के चलते बौद्धिक अयोग्य, 'मुर्ख' बन गया है।
   श्याम-अथवा-श्वेत वर्ण मानसिक क्षमता का मनुष्य एक प्रसिद्द मिथक कथा हनुमानजी और शनि भगवान् के मध्य घटे हास्यास्पद व्यवहार के समान है।  इस मनुष्य का प्रतिक्रियात्मक आचरण है, जिसमें स्वयं का अंतःकरण के प्रयोग नहीं किया गया है। इसलिए संभावित खतरों के ध्वस्त करने के लिए किया गया हर प्रयास असफल हो जाता है।
  शनि भगवान् ने हनुमान जी को चेतवानी दी थी कि शनिवार के दिन वह हनुमान जी पर सवार होंगे। हनुमानजी भगवान् शनि के कथन को ध्वस्त करने के लिए शनिवार के दिन प्रातः से ही अपने दोनों पैर पटखने लगते है कि अगर वह पहले से ही चालित रहेंगे तब भगवान् शनि को उनपर सवार होने का मौका ही नहीं मिलगा। भगवान शनि हनुमानजी की यह पैर पटखने वाली हालत देख कर मुस्करा कर चले जाते है कि यही हनुमान जी का यही आचरण भगवान् शनि द्वारा सवारी किये जाने वाला आचरण है।
  यानि प्रतिक्रिय में किया गया आचरण भी उतना ही असफल होता है, जितना की पूर्व-चेतावनी में घोषित हुआ था। अर्थात, पूर्ण-चेतावनी स्वतःस्फूर्त हो जाती है। यह निम्म IQ होने का परिणाम हैं। यह निम्म IQ आदर्श और सिद्धांतों के अभाव से उत्पन्न हुआ, और जो स्वयं अंतःकरण की ध्वनि को बारबार अनसुना करने का नतीजा है।
   भारतीयों की वर्तमान पीड़ी ऐसे ही हालत से गुज़र रही है। हम अपने ही समाज के लिए एक खतरा उत्पन्न कर रहे हैं। IQ के निम्म होने की वजह से यह खतरे स्वतःस्फूर्त हो जायेंगे।

Tuesday, October 14, 2014

Political Class has usurped all the powers in Indian Democracy

yup! thanks for this search, Rajeev Jassal, brother.
Media manipulation is serious problem in India.
Also, it was during this statement times when the Parliament Members shouted about how the Parliament is the supreme body in India above all else ! I made a quest into the actual answer and chanced upon the knowledge that Parliamentary powers can nevver be balanced in a political system as India - which practices DEMOCRACY alongside REPUBLICANISM !!
In its origin, Parliament was a representative of the common man, as what Kejriwal described Parliament to be in relation to Anna, and was designed to balance the powers the sovereign , which is the President( 'president' is someone who preceded the "Residents".Thus, in a true democracy,  Anna Hazaare is a RESIDENT , who become equal to his PRESIDENT by the introduction of one Institution called the Parliament. Parliament is thus only a representative body, and therefore can IT CAN NEVER be ABOVE OR MORE SUPREME than whom it PRESENTS.)

      But in a political system as Republicanism, the truth is that President powers are not merely BALANCED , but actually FULLY USURPED by the PARLIAMENT GUYS , in that they not only appoint him as that President guy comes from within the politicians class mostly(or atleast in the pleasure of the politician class), NOT DIRECTLY FROM THE PEOPLE !!
 
    the result is that the political party which controls the PARLIAMENT, i.e. the majoritarian party, is the real **owner** of India, and that the POLITICAL CLASS IS THE THE SUPREME LORD OF INDIA, against all other class of people INCLUDING THE COMMON MAN !!
 
     Hence, Indian Democracy is a SHAM , which is actually about choosing which guy you want as a POLITICIAN, further from whence,  He is the MASTERS AND OWNERS OF this COUNTRY which we call India.

Being Politicians CLASS  , he controls Police , CBI , Military, Presidency , Judiciary, All the executive offices ( aka Ministries) , and so on.

Thus India is in the hands of Political Class, lying enslaved and abused , awaiting a second Independence movement to set her free.

Sunday, October 12, 2014

न्यू यॉर्क टाइम्स लेख का हिंदी अनुवाद- भावनात्मक उत्तेजना से अनुवाद और उच्चारण में उत्पन्न भ्रम की घटना

प्रभावशाली अमेरिकी समाचारपत्र 'न्यू यॉर्क टाइम्स' द्वारा 8 अक्टूबर को प्रकाशित किये गए एक लेख जिसका शीर्ष था "भारतीय छात्रों के लिए एक असत्यवान शिक्षा पाठ्यक्रम" (False teachings for Indian students) का भाजपा समर्थकों ने हिंदी अनुवाद के दौरान अर्थ-का-अनर्थ कर डाला है। भाजपा समर्थकों के अनुवाद को पढ़ कर सोशल मीडिया (वह्ट्स अप्प इत्यादि) पर प्रचलित एक लघु-हास स्मरण आता है जिसमे लालू प्रसाद जी को माइक्रोसॉफ्ट के निदेशक बिल गेट्स द्वारा नौकरी के लिए अस्वीकृती पत्राचार जाता है। मगर अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में लालू जी पूरा अर्थ का अनर्थ करके उस पत्र को अपने सम्मान में प्रतिष्ठी पत्र उच्चारण में पढ़ डालते हैं।

   कभी कभी मुझे लगता है की भारतियों की एक पीड़ी इसी अंग्रेजी-से-हिंदी अनुवाद में ही मानसिक रूप से कमज़ोर कर दी गयी है। भाषा सम्बंधित सक्षमता मानसिक विकास का सबसे महतवपूर्ण पहलू है। मगर अंग्रेजी बोलने और सिखाने के सामाजिक प्रतिष्ठा चलन में हम भारतीय अपने नन्हे मुन्ने बच्चों से एक भावनाहीन अंग्रेजी में बातचीत करके उनमे भाषा-संग -भावना का सम्पूर्ण विकास होने में अवरोध कर दे रहे हैं।
   प्रत्येक भाषा में पर्यायवाची शब्दों में से उपयोग के लिए चुना शब्द वाचक की भावना और अर्थ को प्रदर्शित करता है। मगर जब बच्चों में भाषा-और-भावना का बौधिक ज्ञान ही विक्सित नहीं होगा तब ऐसे ही अर्थ के अनर्थ होते रहेंगे। और फिर किसी एक देश की बड़ी आबादी मुर्ख हो जाएगी -अपने मानसिक विकास में। यहाँ हमें भाषा में दिए गए सुझाव के शब्द एक आदेश सुनाई पड़ेंगे, सचेत करने के प्रयास में प्रयोग शब्द हमें एक प्रेरणा सुनाई देंगे , और घटना का तथ्यिक वर्णन के लेख हमे घटना के सम्मान में लिखे शब्द सुनाई देंगे। इस विकास-अवरोधित पीडी के व्यक्ति शायद कुछ प्रथम क्ष्रेणी प्रत्यय (trivia) और चतुर्थ श्रेणी प्रत्यय (quadrivia) के कुछ भी अर्थ नहीं निकाल पाएंगे। इस पीडी के व्यक्तियों के लिए ट्रिविया और क्वाद्रिविया मात्र 'मज़े के लिए बोली गयी फिजूल की बात' हो जायेंगे।
     भाषा अनुवाद के मध्य में पैदा हुआ भ्रम हमारे अंतःकरण पर प्रभाव छोड़ेगा और हमारे अंतःकरण को निष्पक्षता और निर्मोह से न्याय करने में अपांग बना देगा।
   
   भाजपा के समर्थको ने न्यू यॉर्क टाइम्स के लेख को अमेरिका के 'वैमनस्य से जनित भय' (prejudiced fear, jealousy, envy) के रूप में उच्चारित करा है, जबकि लेख 'चेतावनी की भाषा शैली'(Caution, fore warning) में है और तकनिकी सिद्धांतों (technically sound reasons) के आधार अपना विचार प्रस्तुत कर रहा है। एक आम भारतीय नागरिक भाजपा के उच्चारण को पढ़ कर अमेरिका से आक्रोशित महसूस करेगा कि अमेरिका उसके देश के साथ नाइंसाफी कर रहा है , उसके देश के गौरवशाली इतिहास को मान्यता नहीं दे रहा है, इतिहास को मिथक कथा मान रहा हैं। आम नागरिक भाजपा के करनियाँ, जिसकी चेतावनी इस लेख में दी गयी है, से गौरान्वित महसूस करेगा कि सिर्फ भाजपा ही उसके देश और गौरवशाली इतिहास को दुबारा प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रही है।

बरहाल, न्यू यॉर्क टाइम्स के लेख false education for Indian Students के उचित हिंदी अनुवाद का मेरा एक प्रयास में यहाँ नीचे लिख है :-

Monday, October 06, 2014

स्वच्छता अभियान, भ्रष्टाचार और अस्वच्छता के संस्थागत निवारण की असफलता

जनता जब किसी सामाजिक आवश्यकता/उद्देश्य की निरंस्तर पूर्ती के लिए प्रेरित होती है, तब ही वह संस्थाओं का निर्माण प्रसाशन द्वारा करवाती है।
   उदहारण के लिय शहरों और नगरों की भौतिक साफ़-सफाई का सामाजिक उद्देश्य को लीजिये।
  जब गन्दगी का पारा जनता की बर्दाश्त के ऊपर चढ़ गया तब एक दिन जनता ने "प्रेरित"(असल में क्रोध से क्रियान्वित हो कर) झाडू खुद ही उठा कर साफ़ सफाई कर डाली।
  पर क्या वह रोजाना ऐसा कर सकती है? क्या यह सफाई हमेशा के लिए टिकेगी?
  नहीं। यदि हम रोज़ खुद ही सडकों और सार्वजनिक स्थलों को झाडू मार सकते तो पहले ही कर रहे होते,"प्रेरित" होने का इंतज़ार ही क्यों करते ??
  तब फिर उस एक दिन झाडू चलाने से प्राप्त क्या हुआ,जब अगले दिन से हालात फिर से वही हो जाने हैं?
यहाँ पर विचार आता है "संस्था गत" कार्य पूर्ती करने का। अब समझ में आता है कि 'संस्था' क्या है और क्यों बनाई जाती है।

    किसी भी सामाजिक उद्देश्य की *निरंतर पूर्ती* के लिए कार्य को व्यक्तिगत न करके, एक संस्था द्वारा करवाया जाता है। संस्थान एक संवैधानिक अथवा विधि-विधान द्वारा निर्मित होती है और इनकी आयु "निरंतर" होती है जब तक की विधान इनको स्वयं नष्ट न करे।

कूटनीति में जब भ्रष्टाचार अधिक बढ़ जाता है तब यह संस्थान अक्सर करके अपने सामाजिक उद्देश्य की पूर्ती में असफल होने लगते हैं। इनकों मुहैया धन तो व्यक्तिगत खातों में तब्दील कर दिया जाता है। तब संस्थान के उद्देश्य पूर्ती के लिए धन ही कहाँ बचेगा की कर्मचारियों के कार्यणी आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जा सके।
  फिर चतुर कूट नेता(धूर्त नेता, जो जनता को बुद्धू बनाने में अव्वल हों) इसका समाधान कैसे करते है? वह जनता की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए और भ्रष्टाचार से ध्यान विकेन्द्रित करने के लिए फिर से एक अभियान आरम्भ करते है ,कि मानो उद्देश्य पूर्ती पहले वाले संस्था के प्रयास से नहीं हुआ तो क्या, अब नए नेता जी के आने से हो जायेगा।(शायद इसी धूर्त बनाने में नए-नए अव्वल आये नेता जी को "देश में नया जोश आया है" कह कर समाचारपत्रों में जताया जाता है)

आइये, स्वच्छता के सामाजिक उद्देश्य का संस्थागत निवारण को समझते है।
  अतीत में नगरपालिका आदि का निर्माण इसी मकसद से हुआ था की शहर की स्वच्छता के निरंतर पूर्ती यह संस्था करेगी। मगर जब नगरपालिका असफल हो रही है तब क्या किया धूर्त नेताओं ने? 
  एक नया अभियान पुनःआरम्भ कर दिए।
  क्यों?
     स्पष्ट तार्किक निष्कर्ष में भ्रष्टाचार से उत्पन्न असफलता को छिपाने के लिए।
कैसे?
धन की आपूर्ति हमेशा ही कम दिखाई जाती है, संस्थान की आवश्यकता है। जबकि संस्थान का बजट प्रतिवर्ष बढ़ता ही रहता है। यदि आडिट(सर्वेक्षण) हो तब पता चलेगा कि धन व्यय आखिर में हुआ किस उद्देश्य की पूर्ती में।
कूट क्रिया में अंत में संस्थान की असफलता का कारक जनता को ही दिखाया जाता है कि जनता ही इतनी गन्दगी करती है कि इतने से धन में सफाई संभव नहीं है।
   श्रंखला एक से जुड़ का दूसरी संस्था तक चली जाती है और फिर मूल असफलता का असल कारक -भ्रष्टाचार - ओझल हो लेता है जन जागृति से।
  

Saturday, October 04, 2014

Educated people and Modern politics

Success of a government in the dynamics of modern politics is most difficult to judge by stringent objective standards, unless it is clear cut pro-people policial reform which has been long pending.
Countries like India have a big roll of the reforms which are long pending lying in the basement of the government complexes, eating dust. Political parties come and go, without making slightest of move on them and yet they manage to convince the people of having performed. It can happen because the people are themselves what their country needs. The political parties can, then, enjoy the powers turn-by-turn without having to bother themselves.
  Education is a pathway to higher conscience, yet not a guarantee of it. Politicians manage to convince educated lot of their "vision", their "achievements", their "performance" by showcasing fulfillment of certain bureaucratic works to these Educated-but-Conscience-less people.
This becomes the success of a government until the "anti-incumbency wave" washes them over.
In deep, anti-incumbency feeling is that weakness of the people which the political parties which purposefully and habitually deny the pro-people reforms, enjoy. Anti-Incumbency is that weakness of the electorate when they have no where to go; when they are caught between the devil and the deep.
   So that's how the modern Democratic Politics runs, eventually making the choices of the politicians ,the only right.
No one can and no should resist it ,even if you despise this situation because-
- Educated people have made these choices.

Competence or Congeniality - pick your choice ?

Competence comes at the expense of Congeniality. Competence has to dispel many of the views which come from the near and dear ones. That's in the nature of Justice. Isn't this one of the reasons why the Goddess of Justice is kept blindfolded.
In the same thought, Competitive Thoughts have to transcend the barriers of mutual affection so to blossom out.
  People habituated of the dual justice which they learn from local, immoral vernacular sayings such as "सांप भी मर जाये, लाठी भी न टूटे"(to achieve opposing targets in the same strike), will ofcourse not like the method and approach path of the better competence. Better competence often times makes no compromises. It makes a direct and straight hitnto kill the snake. 
     Therefore,  many a time people might misjudge the better Competence to be an 'inferior class' on the basis of its discongenial behavioral pattern.
     But the truth of nature is that Competence has very regularly featured itself in an discongenial robe.
       Famous novel "A brief history of Time" by Stephen Hawkings has a chapter dedicated to describing the inter-personal relations which great scientists such as Albert Einstein , Issac Newton, Charles Darwin had with their peers. Infact in the scientific world and in psychology, the poor Father-Son relationship is known to be one of the greatest triggers in the making of some of the greatest scientists the mankind have ever had.
  Indeed Copernicus did not enjoy "the pleasure of the people and the authorities" when he announced the heliocentricity.
  Why then do we still let Congeniality to be a evaluation parameter for Competence ? Those Behaviours which seek to "win the pleasure of peers" are those of sycophants and of the incompetent who seek alternate routes to success. To work 'enjoying in the pleasure of someone' conduct are the equivalent of "Casting Couch" we know of in the film-making industry. Will this behaviour ever yield righteousness? And the Justice??
   Why else do the incompetent and corrupt politicians commonly agree and call for appointments of people who have "good will" , who are "congenial" , and seek to redeem a power in themselves to make or repeal appoints of those who "enjoy the pleasure of the senior" ?

Monday, September 29, 2014

राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ की आलोचना

राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ और बाकी हिन्दुत्ववादी संघटनो की सर्वप्रथम ख़राब आदत है पश्चिम में हुए वैज्ञानिक सिद्धांतों और खोजों को नक़ल करके उन्हें प्राचीन वैदिक ज्ञान जताना।
  आर्यभट्ट और रामानुजम प्राचीन भारत के अपने समय और युग के अग्रिम गणितज्ञ थे। संघ और हिंदुत्व वादियीं ने इनके नाम पर इनके वास्तविक योगदान से कही अधिक श्रेय दे दिया है। प्य्थोगोरस थ्योरम और यहाँ तक कि कैलकुलस (सूक्षम संख्याओं की गणित, वास्तविक खोज न्यूटन द्वारा) को भी मूल उत्पत्ति भारत की ही बता डाला है।
   शून्य की खोज भारत में हुयी मगर संघियों ने इस खोज को ऐसा गुणगान किया की बस मानो बाकी सब खोज का ज्ञान आरम्भ-अंत यही था।
   धरती के गोलाकार और सूर्य की परिक्रमा करने की ज्ञानी खोज कॉपरनिकस द्वारा ही हुई थी। मगर संघ के लोगों ने कुछ 'अस्पष्ट सूचकों' को "स्पष्ट प्रमाण" समझ कर इस अधभुत खोज को प्राचीन वैदिक ज्ञान जता रखा है। मेरे व्यक्तिगत दर्शन में भारत की भौगोलिक स्थिति में ही कुछ वह खगोलीय घटनाएं नहीं है जिनसे यहाँ के मानस प्रेरित हो पाते यह विचार करने के लिए की धरती गोलाकार है और सूर्य की परिक्रमा करती है।
  संघ की इस हरकत के नतीजे में आज भारत की आबादी का बड़ा प्रतिशत "श्रद्धावान" गुणों वाला है, "चैतन्य" गुणों वाला नहीं जो की प्रशन करे और तर्क करे।  संघ और उसकी राजनैतिक पार्टी के समर्थकों में यह गुण -दुर्गुण- एकदम सपष्ट दिखता है।
   काफी सरे हिन्दुत्ववादियों में कर्मकांडी धर्म और विज्ञान के प्रति बहोत ही भ्रान्ति पूर्ण नज़रिय मिलता है। अक्सर करके लोग विज्ञान को कर्मकांडी धर्म का उपभाग ही मानते है - जैसे मानो की विज्ञान किसी खोई हुई प्राचीन शक्ति को फिर से ढूँढ रहा हो । संघ ने विज्ञानं की खोजो का ऐसा दृष्टिकोण पैदा किया है। आधुनिक तकनीके -राकेट , परमाणु बम इत्यादि को लोग प्राचीन "राम चन्द्र जी के तीर" और "ब्रह्मास्त्र" से तुलना कर के देखते है। यह सब भ्रांतियां हमारे संघ की देंन है। काफी सरे लोग आज भी आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई छोड़छाड़ कर के "उस सत्य ज्ञान" की खोज में घर छोड़ कर हरिद्वार चले जाते हैं। लोग हस्त रेखा और ज्योतिष को भी "विज्ञान" ही मानते है , जिस प्रकार से गणित ,भौतिकी इत्यादि।
  आयुर्वेद को लीजिये। प्राचीन भारत से निकली एक चिकित्सा पद्दति जिसको की विश्व समुदाय ने प्राचीन युग की "वैज्ञानिक" विचार वाली पद्दति अवशय माना , मगर इतना विकसित और समृद्ध भी नहीं की वर्तमान की "एलोपैथिक" पद्धति से मुकाबला किया जा सके। संघ के श्रद्धावानों ने राजनैतिक बहुमत के दुरूपयोग से हालत यह कर दी है की आयुर्वेद को भारतं की आबादी का बड़ा हिस्सा एक विक्सित पद्दति मानता है और राम देव की दुकाने खूब चल रही है।
वर्तमान शोधकर्ताओं ने आयुर्वेद को एक वैज्ञानिक विचार वाली पद्दति में स्वीकारा था इसके कारण को स्पष्टता से समझना होगा। वह हर एक पद्दति जो किसी सिद्धांत पर आधारित हो जिसके माध्यम से उस पद्दति के ज्ञान को पीडी दर पीडी पारित किया जा सके , और जो सबके समक्ष इन्द्रिय अनुभव के आधार पर प्रमाणित हो ,वह वैज्ञानिक पद्दति मानी जाती है। आयुर्वेद का सिद्धांत था कि शरीर में रोग किन्ही तत्वों की कमी अथवा अज्ञात कारण से  उत्पन्न तत्वों के असंतुलन की वजह से रोग होते है - यह वैज्ञानिक विचार माना गया है। बल्कि आधुनिक एलोपैथिक ज्ञान में काफी सारे रोग ऐसे पाए गए जो की तत्वों या फिर  कि विटामिन इत्यादि की कमी से होते हैं।
तो इस प्रकार आयुर्वेद को वैज्ञानिक सिद्धांत वाला ज्ञान ज़रूर माना गया। मगर एलोपेथ ने भविष्य में रोगों के दूसरे कारक भी दूंढे, जहाँ आयुर्वेद पिछड़ गया। एक्स रे की खोज के बाद पश्चिमी पद्दति में शरीर के अन्दर झांकने का तरीका मिला, माइक्रोस्कोप के माध्यम से सूक्षम कोशिकाओं की संरचनाओं को समझा गया, रेडियोएक्टिव पदार्थों के द्वारा अंगों के अन्दर के प्रवाह को देखा गया, ecg, ct scan , इत्यादि कितनों ही नयी और विक्सित तकनीके आई और पश्चिम में चिकित्सीय सिद्धांत एक मूल सिद्धांत से कही आगे निकल गए। रसायन शास्त्र के सहयोग से तत्वों की पहचान हुई और दवाइयों का नाम एक अंतर्राष्ट्रीय रसायन शास्त्र मानक तकनीक से हुआ जिससे की कोई भी देश का, किसी भी सभ्यता का व्यक्ति दवाई को पहचान सके और जांच करे और पुष्टि करे।
आयुर्वेद पीछे रह गया। इसमें दवाई का नाम आज भी उस पेड-पोधे इत्यादि के नाम से होता है जिसे अंश उसके निर्माण में प्रयोग होते है। इस प्रकार आयुर्वेद की अंतर्राष्ट्रीय मानक पर स्वीकारिता कम होती है।
मुरली मनोहर जोशी जी, एक भाजपा नेता, ने कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी में रसायन शास्त्र के तत्वों के नाम और चिन्ह पढाये थे। संघीय समर्थकों की दृष्टि से यह एक गर्व करने की घटना है। इधर एक दूसरे नज़रिय से यह आराजकता थी कि जो आम सहमति से स्वीकारी गयी अंतर्राष्ट्रीय मानदंड और नामांकन पद्दति है - उसके विरुद्ध के तरीकों का प्रयोग हों रहा है। ऐसा करने से आपसी संचार को बाधा पहुचेगी।
   संघ ने भारत में "हिंदी समर्थकों" की एक ऐसी आबादी तैयार करवा दी है जिसमे अंग्रेजी को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। यह दुःख की बात है। संघ ने ऐसा यह नतीजा प्राप्त किया है एक विचार को बार-बार दोहरा कर -कि, "भारतीय को स्वयं को हेय की दृष्टि से देखना बंद करना होगा" । इस विचार के पुनरावृत्ति के परिणाम में भारत ने एक दूसरे किस्म की विकृत मानसिकता की आबादी को जन्म दे दिया है जिसमे की यदि अंग्रेजी में कुछ सही भी हो तो भी उसे स्वीकार नहीं किया जाता है , और अंग्रेजी के समर्थकों को "मकौले के औलाद" , इत्यादि अपशब्दों से संबोधित किया जाता है।
दूसरे शब्दों में , संघ ने भारतीय आबादी के अंतःकरण की मूल समस्या- की हम श्रद्धावान अधिक है ,विवेकशील और चैतन्य कम--को दुबारा श्रद्धा के माध्यम से निवारण करने का प्रयास कर दिया है।
वास्तविक नतीजों में आबादी के नज़रिय में कोई खास सुधार नहीं हुआ है, और हम आज भी "गुलामी" के कागार पर खड़े है -जब कुछ राजनेताओं की सांठ गाँठ ने देश को हज़म लिया है। "गुलामी" हमारे "श्रद्धावान" मनोभाव का सहगुण है। जहाँ श्रद्धा अधिक विकराल है, वहां गुलामी लाना आसान है।
संघ इतिहास को अपनी श्रद्धा के अनुसार पुनःलेखन की कोशिश करता है।
   संघ में अक्सर सुभाष बोसे को और सरदार पटेल को गांधी से अधिक महत्त्व देते हैं। नतीजे में संघ समर्थकों को गांधी के प्रजातांत्रिक संविधान में महत्व कम समझ में आते है। अहिंसा विकास के लिए बहोत महत्व पूर्ण है- यह भूल जाया जाता है।
  कश्मीर मुद्दे पर भी संघ और उसके समर्थकों ने ऐसी आबादी को पैदा कर दिया है जिसमे की "कश्मीर हमारा है" और "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है" की ऐसी मानसिकता है कि जैसे खुद कश्मीरीयों की इच्छा को जानना ज़रूरी न हो! यह नैतिकता और मानवता के एकदम विपरीत की सोच है- पूरी तरह निकृष्ट । ऐसी सोच भी श्रद्धा के परिणाम हैं, चैतन्य का नाश करते हुए।
    Secularism के विषय में संघ ने secularism की छवि और व्यापक अर्थ "गैर हिन्दू जनसँख्या का तुष्टिकरण" कर दिया है। मूल अर्थ जो की पश्चिम की सभ्यता में उभरा, वह भारत की आबादी से गोचर है। लोगों मे यह चैतन्य भी नहीं बचा है की सोच सके कि कैसे Democracy के लिए Secularism आवश्यक है। सार्वजनिक चेतना में यह आत्म ज्ञान  नहीं है की पश्चिम के इतिहास की किन घटनाओं से यह सबक मिला कि Secularism समाजिक विकास और शान्ति व्यवस्था के लिए आवशयक होगा।
  बल्कि संघ ने Democracy के प्रत्यय के हिंदी अनुवाद के दौरान इसके मूल भाव को ही भ्रष्ट कर दिया है। लोग Democracy की तुलना राम-राज्य से करते हैं। और Secularism का अर्थ गैर हिन्दू तुष्टिकरण  से। कुछ एक संघी समर्थक Secularism को भारतीय संविधान के लिए अनावश्यक मानते है,इस तर्क पर कि जब भारत के इतिहास में पश्चिम जैसी वह घटनाएं हुयी ही नहीं है तब इसका भारत से क्या वास्ता। यह सब संघ समर्थक Secularism को वैज्ञानिक और तकनीकी विकास से जोड़ कर नहीं समझ पाते है, और न ही इसे भारत में हुए जात पात और छुआछूत की त्रासदी से। भारत की बहु-पक्षीय आबादी में न्याय के सूत्रों में Secularism की आवश्यकता तो शायद संघ समर्थकों की बुद्धि के परे है।

   संघ और हिन्दुत्ववादी संघटनों को आत्म सुधार की बहोत आवश्यकता है। इसमें सबसे महतवपूर्ण कार्य यह होगा की संघ श्रद्धा के अंतःकरण को लघुकार करे और चैतन्य अंतःकरण को दीर्घाकार करे।